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पिछले

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स्कूली बातें ...
पार्ट - ।।

हार का ठीकरा , बच्चों के सर

            - लाखाराम

नमस्कार! स्कूली बातें पार्ट- ।। में आपका स्वागत है ।
12 वीं में मेरा परिणाम 10 वीं के मुकाबले कम बने , हाँलाकि यह मेरे जिन्दगी की हार नहीं है लेकिन कमजोरी जरूर हैं क्योंकि इस साल में मुझे जिन चीजों से रूबरू होना था उनसे नहीं करवाया गया बल्कि सिर्फ उसका आभास करवाया गया ।
हमारा रिवाज यही हो चुका है कि हम अपने बच्चों का परीक्षा परिणाम हमेशा 80-90 % के अंकों में देखना चाहते हैं जो जरूरी नहीं है लेकिन गैर जरूरी भी नहीं ।
निजी विद्यालय भी यही पैन्तरा अपनाते हैं पिछले सालों के परिणाम के आधार पर नये बच्चों को रिझाते है, मेरे 10 वीं के परिणाम का वैसे ही प्रयोग किया गया ।
अब जब 12 वीं के परिणाम में गिरावट आई तो कई परिजनों ने सवाल किये जिन्होंने मेरे पिछले परिणाम को देख ,मेरी स्कूल में अपने बच्चों को एडमिशन दिलाया था जो अधिकतर मेरे गाँव से है ।
हमारे गुरूजन उन्हें (आने वाले बच्चों, अभिभावकों को) जवाब देते हैं ,, " वो लाखाराम वैसे भी पढ़ता नहीं था दिन भर फेसबुक चलाता रहता है । "
लगता है हमारे शिक्षक उन महान व्यक्तियों के विचारों से अनजान हैं जिन्होंने कहा था कि
" विद्यार्थी, शिक्षक का आईना होता है ।"

"जब कोई विद्यार्थी फेल होता है तो वास्तव में विद्यार्थी नहीं शिक्षक फेल होता है ।"
खैर इन महान व्यक्तियों ने शिक्षकों की बात की है व्यापार करने वालों की नहीं ।
हमारे निजी विद्यालयों को तो बिजनेस से मतलब है वो क्यों करेगे इन महान विचारकों की बातों पर मनन ।


बेचारी फेसबुक को दोष दे दिया जबकि सच्चाई यह है कि मेरे पास कोई मोबाइल था ही नहीं भईया के मोबाईल पर कभी कभार फेसबुक चलाता था । 12 वीं के दौरान कुल मिलाकर 10 पोस्ट की थी वो भी खास मौकों की ।
मुझ पर फेसबुक पर टाईम खराब करने का दोष वो शिक्षक दे रहे हैं जिन्होंने मेरे सहित काफी बच्चों को 12 वीं अपने स्कूल के प्रचार-प्रसार हेतु कई दिनों तक गाँव-गाँव घुमाया ।
खैर कोई नहीं ये फेसबुक वगैरह सब अपनी कमजोरियों को छिपाने का तरीका है । चलो मैं फेसबुक चलाता भी होता होगा लेकिन मेरे एक सहपाठी को छोड़कर समस्त विज्ञान के विद्यार्थियों के परीक्षा परिणामों में गिरावट आई,,,। उसके जिम्मेदार कौन है,, उनमें से कईयों के पास मोबाइल जैसा कुछ नहीं था पढ़ने में भी अच्छे से लेकिन क्यों ? स्कूल के पास कोई जवाब हैं क्या ?

