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वर्ष

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Happy Birthday Rajinikanth  who Has Internl Beauty,,,👻wd Noble Thought,,,,

&
🙈🙉🙊
Who Makes Other Hero👦
In Short,,,
Hero Mean #Rajnikanth,,,😎
Haleema✍ #NojotoQuote

Actionful Badday #Rajni #g,,😘😘😘
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My new year plan  क्या यार Nojoto,,,
गरीबों से ऐसे मज़ाक,,,
😎😎😎
New Year Plan तो अमीरो के शोक हैं,,,!
Hume To jis din 
✌2 समोसे और चाय ☕मिल जाए,,,,
बस,,,समझलो,,,
New Year हो जाए,,,!!
🎊🎊🎊🎆🎇🎇🎆🎉🎉🎊🎊
हलीma✍ #NojotoQuote

🎆🎆🎆🎆🎆🎇New Yearrrrrrr🎆🎆🎆🎆🎆🎇🎇🎇🎇🎊🎊🎊🎊🎊
#नव #वर्ष #की #हार्दिक #शुभकामनाएँ🎆🎆🎆🎆🎇🎇🎇🎇🎊🎊🎊🎊🎊

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 8

।।श्री हरिः।।
16 – भाग्य-भोग

'भगवन! इस जीव का भाग्य-विधान?' कभी-कभी जीवों के कर्मसंस्कार ऐसे जटिल होते हैं कि उनके भाग्य का निर्णय करना चित्रगुप्त के लिये भी कठिन हो जाता है। अब यही एक जीव मर्त्यलोक से आया है। इतने उलझन भरे इसके कर्म है - नरक में, स्वर्ग में अथवा किसी योनि-विशेष में कहाँ इसे भेजा जाय, समझ में नहीं आता। देहत्याग के समय की इसकी अन्तिम वासना भी (जो कि आगामी प्रारब्ध की मूल निर्णायिका होती है) कोई सहायता नहीं देती। वह वासना भी केवल देह की स्मृति - देह रखने की इच्छा है। ऐसी अवस्था आने पर चित्रगुप्त के पास एक ही उपाय है, वे अपने स्वामी के सम्मुख उपस्थित हों।

धर्मराज ने चित्रगुप्त से उस जीव का क्रम लेख लिया और उसे लगभग बिना पढे ही उसके आगामी प्रारब्ध के तीनों कोष्ठक भर दिये। चित्रगुप्त ने देखा जाति के कोष्ठक में लिखा है - मनुष्य-श्वपच, आयु के कोष्ठक में उदारतापूर्वक 102 की संख्या है; किंतु भोग - भोग का विवरण देखकर चित्रगुप्त को लगा कि आज संयमनीपति विशेष क्रुद्ध हैं।

चित्रगुप्त कभी नहीं समझ सके कि जीव का जो कर्म-विधान उनको इतना जटिल लगता है, धर्मराज कैसे उसका निर्णय बिना एक क्षण सोचे कर देते हैं। यम एक मुख्य भागवताचार्य हैं और भक्ति का - भक्ति के अधिष्ठता का रहस्य जाने बिना, उसकी कृपाकोर की प्राप्ति के बिना कर्म का - धर्माधर्म का ठीक-ठीक रहस्य ज्ञान नहीं होता, यह बात चित्रगुप्तजी नहीं समझेंगे। वे तो कर्म के तत्त्वज्ञ हैं और कर्माकर्म की कसौटी पर ही सब कुछ परखना जानते हैं; किंतु जब उनकी कसौटी उन्हें उलझन में डाल देती है - यमराज कर्म के परम निर्णायक हैं। उनके निर्णय की कहीं अपील नहीं, अत: वे बिना हिचके निर्णय कर देते हैं। यह चित्रगुप्तजी के चित्त का समाधान है; किंतु धर्म के निर्णायक को आवेश में तो निर्णय नहीं करना चाहिये।

'यह अभागा जीव!' यमपुरी के विधायक, यमराज के मुख्य सचिव चित्रगुप्त - उन्हें किसी जीव को नरक का आदेश सुनाते किसी ने हिचकते नहीं देखा और आज वे क्षुब्ध हो रहे थे - 'कैसे सहन कर सकेगा यह दारुण दुख? इतना दुखदायी विधान एक असहाय प्राणी के लिये।'

'संयमनी के मुख्य सचिव प्राणी के सुख-दुख के दाता कब से हो गये?' चित्रगुप्त चौंक उठे। उन्होंने अपनी चिन्ता में देखा ही नहीं था कि देवर्षि नारद उनके सामने आ खड़े हुए हैं। उन्होंने प्रणिपात किया देवर्षि को।

‘धर्मराज को स्रष्टा ने केवल जाति, आयु और भोग के निर्णय का अधिकार दिया है।' देवर्षि ने अपना प्रश्न दुहराया - 'स्थुल शरीर तक ही कर्म अपना प्रभाव प्रकट कर सकते हैं, किंतु देखता हूँ; धर्मराज के महामन्त्री अब जीव के सुख-दु:ख की सीमा के स्पर्श की स्पर्धा भी करने लगे हैं।'

ऐसी धृष्टता चित्त में न आवे, आप ऐसा अनुग्रह करें।' चित्रगुप्त ने दोनों हाथ जोड़े - ‘किंतु इतना दारुण भोग प्राप्त करके भी जीव दुखी न हो, क्या सम्भव है?'

