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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 9

|| श्री हरि: ||
3 - भरोसा भगवान का

'वह देखो!' याक की पीठ पर से ही जो कुछ दिखाई पड़ा उसने उत्फुल्ल कर दिया। अभी दिनके दो बजे थे। हम सब चले थे तीर्थपुरी से प्रात: सूर्योदय होते ही, किंतु गुरच्याँग में विश्राम-भोजन हो गया था और तिब्बतीय क्षेत्र में वैसे भी भूख कम ही लगती है। परन्तु जहाँ यात्री रात-दिन थका ही रहता हो, जहाँ वायु में प्राणवायु (आक्सिजन) की कमी के कारण दस गज चलने में ही दम फूलने लगता हो और अपना बिस्तर समेटने में पूरा पसीना आ जाता हो, वहाँ याक की पीठपर ही सही, सोलह मील की यात्रा करके कोई ऊब जाय, यह स्वाभाविक है। कई बार हम पूछ चुके थे 'खिंगलुंग' कितनी दूर है। अब दो बज चुके थे और चार-पाँच बजे तक हमें भोजनादि से निवृत्त हो जाना चाहिये। तंबू भी खडे़ करनेमें कुछ समय लगता है। सूर्यास्त से पहले ही अत्यन्त शीतल वायु चलने लगती है। इन सब चिन्ताओं के मध्य एक इतना सुन्दर दृश्य दिखायी पडे - सर्वथा अकल्पित, आप हमारी प्रसन्नता का अनुमान नहीं कर सकते।

'ओह! यह तो संगमरमर का फुहारा है।' मेरे बंगाली मित्र भूल गये कि वे अर्धपालित पशु याक पर बैठे हैं। याक तनिक सा स्पर्श हो जाने से चौंक कर कूदने-भागने लगता है। उस पर बैठने वाले को बराबर सावधान रहना पड़ता है। कुशल हुई - मेरे साथी का याक तनिक कूद कर ही फिर ठीक चलने लगा था। उसे साथ चलने वाले पीछे के याक ने सींग की ठोकर दी थी, मेरे साथी सामने देखने में लगे होने से असावधान थे; किंतु गिरे नही, बच गये।

'संगमरमर नहीं है, गंधक का झरना है। गंधक के पानी ने अपने आप इसे बनाया है।' हमारे साथ के दुभाषिये दिलीप सिंह ने हमें बताया। वह पैदल चल रहा था; किन्तु प्राय: मेरे याक के साथ रहता था।

'अपने आप बना है यह।' लगभग 15 फुट ऊँचाई, विशाल प्रफुल्ल कमल के समान चमकता गोल होज जैसे रखा गया हो और उसक चारों ओर एक के बाद दूसरे क्रम से एक दूसरे के नीचे न रखकर तनिक इधर-उधर नीचे चार फुट तक वैसे ही उज्जवल, कमलाकार, किन्तु कुछ छोटे-बड़े हौज सजा दिय गये हों। बहुत ही कूशल कारीगर बहुत परिश्रम एव रुचिपूर्वक सजावे तो ऐसा कमलों के समान होजों का स्तम्भ बनेगा। इतनी व्यवस्था, इतनी सजावट और ऐसी सुचिक्कण कारीगरी थी कि विश्वास नहीं होता था कि यह मानव-कला नहीं है। सभी हौजों में निर्मल नीला जल दूर से झिलमिल करता दीख रहा था।

'झरना अपने आप बना है, परंतु यह फुहारा तो किसीने बनवाया है।' मेरे बंगली साथी ने कहा - 'वहाँ संगमरमर कहां से - कितनी दूर से आया होगा।' हम लोगों को तिब्बत के इस क्षेत्र में कहीं संगमरमर होने आशा नहीं थी।

'वहां एक टुकड़ा भी संगमरमर नहीं। गंधक के पानी का यह कार्य है।' दिलीप सिंह हमें फिर समझाया, किन्तु हम उसकी बात तो उस झरने के पास ही जाकर समझ सके। गंधक का झरना है। उसके गरम जल में बहुत अधिक गंधक है। वह गंधक बराबर पत्थरों पर जमता रहता है। इससे संगमरमर के समान उज्जवल, बेल-बूटे बनी जैसी तहें जमती जाती हैं। यह पूरा कमल…स्तम्भ इसी प्रकार बना था।

'वहाँ कोई है, कोई सन्यासी जान पडता है।' गेरुए वस्त्र दीख पडे एक दो पास पत्थर पर फैले। नीचे के छोटे हौज़ में बैठा कोई स्नान कर रहा था। कुछ तिब्बती लोग झरने के पास से अपनी भेड़ें हांके लिय जा रहे थे।

'ये वही सन्यासी हैं, जो हम लोगों को उस दिन दरचिन में मिले थे, जब हम कैलास-परिक्रमा करने जा रहे थे। लगता है कि ये भी आज ही तीर्थपुरी से चले हैं।' दिलीप सिंह में दूर से ही लोगों को पहचान लेने की विचित्र शक्ति है। उसका अनुमान ठीक था। वे वही सन्यासी थे और तीर्थपुरी से तो नहीं, पर आज गुरच्याँग से आ रहे थे।

'अब तो आप मेरे साथ ही चलेंगे।' मैंने सन्यासीजी को आमन्त्रण दिया। मेरे बंगाली साथी 'नीती घाटी होकर जोशीमठ जाना चाहते हैं। उन्हें बदरीनाथ जाना है। यहाँ खिंगलुंग से ही उनका मार्ग पृथक होता है। अब मेरे साथ केवल दिलीप सिंह रह जायगा। एक और हो जाय तो अच्छा, यह मैंने सोचा था।

'जैसी आपकी इच्छा। परन्तु मैं आपके लिये भार सिद्ध होऊँगा।' सन्यासी बड़े प्रसन्नमुख युवक हैं। उनकी बात सच है। यहाँ तिब्बत में मनुष्यके लिये अपना निर्वाह भी कठिन हो जाता है। भारतीय सीमा से अपने साथ लाया सामान ही काम देता है। यहाँ तो नमक, मट्ठा, दूध, दही, मक्खन कहीं-कहीं मिलता है। चेष्टा करने पर एकाध सेर सत्तू और एकाध सेर आटा मिल जाता है तीन-चार रुपये सेर। भारतीय व्यापारी जब तिब्बत में आ जाते हैं तब कुछ सुविधा हो जाती है; किंतु हम पंद्रह-बीस दिन मौसम से पहले आ गये हैं। अभी व्यापारी आने नहीं लगे हैं। ऐसी अवस्था में एक व्यक्ति की भोजन व्यवस्था और ले ली जाय तो वह भार तो बनेगी ही।

'उस भार की आप चिन्ता न करें।' मैंने हँसकर कहा। 'हमारे साथ का सब सामान आज समाप्त हो जायगा। तिब्बत से बाहर पहुँचने में अभी सात-आठ दिन लगेंगे। इतने समय का निर्वाह तो कैलास के अधिष्ठाता को ही करना है। उसे एक भारी नहीं लगेगा तो दो भी नहीं लगेंगे।

'तुम भी मेरे ही जैसे हो।' खुलकर हँसे वे महात्मा। 'तुम्हारे साथ अवश्य चलूंगा। बडा आनन्द रहेगा। कोई चिंता मत करो।' यहां इतना और बता दूं कि हमें अन्त तक चिंन्ता नहीं करनी पड़ी। तिब्बत में दाल और शाक तो मिलता नहीं था; किंतु हमें आटे और मक्खन का अभाव कभी नहीं रहा। आटा बराबर मिलता गया। मक्खन-रोटी या दही-रोटी ऐसा भोजन नहीं है कि उसकी कोई आलोचना की जाय।
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'आप पहले ही इधर आ चुके हैं। हम लोग मानीथंगा और ठांजा पीछे छोड़ चुके हैं। छिरचिन से हमने आज प्रातःकाल ही प्रस्थान किया है। 'आज यदि कुंगरी-विंगरी और जयन्ती के दर्रे पार कर सके तो ऊटा तथा जयन्ती के बीच रात्रि विश्राम होगा। वहाँ एक होटल (तंबू) इन दिनों या गया होगा। दूसरे दिन ऊटा धुरा(दर्रा) पार करके कल हम भारतीय सीमा में पहुँच जाएँगे।' ये बातें मुझे सन्यासीजी ने बतायी और इसीलिए मैंने उनसे प्रश्न किया। वैसे व्यक्तिगत परिचय करने में मेरी रुचि कम है, अंत तक मैंने उन संन्यासीजी का नाम नहीं पूछा। उनकी कुटी कहीं है या नहीं, यह जानने की इच्छा मुझे नहीं हुई।

'मैं पिछले ही वर्ष यहाँ आया था; किंतु देर से आया। लौटते समय मार्ग में हिमपात होने लगा। इच्छा होने पर भी सौ बार नहीं जा सका। अब इस वर्ष श्रीबदरीनाथजी के दर्शन करने आया तो वहाँ से इधर चला आया।' मुझे इस समय पता लगा कि ये स्वामीजी गर्व्याँग के रास्ते न आकर नीतिघाटी के मार्ग से आये थे और हमें जब दरचिन में मिले थे, तब वहां से मानसरोवर चले गये थे। हमने तो समझा था कि वे हमारे समान मानसरोवर होकर कैलास आये होंगे। पैदल यात्री होने के कारण उन्हें समय अधिक लगा होगा।