आपके बिजनेस करने का यही तरीका है तो सारे शहर में पिटा तो ढिढोरा कि लाखाराम ने पढाई नहीं की थी ।

पिछली पोस्ट पर मुझे अपना प्यार देने वाले समस्त पाठकों को आभार ।
आशा करता हूँ कि यूँ ही आपका प्यार बना रहेगा ।
आपके भी इस बारें में कोई अनुभव हो तो जरूर comment box में शेयर करें ।
आपसे अपने अनुभव साझा करने का यही मकसद है कि आप भी शिक्षा के क्षेत्र में फैली बुराईयों से रूबरू हो सके एवं इनका सामना करने के काबिल हो सके ।
Note- यह मेरे अनुभव है जो मैंने प्राप्त किये हैं ।
कोई व्यक्तिगत ना ले ,,, बुरा लगे तो खुद में बदलाव करें ।
स्कूली बातें पार्ट-।।। जल्द ही,,,,

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7 months ago

"Moral ऑफ the Story"

अकेले में रहने से पौधे सूक जाते हैं
अगर उन्हें दूसरे पौधों का साथ मिल जाए तो फिर से जी उठते हैं
Read Full Story in Caption👆
✍✍bHaraT✍✍

मेरी पत्नी ने कुछ दिनों पहले घर की छत पर कुछ गमले रखवा दिए और एक
छोटा सा गार्डन बना लिया।

पिछले दिनों मैं छत पर गया तो ये देख कर हैरान रह गया कि कई गमलों में
फूल खिल गए हैं,
नींबू के पौधे में दो नींबू 🍋🍋भी लटके हुए हैं और दो चार हरी
मिर्च भी लटकी हुई नज़र आई।

मैंने देखा कि पिछले हफ्ते उसने बांस 🎋का जो पौधा गमले में लगाया था,
उस गमले को घसीट कर दूसरे गमले के पास कर रही थी।

मैंने कहा तुम इस भारी गमले को क्यों घसीट रही हो?

पत्नी ने मुझसे कहा कि यहां ये बांस का पौधा सूख रहा है, इसे खिसका कर इस पौधे के पास कर देते हैं।

मैं हंस पड़ा और कहा अरे पौधा सूख रहा है तो खाद डालो, पानी डालो। 💦

इसे खिसका कर किसी और पौधे
के पास कर देने से क्या होगा?" 😕

_*पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा ये पौधा यहां अकेला है इसलिए मुर्झा रहा है।*

इसे इस पौधे के पास कर देंगे तो ये फिर लहलहा उठेगा। ☺

पौधे अकेले में सूख जाते हैं, लेकिन उन्हें अगर किसी और पौधे का साथ मिल जाए तो जी उठते हैं।"

यह बहुत अजीब सी बात थी। एक-एक कर कई तस्वीरें आखों के आगे बनती
चली गईं।

मां की मौत के बाद पिताजी कैसे एक ही रात में बूढ़े, बहुत बूढ़े हो गए थे।

हालांकि मां के जाने के बाद सोलह साल तक वो रहे, लेकिन सूखते हुए पौधे की तरह। 😞

मां के रहते हुए जिस पिताजी को मैंने कभी उदास नहीं देखा था, वो मां के जाने के बाद
खामोश से हो गए थे।😔

_*मुझे पत्नी के विश्वास पर पूरा विश्वास हो रहा था।*_

लग रहा था कि सचमुच पौधे अकेले में सूख जाते होंगे।

बचपन में मैं एक बार बाज़ार से एक छोटी सी रंगीन मछली 🐠खरीद कर लाया था और
उसे शीशे के जार में पानी भर कर रख दिया था।

मछली सारा दिन गुमसुम रही।
मैंने उसके लिए खाना भी डाला, लेकिन वो चुपचाप इधर-उधर पानी में अनमना सा घूमती रही।

सारा खाना जार की तलहटी में जाकर बैठ
गया, मछली ने कुछ नहीं खाया। दो दिनों तक वो ऐसे ही रही, और एक सुबह मैंने देखा कि वो पानी की सतह पर उल्टी पड़ी थी। 😞😞

आज मुझे घर में पाली वो छोटी सी मछली याद आ रही थी।

बचपन में किसी ने मुझे ये नहीं बताया था, अगर मालूम होता तो कम से
कम दो, तीन या ढ़ेर सारी मछलियां खरीद लाता और मेरी वो प्यारी
मछली यूं तन्हा न मर जाती। 😢