'असम्भव तो नहीं है। शरीर की व्यथा प्राणी को दुखी ही करे - आवश्यक नहीं है।' देवर्षि ने चित्रगुप्तजी के सम्मुख पड़ा कर्म-विधान सहज उठा लिया।

'स्वयं धर्मराज ने यह विधान किया है।' चित्रगुप्त डरे। परम दयालु देवर्षि का क्या ठिकाना, कहीं इतना कठोर विधान देखकर वे रुष्ट हो जायँ - उनके शाप को स्वयं स्त्रष्टा भी व्यर्थ करने में समर्थ नहीं होंगे।

'कुब्ज, कुरुप, बधिर, मूक, शैशव से अनाथ, अनाश्रय, उपेक्षित, उत्पीड़ित, मान-भोग वर्जित, नित्य देहपीड़ा-ग्रस्त मरुस्थल-निर्वासित......।' देवर्षि के साथ डरते-डरते चित्रगुप्त भी उस जीव के भोग के कोष्ठक में भरे गये विधान को पुन: पढते जा रहे थे मन-ही-मन। कहीं तो उसमें कुछ सुख-सुविधा मिलनेे का कोई संयोग सूचित किया गया होता।

'अतिशय दयालु हैं धर्मराज।' चित्रगुप्त की आशा के सर्वथा विपरीत देवर्षि के मुख से उल्लास व्यक्त हुआ - 'इस प्राणी को एक साथ स्वच्छ कर देने की व्यवस्था कर द उन्होंने। विपत्ति तो वरदान है श्रीनारायणका।'

अब भला इन ब्रह्मपुत्र से कोई क्या कहे और इन्हें ही इतना अवसर कहां कि किसी की बात सुनने को रुके रहें। चित्रगुप्त के कर्म-विधान का पोथा पटका उन्होंने और उनकी वीणा की झंकार दुर होती चली गयी।
***************************************

महाराजा की सवारी निकली थी नगर-दर्शन करने। यह भी कोई बात है कि उनके सामने राजपथ पर कोई कुबड़ा, गूंगा, काला, कुरूप चाण्डाल बालक आ जाय। राजसेवकों ने उसे पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और घसीट कर मरे कुत्ते के समान दुर फेंक दिया।

'कौन था यह?' महाराजा ने पूछा।

'एक श्वपच का पुत्र!' मन्त्री ने उत्तर दे दिया।

'इसके अभिभावक इसे पथ से दुर क्यों नहीं रखते?' महाराज का क्रोंध शान्त नहीं हुआ था।

'इसका कौई अभिभावक नहीं।' कुछ देर लगी पता लगाने में और तब मन्त्री ने प्रार्थना की - 'माता-पिता इसके तब मर गये, जब यह बहुत छोटा था, अब तो यह इसी प्रकार भटकता रहता है।'

'नगर का अभिशाप है यह।' महाराज को कौन कहे कि गर्व के शिखर से नीचे आकर आप देखें तो वह भी आपके समान ही सृष्टिकर्ता की कृति है; किंतु धन, अधिकार का मद मनुष्य की विवेक-दृष्टि नष्ट कर देता है। महाराज ने आदेश दे दिया - 'इसे दूर मरुस्थल में निर्वासित कर दिया जाय। राजधानी में इतनी कुरुपता नहीं रहनी चाहिये।'

छोटा-सा अबोध बालक। वैसे ही वह दर-दर की ठोकरें खाता फिरता था। कूड़े के ढेर पर से छिलके उठा कर उदर की ज्वाला-शान्त करता था। लोग दुत्कारते थे। बच्चे पत्थर मारते थे। वृक्ष के नीचे भी रात्रि व्यतीत करने का स्थान कठिनता से पाता था और अब उसे नगर से भी निर्वासित कर दिया गया। हाथ-पैर बाँधकर ऊंट पर लादकर एक राजसेवक श्वपच उसे मरुभूमि में ले गया और वहां उसके हाथ-पैर उसने खोल दिये।

अंग में लगे घाव पीड़ा करते थे। मरुस्थल की रेत तपती थी और ऊपर से सूर्य अग्नि की वर्षा करते थे। आँधियाँ मरुभूमि में न आयेंगी तो आयेंगी कहाँ; लेकिन मृत्यु उस बालक के समीप नहीं आ सकती थी। उसके भाग्य ने उसे जो दीर्घायु दी थी - कितनी बड़ी विडम्बना थी उसकी वह दीर्घायु।

जब प्यास से वह मुर्छित होने के समीप होता, कहीं-न-कहीं से रेत में दबा मतीरा उसे मिल जाता। खेजड़ी की छाया उसे मध्याह्न में झुलस जाने से बचा देती थी। मतीरा ही उसकी क्षुधा भी शान्त करता था। वैसे उसे मरुस्थल के मध्य में एक छोटा जलाशय मिल गया बहुत शीघ्र और वहाँ कुछ खजूर के वृक्ष भी मिल गये, किन्तु खजूर बारहमासी फल तो नहीं है।

इस भाग्यहीन बालक का स्वभाव विपत्तियों को भोगते-भोगते विचित्र हो गया था। बचपन में तो वह रोता भी था; किंतु अब तो जब कष्ट बढता था तो वह उलटे हँसता था - प्रसन्न होता था। अनेक बार उसे मरुस्थल के डाकू मिले ओर उन्होंने जी भरकर पीटा। वह उस पीड़ा में खूब हँसा - मानो उसे पीड़ा में सुख लेने का स्वभाव मिल गया हो।

वह क्या सोचता होगा? वह जन्म से मूक और बधिर था। शब्दज्ञान उसे था नहीं। अत: वह कैसे सोचता होगा, यह मैं नहीं समझ पाता हुँ। लेकिन वह कुछ काम करता था। दिन निकलता देखता तो सूर्य के सम्मुख पृथ्वी पर बार-बार सिर पटकता। आंधी आती तो उसे भी इसी प्रकार प्रणाम करता और कभी आकाश में कोई मेघखण्ड आ जाय तो उसे भी। खेजड़ी के वृक्ष को, जलाशय को और यदि कभी कोई दस्युदल आ जाय तो उन लोगों को तथा उनके ऊँटों को भी वह इसी प्रकार प्रणिपात किया करता था।

