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सैनिक

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कर्मों का फल...........

बात उस समय की है जब भीष्म पितामह शरशैया पर पड़े थे । थोड़ा सा भी हिलने की कोशिश करते तो दर्द से कराह उठते । इसी दौरान सभी परिजन और शुभ चिन्तक उनसे मिलने आ रहे थे ।

इसी बीच भगवान श्रीकृष्णा भी मिलने आये । उन्हें देखकर भीष्म पितामह हँसने लगे और बोले - " आओ कृष्ण - कन्हैया आओ ! आप तो सर्वज्ञ हो, क्या मुझे बता सकते हो कि मैंने ऐसा कौन सा पाप किया था, जिसका दण्ड मुझे शरशैया की इस वेदना के रूप में मिला ।

भीष्म पितामह के इस तरह निवेदन करने पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें उनके पिछले सौ जन्मों का दृश्य दिखाया लेकिन कहीं कोई ऐसा कर्म नही था जिसका इतना भयावह दण्ड मिले । तब श्रीकृष्ण उन्हें एक जन्म और पीछे ले गये ।

101 वें जन्म में उन्होंने देखा कि वह एक नगर के राजा थे । एक बार सेना की टुकड़ी कहीं जा रही थी तभी आगे से एक सैनिक दोड़ता हुआ आया और बोला - " महाराज ! रास्ते में एक सर्प पड़ा है, अगर हम आगे बढ़े तो वह मर जायेगा, रास्ता बदले या उसे हटा दे ।"

भीष्म पितामह बोले - " सर्प को झाड़ियो में फेंक दो
सैनिक ने वैसा ही किया लेकिन सर्प को जिस झाड़ी में फेंका गया था वो कंटीली थी । गिरते ही सांप काँटों में उलझ गया और लहूलुहान हो गया । हिलता तो दर्द होता इसलिए ऐसे ही 4-5 दिन पड़ा रहा और अंततः धीरे धीरे उसने प्राण त्याग दिए ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले - " अब समझ आया पितामह ! आपको यह वेदना क्यों सहनी पड़ रही है "

पितामह बोले - " किन्तु ! मधुसुदन ! वह कर्म मैंने अनजाने में किया था । तो उसका फल कष्टदायक क्यों ?"

भगवान श्रीकृष्ण बोले - " पितामह ! कर्म जानबूझकर किया जाये या अनजाने में उसका फल अवश्य मिलता है । आप आग में जानबूझकर कूदो या अनजाने में, आपको जलना ही है । कर्मों का भी कुछ ऐसा ही नियम है ।"

पितामह बोले - " 101 जन्म पूर्व के कर्म का फल इस जन्म में ही क्यों मिला, पहले भी तो मिल सकता था ।"

श्रीकृष्ण बोले - " पितामह ! इन 100 वर्षो में आपके पुण्य कर्म इतने प्रभावी थे कि उन्होंने आपके उस पाप कर्म के फल को उदित नहीं होने दिया । लेकिन उस कर्म की वासना कर्मफल देने के लिए अवसर की तलाश में थी और अब उसे अवसर मिल गया ।"

शिक्षा - दोस्तों ! आप आग में जानबूझकर कूदो या अनजाने में आपको जलना ही है । इससे आप बच नही सकते वैसे ही कर्म जानबूझकर किया जाये या अनजाने में उसका फल अवश्य मिलता है । ये दृष्टान्त कितना सही है, ये तो मैं नही जानता लेकिन ये सिद्धांत शत प्रतिशत सत्य है । इसलिए अपने दैनिक जीवन के कर्मो को बड़ी ही सावधानी से सम्पादित करें ।

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Soldier quotes in Hindi  हर इंसान में एक सैनिक रहता है, 
वही सैनिक जिंदगी की जंग लड़ता है।

मगर हर सैनिक सिर्फ एक सैनिक होता है, उनको उनके कर्तव्य से कोई भी भटका नहीं सकता- भाई, मां, बहन , बेटी और पत्नी!!!