बचपन में मेरी माँ से सुना था कि लोग मकान बनवाते थे और रौशनी के लिए कमरे में दीपक🔥 रखने के लिए दीवार में इसलिए दो मोखे बनवाते थे क्योंकि माँ का
कहना था कि बेचारा अकेला मोखा गुमसुम और उदास हो जाता है।

मुझे लगता है कि संसार में किसी को अकेलापन पसंद नहीं।

_*आदमी हो या पौधा, हर किसी को*
_*किसी न किसी के साथ की ज़रुरत होती है।*

आप अपने आसपास झांकिए, अगर कहीं कोई अकेला दिखे तो उसे अपना
साथ दीजिए, उसे मुरझाने से बचाइए।

अगर आप अकेले हों, तो आप भी
किसी का साथ लीजिए, आप खुद को भी मुरझाने से रोकिए।

_*अकेलापन संसार में सबसे बड़ी सजा है।* गमले के पौधे को तो हाथ से खींच
कर एक दूसरे पौधे के पास किया जा सकता है, लेकिन आदमी को करीब लाने के
लिए जरुरत
होती है रिश्तों को समझने की, सहेजने की और समेटने की।😊

अगर मन के किसी कोने में आपको लगे कि ज़िंदगी का रस सूख रहा है,
जीवन मुरझा रहा है तो उस पर रिश्तों के प्यार का रस डालिए। 💧☺

खुश रहिए और मुस्कुराइए।☺ कोई यूं ही किसी और की गलती से आपसे दूर हो
गया हो तो उसे अपने करीब लाने की कोशिश कीजिए और हो जाइए
हरा-भरा।
#Home ✍✍रिश्तों को भी भूख-प्यास लगती है, मेरे दोस्त
जरा उनको भी प्यार परोस के देखों, कभी पास लाके देखो वो भी हरे-भरे हो जाएंगे
✍✍🅱✍✍

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|| श्री हरि: ||
3 - भरोसा भगवान का

'वह देखो!' याक की पीठ पर से ही जो कुछ दिखाई पड़ा उसने उत्फुल्ल कर दिया। अभी दिनके दो बजे थे। हम सब चले थे तीर्थपुरी से प्रात: सूर्योदय होते ही, किंतु गुरच्याँग में विश्राम-भोजन हो गया था और तिब्बतीय क्षेत्र में वैसे भी भूख कम ही लगती है। परन्तु जहाँ यात्री रात-दिन थका ही रहता हो, जहाँ वायु में प्राणवायु (आक्सिजन) की कमी के कारण दस गज चलने में ही दम फूलने लगता हो और अपना बिस्तर समेटने में पूरा पसीना आ जाता हो, वहाँ याक की पीठपर ही सही, सोलह मील की यात्रा करके कोई ऊब जाय, यह स्वाभाविक है। कई बार हम पूछ चुके थे 'खिंगलुंग' कितनी दूर है। अब दो बज चुके थे और चार-पाँच बजे तक हमें भोजनादि से निवृत्त हो जाना चाहिये। तंबू भी खडे़ करनेमें कुछ समय लगता है। सूर्यास्त से पहले ही अत्यन्त शीतल वायु चलने लगती है। इन सब चिन्ताओं के मध्य एक इतना सुन्दर दृश्य दिखायी पडे - सर्वथा अकल्पित, आप हमारी प्रसन्नता का अनुमान नहीं कर सकते।

'ओह! यह तो संगमरमर का फुहारा है।' मेरे बंगाली मित्र भूल गये कि वे अर्धपालित पशु याक पर बैठे हैं। याक तनिक सा स्पर्श हो जाने से चौंक कर कूदने-भागने लगता है। उस पर बैठने वाले को बराबर सावधान रहना पड़ता है। कुशल हुई - मेरे साथी का याक तनिक कूद कर ही फिर ठीक चलने लगा था। उसे साथ चलने वाले पीछे के याक ने सींग की ठोकर दी थी, मेरे साथी सामने देखने में लगे होने से असावधान थे; किंतु गिरे नही, बच गये।

