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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 10

।।श्री हरिः।।
10 – अचौर्य

श्रीपशुपतिनाथ का दर्शन तब इतना सुलभ नहीं था जितना आज हो गया है। तब पक्की सड़क नेपाल तक नहीं बनी थी। कुछ दूर रेलवे यात्रा, कुछ दूर मोटरों से और फिर पैदल।

मुझे कल्पना भी नहीं थी कि रेलवे इंजिन में पत्थर के कोयले के स्थान पर लकड़ी का ईंधन उपयोग करने से क्या कठिनाई आती होगी। शिवरात्रि के अवसर पर कुछ दिनों के लिए तीर्थयात्रियों को भारत से काठमांडु जाने की बिना छानबीन अनुमति दी जाती है। वैसे ही अनुमति-पत्र उस समय भी दिये गये; और उन्हें एक नेपाली अधिकारी ने उदारतापूर्वक सबको बाँट दिया। मार्ग में एक स्थान पर अनुमति-पत्र को जाँच भी साधारण ही हुई।

मेले के अवसर पर भीड़ की टेलमठेल सर्वत्र होती है। बड़ी कठिनाई से हम रेल के एक मालगाड़ी के डिब्बे में घुस सके और किसी प्रकार दबे-सिकुड़े खड़े हो गये। ट्रेन चली और साथ ही यात्रियों की आँखों से आंसू चले। इंजिन में लकड़ी जल रही थी। उसका धुआँ बहुत कष्ट दे रहा था। मिनट-दो-मिनट पर कोई-न-कोई चौंकता था। इंजिन मे लकड़ी के जलनेसे चिनगारियां उड़ रही थी और वे यात्रियों के शरीर या वस्त्रों पर पड़ती थी। कइयों के फफोले पड़े, कइयों को वस्त्र में लगी आग बुझानी पड़ी।

लकड़ी बहुत कम ताप दे पाती है। ट्रेन इस गति से चल रही थी कि कोई भी चाहे जब उतर सकता था या दौड़कर चढ़ सकता था। स्टेशन आया और डेढ़-दो घंटे इंजिन में लकड़ी चढायी जाती रही। इस प्रकार लगभग 24 मील की यात्रा सायंकाल चार बजे जो प्रारम्भ हुई थी रात्रि के लगभग ग्यारह बजे पूरी हुई।

यदि मार्ग होता और घोर जंगल न पडता होता तो इतनी देर में हम पैदल भी यह यात्रा कर ले सकते थे। बैलगाड़ी की सवारी तो उस समय की उस ट्रेन से शीघ्रगामी सिद्ध होती।

हमें मालगाड़ी के डिब्बों से छुट्टी मिली। किस दुकानदार ने दो हाथ रात्रि के तीन-चार घंटे व्यतीत करने को प्रदान करने की कृपा की, अब स्मरण नहीं। प्रात: चार बजे से पूर्व ही सामान ढोने वाली एक मोटर ट्रक में हम सब लद गये और भीमफेड़ी पहुँचे।

पहाड़ी चक्करदार मार्गों पर कुछ यात्रियों को चक्कर आता है, वमन होता है। ट्रक में यात्री अधिक बेठे थे। यह अच्छा हुआ था; क्योंकि परस्पर सटे होने से शरीर हिल नहीं पाते थे। इससे चक्कर एक दो यात्रियों को ही आया था। विशेषकर सबसे पिछले भाग में बैठ उन यात्रियों को, जिन्हें बैठने का स्थान कुछ अधिक मिल गया था।

भीमफेड़ी से आगे पैदल यात्रा करनी थी। वहाँ दो घंटे विश्राम, नित्यकर्म, स्नान और भोजन - इतना ही कार्यक्रम था; किंतु वहाँ जो छोटी-सी धर्मशाला थी, उसके घेरे में जाते ही चित्त खिन्न हो गया। घेरे में चलने की पगदंडी मात्र स्वच्छ थी। पूरा घेरा यात्रियों ने शौच बैठकर गंदा कर दिया था। जब कि समीप ही मैदान था; नाला था और कुछ गज आगे जंगल भी था।

'यात्री - तीर्थयात्री इतने असावधान क्यों होते है?' सोचता रहा। मन्दिर में स्थित देवता के दर्शन ही पुण्य नहीं है। पुण्य है उनकी कृपा प्राप्त करना और देवता की कृपा तप से, सेवा से, श्रद्धा से तथा भजन से मिलती है। हम दुसरे देवदर्शनार्थ आने वाले श्रद्धालुओं को धक्का देकर, उनके लिए असुविधा उत्पन्न करके मन्दिर में घुस भी जायें, तो क्या देवता प्रसन्न होंगे? उनकी कृपा मिलेगी हमें?