दूसरा काम वह प्राय प्रतिदिन यह करता कि खेजड़ी की एक डाल तोड़ लेता और विभिन्न दिशाओं में दूर-दूर तक एक निश्चित दूरी पर उसके पत्ते, टहनियाँ तब तक डालता जाता - जबतक मध्याह्न की धूप उसे छाया में बैठ जाने को विवश न कर देती। अनेक बार उसके डाले इन पत्तों के सहारे मरुस्थल में भटके यात्री एवं दस्यु उसके जलाशय तक पहुँते थे। अनेक बार उन दस्युओं ने उसे पीटा था। बहुत कम बार किसी यात्री ने उसे रोटी का टूकड़ा खाने को दिया। लेकिन उसने खेजड़ी के पत्ते डालने का काम केवल तब बंद रखा, जब वह ज्वर से तपता पड़ा रहता था।

मरुस्थल में एकाकी, दिगम्बर, असहायप्राय भूख-प्यास से संतप्त रहते वर्ष-पर-वर्ष बीतते गये उसके। बहुत बीमार पड़ा और बार-बार पड़ा; किंतु मरना नहीं था, इसलिये जीवित रहा। बालक से युवा हुआ और इसी प्रकार वृद्ध हो गया। उसकी देह में हड्डियों और चमड़े के अतिरिक्त और था भी क्या। अनेक बार यात्री उसे प्रेत समझकर डरे थे।

दुर्भाग्य ही तो मिला था उसे। एक अकाल का वर्ष आया और वह नन्हा जलाशय सूख गया जो वर्षों से उसका आश्रय रहा था। खेजड़ी में पतों के स्थान पर काँटे रह गये। उसे वह स्थान छोड़कर मरुस्थल में भटकना
पड़ा।

अंधड़ से रेत नेत्रों में भर गयी। प्यास के मारे कण्ठ सूख गया। गले में कांटे पड़ गये और अन्तत: वह मूर्छित होकर गिर पड़ा।

सहसा आकाश में उत्तंक मेघ प्रकट हुए जो केवल राजस्थान की मरुभूमि में कभी-कभी - कुछ शताब्दियों के अन्तर से प्रकट होते हैं। बड़ी-बड़ी बूंदों की बौछार ने उसके संतप्त शरीर को शीतल किया। उसने नेत्र खोलने की चेष्टा की; किंतु उनमें रेत भर गयी थी। देह में भयंकर ताप था। वह जीवन में पहली बार वेदना से चीखा - मूक की अस्पष्ट चीत्कार उसके कण्ठ से निकली।

उत्तंक मेघ उसके लिये तो नहीं आये थे। मरु की राशि में शतियों से समाधिस्थ महर्षि उत्तंक उठे थे समाधि से। उनकी तृषा शान्त करने के लिये मेघ आते हैं। महर्षि ने अपने समीप से आयी वह चीत्कार-ध्वनि सुनी और आगे बढ आये।

कृष्णवर्ण, कुटज, श्वेत केश, कंकालमात्र एक मानवाकार प्राणी रेत में पड़ा था। अब भी वह अपने नेत्रों से रेत ही निकालने के प्रयत्न में था। महर्षि की दृष्टि पड़ी। वे सर्वज्ञ - उन्हें कहां सूचित करना था कि उनके सम्मुख पड़ा प्राणी बोलने और सुनने में असमर्थ है। लेकिन महर्षि का संकल्प तो वाणी की अपेक्षा नहीं करता। उनकी अमृत दृष्टि पड़ी उस सम्मुख के प्राणी पर और फिर वे अपनी साधना-भूमि की ओर मुड़ गये।
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कुछ मास (क्योंकि देवताओं का दिन मनुष्यों के छः महीने के बराबर होता है और उतनी ही बड़ी होती है उनकी रात्रि) व्यतीत हुए होंगे, चित्रगुप्तजी के और एक दिन पुनः देवर्षि नारद संयमनी पधारे।

'आपके उस अतिशय भाग्यहीन जीव की अब क्या स्थिति है?' धर्मराज का सत्कार स्वीकार करके जाते समय देवर्षि ने सहसा चित्रगुप्त से पूछ लिया - 'जीवन में भाग्य का भोग उनको कितना दूखी कर सका, यह विवरण तो आपके समीप होगा नहीं।'

'आपका अनुग्रह जिसे अभय दे दे, कर्म के फल उसे कैसे उत्पीड़ित कर सकते हैं?' चित्रगुप्त ने नम्रतापूर्वक बताया - 'वे महाभाग देह की पीड़ा, अभाव, असम्मान से प्राय: अलिप्त रहे।'

'अनुग्रह तो उनपर किया था धर्मराज ने।‘ देवर्षि ने सहजभाव से बतलाया - 'भोग-विवर्जित करके संयमनी के स्वामी ने उन्हें अनेक दोषों से सुरक्षित कर दिया था। आपत्तियों ने उन्हें निष्काम बनाया। विपत्ति का वरदान पाये बिना प्राणी का परित्राण कदाचित् ही हो पाता है।'

'महर्षि उत्तंक के अनुग्रह ने उनके निष्कलुष वासनारहित चित्त को आलोकित कर दिया।' चित्रगुप्तजी ने बताया - 'अब हमारे विवरण में केवल इतना ही है कि उनका परम पवित्र देह धरा देवी ने अपनी मरुराशि में सुरक्षित कर लिया है।'

जिसके सम्बन्ध में श्रुति कहती है -

'न तस्य प्राणाश्चोत्क्रामन्ति तत्रैव प्रविलीयन्ते।'

उस मुक्तात्मा के सम्बन्ध में इससे अधिक विवरण चित्रगुप्तजी के समीप हो भी कैसे सकता है?