'संगमरमर नहीं है, गंधक का झरना है। गंधक के पानी ने अपने आप इसे बनाया है।' हमारे साथ के दुभाषिये दिलीप सिंह ने हमें बताया। वह पैदल चल रहा था; किन्तु प्राय: मेरे याक के साथ रहता था।

'अपने आप बना है यह।' लगभग 15 फुट ऊँचाई, विशाल प्रफुल्ल कमल के समान चमकता गोल होज जैसे रखा गया हो और उसक चारों ओर एक के बाद दूसरे क्रम से एक दूसरे के नीचे न रखकर तनिक इधर-उधर नीचे चार फुट तक वैसे ही उज्जवल, कमलाकार, किन्तु कुछ छोटे-बड़े हौज सजा दिय गये हों। बहुत ही कूशल कारीगर बहुत परिश्रम एव रुचिपूर्वक सजावे तो ऐसा कमलों के समान होजों का स्तम्भ बनेगा। इतनी व्यवस्था, इतनी सजावट और ऐसी सुचिक्कण कारीगरी थी कि विश्वास नहीं होता था कि यह मानव-कला नहीं है। सभी हौजों में निर्मल नीला जल दूर से झिलमिल करता दीख रहा था।

'झरना अपने आप बना है, परंतु यह फुहारा तो किसीने बनवाया है।' मेरे बंगली साथी ने कहा - 'वहाँ संगमरमर कहां से - कितनी दूर से आया होगा।' हम लोगों को तिब्बत के इस क्षेत्र में कहीं संगमरमर होने आशा नहीं थी।

'वहां एक टुकड़ा भी संगमरमर नहीं। गंधक के पानी का यह कार्य है।' दिलीप सिंह हमें फिर समझाया, किन्तु हम उसकी बात तो उस झरने के पास ही जाकर समझ सके। गंधक का झरना है। उसके गरम जल में बहुत अधिक गंधक है। वह गंधक बराबर पत्थरों पर जमता रहता है। इससे संगमरमर के समान उज्जवल, बेल-बूटे बनी जैसी तहें जमती जाती हैं। यह पूरा कमल…स्तम्भ इसी प्रकार बना था।

'वहाँ कोई है, कोई सन्यासी जान पडता है।' गेरुए वस्त्र दीख पडे एक दो पास पत्थर पर फैले। नीचे के छोटे हौज़ में बैठा कोई स्नान कर रहा था। कुछ तिब्बती लोग झरने के पास से अपनी भेड़ें हांके लिय जा रहे थे।

'ये वही सन्यासी हैं, जो हम लोगों को उस दिन दरचिन में मिले थे, जब हम कैलास-परिक्रमा करने जा रहे थे। लगता है कि ये भी आज ही तीर्थपुरी से चले हैं।' दिलीप सिंह में दूर से ही लोगों को पहचान लेने की विचित्र शक्ति है। उसका अनुमान ठीक था। वे वही सन्यासी थे और तीर्थपुरी से तो नहीं, पर आज गुरच्याँग से आ रहे थे।

'अब तो आप मेरे साथ ही चलेंगे।' मैंने सन्यासीजी को आमन्त्रण दिया। मेरे बंगाली साथी 'नीती घाटी होकर जोशीमठ जाना चाहते हैं। उन्हें बदरीनाथ जाना है। यहाँ खिंगलुंग से ही उनका मार्ग पृथक होता है। अब मेरे साथ केवल दिलीप सिंह रह जायगा। एक और हो जाय तो अच्छा, यह मैंने सोचा था।