'हिमपात तो आज भी होता दीखता है। आगे कोई पड़ाव भी नहीं।' तिब्बत में वर्षा कम ही होती है। इस अंचल में जब मेघ आते हैं, तब पहले हिमशर्करा पडती है। चीनी के दानों से दुगुनी-चौगुनी हिम-कंकड़ियां। वस्तुत: वे जल की बूंदें होती हैं जो शीताधिक्य के कारण जम गयी होती हैं। हिमपात की वे पूर्वसूचना हैं। उनके पश्चात, हिमपात होता है। कद् दूकस में कसे नारियल के अत्यन्त पतले आध इंच से भी कुछ छोटे टुकडों के समान हिम वायु में तैरती गिरती है। असंख्य टुकड़े - लगता है कि रुई की वर्षा हो रही है। सम्मुख का मार्ग नहीं दीखता। पृथ्वी उज्जवल हो जाती है। आज आकाश में मेघ हैं, दो-चार हिमशर्करा की कंकड़ियां मुखपर पड़ चुकी हैं। आज जब दो धुरे (दर्रे) पार करने हैं, तब उनपर चढ़ते समय हिंमपात का सामना करना निश्चित है।

'यह हिमपात तो खेल है।' स्वामीजी ने कहा। 'हिमपात तो मार्गशीर्ष से प्रारम्भ होता है। लगातार हिमवर्षा होती है और एक साथ दस-पन्द्रह फुट हिम पड़ जाती है। उसमें मनुष्य चल नहीं सकता। मैं पिछले वर्ष दीपावली पर दरचिन था और आपने कदाचित् सुना होगा कि पिछले वर्ष हिमपात कार्तिक्र में ही प्रारम्भ हो गया था।'

'हम जिस दिन मानीथंगा पहुँचे थे, उसी दिन यह तिब्बती, जिसके तंबू के पास हम रुके थे वह अपने फांचे (भेडों पर नमक आदि लादने की ऊनी थैलियां) लेकर लौटा था। पिछले हिमपात में उसकी तीन सौ भेड़ें और दो नौकर मारे गये।' मैंने जो सुना था, वही सुना दिया। हम पैदल ही चल रहे थे। तीर्थपुरीसे जो याक मिले थे भाड़ेपर, वे केवल मानीथंगा तक के लिये थे। वे लौट चुके थे। मौसम से पूर्व आने के कारण अभी मार्ग खुला नहीं था। हम पहले यात्री थे। हमारे साथ डेढ़-दो सौ भेड़ें लेकर, उनपर नमक लादकर चार तिब्बती चल रहे थे। वे भारतीय बस्ती मिलम में नमक देकर अन्न लेंगे और लौटेंगे। उनकी पांच भेडों पर मेरा सामान - तंबू आदि लदा था।

यहां इतना और बता हूँ कि कैलास-मानसरोवर अंचल में न नगर हैं न ग्राम। दरचिन, तीर्थपुरी, खिंगलुंग-जैसे कुछ सथान ऐसे हैं जहाँ पर्वतों में बुद्ध मन्दिर हैं। उनके पास ही बहुत-सी गुफाएँ हैं। इन गुफाओं में य़हाँ के लोग अपना सामान रखते हैं। शीतकाल में उनमें अपने पशुओं के साथ रहते हैं। शेष समय वे तंबुओं में घूमते हुए बिताते हैं। अपने याक और भेड़े लिये वे घूमते रहते हैं। मानीथंगा, थिरचिन आदि ग्राम नहीं, इन चरवाहों तथा यात्रियों के पड़ाव के स्थान हैं। वे कभी सुनसान रहते हैं और कभी वहाँ तंबुओं के ग्राम बस जाते हैं।

'आपने ध्यान नहीं दिया, वह तिब्बती मुझे देखकर चौंका था। वह मेरे आने से संतुष्ट नही था। मैं उसके भेडोंवाले दल के साथ ही पिछले वर्ष भारत के लिये चला था।' स्वामीजी ने बताया। 'वह कहता था कि यह लामा अपशकुन है। इसके साथ मत जाओ।' दिलीप सिंह ने हमें बताया। वहाँ मानीथंगा में तिब्बती और दिलीप सिह में बात बहुत हुई; किंतु वहाँ हमें दिलीप सिंह ने कुछ नहीं कहा था। तिब्बती भाषा में हम भला, क्या समझते। हमें तो वह तिब्बती भला लगा था। उसने हमारे तंबू खड़े करने में सहायता दी। हमारे यहां अग्नि जला दी और हमारे लिये मक्खन पडी नमकीन, तिब्बती चाय झटपट बनवा लाया था अपने तंबू में से।

'आप बचे कैसे?' कुछ रुककर दिलीप सिंह ने फिर पूछा।

'कुछ आगे चलो।' पता नहीं स्वामीजी क्यों गम्भीर हो गये थे।
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'यह क्या है दिलीप सिंह?' मैं ठिठक कर खडा हो गया था। मार्ग के पास ही थोड़ी-थोड़ी दुरी पर बकरियों भेड़ों की ठठरियां पडी थी। उनमें अब केवल हड्डी थी। दो मनुष्य-कंकाल भी दीखे। उनके आस पता बहुत से फाँचे थे, कपड़े थे और स्थान-स्थान पर प्रायः बकरियों के कंकाल के पास ऊन की बड़ी-बड़ी गोलियां थी। वे कुछ चपटी थीं। उनके ढ़ेर और उनकी यह गोल-चपटी आकृति......।

'बकरियाँ-भेड़ें हिम में दब गयी। उनको जब कुछ भोजन नहीं मिला तब उन्होनें समीप की भेड या बकरी का ऊन खा लिया। वह ऊन उनकी आतों में जाकर ऐसे गोले बन गया। अब मास तथा आतें तो गल गयी, वन्य पशु-पक्षी खा गये किंतु आँतोंसे निकले ये ऊन के गोले पडे हैं। दिलीप सिंह ने जो कुछ बताया, उसका स्मरण आज भी रोमांचित कर देता है। हम कुछ अधिक वेग से चलने लगे। संयोगवश बादल हट गये थे। हिमपात कुछ समय के लिये तो टल गया था।

'उस दिन - उस भयंकर दिन मैं इस अभागे यूथ के साथ था।' संन्यासीजी ने कुछ आगे जाकर अपनी गम्भीरता तोड़ी। 'मानीथंगा से जब ये चरवाहे चले थे, तब इनके लामा ने कहा था कि अभी बीस दिन हिमपात नहीं होगा। मैं तो अकस्मात इनके साथ हो गया।'

दिलीप सिंह और पास आ गया था। मैं भी उत्सुक था संन्यासीजी की बात सुनने के लिये। संन्यासीजी कह रहे थे - 'जब हम छिरचिन से चले, तभी घने बादल घिर आये थे। तिब्बती चरवाहे बराबर लामा का नाम लेते थे और कहते थे - उनका लामा पत्थर में पंजे मारकर चिह्न बना देता है। वह वर्षा, आंधी, हिमपात सबको रोक देता है। इन बादलों को वह अवश्य भगा देगा। उन चरवाहों में एक अधूरी हिंदी बोल लता था। मुझे वह पता नहीं क्यों मानता भी बहुत था। कई बार उसने मुझे अपनी 'छिरपी' (सूखे मट्ठे का खण्ड ) खिलाया।'

एक बार संन्यासीजी ने कैलास की ओर मुड़कर देखा और बोले - 'सहसा हिम-शर्करा प्रारम्भ हुई। बकरियां और भेडें चिल्लाने लगी और चरवाहे भयातुर हो उठे। इसके पश्चात् हिमपात प्रारम्भ हो गया। हम देख भी नहीं सकते थे कि हमारे आगे दो फुटपर मनुष्य है या पर्वत। मेरे साथ के लोगों का क्या हुआ - मुझे पता नहीं।'

'आप बचे कैसे?' दिलीप सिंह ने पूछा।

'मुझे मारता कौन?' संन्यासी ने कहा - 'मुझे तो न कोई भय लगा न घबराहट हुई। मैं चल रहा था - चलता रहा। मार्ग दीख नहीं रहा था, मार्ग देखने का प्रश्न भी नहीं था। जहाँ गड्ढे में गिरता प्रतीत होता था या सिर टकराता था - जिधर मुड़ना सम्भव होता था मुड़ जाता था।'

'अद्भुत हैं आप।' मैंने कहा।

'इसमें अद्भुत बात क्या है?' संन्यासी ने सहज भावसे कहा - 'वो भगवान शंकर कैलास के अधिष्ठाता हैं, वे मैदान में रक्षा करते हैं और पर्वत के हिमपात में नहीं करते? मैं उनके आश्रम पर आया था - कैलास आया था मैं। उन देव-दवेश्वर के दर्शनार्थी को मार कौन सकता था? हिमपात हुआ - होता रहा। मेरे पैर एक स्थान पर फिसले और पता नहीं मैं कितने नीचे लुढक गया। कई बार लुढका। कई बार हिम में लुढ़कने पर ढक गया और उठा। बड़ा आनन्द आया उस दिन। पर्वतीय पिताका जाग्रत् स्वरूप और उनका क्रीड़ा-बैभव देखा मैंने।'

सन्यासीजी ने अपनी बात समाप्त की - 'जब मैं अन्तिम बार लुढ़का तो किसी जलस्त्रोत में पड गया। मेरी चेतना जल की शीतलता और लहरों ने छीन ली। जब मूझे फिर शरीर का भान हुआ, तब कुछ भेड़ वाले मुझे दुंग से आगे अग्नि जलाकर सेंक रहे थे। उन्होने मुझे धारा से निकाला था, उन्हें संदेह हो गया था कि मैं जीवित हूँ।'