जहाँ यात्री रुकते हैं, जहाँ से चलते हैं, जहां बैठते, जल पीते या स्नान भोजन करते हैं, उसके आस पास अथवा जलधारा के समीप गंदगी करके हम भक्तापराध ही तो करते हैं। दुससे श्रद्धालु यात्रियों के लिए असुविधा ही तो उत्पन्न करते हैं और हम जानते हैं कि भगवान भी भक्तापराध क्षमा नहीं करते।

यात्रियों की सेवा, उनके उपयोगी स्थलों की स्वच्छता और देव-दर्शन में दूसरों की सुविधा का ध्यान - यह ऐसी पूजा है जो देवता को किसी भी बहुमूल्य उपचार से कहीं अधिक प्रिय होती है।

मैं यह सब सोचता रहा और ढूंढ़ता रहा कि कहीं बैठने को स्थान मिल जाय तो स्नान-संध्या का क्रम प्रारम्भ हो।
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यात्रा में मेरे साथ दो और यात्री हो गये थे। वे मुझे मुजफ्फरपुर स्टेशन पर मिले थे और काठमांडू तक साथ रहे। हम तीनों धर्मशाला के पिछे की ओर उसके पक्के चबूतरे पर बैठ गये। बारी-बारी से नित्यकर्म एवं स्नान हमने किया। अब मैं नित्य के पाठ-पूजन में लगा और वे दोनों साथी भोजन करने में लग गये।

हमें कुलियों के एक समुदाय ने घेर लिया था। पर्वतीय दूरस्थ ग्रामों के ये गरीब लोग इस आशा में इस समय यहाँ आ जाते हैं कि यात्रियों का सामान ढोकर दो पैसे अपने बाल-बच्चों के लिये ले जा सकें। वर्षभर के लिए वस्त्र तथा घरेलू खेती आदि के औजार वे मजदूरी के पैसों से ही ले जाते हैं।

प्राय: सभी यात्रियों के पास उन्हें घेरे कुलियों का समूह खड़ा था। हम तीनों के पास इतना ही सामान था कि हमने सम्मिलित रूप से एक कुली करना निश्चय किया था। वे दोनों साथी मेरी ओर संकेत करके कह रहे थे - 'इन बाबू को पूजा कर लेने दो तो ये तुमसे बात करेंगे।'

हमको बताया गया था कि यहाँ अपने सामान से सावधान रहना चाहिये; किंतु ऐसी सावधानी, पता नहीं, मुझमें कभी आयेगी भी या नहीं। संध्या-पूजा के समय भी सब सामान आगे रखकर उसकी चौकीदारी की जाय तो कोई पूजा-पाठ क्या करेगा। मैंने सामान समेटकर पीछे कर दिया था। कम्बल के एक भाग में मेरे कपड़े और सामान लिपटा था। दूसरा भाग आगे बढाकर मैंने आसन बना लिया था।

मेरे दोनों साथी प्रायः मेरे पास एक पंक्ति में बैठे थे। मैदान की गंदगी दृष्टि में न आवे, इसलिए हमने मुख धर्मशाला की दीवार की ओर कर रखा था। अपना पूरा सामान और वस्त्र गोद में रखे वे मेरे साथ के यात्री उसी पर पूड़ियों की पत्तलें रखे भोजन कर रहे थे।

'ले गया! ले गया! हाय, ले गया!' सहसा साथ के दोनों यात्री चिल्ला उठे। उनमें से एक खड़े होकर भी फिर बैठ गये और दुसरे दौड़े, कुछ मिनट में वे भी लौट आये। कोई कुली उनकी गोद में से उनका कोट खींचकर भाग गया था और वह जंगल में निकल गया। अब ढूंढना सम्भव नहीं था।
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'वैसे ही क्या कम दरिद्रता का मारा है वह! चोरी तो उसे और कंगाल करेगी!' मुझे पता नहीं क्यों एक सनक है। बचपन में पिताजी से पाये संस्कार कह लीजिये। मेरी धारणा तर्कसंगत मैं कैसे कहूं, किंतु धारणा है कि 'चोरी का धन आया और मनुष्य विपत्ति में पड़ा। रोग, मुकदमे और कुछ न हो तो कोई दुर्व्यसन घर की पूंजी भी अवश्य ले जायेगा।'