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 8

।।श्री हरिः।।
15 - कलियुग के अन्त में

आपने यदि वैज्ञानिक कही जाने वाली कहानियों में से कोई पढी हैं तो देखा होगा कि किस प्रकार दो-चार शती आगे की परिस्थिति का उनमें अनुमान किया जाता है और वह अनुमान अधिकांश निराधार ही होता है। यह कहानी भी उसी प्रकार की एक काल्पनिक अनुमान मात्र प्रस्तुत करती है; किंतु यह सर्वथा निराधार नहीं है। पुराणों में कलियुग के अन्त समय का जो वर्णन है, वह सत्य है; क्योंकि पुराण सर्वज्ञ भगवान् व्यास की कृति है। उनमें भ्रम, प्रमाद सम्भव नहीं है। अत: उन पुराणों के वर्णनों को मूख्याधार बनाकर कल्पना ने कहानी को यह आकार दिया है। अवश्य ही आज के सामान्य स्वीकृत एवं सम्भाव्य वैज्ञानिक तथ्यों को दृष्टि में रखा गया है।

यह कलिसंवत् 5064 है, विक्रम संवत् 2020 में। कलियुग की कुल आयु (पूरा भोगकाल) 4,32,000 वर्ष है। इसलिये यह कहानी लगभग 4,26,900 वर्ष आगे को सम्बन्ध में है और उस समय की स्थिति का एक दृश्य उपस्थित करती है।

इसका प्रयोजन? अनेक बार लोग इस भ्रम में पड़ते हैं कि कल्कि अवतार हो गया या निकट वर्षों में होने वाला है। यह प्रचार भी कुछ लोग करते हैं, किन्हीं भ्रान्तियों के कारण अथवा कुछ निहित स्वार्थों के कारण। ऐसी दशा में यह कहानी इतनी तो सूचित कर ही देती है कि शास्त्र-पुराणों के अनुसार कल्कि अवतार जिस समय होगा, उस समय की सामाजिक अवस्था किस स्तर पर पहुँच चुकी होंगी और मुख्य घटनाएं क्या होंगी। उनके प्रमुख पात्र कौन से होंगे। इस विशेष कहानी के लिये इतना स्पष्टीकरण आशा है, पर्याप्त होगा।
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'यह पुरुवंशी प्रतीपात्मज देवापि राजर्षि मरु को अभिवादन करता है!' हिमालय का अत्यन्त दुर्गम दिव्य-देश कलाप ग्राम, जो नित्यसिद्ध योगियों की साधनभूमि है; जो मनुष्य तो दुर, गन्धर्वादि उपदेवताओं के लिये भी अगम्य एवं अदृश्य है, उसी सिद्धभूमि में आज कुछ हलचल जान पड़ती थी। जहाँ अखण्ड शान्ति, नित्य उद्रिक्त सत्वगुण सदा रहता है, वहां किंचित् भी रजस-क्रिया का उद्भव आश्चर्य की ही बात है। पूरा युग लक्ष-लक्ष वर्ष व्यतीत हो गये, ऐसा तो कभी नहीं हुआ कि प्रयत्न करने पर भी समाधि में चित्त की स्थिति न हो। विवशतः राजर्षि देवापि अपने आसन से उठे। द्वापर का जब अन्त होने वाला था, उससे कुछ ही पूर्व ये भीष्मपितामह के पिता शान्तनु के बड़े भाई यहाँ आये थे। इस साधन भूमि में इनका साधन काल सबसे थोड़ा रहा था। महर्षियों के समीप जाकर उनके एकान्त में बाधा देना ठीक नहीं लगा, अतएव अपने से कुछ ही शताब्दी पूर्व साधन-दीक्षित होने वाले राजर्षि मरु के समीप वे चले आये। यह सिद्ध भूमि, यहाँ शताब्दियों का मूल्य हमारे आपके घंटों जितना भी कठिनाई से ही होगा। राजर्षि मरु द्वापर के प्रारम्भ में (त्रेता के व्यतीत होने के कुछ पीछे) आये थे। केवल कुछ लाख वर्ष पहिले - देवापि को वे अपने सहध्यायी जैसे लगते थे और दोनों राजर्षियों में अच्छी मैत्री भी हो गयी थी यहाँ आकर।

'इक्ष्वाकुवंशीय शीघ्र का पुत्र यह मरु राजर्षि देवापि का अभिवादन करके उनका अभिनंदन करता है।' मर्यादा-पुरुषोत्तम श्रीराम के पुत्र कुश के वंश में अग्निवर्ण के पौत्र हैं ये राजर्षि मरु। ये भी ध्यानस्थ नहीं थे। उठकर देवापि को अंकमाल दी और आसन अर्पित किया उन्होंने।

आज की दृष्टि से असाधारण, अकल्पनीय, दीर्घकाय, प्रलम्बबाहु, कमलदल-विशाल लोचन, उन्नत नासिका, प्रशस्त भाल एवं वक्ष और पाटल गौर वर्ण, अत्यन्त सुंदर, सुगठित, किंचित् तपःकृश देह, जटाजूट, बड़े श्मश्रु केश, केवल वल्कल परिधान - दोनों ही स्त्रष्टा की अनुपम कृति लगते थे। राजर्षि नरु का शरीर देवापि से विशाल था और आयु में भी वे बड़े थे। देवापि उनका सम्मान अपने अग्रज के समान करते थे; किंतु राजा मरु सदा देवापि को अपना समकक्ष मित्र ही मानते हैं।