ये सन्यासीजी केवल दुंग तक हमारे साथ आये। मिलम से भी पूर्व मार्ग में ही वे हमसे पृथक हो गये। परन्तु उनकी एक बात स्मरण करने योग्य है। वे कहा करते थे - 'मर्तय का भरोसा क्या? भरोसा भगवान का। उसका भरोसा, जो सदा है - सदा साथ है।'

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 8

।।श्री हरिः।।
14 - कोप या कृपा

'मातः!' बड़ा करुण स्वर था हिमभैरव का। यह उज्जवल वर्ण, स्वभाव से स्थिर-प्रशान्त, यदा-कदा ही क्रुद्ध होने वाला रुद्रगण बहुत कम बोलता है। बहुत कम अन्य गणों के सम्पर्क में आता है। उग्रता की अपेक्षा सौम्यता ही इसमें अधिक है। साम्बशिव की एकान्त सेवा और स्थिर आसन किंतु जब इसे क्रोध आता है - अन्ततः भैरव ही है, पूरा प्रलय उपस्थित कर देगा। किंतु आज यह बहुत ही व्यथित जान पड़ता है।

'तुम इतने कातर क्यों हो वत्स?' जगदम्बा शैलसुता ने अनुकम्पापूर्वक देखा।

'ऋषिकुमार वर्चा ने शाप दिया मुझे।' रोते हुए हिचकी बंध गयी हिमभैरव की - 'यक्षराज के सरोवर में स्नान करके वे लौट रहे थे। सुकोमल हिम में चरणपात उन्होंने अपनी ही असावधानी से किया; किंतु जब गिरे, रोष उन्हें मुझ पर आया। उन्हें कोई आघात नहीं लगा। केवल जटाओं एवं वल्कल में हिमकण भर गये थोड़े से और वे कहते हैं कि 'हिमभैरव अब ऋषिकुमारों से परिहास का प्रमाद करता है। उसे भगवान् शंकर के श्रीचरणों में रहने का अधिकार नहीं। वह मनुष्यजन्म ले।' आपके इन चरणों से पृथक यह किंकर........।'

'डरो मत पुत्र!' अत्यन्त कातर, अपने चरणों को अश्रुधारा से धोते गण को वात्सल्य की उन अधिदेवता ने अपने श्रीकरों से उठाया - 'ऋषिकुमार की वाणी को अन्यथा नहीं किया जा सकता; किंतु उन्होंने मनुष्य-जन्म लेने का ही तो शाप दिया है। मर्त्यलोक में निवास की अवधि तो निश्चित की नहीं है। तुम जन्म लो और फिर अविलम्ब वह देह त्याग कर मेरे समीप आ जाओ।'

'मैं भुवनेश्वरी को अम्बा कहता हूँ और अब कोई सामान्य मानवी मेरी जननी बनेगी।' हिमभैरव का रुदन रुका नहीं - 'अपवित्र मर्त्यधरा मेरी जन्म भूमि और यम के दूत - रोग मुझे पराभव देंगे - मेरी मृत्यु के हेतु बनेंगे।'

'वह सब तुमसे किसने कहा?' माता पार्वती ने पुचकारा स्नेहपूर्वक - 'मेरी प्रिय सखी बलया - नन्दीश्वर के शाप से वह मर्त्यनारी बनी। उसका निर्वासन मुझे व्यथित करता है। तुम उसकी गोद में जा सकते हो। उसे भी तो तुम अम्बा ही कहते थे। तुम्हारा जन्म मेरे इस दिव्य प्रदेश में होगा और मुझे बलया को भी तो मुक्त करना है। मुक्त हो जायेंगे उसके सम्पर्क में आने वाले अन्य बहुत-से परिपूत प्राणी। तुम्हारा यह हिम तुम सबको शरीर बन्धन से मुक्त करेगा!'

'अनुकम्पा माता की!' हिमभैरव ने नेत्र पोंछ लिये। जगदम्बा के ज्योतिर्मय श्रीचरणों पर उसने मस्तक रखा - 'अल्पतम अवधि वियोग की बने इस शिशु के लिये!'
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'नाथ! जबसे सावधान हुई, सचेत हुई, बड़ी नन्दा की जत किसी वर्ष चुकाया नहीं मैंने। भगवती नन्दा (पार्वती) हम पर्वतीय जनों की परमाराध्या हैं!' महारानी बलया ने एकान्त में बड़े ही अनुरोध भरे स्वर में प्रार्थना की - 'यात्रा का समय समीप आ रहा है। महाराज अनुग्रह करें! मैं आपको साथ चलने का आग्रह नहीं करती; किंतु अनुमति प्राप्त हो इस सेविका को!'

'कठिन यात्रा है और इस समय तुम सरल यात्रा के योग्य भी नहीं हो!' कान्यकुब्जेश्वर महाराज यशधवल का मुख गम्भीर हो गया। दो क्षण वे कुछ सोचते रहे - 'किंतु इस अवस्था में तुम्हारी किसी आकांक्षा को भग्न करना भी ठीक नहीं है। यात्रा का संकल्प पवित्र है। मैं साथ चलूंगा और सब सुविधा रहेगी; किंतु एक अनुरोध मेरा भी मानना होगा तुम्हें। यात्रा की किसी भी सीमा से तुम पदयात्रा करने का आग्रह नहीं करोगी।'

'नहीं कहूँगी देव!' महारानी ने स्वीकार किया। महाराज यशधवल को बड़ा प्रेम है अपनी इस पर्वतीय महारानी से और अब तो महारानी अन्तर्वत्नी हैं। राज्य के प्रमुख ज्योतिषियों ने बताया है कि महारानी की कुक्षि में कुमार है। महाराज का और आदर बढ गया है महारानी बलया के लिये।

यात्रा का आदेश मिला सैनिकों को और साथ में चिकित्सक, परिचारक आदि सबकी व्यवस्था हुई। यात्रा के उत्सुक श्रद्धालूजन तथा साधुओं को भी महाराज यशधवल ने साथ ले लिया। उनके आहार-विश्राम की व्यवस्था भी राजा ने की।

आज के समान तीर्थयात्रा सुगम नहीं थी। वैसे 'बड़ी नन्दा की जत' आज भी गढवाल में कठिन यात्राओं में है और यह घटना तो आज से लगभग 6 शती पूर्व की है। मार्ग में शिविर पड़ते, कथा-कीर्तन, साधू-ब्राह्मणों का सत्कार और मार्ग के तीर्थों पर स्नान-दान करते यह तीर्थ-यात्री समूह जा रहा था। कई मास मार्ग में लगेंगे, यह स्वाभाविक तथा पहले से जानी-समझी बात थी।

महाराज यशधवल जब 'गंगतोली' पहुंचे, महारानी बलया को प्रसव-वेदना प्रारम्भ हुई। सैनिकों, बहुत से सेवकों तथा साथ के तीर्थयात्रियों को महाराज ने आगे चलने का आदेश दिया और स्वयं महारानी के साथ रुक गये। चिकित्सक, परिचारक आदि थोड़े से व्यक्ति गंगतोली में रुके। आगे जाने वाले दल ने जिबरागिली ढाल पर पड़ाव डाला था। उस समय जब गंगतोली महारानी बलया की गोद में एक उज्जवल-हिमवर्ण पुत्र आया।
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'मातः!' भगवती उमा के सम्मुख आज उपस्थित थे भगवान रुद्र के वे गणप्रमुख जिनके ऊपर हिमालय के पुण्य स्थलों की पवित्रता को अक्षुण्ण रखने का दायित्व है। उन्होंने प्रार्थना की - 'राजा यशधवल ने नन्दाक्षेत्र की पवित्रता भंग की है। उस क्षेत्र में उसकी रानी के पुत्र होने से क्षेत्र अशुचि हुआ है। रानी बलया आपकी अनुग्रहभाजना हैं और उनका नवजात पुत्र तो आपका किंकर हिमभैरव.....…हम श्रीचरणों की आज्ञा के बिना कोई दण्ड-विधान करने का साहस अपने में नहीं पाते।'

'बलया मेरे सांनिध्य से बहुत काल निर्वासित रह चुकी और हिमभैरव तो प्रार्थना कर गया है कि उसके मर्त्यशरीर की आयु अल्पतम होनी चाहिये।' भगवती ने कृपापूर्वक आज्ञा दी - 'इन दोनों के जो भी सहचर हैं, उन्हें भी अब कैलास आ जाने दो! किंतु केवल हिमपात का ही विधान करना है तुम्हें। आधि-व्याधि या अन्य कोई दण्ड किसी को नहीं मिलेगा! किसी को कोई कष्ट अथवा आतंक प्राप्त नहीं होना चाहिये।'

'भगवती की जैसी आज्ञा!' गणप्रमुखों ने अञ्जलि बाँधकर मस्तक झुकाया।

दो क्षण पश्चात् सहसा अतर्कित हिमपात प्रारम्भ हुआ 'जिबरागिली ढाल' के प्रदेश में। इतना भयानक हिमपात कि किसी को उसे ठीक देखने का समय भी नहीं मिला। उस ढाल के ठीक नीचे 'रूपकुण्ड' है। जो लोग भी ढाल पर थे, उनके शरीर हिम में जम गये और लुढ़ककर हिम के साथ रूपकुण्ड में पहुंच गये।