उनके लिए सब कुछ वतन होता है।


ऐसे वीरों को शत शत नमन। #NojotoQuote

#RamPujari #army #India #jaihind #vandemataram #

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Soldier quotes in Hindi  पूरी जिंदगी कुर्बान 
करने का जज्बा
एक‌ सैनिक का 
ही हो सकता है।
अपने वापस आने का
 एक दिलासा 
देने का जज्बा 
एक सैनिक का ही हो सकता है।
अंधेरी उम्र में
 अपने मां-बाप
 को छोड़ने का जज्बा 
एक सैनिक का ही हो सकता है
 अपनी दिलरुबा को 
छोड़ कर जाने का जज़्बा
एक सैनिक का ही हो सकता है
अपनी पूरी जिंदगी कुर्बान 
करने का जज्बा 
सिर्फ तो सिर्फ 
एक सैनिक का ही हो सकता है
 एक सैनिक का ही हो सकता है।। #NojotoQuote

#Indian Army
#Nojoto#nojotohindi

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Army day Sena Divas quotes in hindi  सैनिक वो है -
 जिनकी वजह से हम बेफिक्र हर जगह होते हैं और  चैन की नींद सोते हैं।
 सैनिक वो है जो -
 हजारों किलोमीटर दूर बारिस, तूफान, आंधी और धूल सहते हैं और हम घर बैठकर कभी कैरम तो कभी ब्रेड पकोड़ों के संग क्रिकेट मैच की मौज ले रहे होते हैं। 
सैनिक वो है - 
जिनको अपने बीवी, बच्चों और बूढ़े मां बाप से मिलने में महीनों लग जाते हैं और हम हर रोज उनके संग हर पल मस्ती और ख़ुशी से बिताते हैं।
सैनिक वो है -
 जिनसे हमारा दिन, रात, दोपहर हर पहर महफूज है हमारा जीवन खुशनुमा मस्ती भरा हर पल हर रोज है।
 सैनिक वो हैं -
 जिनकी वजह से हम होली, दीवाली, ईद और क्रिसमस मनाते हैं मस्ती से झूमते हैं, नाचते हैं गाते और गुनगुनाते हैं।
 कुंवर कर्जदार है हमारे रक्त का कतरा कतरा जिनकी वजह से हम सुकून और चैन की जिंदगी बिताते हैं।

 ©कुँवर की कलम से......✍ #NojotoQuote

"सेना दिवस" पर मेरे देश के सभी सैनिको एवं शहीदों को कोटि कोटि नमन।
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#kunwar_nadaan
#कुँवरकीकलमसे
#सेनादिवस

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9 days ago

|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 9

|| श्री हरि: ||
8 - सुहृदं सर्वभूतानाम्

'सावधान!' हवाईजहाज के लाउडस्पीकर से आदेश का स्वर आया। यह अंतिम सूचना थी। वह पहले से ही द्वार के सम्मुख खड़ा था और द्वार खोला जा चुका था। उसकी पीठ पर हवाई छतरी बँधी थी। रात्रि के प्रगाढ़ अंधकार में नीचे कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। केवल आकाश में दो-चार तारे कभी-कभी चमक जाते थे। मेघ हल्के थे। वर्षा की कोई सम्भावना नहीं थी। बादलों के होने से जो अंधकार बढा था, उसने आश्वासन ही दिया कि शत्रु छतरी से कूदने वाले को देख नहीं सकेगा। हवाई जहाज बहुत ऊपर चक्कर लगा रहा था। सहसा वह नीचे चील की भांति उतरा।

'एक हजार दो सौ फीट, एक सौ सत्रह, कूद जाओ!' आदेश सभी अंग्रेजी में दिये जाते थे। यह आदेश भी अंग्रेजी में ही था। मैंने अनुवाद मात्र किया है। एक काली छाया हवाई जहाज से तत्काल नीचे गिरी और द्वार बंद हो गया। हवाई जहाज फिर ऊपर ऊठ गया। वह मुड़ा और पूरी गति से जिस दिशा से आया था, उसी दिशा में लौट गया। शत्रु के प्रदेश से यथाशीघ्र उसे निकल जाना चाहिए। जिसे नीचे गिराया गया, उसकी खोज-खबर लेना न उसका कर्तव्य था और न ऐसा करना उस समय सम्भव ही था।