'मेरी कोट की जेब में इनके भी पच्चीस रुपये थे।' मेरे साथी ने बताया। उन दोनों में एक व्यापारी थे और दूसरे किसी दफ्तर में काम करते थे। अब संतोष करने के अतिरिक्त उपाय भी क्या था।

'उसकी तो मौज हो गयी।' एक अन्य यात्री ने कहा - 'एक बढिया ऊनी कोट और पचास-साठ से कम नकद
तो क्या रहे होंगे जेब में।'

'लेकिन मौज नहीं, विपत्ति गयी उनके पास।' मैंने कहा - 'नेपाल में रुकना नहीं है, अन्यथा आप चार महीने बाद उसकी दशा देख सकते थे। जो धन सच्ची कमाई का है, उसे कोई चुरा नहीं सकता और जहां चोरी का धन आया, वह किसी-न-किसी रास्ते स्वयं जायेगा और घर की पूंजी भी ले जायगा।'

यह घटना पिछले महासमरसे पहले की है। तब 'ऊपर की आमदनी' गौरव की वस्तु नहीं थी और व्यपार में भी इतना छल नहीं घुस सका था। उस समय तक 'ब्लैक मार्केट' शब्द ने जन्म नहीं लिया था।

'मैं तो व्यापारी हूँ और व्यापार में आप जानते हैं कि कुछ कच्चा-पक्का करना पड़ता है।' जिनका कोट गया था, वे कुछ रुष्ट से स्वर में बोले - 'किन्तु इनके रुपये भी मेरी जेब में थे और अपने कार्यालय में इनके जैसा हाथ का शुद्ध कर्मचारी दूसरा नहीं है। इन्होंने वेतन के अतिरिक्त प्रसन्नतापूर्वक आये उपहार भी कभी स्वीकार नहीं किये।'

मैं अपनी भूल समझ गया। जो बात मैंने कोट चुरानेवाले को लक्ष्यकर कही थी, उसका आघात मेरे साथी को लगा। इस समय उनसे ऐसी बात कहना सर्वथा अशोभनीय था। साथ ही उन्होंने जो तथ्य उपस्थित किया, उसने मेरी धारणा को झकभोर दिया।

'आप सचमुच प्रशंसनीय है।' उन ईमानदार कर्मचारी की ओर मैंने देखा - 'आपकी अर्थ-हानि है आश्चर्य की ही बात। अपने कार्यालय में आप सम्भवतः सबसे अधिक परिश्रम करनेवाले भी होंगे।'

'परिश्रम तो मैं सबसे कम कर पाता हूँ। वे बोले - परिवार बड़ा है। प्राय: समय पर पहुंच नही पाता और थोड़ा सुस्त भी हूँ; किंतु हमारे मैनेजर बड़े अच्छे स्वभाव के हैं। वे मुझे मानते भी बहुत हैं।'

'तो यह बात है, आप श्रम की चोरी करते हैं।' मेरा समाधान हो गया था। वैसे मैं इतना अशिष्ट नहीं था कि यह बात मुंह से कहता। मुझे तो अपने दोनों साथियों को आश्वासन देना था और वह उस समय मेरा कर्तव्य था।

'चोरी तो चोरी है। धन चुराया तो और उचित श्रम किये बिना पारिश्रमिक ले लिया तो, चोरी तो बिना अनुमति एक इलची उठा लेना भी है।' मेरे मन ने कहा - 'जो किसी प्रकार की चोरी नहीं करेगा, उसे जीवन में आर्थिक संकट नहीं सहना पड़ेगा।' मेरी इस धारणा के प्रतिकूल अभीतक मुझे कोई प्रमाण नहीं मिला।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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Kiss Day quotes  सुनो पगली,
कभी तेरे जिस्म की चाहत नही रही मुझे
तू रूह से चाहे मुझे
बस इतना ही काफी है...।।