ठीक उसी समय "गंगतोली' पर बड़े जोर से ओले पड़ रहे थे। इन औलों की वर्षा में महाराज यशधवल अपनी पत्नी, नवजात पुत्र तथा सेवक-परिचारकों के साथ निर्वाण प्राप्त हो गये।*
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*चमोली जिले में मोटर बस के अड्डे 'ग्वालडाम' से 41 मील दूर 'रूपकुण्ड' है। यह समुद्र की सतह से 16000 फीट ऊंचाई पर है और इसके चारों ओर खड़ी दीवार के समान पर्वत, 80 से 250 फीट ऊँचे हैं। इसके ठीक ऊपर 'जिबरागिली ढाल' है। इससे 10 मील दूर 'होमकुण्ड' है। इस रूपकुण्ड से बहूत से अस्थि-पञ्जर गत दो वर्ष पूर्व मिले थे। साथ ही कुण्ड से तलवारें, ढाल, सैनिक वस्त्र, भाले, कमण्डलु मालाएँ आदि भी मिली थीं। पुरातत्त्व-वेत्ताओं ने इन अस्थि-पञ्जरों को छः सौ वर्ष पुराना बताया है। यद्यपि ये अस्थि-पञ्जर किनके हैं' - इस सम्बन्ध में इतिहासजों ने अनेक प्रकार के अनुमान लगाये हैं और उनमें ऐकमत्य नहीं है, किंतु कुमाँऊ प्रदेश में प्रचलित 'जागर' लोकगीतों में जो इस सम्बन्ध में कथा है, उसी का आधार इस कहानी में लिया गया है। हिमालय में अब भी ऐसे दिव्य क्षेत्र हैं - मुझे मिले हैं,जहां मल-मूत्र या थूक डालना मना है और कोई यह मर्यादा तोड़े तो वहाँ ओले पड़ने लगते हैं। - लेखक

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 8

।।श्री हरिः।।
12 - प्रार्थना का प्रभाव

'भगवान् यार्कशायर में हैं और दक्षिण ध्रुव में नहीं है?' वह खुलकर हंस पड़ा। 'जो यहां हमारी रक्षा करता है वह सब कहीं कर सकता है।'

इम तर्क का किसी के पास भला क्या उत्तर हो सकता है। श्रीमती विल्सन जानती हैं कि उनके पति जब कोई निश्चय कर लेते हैं, उन्हें रोका नहीं जा सकता।

मनुष्य भगवान की सृष्टि का बड़ा अद्भुत प्राणी है। इस दो पैर से चलने वाले पुतले के भीतर क्या-क्या है - कदाचित् इसके निर्मात ब्रह्माजी भी नहीं जानते। यह देवता बन सकता है, दानव बन सकता है ,पशु बन सकता है और पिशाच तक बन सकता है। जब इसे कोई सनक सवार हो जाती है तो देवता और दानव दोनों चकित रह जाते हैं। जो कार्य दोनों के वश का न हो - मनुष्य के लिये दुर्गम, असम्भव जैसे कुछ नहीं है। वह नर जो है। उसका नित्य सखा नारायण उसका साथ देगा ही - यह दुसरी बात है कि नर ही अपने सखा की उपेक्षा किये निर्बल बना रहे।

मि. विल्सन पक्के निरामिषभोजी हैं। उनके लिये उबाले आलू, उबाली पत्तियाँ, थोड़ा अंजीर या कोई सूखा मेवा और दूध - बस, यह सदा पर्याप्त होता है। चावल, दाल, रोटी - अन्न छोड़कर फलाहारी वे कभी बने नहीं; बनने की बात भी नहीं सोची; किंतु अन्न की अपेक्षा उन्हें कभी नहीं रहती। यदा-कदा ही वे उसका उपयोग करते हैं।

लम्बा दुबला शरीर, नीली आँखें, सुनहले केश - लेकिन इस फलाहारीप्राय अंग्रेज की रुचि बड़ी विचित्र है। इसे गुमसुम बैठना पसंद नहीं। आतंकपूर्ण स्थितियों में इसे आनन्द आता है। भय को आमन्त्रण देगा और जब चारों श्रीर से प्राणघातक आशकाएँ इसे घेर लेंगी - बड़े आनन्द से उछलेगा, कूदेगा और ताली बजा-बजाकर हँसेगा - 'भगवान्! मेरे भगवान्! मैं तुझे देख रहा हूँ।' जैसे भगवान इसे शान्त, सौम्य परिस्थितियों में दीखते ही नहीं।

श्रीमती विल्सन - बेचारी सुशील नारी - पति की मंगलकामना के अतिरिक्त वह और क्या कर सकती है। बड़ा सनकी है उसका पति - जब हिमपात प्रारम्भ होगा, वह प्राय: संध्या का अन्धकार फैलने के बाद अकेला मोटर लेकर घूमने निकल जायगा। नगर की पुलिस तंग है, इस फक्कड़ से। रात्रि के हिम में किसी राजपथ पर कोई मोटर रुक गयी है, प्रात: मार्ग स्वच्छ करने वाला दल दूर से ही कहेगा - 'बहुत करके विल्सन होना चाहिये।' उसकी मोटर प्राय: पथ पर बर्फ में जमी मिलती है। आप उस समय जब बरफ हटाकर मोटर की खिड़कियां खुलने योग्य कर दी जायेंगी, बड़े आनन्द से खिड़की खोलकर कहेंगे - 'अच्छा, इतनी बरफ पड़ी? तभी तो रात में थोडी सर्दी लग रही थी। रातभर मोटर के भीतर अकड़े पड़े रहने पर भी जो थोड़ी सर्दी लगने की बात करे - पागल नहीं तो और क्या कहा जाय उसे।

एक उपद्रव हो तो गिनाया जाय। जब तूफान के वेग से समुद्र हाहाकार करने लगेगा, बड़े-बड़े जहाज लंगर डालकर बंदरगाहों में शरण लेंगे, खतरे की सूचना बंदरगाह का अधिकारी यन्त्रों से दूर-दूर भेजता होगा, एक छोटी सफेद रंग की नौका गर्जन-तर्जन करते महासागर के वक्ष पर हंसिनी-सी तैरती दीख सकती है। बड़े साहसी नाविक तक नेत्रों से दूरवीक्षण लगाये चकित-स्तम्भित देखते रहते हैं - 'मि. विल्सन नौका-विहार का आनन्द लेने निकले हैं।'

यह सब तो नित्य की बातें हैं; किंतु इस बार श्रीमती विल्सन हताश हो गयी हैं। उनके पति को एक नयी धुन चढी है। दक्षिण अमेरिका से कोई दल दक्षिण ध्रुव का पता लगाने जा रहा है। विल्सन उस दल के साथ जायंगे। कैसे जायंगे? कैसे रहेंगे? ये प्रश्न कभी विल्सन के मन में उठे हों तो आज उठें। उन्होंने तो लिखा-पढी की उस दल के नायक से और अनुमति प्राप्त कर ली। पासपोर्ट ले लिया और जहाज में स्थान तक निश्चित करा लिया। यह सब करके तब पत्नी को सूचना दी इस भले आदमी ने।

'मैं आपको अपने महान् निश्चय से विचलित नहीं करूंगी।' श्रीमती विल्सन को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। अपने पति के स्वभाव को वे जानती हैं। 'मुझे इसका गर्व है कि मेरे पति विश्व के उन थोड़े से लोगों में एक हैं जो अकल्पनीय साहस कर सकते हैं।'

'कितनी अच्छी हो तुम!' विल्सन तो बच्चों की भांति हैं। वे बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

'तुम मेरी एक बात मान लो! भोजन-सम्बन्धी अपना नियम अब यहीं रहने दो।' श्रीमती विल्सन का अनुरोध सहज स्वाभाविक है। किसी हिमप्रदेश में कोई शाकाहारी बने रहने का हठ करे, बोतल को न छूने की शपथ का निर्वाह करे - कैसे जीवित रहेगा वह।

'तुम क्यों चिंता करती हो?' यही उत्तर ऐसे किसी भी अवसर पर देता है। 'चिन्ता करनेवाला है न। वह सारे संसार की चिंता करता है। तुम विश्वास रखो - जब तक मैं होश में रहूँगा, उसकी नित्य प्रार्थना करूंगा। उसे भूलूंगा नहीं।'

'उसे भूलूंगा नहीं।' इससे बड़ा आश्वासन भला और क्या दिया जा सकता है।
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'मैं शाकाहारी हूँ। किसी प्रकार की कोई शराब न छूने की मैंने प्रतिज्ञा की है।' दक्षिण अमेरिका से जहाज छूटने के पश्चात पहले ही दिन विल्सन को दलनायक को स्पष्ट सूचित करना पड़ा। स्थल पर इसकी आवश्यकता नही पड़ी थी। उनकी पत्नी उनके साथ आयी थी इंग्लैण्ड से और जहाज के छुटने के समय तक विदा देने उनके साथ रहीं। दल के सदस्यों ने भूमि पर रहते समय एक साथ भोजन करने का कभी कोई आग्रह किया नहीं था।

'आप निरामिषभोजी हैं और शराब छूते तक नहीं?' दलनायक हर्बर्ट अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए। 'आप होश में भी हैं या नहीं? दक्षिण ध्रुव की यात्रा करने चल रहे हैं आप।'

'मेरे बेहोश होने की तो कोई बात नहीं है।' विल्सन शान्त बैठे रहे - 'मैं जानता हूँ कि मैं कहां जा रहा हूँ।'

'हम आपको समीप के द्वीप पर छोड़ देंगे। अमेरिका लौट जाने के लिये एक सप्ताह के भीतर ही आप जहाज पा सकते हैं।' दलनायक को खेद हो रहा था - क्यों वह इस, व्यक्ति को साथ ले आया।

'यात्रा में साथ ले चलने की स्वीकृति आपने दी है और वह पत्र मेरी जेब में है।' विल्सन ने दृढ स्वर में कहा - 'मैंने यात्रा के नियमों में किसी को तोड़ा नहीं है।'