'एक, दो, तीन - दस, ग्यारह - सत्तर, इकहत्तर, गीरनेवाला पत्थर के समान ऊपर से गिर रहा था; किंतु वह अभ्यस्त था। बिना किसी घबराहट, वह गिनता जा रहा था। उसे पता था कि उसे जब गिराया गया, उसका हवाई जहाज पृथ्वी से एक हजार दो सौ फीट ऊपर था। 'एक सौ पंद्रह, एक सौ सोलह, एक सौ सत्रह!' संख्या जो उसे बतायी गयी थी, पूरी गिनी उसने और तब उसके हाथों ने पीठ पर बँधी छतरी की रस्सी खींच दी। पैराशूट एक झटके से खुल गया। अब वह वायु में तैरता हुआ धीरे-धीरे नीचे आ रहा था।

सहसा वायु का वेग प्रबल हो गया। पैराशूट एक दिशा में उड़ चला; किंतु वह बहुत दुर नहीं जा सका। उसके सहारे उतरने वालों के पैरों को किसी वृक्ष की ऊपरी टहनियों का स्पर्श हुआ। अगले क्षणों में एक शाखा ने पैर उलझाने में वह सफल हो गया। बहुत कड़ा झटका लगा। मुख, हाथ, पीठ पर शाखाओं की रगड़ लगी। अच्छी चोट तथा कुछ खरोंचे भी आयी। शरीर की नस-नस कड़कड़ा उठी, लेकिन अंत में पैराशुट उलट गया। वह डाल पर स्थिर बैठ गया और उसने रस्सियां खोलकर पैराशुट को पीठपर से उतार लिया।

वह कहाँ है, कुछ पता नहीं उसे। चारों ओर घोर वन है। वन्य पशुओं की चिंघाड़े रह-रह कर गूंज रही हैं। जो मानचित्र उसे दिया गया था, अब वह बड़ी कठिनाई से काम देगा, क्योंकि हवा उसे अपने लक्ष्य से कितना हटा लायी है, किस स्थान पर वह आ गया है, यह जानने का कोई उपाय उसके पास नहीं।

रात्रि के इस अन्धकार में भूमि पर उतरना आपत्ति को आमन्त्रण देना था। प्रकाश वह थोड़ा भी कर नहीं सकता। इससे शत्रु कहीं समीप हुआ तो वह पता पा जायगा। जब तक झुटपुटा नहीं हुआ, वह चुपचाप उसी डालपर बैठा रहा। मच्छरों ने उसका मुख लाल बना दिया। शीतल वायु के झकोरे यद्यपि शरीर अकड़ाये दे रहे थे, उसे अच्छे लगे; क्योंकि कुछ क्षण को उनके कारण मच्छरों से उसे छुटकारा मिल जाता था। वायु की दुर्गंधि बतलाती थी कि समीप ही कहीं दलदल है।

झुटपुटे के प्रारम्भ में ही वह नीचे उतरा। सबसे पहले उसने कमर से बड़ा चाकू निकाल कर भूमि में गड्ढा बनाया। गीली मिट्टी होने से थोड़े ही परिश्रम में गड्ढा इतना बन गया कि उसमें पैराशूट रखकर ऊपर से मिट्टी डाल दी उसने। मिट्टीके ऊपर सूखे पत्ते इधर-उधर से लाकर बिखेर दिये। अब वह निश्चिंत हुआ कि पैराशूट या ताजे गड्ढे को देखकर शत्रु को कोई संदेह होने का भय नहीं रहा।