'आज कुछ अकल्पनीय होने वाला लगता है।' देवापि ने कहा - 'अनेक बार प्रयत्न करके भी एकाग्र नहीं हो सका हुँ। जैसे कोई आकर्षण नीचे जनाकीर्ण जगत की ओर खींच रहा है।'

'आप जानते ही हैं कि हम दोनों स्त्रष्टा के एक संकल्प-विशेष के यन्त्र हैं।' राजर्षि मरु बोले - 'स्वयं मेरी भी आज यही अवस्था है। लगता है कि वह समय आ गया, जब हम दोनों को कार्यक्षेत्र में जाना होगा। भगवान् ब्रह्मा ने मेरे रूप में सूर्यवंश का बीज यहां सुरक्षित किया था और आप चन्द्रवंश के मूल पुरुष बनेंगे निकट के सत्ययुग में। सम्भव है, अब इन बीजों के विस्तार का काल आ चुका हो।'

'वत्स! रजस का लेश भी यहां वर्जित है।' सहसा दोनों ही राजर्षियों के ह्रदय में कोई अलक्ष्य वाणी गूंजी - 'तुम्हारा साधनकाल पूर्ण हो गया। सृष्टिकर्ता की इच्छा से तुममें रजस अंकुरित होने लगा है। अत: अब तुम कर्मभूमि में पधारो।

'आदेश आ गया!' वहाँ प्रत्यक्ष मिलन कोई महत्त्व नहीं रखता। अदृश्य-दृश्य का भेद नगण्य है। मन का संकल्प परस्पर विचारविनिमय, उपदेशग्रहण एवं आदेश प्राप्ति का सुपरिचित माध्यम है उस सिद्ध स्थली में। दोनों राजर्षियों ने हाथ जोड़कर सिर झुकाया और एक साथ वहाँ से चले।
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'मनुष्य हैं ये?' राजर्षि देवापि के सम्मुख तो आज के मनुष्यों का ही अत्यल्प है, कलि के अन्त में तो उन्हें तीन से चार फीट तक के ही मनुष्य सर्वत्र मिलने थे। इनके मध्य रहना सम्भव होगा?'

'हम सीधे महेन्द्राचल पर चलेंगे।' थोड़ी देर भगवती भागीरथी के तट पर हरद्वार में ध्यानस्थ रहकर दोनों राजर्षि उठे - 'इस आगामी चतुर्युगी के युग-निर्माता एवं शास्त्र-निर्देशक भगवान परशुराम हैं। उनके पावन चरणों में प्रणिपात करके हमें आदेश की अपेक्षा करनी है।'

'धन्य हो गया सम्भल ग्राम! पवित्र हो गया विप्र-श्रेष्ठ विष्णुयश का कुल। भगवान् कल्किरूप में अवतीर्ण हुए।' भगवान् परशुराम ने स्वयं गद्गद स्वर में कहना प्रारम्भ किया। मरु और देवापि की जैसे वे प्रतीक्षा ही कर रहे थे। दोनों ने जब चरणों में मस्तक रखा, भार्गव ने एक साथ भूजाओं में भर लिया उन्हें। स्वयं ही चिर-परिचित की भांति - जैसे पिता पुत्रों से मिले और अपने संवाद दे कहने लगे - 'अभी आज ही वे लोकमहेश्वर यहाँ से गये हैं। किंतु तुम दुखी मत हो। तुम दोनों तो उनके परम प्रिय हो। वे स्वयं तुम्हारे भवन पधारेंगे।'

'हमारे भवन?' मरु ने चकित भाव से पूछा। भला उनकी तो कहीं झोंपड़ी भी नहीं है।

'हां, अब तुम गार्हस्थ्य स्वीकार करो!' परशुरांमजी वात्सल्य-गद्गद कह रहे थे - 'मैं तुम्हारे पुत्र-पौत्रों को श्रुति-शास्त्र तथा शस्त्र की भी शिक्षा दूंगा। ये जटाएँ आज विसर्जित करो और सूर्य-चन्द्र वंशों के राज्य स्थापित करो इस पुण्यभूमि में।

'वे निखिल गुरु!' भगवान परशुरांम भाव-विह्वल हो रहे थे। वे पुनः कल्कि का वर्णन करने लगे - 'इस जन को उन्होंने गौरव दिया। उन्हें कहाँ अध्ययन करना और सीखना रहता है। श्रुति उनका निःश्वास है। मृत्यु उनके संकल्प की छाया; किंतु यहाँ वे अत्यन्त विनम्र सेवापरायण बने रहे। उन्होंने समस्त शास्त्र, सांगवेद एवं समस्त अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा ग्रहण करने का नाटय किया। गुरु का गौरव दिया इस जन को।'

'वे परम प्रमु किधर................?'

'वे उग्रतेजा-रुप में इस बार प्रकट हुए हैं।' परशुरामजी ने प्रश्न का तात्पर्य समझ लिया - 'उन सहस्त्र सूर्य-समप्रभ का अंगवर्ण भी नेत्रों को आकलन नहीं हो पाता। तूम जानने हो कि इस भार्गव ने भूमि को इक्कीस बार निःक्षत्र किया और नौ शोणितह्रद बनाये कुरुक्षेत्र में। किंतु आज तुच्छ है वह परशु। भगवान देवेन्द्र के द्वारा प्रदत्त उच्चैःश्रवा की पीठ पर वायु के वेग से रौंद रहे हैं धरा को। उनके कर की कराल करवाल........ तुम दर्शन करोगे उनके?'