'आप चाहेंगे तो लौटने पर आपको इंग्लैंड से यहाँ बुलाने का हर्जाना और मार्गव्यय मैं चूका दुंगा।'हर्बर्ट ने भी दृढ स्वर में ही कहा - 'जान-बूझकर किसी की हत्या करने के लिये मैं उसे साथ नहीं ले जा सकता।'

'मैं लौटने के लिये नहीं आया हूँ।' विल्सन ज्यों-के-त्यों दृढ रहे। 'सब सदस्य अपने उत्तरदायित्वपर आये हैं। किसी की मृत्यु के लिये कोई उत्तरदायी नहीं है।'

'तुम समझने का प्रयत्न करो मेरे मित्र।' हर्बर्ट बैठ गया और विल्सन का हाथ पकड़कर बड़ी नम्रता से उसने कहा - 'जहाँ बहुत तेज शराब भी गले के नीचे जाकर रक्त में उष्णता बनाये रखने में किसी भाँति सफल होती है, वहाँ कोई शराब न छूने का व्रत रखे - कैसे जीवित रहेगा? हमारा जहाज बहुत दूर तक नहीं जा सकता। अन्त में हमें स्लेज पर ही यात्रा करनी है। हमारे एकमात्र भोजन वहाँ साथ चलने वाले बारहसिंगे ही हो सकते हैं। कोई भी भोजन का पदार्थ वहां प्राप्य नहीं और न उसे ले जाने के साधन हैं।'

'मैं आपकी सहानुभूति एवं सलाह का कृतज्ञ हूँ।' विल्सन ने भी स्वर को पर्याप्त प्रेमपूर्ण बना लिया - 'ये सब कठिनाइयाँ मेरे ध्यान से बहर नहीं हैं। लेकिन तुम क्या नहीं मानते कि भगवान् सर्वसमर्थ हैं? वे सर्वत्र हैं तो हमें क्यों भय करना चाहिये और क्यों चिन्ता करनी चाहिये? मैं तो इस यात्रा पर आया ही इसलिये हूँ कि निर्जन हिमप्रदेश में भी परमात्मा है और वहाँ भी वह उस प्रार्थना को सूनने के लिए उपस्थित रहता है जो केवल उसके लिये की जाती है - यह अनुभव करूं।'

'मैं नास्तिक नहीं हूँ। लेकिन इतना आशावादी बनने का भय भी नहीं उठा सकता।' हर्बर्ट ठीक कह रहा था। एक सामान्य मनुष्य जैसे सोच सकता है, वैसे ही सोच रहा था वह - 'मैं कृतज्ञ रहूंगा, यदि तुम मेरी सलाह मान लो।'

'हम पहले प्रार्थना करेंगे।' विल्सन ने दूसरा ही प्रस्ताव किया - 'प्रार्थना के बाद भोजन करके तब इस बात पर चर्चा करना अच्छा रहेगा।'

'परमात्मा! मेरे परमात्मा! तू सब कहीं है। तू उस हिम-प्रदेश में भी है जहां मैं तुझे प्रणाम करने आ रहा हूं।' विल्सन का कण्ठ प्रार्थना करते समय गद्गद हो रहा था। उसके बन्द नेत्रों से आंसू की बूंदें टपक रही थी - 'जगदीश्वर! एकमात्र ही सबका रक्षक और पालक है। तू यहाँ है और सब कहीं है। हम क्यों डरें? क्यों चिन्ता करें। तू है न! हमें शक्ति दे कि हम तेरा ही भरोसा करें! तुझे ही स्मरण करें!'

सभी यात्री, सेवक और वे नाविक भी जो प्रार्थना में आ सकते थे - आये थे। सबके नेत्र गीले हो गये थे। सब यात्रियों को लगा रह था विल्सन इस भयंकर यात्रा में उनके लिये बहुत आवश्यक है। उसका विश्वास - उसकी प्रार्थना उन्हें जो आत्मबल दे रही है, वह उस समस्त सामग्री से, जो आवश्यक मानकर साथ ली गयी है, अधिक महत्त्वपूर्ण है।

सबकी सहानुभूति विल्सन के साथ हो गई थी। दलनायक हर्बर्ट ने लौटने की बात फिर नहीं छेड़ी। उसने सोच लिया - 'परिस्थिति जब विवश करेगी, आहार-सम्बन्धी नियम अपने-आप लुप्त हो जायेंगे। अभी आग्रह करने का अर्थ उस आग्रह को पुष्ट करना ही होगा।'
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'विल्सन! हम प्रार्थना करेंगे।' दलनायक हर्बर्ट और दल के दूसरे साथी प्रार्थना के अद्भुत प्रभाव को देखते-देखते अब अभ्यस्त हो गये हैं। वे अब विल्सन को परिहास में संत विल्सन कह लेते हैं; किंतु यह केवल परिहास
नहीं है। प्राय: सभी अनुभव करते हैं कि विल्सन संत हैं। अब जहाज छोड़कर दल स्लेजगाड़ियों पर यात्रा कर रहा है। बर्फीले तूफान, बर्फ की दल-दल, मार्ग में पड़ी पचीस पचास गज चौड़ी तक दरारें और मार्ग खो जाना - सच बात तो यह है कि कोई मार्ग है ही नहीं। दिग्दर्शक यन्त्र और अनुमान - पद-पद पर विपत्तियाँ आती हैं। किसी भी दारुण विपत्ति के समय दल एकत्र हो जाता है और प्रार्थना होने लगती है। है अद्भुत बात - प्रत्येक बार प्रार्थना के पश्चात् सभी अनुभव करते हैं कि विपत्ति भाग गयी - भगा दी गयी है और उनका मार्ग सुगम हो गया है।

हिम - अनन्त अपार हिम है चारों ओर। वृक्ष, तृण, हरियाली की तो चर्चा ही व्यर्थ है। बारहसिंगों के झुंड और कुत्तों का दल - कुत्ते न हों तो स्लेज खींचे कौन! लेकिन ये हिम-प्रान्तीय भयानक कुत्ते - बार-बार बिगड़ उठते हैं। बार-बार बारहसिंगों के झुंड पर आक्रमण करते हैं और बारहसिंगों में भगदड़ मचती है। कुत्ते मनुष्य के समान बुद्धिमान् तो नहीं कि सोच-समझ कर क्षुधा पर नियन्त्रण रखें। बेचारे स्लेज खींचते-खींचते थके जाते हैं, भूख लगती है और बारहसिंगों को छोड़कर उन्हें मिल भी क्या सकता है। बड़ा कठिन है उनको नियंत्रित करना। समय-समय पर बर्फ के नीचे जमी काई चरने के लिए बारहसिंगों को भी छोड़ना ही पड़ता है।

विश्राम - नाममात्र है विश्राम का। ऐसी दारुण यात्रा में विश्राम कैसा! साथ में एक तम्बू है - 'नीचे हिम की चट्टान और ऊपर अनवरत धुनी रूई-जैसी गिरती उज्जवल हिम - अपने-अपने थैलों मे जूते पहिने ही घुसकर कुछ घंटे पड़े रहने को आप विश्राम कहना चाहें तो कह सकते हैं।

विल्सन - सबका सहारा, सबको उत्साहित रखनेवाला, नित्य प्रसन्न विल्सन, और पूरे दल में विल्सन ही हैं जिनका दल पर कोई भार नहीं। साथ कुछ मेवे, कुछ पनीर और जमे दुध के डब्बे, कुछ फल बंद डब्बों में आया था। वह सब विल्सन के लिये पहले सुरक्षित हो गया। लेकिन उसका क्या अर्थ है? दुसरे के लिये तो केवल वह स्वाद बदलने का साधनमात्र हो सकता था। जब दुसरे शराब की बोतल मुख से लगाते हैं, विल्सन स्पिरिट के स्टोव पर बर्फ को पिघलाकर उबालता है और गरम पानी की घुंटें पीकर सबसे अधिक स्फूर्ति पा जाता है।

'मैं चरने जाता हूँ।' प्राय: वह सबको हँसा देता है। अद्भुत है यह अंग्रेज। उसके अमेरिकन साथी इस बात की कल्पना ही नहीं कर सकते कि बारहसिंगों के साथ बरफ के नीचे जमी यत्र-तत्र काई जैसी घास को मनुष्य भोजन बना सकता है। लेकिन विल्सन मजे में पर्याप्त मात्रा में उसे खा लेता है।

'हमें लौटना चाहिये।' सहसा एक दिन कुत्तों ने स्लेज को लौटाने की हठ ठान ली। वे किसी प्रकार आगे बढना ही नही चाहते थे। बारहसिंगों का झुण्ड चरने को छोड़ा गया और अदृश्य हो गया। विल्सन ने सलाह दी - लक्षण अच्छे नहीं हैं। इस वर्ष शीत शीघ्र प्रारम्भ होता दीखता है। भयंकर बर्फीले तूफान कुछ दिनों में ही चलने लगेंगे। हम लोग जहाज तक लौट चलें तो ठीक।'

'बारहसिंगे भाग चुके और उनको पाने का कोई मार्ग नहीं है।' दलनायक हर्बर्ट ने सहमति व्यक्त की - 'अब लौटने पर हम सब विवश हैं। जहाज यदि समुद्र के जम जाने से पहले न निकल सका तो हिमसमाधि निश्चित समझनी चाहिये।'

'हम फिर अगले वर्ष आ सकते हैं।' एक यात्री ने कहा। सभी श्रान्त थे और लौटने को उस्तुक थे।