'जैसी आपकी इच्छा। परन्तु मैं आपके लिये भार सिद्ध होऊँगा।' सन्यासी बड़े प्रसन्नमुख युवक हैं। उनकी बात सच है। यहाँ तिब्बत में मनुष्यके लिये अपना निर्वाह भी कठिन हो जाता है। भारतीय सीमा से अपने साथ लाया सामान ही काम देता है। यहाँ तो नमक, मट्ठा, दूध, दही, मक्खन कहीं-कहीं मिलता है। चेष्टा करने पर एकाध सेर सत्तू और एकाध सेर आटा मिल जाता है तीन-चार रुपये सेर। भारतीय व्यापारी जब तिब्बत में आ जाते हैं तब कुछ सुविधा हो जाती है; किंतु हम पंद्रह-बीस दिन मौसम से पहले आ गये हैं। अभी व्यापारी आने नहीं लगे हैं। ऐसी अवस्था में एक व्यक्ति की भोजन व्यवस्था और ले ली जाय तो वह भार तो बनेगी ही।

'उस भार की आप चिन्ता न करें।' मैंने हँसकर कहा। 'हमारे साथ का सब सामान आज समाप्त हो जायगा। तिब्बत से बाहर पहुँचने में अभी सात-आठ दिन लगेंगे। इतने समय का निर्वाह तो कैलास के अधिष्ठाता को ही करना है। उसे एक भारी नहीं लगेगा तो दो भी नहीं लगेंगे।

'तुम भी मेरे ही जैसे हो।' खुलकर हँसे वे महात्मा। 'तुम्हारे साथ अवश्य चलूंगा। बडा आनन्द रहेगा। कोई चिंता मत करो।' यहां इतना और बता दूं कि हमें अन्त तक चिंन्ता नहीं करनी पड़ी। तिब्बत में दाल और शाक तो मिलता नहीं था; किंतु हमें आटे और मक्खन का अभाव कभी नहीं रहा। आटा बराबर मिलता गया। मक्खन-रोटी या दही-रोटी ऐसा भोजन नहीं है कि उसकी कोई आलोचना की जाय।
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'आप पहले ही इधर आ चुके हैं। हम लोग मानीथंगा और ठांजा पीछे छोड़ चुके हैं। छिरचिन से हमने आज प्रातःकाल ही प्रस्थान किया है। 'आज यदि कुंगरी-विंगरी और जयन्ती के दर्रे पार कर सके तो ऊटा तथा जयन्ती के बीच रात्रि विश्राम होगा। वहाँ एक होटल (तंबू) इन दिनों या गया होगा। दूसरे दिन ऊटा धुरा(दर्रा) पार करके कल हम भारतीय सीमा में पहुँच जाएँगे।' ये बातें मुझे सन्यासीजी ने बतायी और इसीलिए मैंने उनसे प्रश्न किया। वैसे व्यक्तिगत परिचय करने में मेरी रुचि कम है, अंत तक मैंने उन संन्यासीजी का नाम नहीं पूछा। उनकी कुटी कहीं है या नहीं, यह जानने की इच्छा मुझे नहीं हुई।

'मैं पिछले ही वर्ष यहाँ आया था; किंतु देर से आया। लौटते समय मार्ग में हिमपात होने लगा। इच्छा होने पर भी सौ बार नहीं जा सका। अब इस वर्ष श्रीबदरीनाथजी के दर्शन करने आया तो वहाँ से इधर चला आया।' मुझे इस समय पता लगा कि ये स्वामीजी गर्व्याँग के रास्ते न आकर नीतिघाटी के मार्ग से आये थे और हमें जब दरचिन में मिले थे, तब वहां से मानसरोवर चले गये थे। हमने तो समझा था कि वे हमारे समान मानसरोवर होकर कैलास आये होंगे। पैदल यात्री होने के कारण उन्हें समय अधिक लगा होगा।

'हिमपात तो आज भी होता दीखता है। आगे कोई पड़ाव भी नहीं।' तिब्बत में वर्षा कम ही होती है। इस अंचल में जब मेघ आते हैं, तब पहले हिमशर्करा पडती है। चीनी के दानों से दुगुनी-चौगुनी हिम-कंकड़ियां। वस्तुत: वे जल की बूंदें होती हैं जो शीताधिक्य के कारण जम गयी होती हैं। हिमपात की वे पूर्वसूचना हैं। उनके पश्चात, हिमपात होता है। कद् दूकस में कसे नारियल के अत्यन्त पतले आध इंच से भी कुछ छोटे टुकडों के समान हिम वायु में तैरती गिरती है। असंख्य टुकड़े - लगता है कि रुई की वर्षा हो रही है। सम्मुख का मार्ग नहीं दीखता। पृथ्वी उज्जवल हो जाती है। आज आकाश में मेघ हैं, दो-चार हिमशर्करा की कंकड़ियां मुखपर पड़ चुकी हैं। आज जब दो धुरे (दर्रे) पार करने हैं, तब उनपर चढ़ते समय हिंमपात का सामना करना निश्चित है।