'देव! दयामय!' आर्तनाद कर उठे दोनों तपस्वी। भगवान् परशुराम के अनुग्रह से प्राप्त दिव्य-दृष्टि से जो कुछ उन्होंने देखा, असह्य था वह उनके लिये। प्रचण्ड वायु के वेग से दौड़ता हरितवर्ण श्यामकर्ण अश्व और उसकी पीठ पर केश बिखेेरे, नेत्रों में प्रलय की ज्वाला लिये, कोटि-कोटि भास्कर के समान उग्रतेजा, अरुणवर्ण खड्गहस्त वे परम पुरुष! पृथ्वी जैसे सम्पूर्ण रक्त के सागर में डूब जायगी। तिनकों जैसे उड़ते शव। अश्व के खुर रौंद रहे हैं राशि-राशि प्राणियों को। समूह-के-समूह मनुष्य खड्ग से कटते जा रहे हैं। क्रन्दन, शव, रक्त - कोई कुछ समझे, इससे पूर्व तो महामृत्यु बनी तलवार टुकड़े उड़ा जाती है। नगर-ग्राम देश-द्वीप - प्रलयंकर-सा घुमता अश्व और उसके पीछे उमड़ता रक्त का सागर। असह्य था यह दृश्य।

'अभय वत्स!' आश्वासन दिया भगवान परशुराम ने। युग बीत गये, उर्वी अन्न-फल उत्पन्न नहीं करती। मनुष्यों ने कृत्रिम उर्वरकों का इतना उपयोग किया कि धरा बंजर बन गयी। समुद्री काई और सेवार को आहार बनाया नरों ने; किंतु अपने ही आविष्कृत अद्भुत स्फीटकों से उस सागरीय आहार को भी उन्होंने विषैला बना लिया। गोधूम और शालि आदि यदि कहीं अब मिलेंगे भी तो वे श्यामक के समान अणुप्राय रह गये हैं। इस रक्त-कर्दम से धरा को उर्वरा बनने दो। इस समय तो मानव आमिष, फल, पत्र, छाल, काष्ण, तृण आदि के आहार पर जीता है और वह भी विडम्बना-प्राय है। वृक्षों में शमी तथा वैसे ही कण्टक-वृक्ष, फलों में झाड़ियों के बदरीफल और आमिष पाता है मानव कृमियों तथा सरीसृपोंका। पशु-पक्षियों का वंश, पता नहीं कब उसके उदर में जा चुका।'

'यह हीनसत्त्व हीनाकार कदर्य मानव ..................!' मरु ने खिन्न स्वर में कहा, ' अपने मस्तिष्क पर बड़ा गर्व किया इसने; किंतु अपने गर्व में यह अपने ही आविष्कारों का आखेट हो गया।' खिन्न स्वर ही था भगवान परशुराम का भी - 'इसने ऐसे स्फीटक निर्मित किये कि युद्ध करके उनके द्वारा इसी के सब आविष्कार, सब नगर समाप्त हो गये। वन्य प्राणी बन गया यह स्वयं के विनाशक कृत्यों से। और दूसरा परिणाम भी क्या होता। इश्वर की सत्ता तथा धर्म, परलोक आदि को इसने पहिले ही अस्वीकार कर दिया था। स्थूल भोगों को ही महत्ता देने का परिणाम जो विनाश होता है अनिवार्य बना वह।'

'और अब यह दीन पशुप्राय मानव......।' देवापि बोल नहीं सके।

'कीटप्राय कहो वत्स!' भार्गव बता रहे थे - 'इसकी परमायु आज बीस या तीस वर्ष है। सामान्यतः तो दस-पंद्रह वर्ष पूर्णायु हो गयी है।इन्द्रीय-भोग मात्र जीवन और वे भोग - जो जिसे स्वीकार कर ले जबतक को, वह उसका उतने काल का पति। जैसे भी हत्या-चोरी से पेट भरे, वही जीविका। जो दुसरों को दबाने, छीनने, मारने समर्थ हो, वह शासक। शूद्र-प्राय दस्युबहुल ये मानव। इनके भार से धरा कलुषित हो गयी है।'

'इनमें हम जो सृजन करेंगे...........?' मरु की शंका उचित ही थी। 'कुछ थोड़े संयमी, भावुक भी हैं।' भगवान ने बताया - 'दस्यु तो भगवान की तलवार की धारा ने समाप्त किये ही समझो। उन सत्वमुर्ति प्रभु के अंगराग की पावन गंध अब शेष रहे लोगों के चित्त निर्मल कर देगी। अब उनकी संतान शुद्धशील होगी और युग का प्रभाव उसे उचित दीर्घ आकार भी प्रदान करेगा।'

'श्रीचरण जो आदेश करेंगे' मरु ने विनम्रतापूर्वक कहा - 'इन सेवकों को उसका पालन करना ही है; किंतु - '

'जीवन की सफलता श्रीहरि के चरणों में भक्ति है और वह तुम्हें प्राप्त है। भगवान् कल्कि स्वयं पधारेंगे तुम्हारे सदन!' परशुरामजी ने आश्वासन देते हुए आदेश दिया - 'जो मानव बचे भी हैं, वे शुद्रप्राय हैं। दीर्घकाल से वर्णाश्रम का सर्वथा लोप हो चुका है। क्रियालोप से द्विज भी व्रात्य हो गये और फिर वर्ण संकर हो गया। अत: इनकी संतित शुद्र ही होगी। तुम दोनों क्षत्रियवंश की प्रतिष्ठा करो। तुम्हारी संतानों में आगे कुछ स्वयं वैश्यवर्ण अपना लेंगे। ऋषि भी धरा को धन्य करने कलापग्राम से आ रहे हैं। ब्राह्मणों का कुल उनके द्वारा स्थापित हो जायगा। मरु के द्वारा सूर्यवंश की परम्परागत राजधानी अयोध्या और चन्द्रवंश का पवित्र-क्षेत्र प्रतिष्ठानपूर अब देवापि के द्वारा पूर्व प्रतिष्ठा को प्राप्त करे।'