'हम फिर आ सकें या न आ सकें, हमारी यात्रा दूसरों का मार्ग-दर्शन करेगी।' विल्सन ने तटस्थ भाव से कहा - 'प्रयत्न करना हमारे हाथ में था। परमात्मा की इच्छा सर्वोपरि है और हमें उसके संकेतों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये।'

कुत्ते लौटते समय गाड़ियों को पूरी शक्ति से खींच रहे थे। जैसे उन्हें भी लगता था कि इस हिमप्रदेश से जितनी शीघ्र निकला जा सके - उतनी शीघ्र निकल चलने में ही कुशल है।
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'हम प्रार्थना करेंगे।' विल्सन के प्रस्ताव को कोई समर्थन नहीं मिला। सच यह है कि समर्थन या विरोध करने जितनी शक्ति अब जहाज के यात्रियों में नहीं थी। कितने दिन कोई उपवास कर सकता है! अब उठने और बोलने की क्रिया जहाज के सारे यात्रियों के लिए अत्यन्त कष्टसाध्य होती जा रही थी। जीवन से प्राय: निराश हो चुके थे।

जहाज पर उसके यात्री आये और समुद्र का जमना प्रारम्भ हुआ। बहुत थोड़ी दूर जाकर जहाज रूक गया। पृथ्वी और जल का भेद मिट चुका था। एक श्वेत चद्दर - यात्रियों को लगता था कि बूढी पृथ्वी मर गयी है और उसे श्वेत वस्त्र से ढक दिया गया है। मृत्यु - केवल मृत्यु दीखती थी उन्हें। मृत्यु की छाया काली होती है; किंतु उनके यहाँ तो उजली - असीम उजली, कोमल और शीतल रूप धारण करके मृत्यु आयी थी।

पूरा जहाज ढक गया हिम के अपार अम्बार में। बाहर से उसका कोई अंश दीखता भी है या नहीं - जहाज के यात्रियों में साहस नहीं था कि जहाज से बाहर आकर यह देखें! बेचारे कुत्ते मर गये थे। स्लेज खींचने में उन्होंने प्राण होम दिये। मार्ग में हिमपात प्रारम्भ हो गया था। यात्री किसी प्रकार भागते-दोड़ते जहाज पर पहुँच गये, यही बहुत था। लेकिन अब इस सुरक्षा का क्या अर्थ! इतना ही कि अगली ऋतु में कहीं कोई पता लगाने आया तो जहाज के भीतर उनके सिकुड़े शव उसे मिल जायंगे।

जल - केवल जल पीकर रहना था उन्हें और अन्त में वह भी अलभ्य हो गया। भोजन का सामान और शराब की बोतलें कबकी समाप्त ही चुकी थीं। बहुत सा उनका भाग स्लेज-गाड़ियों के उपर मार्ग में ही छूट गया था। जहाज में जो कुछ था - कितने दिन चल सकता वह? शीत असह्य हो गया। भोजन समाप्त होने पर बार-बार जल की आवश्यकता पड़ी। उष्णताकी प्राप्ति, बर्फ गलाकर जल बनाना - सबका साधन था स्प्रिट लैम्प और अन्त में स्प्रिट भी समाप्त हो गया।

'परमात्मा! मेरे परमात्मा! मैं जानता हूँ कि तू यहाँ भी है और मेरी प्रार्थना सुनता है।' विल्सन की प्रार्थना में अब वह अकेला रह गया है। अनाहार और मृत्यु की स्पष्ट मूर्ति ने सबको निराश कर दिया है। किसी में अब आशा नहीं कि प्रार्थना से कुछ होगा - सच तो यह है कि अब कोई कुछ सोचता नहीं - सोचने योग्य नहीं - मृत्यु - मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हैं सब। केवल विल्सन है जो नित्य दोंनों समय प्रार्थना कर लेता है। समय का अनुमान भी वहाँ घड़ी से ही होता है। वह ठीक घड़ी की भाँति समय पर हाथ जोड़कर घुटनों के बल बैठकर बोलने लगता है - 'मेरे प्रभु! मैं कुछ नहीं चाहता। केवल इतना - इतना ही कि मैं तुझे भूलूं नहीं।'

अद्भुत जीव है यह विल्सन भी। इसका अनाहार सबसे पहले प्रारम्भ हुआ। सबसे दुबला यही है। स्प्रिट समाप्त होने को आया - यह देखते ही इसने पानी भी बंद कर दिया। बर्फ के टुकड़े मुख में रखकर चूस लेने का अभ्यास सबसे पहले इसने किया। जिन्हें मांसाहार करना था, जिनकी नाड़ियों का रक्त शराब की उष्णता से उष्ण बनता रहा, जो बहुत पीछे तक कुछ-न-कुछ छीन-झपटकर पेट में पहुँचा देते थे, वे सब मूर्छित-प्राय पड़े हैं और यह शाकाहारी, खौलाये पानीपर जीवित रहने वाला विल्सन - यह अब भी उठ-बैठ लेता है, प्रार्थना कर लेता है।

साठ दिन - पूरे साठ दिन बीत चुके। आज विल्सन को लगा, वह अन्तिम बार प्रार्थना करने बैठा है। उसका सिर घुम रहा है। उसके नेत्रों के आगे अन्धकार फैल रहा है। उसका कण्ठ सूख गया है। 'परमात्मा!' केवल एक शब्द कह पाया वह। उसे लगा, अब गिरेगा - मूर्छा और मृत्यु वहां पर्यायवाची ही थे।

'कोई है? कोई जीवित है भाई?' जहाज के ऊपर डैक पर से नीचे उतरने के बंद द्वार को कोई पीट रहा है। बार-बार पुकार रहा है - 'परमात्मा के लिए बोलो! एक बार बोलो!'

'कौन आवेगा यहाँ? भ्रम - भ्रम है मेरा।' विल्सन अर्धमूर्छित हो रहा था। लेकिन द्वार बराबर पीटा जा रहा था। बराबर कोई पुकार रहा था। अंत में लेटे-लेटे पेट के बल किसी प्रकार विल्सन खिसका।

'परमात्मा के लिये शराब नहीं - गरम पानी।' द्वार खोलकर विल्सन गिरा और क्षणभर को मूर्छित हो गया; किंतु आगतों में से जब एक ने उसके मुख से बोतल लगाना चाहा - उसकी चेतना लौट आयी। उसने बोतल हटा दी मुख से।

'जहाज जम गया है। हम साठ यात्री मृत्यु की घड़ियाँ गिन रहे हैं। भोजन और स्प्रिट समाप्त हो गया है।' जहाज में लगे बेतार के तार से यह अन्तिम संदेश अमेरिका में सुना गया था। शीत के प्रारम्भ में जब हिमपात प्रारम्भ हो गया हो अंटारकटिका की यात्रा की बात सोचना ही अकल्पनीय है। सरकारी अधिकारी भी यात्रियों के प्रति सहानुभूति ही प्रकट कर सकते थे।

समाचारपत्रों में यह दारुण समाचार छपा और एक तरुण ने संकल्प किया उन हिम-समाधि लेते मनुष्यों के उद्धार का। बाधाओं की गणना ही व्यर्थ है। जो सहायता दे सकते थे - उन्होंने भी रोकने का ही प्रयास किया। लेकिन उसे यात्रा करनी थी। एक नहीं तो दुसरा - जो प्राण देकर परोपकार करने को प्रस्तुत है, उसके सहायक संसार में निकल ही आते हैं।

कुत्तों, स्लेज-गाड़ियों, बारहसिंगों की पूरी सेना मिल गयी उसे अंटारकटिका में पहुँचने पर भोले हिमग्राम के वासियों से। उसे गणना नहीं करनी थी कि कितने यूथ कुत्तों और बारहसिंगों के हिम की भेंट हो गये। उसे तो लक्ष्य पर पहुँचना था - ठीक समय पर पहुँच गया वह।

'हमारे यूथ में कुछ मादा बारहसिंगे है। तीन-चार ने मार्ग में बच्चे दिये हैं। आपको हम दुध पिला सकते हैं।' जब जहाज के यात्री होश में आये, कुछ पेट में पहुँच जाने से बोलने योग्य हुए, तरुण ने विल्सन के सामने एक प्याला गरम दूध रख दिया। मूर्छित दशा में भी विल्सन को दूध पिला चुका था वह।

'हम प्रार्थना करेंगे।' दूध पीने से पहले विल्सन घुटनों के बल वहीं बैठ गया। उसके पीछे पूरा समुदाय बैठ गया। यह उसकी प्रार्थना का ही प्रभाव तो है जो वे आज उसके साथ प्रार्थना करने बैठ सकते हैं।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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तेरे बातें मुझे आज भी सच्ची लगती है,
पता है तू मुझे आज भी अच्छी लगती है।
जानता हूँ तेरे अपनों ने भी रहम नहीं दिखाया,
झूठी शान के लिए तूझे घर से भगाया।
तेरे लिए मेरा दिल आज भी खाली,
दुनियाँ चाहे जो कहे तू तो मेरे लिए
भाग्यशाली है।।
तोड़ दो सारे रिश्तों को, छोर दो उनका रास, 
चले आओ जल्दी से तुम मेरे पास।।

True lover never fail in life.. We always support him /her if they are in any difficulties.. So plezz#don't worry ##If you fail #you should be proud ##that you will be loved ##by. her/##हिम..