( रचना अनुशीर्षक में पढ़ें )
      👇👇👇👇👇 #NojotoQuote

#microtale

#KissDay_वाली_फीलिंग्स

Happy Kiss Day पगली,
पर इस बार तो तुम हो नही मेरे साथ लेकिन फिर भी मैने Wish किया है तुम्हें,
लेकिन हमारा पिछले साल का Valentine Week, जब हम दोनों साथ थे और उस Valentine Week का सातवां दिन था, Kiss Day, तुमने Wish किया था गलती से मुझे Hug Day और फिर खुद ही इस गलती पर किसी छोटे बच्चे की तरह खिलखिलाकर हंस पड़ी थी तुम ।

मेरे कुछ खास दोस्त जिनको पता था तुम्हारे बारे में वो भी मुझे उस दिन चिढ़ा रहे थे लेकिन मुझे उनकी कोई परवाह ना थी और ना ही मुझे कोई परवाह थी इस मोहब्बत के महीने में मोहब्बत के हफ्ते के दिनों को जानने की, मुझे तो बस तुम्हारा साथ चाहिए था ।।

लेकिन हर बार की तरह पिछले साल भी हमने पूरा Valentine Week ऑनलाइन ही मनाया था, पर मुझे उस बात का कोई दुख ना था, मैं तो इस बात से खुश था कि तुम्हारा मेरा साथ बना रहा था फिर हर कपल्स की तरह हमारे बीच लड़ाई कितनी भी क्यूँ ना हुई हो...!!!

और फिर तुम्हें तो याद है ना इन डेढ़ सालों (1.5 सालों) में हम केवल 2 बार ही तो मिल पाए थे । हां उस दिन Kiss Day तो नही था लेकिन मेरे लिए तो वही दिन Kiss Day के बराबर था क्योंकि मैने भी चूमा था तुम्हें उस दिन, जब मैं मिला था तुमसे दूसरी बार, लेकिन मैंने चूमा था तुम्हारे उस चाँद से चमकते माथे को और तब तुम शरमाकर सिमट गई थी मेरी बाहों में । तुमसे मिलने के बाद तुम्हारे सुर्ख गुलाबी लबों को चूमने का ख्याल तक ना आया और फिर ना ही कोशिश की मैंने और सच बताऊं तो मैं ये चाहता भी नही था ।।

उस दिन मैंने अपने दायरे में रहकर तुम्हें अपने प्रेम का अहसास कराया पर उस दिन सिर्फ तुम्हारे माथे को नही चूमा था मैंने उस दिन मैंने तुम्हारे अन्तर्मन को भी स्पर्श किया था क्योंकि मेरे चूमने के दौरान तुम्हारी बन्द हुई आंखें इस बात का सबूत दे रही थीं ।।

#मेरी_कलम_से✍️

#MayanK

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rose day quotes in Hindi Happy Rose Day पगली

आज Rose Day है ना इसीलिए Wish किया तुम्हें
पिछले साल की तरह मैं इस साल भी wait कर रहा था 
तुम्हारे इस Valentine Week के पहले दिन के Msg का, 
पर सच तो ये है कि तुम्हारा Msg अब कभी नहीं आएगा....
पर मुझे उसकी कोई परवाह नही है ।

पिछले साल की तरह इस साल भी मैंने तुम्हारे लिए फिर से गुलाब खरीदा है
और हर साल मैं गुलाब खरीदता रहूंगा; सिर्फ तुम्हारे लिए; तुम्हें देने के लिए ।।

पर शायद तुम्हें अब वक्त लगेगा फिर से मेरी ज़िंदगी में वापस आने में
पर एक वादा है तुझसे जब भी तुम मेरी ज़िंदगी में वापस आओगी ना,
मैं तुम्हारे इन सभी गुलाबों को तुम्हें दूँगा ।

हां मुझे मालूम है तब तक ये सभी गुलाब मुरझा चुके होंगे, सूख चुके होंगे
लेकिन मुझे पूरी उम्मीद है, उस वक़्त भी ये सभी गुलाब 
"हमारे" प्रेम की पवित्रता से हमेशा महकते रहेंगे ।।

#मेरी_कलम_से✍️ #NojotoQuote

#microtale

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Miss You Quotes सुनो

कल रात जब सभी नए साल की बधाई एक-दूसरे को दे रहे थे ना, 

तब मैं भी पिछले साल की तरह इस साल भी इंतजार कर रहा था
तुम्हारे उन new years के msgs का जो तुमने मुझे किये थे...