'श्रीचरणों की प्रतीक्षा करेंगे हम।' दोनों ने साष्टांग प्रणिपात किया।

'प्रजापति स्वयं तुम्हारी सहधर्मिणियों का विधान करेंगे।' भगवान परशुराम ने आशीर्वाद देकर बताया - 'तुम्हारी संतति को शस्त्र एवं शास्त्र की शिक्षा देने मुझे भी आना ही है।'

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 8

।।श्री हरिः।।
14 - कोप या कृपा

'मातः!' बड़ा करुण स्वर था हिमभैरव का। यह उज्जवल वर्ण, स्वभाव से स्थिर-प्रशान्त, यदा-कदा ही क्रुद्ध होने वाला रुद्रगण बहुत कम बोलता है। बहुत कम अन्य गणों के सम्पर्क में आता है। उग्रता की अपेक्षा सौम्यता ही इसमें अधिक है। साम्बशिव की एकान्त सेवा और स्थिर आसन किंतु जब इसे क्रोध आता है - अन्ततः भैरव ही है, पूरा प्रलय उपस्थित कर देगा। किंतु आज यह बहुत ही व्यथित जान पड़ता है।

'तुम इतने कातर क्यों हो वत्स?' जगदम्बा शैलसुता ने अनुकम्पापूर्वक देखा।

'ऋषिकुमार वर्चा ने शाप दिया मुझे।' रोते हुए हिचकी बंध गयी हिमभैरव की - 'यक्षराज के सरोवर में स्नान करके वे लौट रहे थे। सुकोमल हिम में चरणपात उन्होंने अपनी ही असावधानी से किया; किंतु जब गिरे, रोष उन्हें मुझ पर आया। उन्हें कोई आघात नहीं लगा। केवल जटाओं एवं वल्कल में हिमकण भर गये थोड़े से और वे कहते हैं कि 'हिमभैरव अब ऋषिकुमारों से परिहास का प्रमाद करता है। उसे भगवान् शंकर के श्रीचरणों में रहने का अधिकार नहीं। वह मनुष्यजन्म ले।' आपके इन चरणों से पृथक यह किंकर........।'

'डरो मत पुत्र!' अत्यन्त कातर, अपने चरणों को अश्रुधारा से धोते गण को वात्सल्य की उन अधिदेवता ने अपने श्रीकरों से उठाया - 'ऋषिकुमार की वाणी को अन्यथा नहीं किया जा सकता; किंतु उन्होंने मनुष्य-जन्म लेने का ही तो शाप दिया है। मर्त्यलोक में निवास की अवधि तो निश्चित की नहीं है। तुम जन्म लो और फिर अविलम्ब वह देह त्याग कर मेरे समीप आ जाओ।'

'मैं भुवनेश्वरी को अम्बा कहता हूँ और अब कोई सामान्य मानवी मेरी जननी बनेगी।' हिमभैरव का रुदन रुका नहीं - 'अपवित्र मर्त्यधरा मेरी जन्म भूमि और यम के दूत - रोग मुझे पराभव देंगे - मेरी मृत्यु के हेतु बनेंगे।'

'वह सब तुमसे किसने कहा?' माता पार्वती ने पुचकारा स्नेहपूर्वक - 'मेरी प्रिय सखी बलया - नन्दीश्वर के शाप से वह मर्त्यनारी बनी। उसका निर्वासन मुझे व्यथित करता है। तुम उसकी गोद में जा सकते हो। उसे भी तो तुम अम्बा ही कहते थे। तुम्हारा जन्म मेरे इस दिव्य प्रदेश में होगा और मुझे बलया को भी तो मुक्त करना है। मुक्त हो जायेंगे उसके सम्पर्क में आने वाले अन्य बहुत-से परिपूत प्राणी। तुम्हारा यह हिम तुम सबको शरीर बन्धन से मुक्त करेगा!'

'अनुकम्पा माता की!' हिमभैरव ने नेत्र पोंछ लिये। जगदम्बा के ज्योतिर्मय श्रीचरणों पर उसने मस्तक रखा - 'अल्पतम अवधि वियोग की बने इस शिशु के लिये!'
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'नाथ! जबसे सावधान हुई, सचेत हुई, बड़ी नन्दा की जत किसी वर्ष चुकाया नहीं मैंने। भगवती नन्दा (पार्वती) हम पर्वतीय जनों की परमाराध्या हैं!' महारानी बलया ने एकान्त में बड़े ही अनुरोध भरे स्वर में प्रार्थना की - 'यात्रा का समय समीप आ रहा है। महाराज अनुग्रह करें! मैं आपको साथ चलने का आग्रह नहीं करती; किंतु अनुमति प्राप्त हो इस सेविका को!'

'कठिन यात्रा है और इस समय तुम सरल यात्रा के योग्य भी नहीं हो!' कान्यकुब्जेश्वर महाराज यशधवल का मुख गम्भीर हो गया। दो क्षण वे कुछ सोचते रहे - 'किंतु इस अवस्था में तुम्हारी किसी आकांक्षा को भग्न करना भी ठीक नहीं है। यात्रा का संकल्प पवित्र है। मैं साथ चलूंगा और सब सुविधा रहेगी; किंतु एक अनुरोध मेरा भी मानना होगा तुम्हें। यात्रा की किसी भी सीमा से तुम पदयात्रा करने का आग्रह नहीं करोगी।'

'नहीं कहूँगी देव!' महारानी ने स्वीकार किया। महाराज यशधवल को बड़ा प्रेम है अपनी इस पर्वतीय महारानी से और अब तो महारानी अन्तर्वत्नी हैं। राज्य के प्रमुख ज्योतिषियों ने बताया है कि महारानी की कुक्षि में कुमार है। महाराज का और आदर बढ गया है महारानी बलया के लिये।