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|| श्री हरि: ||
3 - भरोसा भगवान का

'वह देखो!' याक की पीठ पर से ही जो कुछ दिखाई पड़ा उसने उत्फुल्ल कर दिया। अभी दिनके दो बजे थे। हम सब चले थे तीर्थपुरी से प्रात: सूर्योदय होते ही, किंतु गुरच्याँग में विश्राम-भोजन हो गया था और तिब्बतीय क्षेत्र में वैसे भी भूख कम ही लगती है। परन्तु जहाँ यात्री रात-दिन थका ही रहता हो, जहाँ वायु में प्राणवायु (आक्सिजन) की कमी के कारण दस गज चलने में ही दम फूलने लगता हो और अपना बिस्तर समेटने में पूरा पसीना आ जाता हो, वहाँ याक की पीठपर ही सही, सोलह मील की यात्रा करके कोई ऊब जाय, यह स्वाभाविक है। कई बार हम पूछ चुके थे 'खिंगलुंग' कितनी दूर है। अब दो बज चुके थे और चार-पाँच बजे तक हमें भोजनादि से निवृत्त हो जाना चाहिये। तंबू भी खडे़ करनेमें कुछ समय लगता है। सूर्यास्त से पहले ही अत्यन्त शीतल वायु चलने लगती है। इन सब चिन्ताओं के मध्य एक इतना सुन्दर दृश्य दिखायी पडे - सर्वथा अकल्पित, आप हमारी प्रसन्नता का अनुमान नहीं कर सकते।

'ओह! यह तो संगमरमर का फुहारा है।' मेरे बंगाली मित्र भूल गये कि वे अर्धपालित पशु याक पर बैठे हैं। याक तनिक सा स्पर्श हो जाने से चौंक कर कूदने-भागने लगता है। उस पर बैठने वाले को बराबर सावधान रहना पड़ता है। कुशल हुई - मेरे साथी का याक तनिक कूद कर ही फिर ठीक चलने लगा था। उसे साथ चलने वाले पीछे के याक ने सींग की ठोकर दी थी, मेरे साथी सामने देखने में लगे होने से असावधान थे; किंतु गिरे नही, बच गये।

'संगमरमर नहीं है, गंधक का झरना है। गंधक के पानी ने अपने आप इसे बनाया है।' हमारे साथ के दुभाषिये दिलीप सिंह ने हमें बताया। वह पैदल चल रहा था; किन्तु प्राय: मेरे याक के साथ रहता था।

'अपने आप बना है यह।' लगभग 15 फुट ऊँचाई, विशाल प्रफुल्ल कमल के समान चमकता गोल होज जैसे रखा गया हो और उसक चारों ओर एक के बाद दूसरे क्रम से एक दूसरे के नीचे न रखकर तनिक इधर-उधर नीचे चार फुट तक वैसे ही उज्जवल, कमलाकार, किन्तु कुछ छोटे-बड़े हौज सजा दिय गये हों। बहुत ही कूशल कारीगर बहुत परिश्रम एव रुचिपूर्वक सजावे तो ऐसा कमलों के समान होजों का स्तम्भ बनेगा। इतनी व्यवस्था, इतनी सजावट और ऐसी सुचिक्कण कारीगरी थी कि विश्वास नहीं होता था कि यह मानव-कला नहीं है। सभी हौजों में निर्मल नीला जल दूर से झिलमिल करता दीख रहा था।

'झरना अपने आप बना है, परंतु यह फुहारा तो किसीने बनवाया है।' मेरे बंगली साथी ने कहा - 'वहाँ संगमरमर कहां से - कितनी दूर से आया होगा।' हम लोगों को तिब्बत के इस क्षेत्र में कहीं संगमरमर होने आशा नहीं थी।

'वहां एक टुकड़ा भी संगमरमर नहीं। गंधक के पानी का यह कार्य है।' दिलीप सिंह हमें फिर समझाया, किन्तु हम उसकी बात तो उस झरने के पास ही जाकर समझ सके। गंधक का झरना है। उसके गरम जल में बहुत अधिक गंधक है। वह गंधक बराबर पत्थरों पर जमता रहता है। इससे संगमरमर के समान उज्जवल, बेल-बूटे बनी जैसी तहें जमती जाती हैं। यह पूरा कमल…स्तम्भ इसी प्रकार बना था।

'वहाँ कोई है, कोई सन्यासी जान पडता है।' गेरुए वस्त्र दीख पडे एक दो पास पत्थर पर फैले। नीचे के छोटे हौज़ में बैठा कोई स्नान कर रहा था। कुछ तिब्बती लोग झरने के पास से अपनी भेड़ें हांके लिय जा रहे थे।

'ये वही सन्यासी हैं, जो हम लोगों को उस दिन दरचिन में मिले थे, जब हम कैलास-परिक्रमा करने जा रहे थे। लगता है कि ये भी आज ही तीर्थपुरी से चले हैं।' दिलीप सिंह में दूर से ही लोगों को पहचान लेने की विचित्र शक्ति है। उसका अनुमान ठीक था। वे वही सन्यासी थे और तीर्थपुरी से तो नहीं, पर आज गुरच्याँग से आ रहे थे।

'अब तो आप मेरे साथ ही चलेंगे।' मैंने सन्यासीजी को आमन्त्रण दिया। मेरे बंगाली साथी 'नीती घाटी होकर जोशीमठ जाना चाहते हैं। उन्हें बदरीनाथ जाना है। यहाँ खिंगलुंग से ही उनका मार्ग पृथक होता है। अब मेरे साथ केवल दिलीप सिंह रह जायगा। एक और हो जाय तो अच्छा, यह मैंने सोचा था।

'जैसी आपकी इच्छा। परन्तु मैं आपके लिये भार सिद्ध होऊँगा।' सन्यासी बड़े प्रसन्नमुख युवक हैं। उनकी बात सच है। यहाँ तिब्बत में मनुष्यके लिये अपना निर्वाह भी कठिन हो जाता है। भारतीय सीमा से अपने साथ लाया सामान ही काम देता है। यहाँ तो नमक, मट्ठा, दूध, दही, मक्खन कहीं-कहीं मिलता है। चेष्टा करने पर एकाध सेर सत्तू और एकाध सेर आटा मिल जाता है तीन-चार रुपये सेर। भारतीय व्यापारी जब तिब्बत में आ जाते हैं तब कुछ सुविधा हो जाती है; किंतु हम पंद्रह-बीस दिन मौसम से पहले आ गये हैं। अभी व्यापारी आने नहीं लगे हैं। ऐसी अवस्था में एक व्यक्ति की भोजन व्यवस्था और ले ली जाय तो वह भार तो बनेगी ही।

'उस भार की आप चिन्ता न करें।' मैंने हँसकर कहा। 'हमारे साथ का सब सामान आज समाप्त हो जायगा। तिब्बत से बाहर पहुँचने में अभी सात-आठ दिन लगेंगे। इतने समय का निर्वाह तो कैलास के अधिष्ठाता को ही करना है। उसे एक भारी नहीं लगेगा तो दो भी नहीं लगेंगे।

'तुम भी मेरे ही जैसे हो।' खुलकर हँसे वे महात्मा। 'तुम्हारे साथ अवश्य चलूंगा। बडा आनन्द रहेगा। कोई चिंता मत करो।' यहां इतना और बता दूं कि हमें अन्त तक चिंन्ता नहीं करनी पड़ी। तिब्बत में दाल और शाक तो मिलता नहीं था; किंतु हमें आटे और मक्खन का अभाव कभी नहीं रहा। आटा बराबर मिलता गया। मक्खन-रोटी या दही-रोटी ऐसा भोजन नहीं है कि उसकी कोई आलोचना की जाय।
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'आप पहले ही इधर आ चुके हैं। हम लोग मानीथंगा और ठांजा पीछे छोड़ चुके हैं। छिरचिन से हमने आज प्रातःकाल ही प्रस्थान किया है। 'आज यदि कुंगरी-विंगरी और जयन्ती के दर्रे पार कर सके तो ऊटा तथा जयन्ती के बीच रात्रि विश्राम होगा। वहाँ एक होटल (तंबू) इन दिनों या गया होगा। दूसरे दिन ऊटा धुरा(दर्रा) पार करके कल हम भारतीय सीमा में पहुँच जाएँगे।' ये बातें मुझे सन्यासीजी ने बतायी और इसीलिए मैंने उनसे प्रश्न किया। वैसे व्यक्तिगत परिचय करने में मेरी रुचि कम है, अंत तक मैंने उन संन्यासीजी का नाम नहीं पूछा। उनकी कुटी कहीं है या नहीं, यह जानने की इच्छा मुझे नहीं हुई।

'मैं पिछले ही वर्ष यहाँ आया था; किंतु देर से आया। लौटते समय मार्ग में हिमपात होने लगा। इच्छा होने पर भी सौ बार नहीं जा सका। अब इस वर्ष श्रीबदरीनाथजी के दर्शन करने आया तो वहाँ से इधर चला आया।' मुझे इस समय पता लगा कि ये स्वामीजी गर्व्याँग के रास्ते न आकर नीतिघाटी के मार्ग से आये थे और हमें जब दरचिन में मिले थे, तब वहां से मानसरोवर चले गये थे। हमने तो समझा था कि वे हमारे समान मानसरोवर होकर कैलास आये होंगे। पैदल यात्री होने के कारण उन्हें समय अधिक लगा होगा।

