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"जेब है खाली खाली, जरूरतों ने छेड़ा संग्राम है पिता ने देखा है उम्मीद से, माँ का भी पैगाम है रात रात तक काम करवाने वाला मालिक मेरा आज क्यों और कहाँ गुमनाम है अपनी भावनाओं का आज कुछ शब्दों में अनुवाद करते हैं क्योंकि वेतन के दिन बाबूजी नहीं हमको याद करते हैं काम करने के चक्कर में खाना पीना भूल जाते हैं पसीने से सराबोर इतने, मुफ़्त में कपड़े धुल जाते हैं छोटे बड़े किसी भी काम को मना नहीं करते हम हर ज़िम्मेदारी को बड़ी शिद्दत से निभाते हैं अपना संडे भी आपके चक्कर में बर्बाद करते हैं फिर भी वेतन के दिन बाबूजी नहीं हमको याद करते हैं देखो साहेब, कैसे ये उंगलियां काँप रहीं हैं आपके जूतों की कीमत से हैसियत अपनी नाप रही हैं गाड़ी के शीशे को चमकाने के चक्कर में कालिख को काज़ल समझे, कर पश्चाताप रही हैं आप तो काम करवाने के नए नए तरीके ईजाद करते हैं फिर क्यों वेतन के दिन बाबूजी नहीं हमको याद करते हैं हम पर तो भोलू, भुलक्कड़, निक्कमे का टैग लगाते हैं अपना काम भले बीच में ही छोड़ आते हैं फीकी चाय सी कर के रख दी ज़िंदगी हमारी खुद रोज रात को रम और रॉयल स्टैग चढ़ाते हैं आज आखिरी बार हाथ जोड़ कर आपसे फरियाद करते हैं फिर फर्क नहीं पड़ेगा, क्यों वेतन के दिन बाबूजी नहीं हमको याद करते हैं"

जेब है खाली खाली, जरूरतों ने छेड़ा संग्राम है
पिता ने  देखा है उम्मीद से, माँ का भी पैगाम है
रात रात तक काम करवाने वाला मालिक मेरा
आज क्यों और कहाँ गुमनाम है
अपनी भावनाओं का आज कुछ शब्दों में अनुवाद करते हैं
क्योंकि वेतन के दिन बाबूजी नहीं हमको याद करते हैं

काम करने के चक्कर में खाना पीना भूल जाते हैं
पसीने से सराबोर इतने, मुफ़्त में कपड़े धुल जाते हैं
छोटे बड़े किसी भी काम को मना नहीं करते हम
हर ज़िम्मेदारी को बड़ी शिद्दत से निभाते हैं
अपना संडे भी आपके चक्कर में बर्बाद करते हैं
फिर भी वेतन के दिन बाबूजी नहीं हमको याद करते हैं

देखो साहेब, कैसे ये उंगलियां काँप रहीं हैं
आपके जूतों की कीमत से हैसियत अपनी नाप रही हैं
गाड़ी के शीशे को चमकाने के चक्कर में
कालिख को काज़ल समझे, कर पश्चाताप रही हैं
आप तो काम करवाने के नए नए तरीके ईजाद करते हैं
फिर क्यों वेतन के दिन बाबूजी नहीं हमको याद करते हैं

हम पर तो भोलू, भुलक्कड़, निक्कमे का टैग लगाते हैं
अपना काम भले बीच में ही छोड़ आते हैं
फीकी चाय सी कर के रख दी ज़िंदगी हमारी
खुद रोज रात को रम और रॉयल स्टैग चढ़ाते हैं
आज आखिरी बार हाथ जोड़ कर आपसे फरियाद करते हैं
फिर फर्क नहीं पड़ेगा, क्यों वेतन के दिन बाबूजी नहीं हमको याद करते हैं

कोई मेरे निजी विचार नहीं हैं अपने दोस्त Amardeep Kumar की फरमाइश पर लिखा है। लेकिन देखा जाए तो आधे से ज्यादा मालिकों के सच तो यही है। कर्मचारी काम करते करते मर भी जाएँ तो भी ज्यादातर मालिक खुश नहीं होते।
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