'यह हिमपात तो खेल है।' स्वामीजी ने कहा। 'हिमपात तो मार्गशीर्ष से प्रारम्भ होता है। लगातार हिमवर्षा होती है और एक साथ दस-पन्द्रह फुट हिम पड़ जाती है। उसमें मनुष्य चल नहीं सकता। मैं पिछले वर्ष दीपावली पर दरचिन था और आपने कदाचित् सुना होगा कि पिछले वर्ष हिमपात कार्तिक्र में ही प्रारम्भ हो गया था।'

'हम जिस दिन मानीथंगा पहुँचे थे, उसी दिन यह तिब्बती, जिसके तंबू के पास हम रुके थे वह अपने फांचे (भेडों पर नमक आदि लादने की ऊनी थैलियां) लेकर लौटा था। पिछले हिमपात में उसकी तीन सौ भेड़ें और दो नौकर मारे गये।' मैंने जो सुना था, वही सुना दिया। हम पैदल ही चल रहे थे। तीर्थपुरीसे जो याक मिले थे भाड़ेपर, वे केवल मानीथंगा तक के लिये थे। वे लौट चुके थे। मौसम से पूर्व आने के कारण अभी मार्ग खुला नहीं था। हम पहले यात्री थे। हमारे साथ डेढ़-दो सौ भेड़ें लेकर, उनपर नमक लादकर चार तिब्बती चल रहे थे। वे भारतीय बस्ती मिलम में नमक देकर अन्न लेंगे और लौटेंगे। उनकी पांच भेडों पर मेरा सामान - तंबू आदि लदा था।

यहां इतना और बता हूँ कि कैलास-मानसरोवर अंचल में न नगर हैं न ग्राम। दरचिन, तीर्थपुरी, खिंगलुंग-जैसे कुछ सथान ऐसे हैं जहाँ पर्वतों में बुद्ध मन्दिर हैं। उनके पास ही बहुत-सी गुफाएँ हैं। इन गुफाओं में य़हाँ के लोग अपना सामान रखते हैं। शीतकाल में उनमें अपने पशुओं के साथ रहते हैं। शेष समय वे तंबुओं में घूमते हुए बिताते हैं। अपने याक और भेड़े लिये वे घूमते रहते हैं। मानीथंगा, थिरचिन आदि ग्राम नहीं, इन चरवाहों तथा यात्रियों के पड़ाव के स्थान हैं। वे कभी सुनसान रहते हैं और कभी वहाँ तंबुओं के ग्राम बस जाते हैं।

'आपने ध्यान नहीं दिया, वह तिब्बती मुझे देखकर चौंका था। वह मेरे आने से संतुष्ट नही था। मैं उसके भेडोंवाले दल के साथ ही पिछले वर्ष भारत के लिये चला था।' स्वामीजी ने बताया। 'वह कहता था कि यह लामा अपशकुन है। इसके साथ मत जाओ।' दिलीप सिंह ने हमें बताया। वहाँ मानीथंगा में तिब्बती और दिलीप सिह में बात बहुत हुई; किंतु वहाँ हमें दिलीप सिंह ने कुछ नहीं कहा था। तिब्बती भाषा में हम भला, क्या समझते। हमें तो वह तिब्बती भला लगा था। उसने हमारे तंबू खड़े करने में सहायता दी। हमारे यहां अग्नि जला दी और हमारे लिये मक्खन पडी नमकीन, तिब्बती चाय झटपट बनवा लाया था अपने तंबू में से।