मैं भी पिछले साल की तरह इस साल भी इंतजार कर रहा था
तुम्हारी एक नई तस्वीर पाने का जिससे मैं तुम्हारी एक झलक दोबारा पा सकूँ...

मैं भी पिछले साल की तरह इस साल भी इंतजार कर रहा था
तुमसे एक बार, हाँ केवल एक बार तुमसे दोबारा मिल पाने का...

पर मुझे मालूम है कि अब तुम कभी वापस नही आओगी 
इसलिए तुम्हारी दी हुई बेशकीमती यादों से
मैं किसी तरह खुद को मुक़म्मल करने की कोशिश कर रहा था

और इसीलिए इस साल मैं केवल तुम्हारे उन पुराने msgs को पढ़ रहा था
जो तुमने मुझे भेजे थे

इस साल मैं तुम्हारी उसी पुरानी तस्वीर को देख रहा था
जो तुमने मुझे भेजी थी ।।

इस साल भी मैं पिछले साल की उस पुरानी मुलाकात को फिर से याद कर रहा था
जब एक-दूसरे का साथ पाकर हम मुक़म्मल हुए थे ।।


पर अब ये ज़िन्दगी उन सब पलों को दोबारा नही दोहराने वाली पर एक-दूसरे के साथ बिताए हुए वो बेशकीमती पल मेरे जेहन में हमेशा जीवित रहेंगे ।। #NojotoQuote

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भारतीय सेना के शहीद कैप्टन विजयंत थापर एवम 6 वर्ष की कश्मीरी लड़की रुकसाना
यह घटना है 1999 कि जब कैप्टन विजयंत थापर 22 वर्ष के थे एवम 2 राजपूताना राइफल्स में तैनात थे। उनकी यूनिट के नजदीक 6 वर्षीया रुकसाना रहती थी जिनके पिता की आतंकियों ने हत्या कर दी थी। एक दिन कैम्प से बाहर कैप्टन थापर ड्यूटी के दैरान खाना खा रहे थे तो रुकसाना वहां आ के बैठ गयी, उसके बाद कैप्टन थापर ने उसे भी खाना खिलाया और उस से पूछा कि तुम स्कूल क्यों नहीं जाती हो? वहां आस-पास जांच करने पर पता चला कि रुकसाना के परिवार के पास पैसे नहीं हैं और उस के पिता को आतंकियों ने मार दिया है। कैप्टन थापर ने कहा कि रुकसाना की पढ़ाई का सारा खर्च वह खुद उठाएंगे।
इसके बाद कारगिल युद्ध शुरू हो गया। कैप्टन थापर ने अपने पिता रिटायर्ड कर्नल वी एन थापर को चिट्ठी लिखी और कहा कि अगर युद्ध में उसे कुछ हो जाता है तो आप स्वयं रुकसाना की पढ़ाई व उसकी देखरेख का खर्च उठाएंगे। कारगिल युद्ध में कैप्टन थापर की यूनिट को तोलोलिंग हिल पर कब्ज़ा करने की ज़िम्मेदारी दी गयी। अभियान के दैरान पहले लक्ष्य "बर्बाद बंकर" पर कैप्टन थापर व उनकी टीम ने कब्ज़ा कर लिया, जब उनकी यूनिट आगे बढ़ने लगी तो दुश्मन की एक गोली कैप्टन थापर के सिर में लगी और कैप्टन थापर शहीद हो गए।
कैप्टन थापर को शहीद हुए 19 वर्ष हो चुके हैं, पिछले 19 वर्ष से लगातार कैप्टन थापर के पिता रिटायर्ड कर्नल वी एन थापर रुकसाना की पढ़ाई व देखरेख का खर्च उठा रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले रुकसाना और उसके चाचा नोएडा में रिटायर्ड कर्नल थापर के घर भी आये थे। हर वर्ष रिटायर्ड कर्नल थापर कश्मीर जाते हैं और रुकसाना की पढ़ाई व देखरेख पर आने वाले सभी खर्च की पेमेंट करते हैं। रुकसाना ने पिछले वर्ष 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी की है व अब कॉलेज में जा के आर्ट्स की पढ़ाई करना चाहती है।
ये हैं भारतीय सेना के महान संस्कार, "जान जाए लेकिन वचन न जाए"।
शहीद कैप्टन विजयंत थापर को श्रद्धांजलि व उनके पिता कर्नल थापर को सलाम🙏

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