'हिमपात तो आज भी होता दीखता है। आगे कोई पड़ाव भी नहीं।' तिब्बत में वर्षा कम ही होती है। इस अंचल में जब मेघ आते हैं, तब पहले हिमशर्करा पडती है। चीनी के दानों से दुगुनी-चौगुनी हिम-कंकड़ियां। वस्तुत: वे जल की बूंदें होती हैं जो शीताधिक्य के कारण जम गयी होती हैं। हिमपात की वे पूर्वसूचना हैं। उनके पश्चात, हिमपात होता है। कद् दूकस में कसे नारियल के अत्यन्त पतले आध इंच से भी कुछ छोटे टुकडों के समान हिम वायु में तैरती गिरती है। असंख्य टुकड़े - लगता है कि रुई की वर्षा हो रही है। सम्मुख का मार्ग नहीं दीखता। पृथ्वी उज्जवल हो जाती है। आज आकाश में मेघ हैं, दो-चार हिमशर्करा की कंकड़ियां मुखपर पड़ चुकी हैं। आज जब दो धुरे (दर्रे) पार करने हैं, तब उनपर चढ़ते समय हिंमपात का सामना करना निश्चित है।

'यह हिमपात तो खेल है।' स्वामीजी ने कहा। 'हिमपात तो मार्गशीर्ष से प्रारम्भ होता है। लगातार हिमवर्षा होती है और एक साथ दस-पन्द्रह फुट हिम पड़ जाती है। उसमें मनुष्य चल नहीं सकता। मैं पिछले वर्ष दीपावली पर दरचिन था और आपने कदाचित् सुना होगा कि पिछले वर्ष हिमपात कार्तिक्र में ही प्रारम्भ हो गया था।'

'हम जिस दिन मानीथंगा पहुँचे थे, उसी दिन यह तिब्बती, जिसके तंबू के पास हम रुके थे वह अपने फांचे (भेडों पर नमक आदि लादने की ऊनी थैलियां) लेकर लौटा था। पिछले हिमपात में उसकी तीन सौ भेड़ें और दो नौकर मारे गये।' मैंने जो सुना था, वही सुना दिया। हम पैदल ही चल रहे थे। तीर्थपुरीसे जो याक मिले थे भाड़ेपर, वे केवल मानीथंगा तक के लिये थे। वे लौट चुके थे। मौसम से पूर्व आने के कारण अभी मार्ग खुला नहीं था। हम पहले यात्री थे। हमारे साथ डेढ़-दो सौ भेड़ें लेकर, उनपर नमक लादकर चार तिब्बती चल रहे थे। वे भारतीय बस्ती मिलम में नमक देकर अन्न लेंगे और लौटेंगे। उनकी पांच भेडों पर मेरा सामान - तंबू आदि लदा था।

यहां इतना और बता हूँ कि कैलास-मानसरोवर अंचल में न नगर हैं न ग्राम। दरचिन, तीर्थपुरी, खिंगलुंग-जैसे कुछ सथान ऐसे हैं जहाँ पर्वतों में बुद्ध मन्दिर हैं। उनके पास ही बहुत-सी गुफाएँ हैं। इन गुफाओं में य़हाँ के लोग अपना सामान रखते हैं। शीतकाल में उनमें अपने पशुओं के साथ रहते हैं। शेष समय वे तंबुओं में घूमते हुए बिताते हैं। अपने याक और भेड़े लिये वे घूमते रहते हैं। मानीथंगा, थिरचिन आदि ग्राम नहीं, इन चरवाहों तथा यात्रियों के पड़ाव के स्थान हैं। वे कभी सुनसान रहते हैं और कभी वहाँ तंबुओं के ग्राम बस जाते हैं।

'आपने ध्यान नहीं दिया, वह तिब्बती मुझे देखकर चौंका था। वह मेरे आने से संतुष्ट नही था। मैं उसके भेडोंवाले दल के साथ ही पिछले वर्ष भारत के लिये चला था।' स्वामीजी ने बताया। 'वह कहता था कि यह लामा अपशकुन है। इसके साथ मत जाओ।' दिलीप सिंह ने हमें बताया। वहाँ मानीथंगा में तिब्बती और दिलीप सिह में बात बहुत हुई; किंतु वहाँ हमें दिलीप सिंह ने कुछ नहीं कहा था। तिब्बती भाषा में हम भला, क्या समझते। हमें तो वह तिब्बती भला लगा था। उसने हमारे तंबू खड़े करने में सहायता दी। हमारे यहां अग्नि जला दी और हमारे लिये मक्खन पडी नमकीन, तिब्बती चाय झटपट बनवा लाया था अपने तंबू में से।

'आप बचे कैसे?' कुछ रुककर दिलीप सिंह ने फिर पूछा।

'कुछ आगे चलो।' पता नहीं स्वामीजी क्यों गम्भीर हो गये थे।
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'यह क्या है दिलीप सिंह?' मैं ठिठक कर खडा हो गया था। मार्ग के पास ही थोड़ी-थोड़ी दुरी पर बकरियों भेड़ों की ठठरियां पडी थी। उनमें अब केवल हड्डी थी। दो मनुष्य-कंकाल भी दीखे। उनके आस पता बहुत से फाँचे थे, कपड़े थे और स्थान-स्थान पर प्रायः बकरियों के कंकाल के पास ऊन की बड़ी-बड़ी गोलियां थी। वे कुछ चपटी थीं। उनके ढ़ेर और उनकी यह गोल-चपटी आकृति......।

'बकरियाँ-भेड़ें हिम में दब गयी। उनको जब कुछ भोजन नहीं मिला तब उन्होनें समीप की भेड या बकरी का ऊन खा लिया। वह ऊन उनकी आतों में जाकर ऐसे गोले बन गया। अब मास तथा आतें तो गल गयी, वन्य पशु-पक्षी खा गये किंतु आँतोंसे निकले ये ऊन के गोले पडे हैं। दिलीप सिंह ने जो कुछ बताया, उसका स्मरण आज भी रोमांचित कर देता है। हम कुछ अधिक वेग से चलने लगे। संयोगवश बादल हट गये थे। हिमपात कुछ समय के लिये तो टल गया था।

'उस दिन - उस भयंकर दिन मैं इस अभागे यूथ के साथ था।' संन्यासीजी ने कुछ आगे जाकर अपनी गम्भीरता तोड़ी। 'मानीथंगा से जब ये चरवाहे चले थे, तब इनके लामा ने कहा था कि अभी बीस दिन हिमपात नहीं होगा। मैं तो अकस्मात इनके साथ हो गया।'

दिलीप सिंह और पास आ गया था। मैं भी उत्सुक था संन्यासीजी की बात सुनने के लिये। संन्यासीजी कह रहे थे - 'जब हम छिरचिन से चले, तभी घने बादल घिर आये थे। तिब्बती चरवाहे बराबर लामा का नाम लेते थे और कहते थे - उनका लामा पत्थर में पंजे मारकर चिह्न बना देता है। वह वर्षा, आंधी, हिमपात सबको रोक देता है। इन बादलों को वह अवश्य भगा देगा। उन चरवाहों में एक अधूरी हिंदी बोल लता था। मुझे वह पता नहीं क्यों मानता भी बहुत था। कई बार उसने मुझे अपनी 'छिरपी' (सूखे मट्ठे का खण्ड ) खिलाया।'

एक बार संन्यासीजी ने कैलास की ओर मुड़कर देखा और बोले - 'सहसा हिम-शर्करा प्रारम्भ हुई। बकरियां और भेडें चिल्लाने लगी और चरवाहे भयातुर हो उठे। इसके पश्चात् हिमपात प्रारम्भ हो गया। हम देख भी नहीं सकते थे कि हमारे आगे दो फुटपर मनुष्य है या पर्वत। मेरे साथ के लोगों का क्या हुआ - मुझे पता नहीं।'

'आप बचे कैसे?' दिलीप सिंह ने पूछा।

'मुझे मारता कौन?' संन्यासी ने कहा - 'मुझे तो न कोई भय लगा न घबराहट हुई। मैं चल रहा था - चलता रहा। मार्ग दीख नहीं रहा था, मार्ग देखने का प्रश्न भी नहीं था। जहाँ गड्ढे में गिरता प्रतीत होता था या सिर टकराता था - जिधर मुड़ना सम्भव होता था मुड़ जाता था।'

'अद्भुत हैं आप।' मैंने कहा।

'इसमें अद्भुत बात क्या है?' संन्यासी ने सहज भावसे कहा - 'वो भगवान शंकर कैलास के अधिष्ठाता हैं, वे मैदान में रक्षा करते हैं और पर्वत के हिमपात में नहीं करते? मैं उनके आश्रम पर आया था - कैलास आया था मैं। उन देव-दवेश्वर के दर्शनार्थी को मार कौन सकता था? हिमपात हुआ - होता रहा। मेरे पैर एक स्थान पर फिसले और पता नहीं मैं कितने नीचे लुढक गया। कई बार लुढका। कई बार हिम में लुढ़कने पर ढक गया और उठा। बड़ा आनन्द आया उस दिन। पर्वतीय पिताका जाग्रत् स्वरूप और उनका क्रीड़ा-बैभव देखा मैंने।'

सन्यासीजी ने अपनी बात समाप्त की - 'जब मैं अन्तिम बार लुढ़का तो किसी जलस्त्रोत में पड गया। मेरी चेतना जल की शीतलता और लहरों ने छीन ली। जब मूझे फिर शरीर का भान हुआ, तब कुछ भेड़ वाले मुझे दुंग से आगे अग्नि जलाकर सेंक रहे थे। उन्होने मुझे धारा से निकाला था, उन्हें संदेह हो गया था कि मैं जीवित हूँ।'

ये सन्यासीजी केवल दुंग तक हमारे साथ आये। मिलम से भी पूर्व मार्ग में ही वे हमसे पृथक हो गये। परन्तु उनकी एक बात स्मरण करने योग्य है। वे कहा करते थे - 'मर्तय का भरोसा क्या? भरोसा भगवान का। उसका भरोसा, जो सदा है - सदा साथ है।'

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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