'आप बचे कैसे?' कुछ रुककर दिलीप सिंह ने फिर पूछा।

'कुछ आगे चलो।' पता नहीं स्वामीजी क्यों गम्भीर हो गये थे।
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'यह क्या है दिलीप सिंह?' मैं ठिठक कर खडा हो गया था। मार्ग के पास ही थोड़ी-थोड़ी दुरी पर बकरियों भेड़ों की ठठरियां पडी थी। उनमें अब केवल हड्डी थी। दो मनुष्य-कंकाल भी दीखे। उनके आस पता बहुत से फाँचे थे, कपड़े थे और स्थान-स्थान पर प्रायः बकरियों के कंकाल के पास ऊन की बड़ी-बड़ी गोलियां थी। वे कुछ चपटी थीं। उनके ढ़ेर और उनकी यह गोल-चपटी आकृति......।

'बकरियाँ-भेड़ें हिम में दब गयी। उनको जब कुछ भोजन नहीं मिला तब उन्होनें समीप की भेड या बकरी का ऊन खा लिया। वह ऊन उनकी आतों में जाकर ऐसे गोले बन गया। अब मास तथा आतें तो गल गयी, वन्य पशु-पक्षी खा गये किंतु आँतोंसे निकले ये ऊन के गोले पडे हैं। दिलीप सिंह ने जो कुछ बताया, उसका स्मरण आज भी रोमांचित कर देता है। हम कुछ अधिक वेग से चलने लगे। संयोगवश बादल हट गये थे। हिमपात कुछ समय के लिये तो टल गया था।

'उस दिन - उस भयंकर दिन मैं इस अभागे यूथ के साथ था।' संन्यासीजी ने कुछ आगे जाकर अपनी गम्भीरता तोड़ी। 'मानीथंगा से जब ये चरवाहे चले थे, तब इनके लामा ने कहा था कि अभी बीस दिन हिमपात नहीं होगा। मैं तो अकस्मात इनके साथ हो गया।'

दिलीप सिंह और पास आ गया था। मैं भी उत्सुक था संन्यासीजी की बात सुनने के लिये। संन्यासीजी कह रहे थे - 'जब हम छिरचिन से चले, तभी घने बादल घिर आये थे। तिब्बती चरवाहे बराबर लामा का नाम लेते थे और कहते थे - उनका लामा पत्थर में पंजे मारकर चिह्न बना देता है। वह वर्षा, आंधी, हिमपात सबको रोक देता है। इन बादलों को वह अवश्य भगा देगा। उन चरवाहों में एक अधूरी हिंदी बोल लता था। मुझे वह पता नहीं क्यों मानता भी बहुत था। कई बार उसने मुझे अपनी 'छिरपी' (सूखे मट्ठे का खण्ड ) खिलाया।'

एक बार संन्यासीजी ने कैलास की ओर मुड़कर देखा और बोले - 'सहसा हिम-शर्करा प्रारम्भ हुई। बकरियां और भेडें चिल्लाने लगी और चरवाहे भयातुर हो उठे। इसके पश्चात् हिमपात प्रारम्भ हो गया। हम देख भी नहीं सकते थे कि हमारे आगे दो फुटपर मनुष्य है या पर्वत। मेरे साथ के लोगों का क्या हुआ - मुझे पता नहीं।'

'आप बचे कैसे?' दिलीप सिंह ने पूछा।

'मुझे मारता कौन?' संन्यासी ने कहा - 'मुझे तो न कोई भय लगा न घबराहट हुई। मैं चल रहा था - चलता रहा। मार्ग दीख नहीं रहा था, मार्ग देखने का प्रश्न भी नहीं था। जहाँ गड्ढे में गिरता प्रतीत होता था या सिर टकराता था - जिधर मुड़ना सम्भव होता था मुड़ जाता था।'