यात्रा का आदेश मिला सैनिकों को और साथ में चिकित्सक, परिचारक आदि सबकी व्यवस्था हुई। यात्रा के उत्सुक श्रद्धालूजन तथा साधुओं को भी महाराज यशधवल ने साथ ले लिया। उनके आहार-विश्राम की व्यवस्था भी राजा ने की।

आज के समान तीर्थयात्रा सुगम नहीं थी। वैसे 'बड़ी नन्दा की जत' आज भी गढवाल में कठिन यात्राओं में है और यह घटना तो आज से लगभग 6 शती पूर्व की है। मार्ग में शिविर पड़ते, कथा-कीर्तन, साधू-ब्राह्मणों का सत्कार और मार्ग के तीर्थों पर स्नान-दान करते यह तीर्थ-यात्री समूह जा रहा था। कई मास मार्ग में लगेंगे, यह स्वाभाविक तथा पहले से जानी-समझी बात थी।

महाराज यशधवल जब 'गंगतोली' पहुंचे, महारानी बलया को प्रसव-वेदना प्रारम्भ हुई। सैनिकों, बहुत से सेवकों तथा साथ के तीर्थयात्रियों को महाराज ने आगे चलने का आदेश दिया और स्वयं महारानी के साथ रुक गये। चिकित्सक, परिचारक आदि थोड़े से व्यक्ति गंगतोली में रुके। आगे जाने वाले दल ने जिबरागिली ढाल पर पड़ाव डाला था। उस समय जब गंगतोली महारानी बलया की गोद में एक उज्जवल-हिमवर्ण पुत्र आया।
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'मातः!' भगवती उमा के सम्मुख आज उपस्थित थे भगवान रुद्र के वे गणप्रमुख जिनके ऊपर हिमालय के पुण्य स्थलों की पवित्रता को अक्षुण्ण रखने का दायित्व है। उन्होंने प्रार्थना की - 'राजा यशधवल ने नन्दाक्षेत्र की पवित्रता भंग की है। उस क्षेत्र में उसकी रानी के पुत्र होने से क्षेत्र अशुचि हुआ है। रानी बलया आपकी अनुग्रहभाजना हैं और उनका नवजात पुत्र तो आपका किंकर हिमभैरव.....…हम श्रीचरणों की आज्ञा के बिना कोई दण्ड-विधान करने का साहस अपने में नहीं पाते।'

'बलया मेरे सांनिध्य से बहुत काल निर्वासित रह चुकी और हिमभैरव तो प्रार्थना कर गया है कि उसके मर्त्यशरीर की आयु अल्पतम होनी चाहिये।' भगवती ने कृपापूर्वक आज्ञा दी - 'इन दोनों के जो भी सहचर हैं, उन्हें भी अब कैलास आ जाने दो! किंतु केवल हिमपात का ही विधान करना है तुम्हें। आधि-व्याधि या अन्य कोई दण्ड किसी को नहीं मिलेगा! किसी को कोई कष्ट अथवा आतंक प्राप्त नहीं होना चाहिये।'

'भगवती की जैसी आज्ञा!' गणप्रमुखों ने अञ्जलि बाँधकर मस्तक झुकाया।

दो क्षण पश्चात् सहसा अतर्कित हिमपात प्रारम्भ हुआ 'जिबरागिली ढाल' के प्रदेश में। इतना भयानक हिमपात कि किसी को उसे ठीक देखने का समय भी नहीं मिला। उस ढाल के ठीक नीचे 'रूपकुण्ड' है। जो लोग भी ढाल पर थे, उनके शरीर हिम में जम गये और लुढ़ककर हिम के साथ रूपकुण्ड में पहुंच गये।

ठीक उसी समय "गंगतोली' पर बड़े जोर से ओले पड़ रहे थे। इन औलों की वर्षा में महाराज यशधवल अपनी पत्नी, नवजात पुत्र तथा सेवक-परिचारकों के साथ निर्वाण प्राप्त हो गये।*
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*चमोली जिले में मोटर बस के अड्डे 'ग्वालडाम' से 41 मील दूर 'रूपकुण्ड' है। यह समुद्र की सतह से 16000 फीट ऊंचाई पर है और इसके चारों ओर खड़ी दीवार के समान पर्वत, 80 से 250 फीट ऊँचे हैं। इसके ठीक ऊपर 'जिबरागिली ढाल' है। इससे 10 मील दूर 'होमकुण्ड' है। इस रूपकुण्ड से बहूत से अस्थि-पञ्जर गत दो वर्ष पूर्व मिले थे। साथ ही कुण्ड से तलवारें, ढाल, सैनिक वस्त्र, भाले, कमण्डलु मालाएँ आदि भी मिली थीं। पुरातत्त्व-वेत्ताओं ने इन अस्थि-पञ्जरों को छः सौ वर्ष पुराना बताया है। यद्यपि ये अस्थि-पञ्जर किनके हैं' - इस सम्बन्ध में इतिहासजों ने अनेक प्रकार के अनुमान लगाये हैं और उनमें ऐकमत्य नहीं है, किंतु कुमाँऊ प्रदेश में प्रचलित 'जागर' लोकगीतों में जो इस सम्बन्ध में कथा है, उसी का आधार इस कहानी में लिया गया है। हिमालय में अब भी ऐसे दिव्य क्षेत्र हैं - मुझे मिले हैं,जहां मल-मूत्र या थूक डालना मना है और कोई यह मर्यादा तोड़े तो वहाँ ओले पड़ने लगते हैं। - लेखक

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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