'अद्भुत हैं आप।' मैंने कहा।

'इसमें अद्भुत बात क्या है?' संन्यासी ने सहज भावसे कहा - 'वो भगवान शंकर कैलास के अधिष्ठाता हैं, वे मैदान में रक्षा करते हैं और पर्वत के हिमपात में नहीं करते? मैं उनके आश्रम पर आया था - कैलास आया था मैं। उन देव-दवेश्वर के दर्शनार्थी को मार कौन सकता था? हिमपात हुआ - होता रहा। मेरे पैर एक स्थान पर फिसले और पता नहीं मैं कितने नीचे लुढक गया। कई बार लुढका। कई बार हिम में लुढ़कने पर ढक गया और उठा। बड़ा आनन्द आया उस दिन। पर्वतीय पिताका जाग्रत् स्वरूप और उनका क्रीड़ा-बैभव देखा मैंने।'

सन्यासीजी ने अपनी बात समाप्त की - 'जब मैं अन्तिम बार लुढ़का तो किसी जलस्त्रोत में पड गया। मेरी चेतना जल की शीतलता और लहरों ने छीन ली। जब मूझे फिर शरीर का भान हुआ, तब कुछ भेड़ वाले मुझे दुंग से आगे अग्नि जलाकर सेंक रहे थे। उन्होने मुझे धारा से निकाला था, उन्हें संदेह हो गया था कि मैं जीवित हूँ।'

ये सन्यासीजी केवल दुंग तक हमारे साथ आये। मिलम से भी पूर्व मार्ग में ही वे हमसे पृथक हो गये। परन्तु उनकी एक बात स्मरण करने योग्य है। वे कहा करते थे - 'मर्तय का भरोसा क्या? भरोसा भगवान का। उसका भरोसा, जो सदा है - सदा साथ है।'

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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एक आदमी की घरवाली मायके गई तब वो ऑफिस में था। जब वो घर पहुँचा तो उसको ये नोट टीवी पर चिपका मिला ।
👇🏼


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माँ के घर जा रही हूँ बच्चों को ले के। नीचे की बातों पर ध्यान से अमल करना।
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1 - दोस्तों को घर बुला के कबाडखाना मत बना देना। पिछली बार large Pizza के 4 बिल मिले थे सोफे के नीचे ... 


2 - चश्मा आईने के पास रखना। पिछली बार फ्रीज में मिला था ।


3 - काम वाली बाई की पगार दे चुकी हूँ ।
फोकट में प्यार जताने की कोई ज़रूरत नहीं ।


4 - तड़के उठकर पड़ोसियों को  जगा के पेपर आया के नहीं यह पूछने की जरूरत नही।
हमारा पेपरवाला उनसे अलग हैं ।.. 
और दूधवाला और लाॅन्ड्रीवाला भी।


5 - तुम्हारी अंडरवियरें अलमारी के नीचे के खानो में हैं और बच्चों की ऊपर के खाने में रखी होती है । पिछले बार की तरह बच्चों की पहन की मत चले जाना।....


6 - तुम्हारी सारी रिपोर्ट नाॅर्मल हैं ।
बार-बार उस लेडी डाॅक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं ।


7 - मेरी बहन और भाभी का बर्थ डे पिछले महीने ही हो गया हैं । रात को फोन करके उनको विश करने की कोई जरूरत नहीं ।


8 - वाय-फाय का पासवर्ड बदल दिया हैं । जल्दी से सो जाना।.... 


9 -  ज्यादा खुश होने और चहकने की जरूरत नहीं है... 
क्योंकि मिसेस खन्ना, मिसेस अरोड़ा, मिसेस गुप्ता, मिसेस शर्मा, मिसेस वर्मा, सभी बाहर जाने वाली हैं ।


10-. शक्कर, पत्ती, काॅफी मांगने के बहाने उस कलमुंही प्रिया के घर पे बार-बार जाने की जरूरत नहीं। मैंने  सारी चीजें ला के रख दी है। 


और सबसे जरूरी बात .....


11 - ओवर स्मार्ट बनने की कोशिश मत करना । मैं किसी भी वक्त वापस आ सकती हूँ ।..👱🏻‍♀


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Happy vacation
😆😆😆😆😆

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