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'हम उसे गोली नहीं मार सकते। वह भारतीय है। उसे नेताजी को देना होगा।' जापानी अधिकारी परस्पर विवाद करने में लगे थे। एक अंग्रेजों के जासूस को मार देना चाहिये, इस विषय में दो मत नहीं था उनमें, किंतु नेताजी ने बहुत कठोर रुख बना लिया था, भारतीयों के साथ किये जाने वाले व्यवहार को लेकर। बात लगभग झगड़े की सीमा तक पहुंच चुकी थी। नेताजी अड़े थे - 'प्रत्येक भारतीय बंदी उन्हें दे दिया जाये। उसके साथ क्या हो, यह निर्णय वे करेंगे।'

'यह हमारे सैनिक अधिकारों में हस्तक्षेप है।' जापानी अधिकारियों को ऐसा प्रतीत होता था और वे मन में चिढ़ते थे; किंतु प्रत्यक्ष विरोध करना उनके लिए सम्भव नहीं था। उन्हें टोकियो से आदेश मिला था - 'सुभाषचंद्रवसु का सम्मान सम्राट के प्रतिनिधि की भाँति किया जाना चाहिये।'

कल रात्रि में कोई अंग्रेजी सेना का विमान वन में जासूस उतार गया। यह पता नहीं है कि जासूस अकेला ही आया है या उसके कुछ और साथी हैं। विमान का पीछा नहीं किया जा सका; किंतु वन खोज करने वाले सैनिक एक भारतीय को पकड़ कर ले आये। वह पैराशूट मिल गया भूमि मेँ गड़ा हुआ, जिससे वह उतरा था। अब बिना कठोर व्यवहार के जासूस कुछ बतायेगा नही।
कुछ सैनिक अधिकारी उसे गोली मार देने के पक्ष में हैं; किंतु नेताजी का संदेश आ गया है। उन्होंने कहलाया है - 'उससे पूछने का काम मुझ पर छोड़ दो!'

'हम यदि उसे रोकते हैं, बात टोकियो तक पहुँच सकती है।' प्रधान सैनिक अधिकारी ने गम्भीर चेतावनी दी और तब दूसरा उपाय इसे छोड़कर नहीं रह गया कि उस भारतीय को चुपचाप नेताजी के समीप भेज दिया जाये।

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'जिस वृक्ष पर मैं उतरा था, उसकी टहनियाँ और पत्ते टूटे थे। उनको हटा देना चाहिये, इधर मेरा ध्यान नहीं गया था।' वह तरुण बता रहा था - 'जापानी वन-निरीक्षकों का ध्यान उन रात के टूटे पत्तों पर गया। उन्होंने उस वृक्ष के आसपास खोज की और पैराशूट को भूमि में से खोद निकाला। इसके बाद उनके सैनिकों का एक पूरा समूह वन में फैल गया। मेरे लिए छिपना सम्भव नहीं रह गया और पिस्तौल का उपयोग करने से कोई लाभ नहीं था। विवश होकर मैं उनके सामने आ गया।'

'जीवन में शिक्षाकाल से अब तक मैंने कभी ईश्वर की सत्ता स्वीकार नही की थी। वैसे मैं पहिले संयम पसन्द करता था; किंतु जासूसी में अनेक बार शराबियों-जुआरियों के बीच में रहना पडा। धीरे-धीरे मुझ में सब दुर्व्यसन आ गये। नास्तिक था ही, परलोक की चिन्ता पागलपन लगती थी।' युवक कहते-कहते रो पडा था। उसने अपना अनेक अपकर्मों की रोते-रोते चर्चा की। यहाँ उनकी चर्चा अनावश्यक ही नही, अनुचित भी है।

'मुझे कमरे में हथकड़ी डालकर बन्द कर दिया गया था। मच्छरों को भगाने के लिए हाथ भी खुले नहीं थे। परंतु विपत्ति इतनी कहाँ थी। चूहों का एक झुंड आया। उसने मुझे पहिले दूर से देखा, सूंघा और फिर वे निकट आ गये। जब उनमें से एक ने मेरी गर्दन पर मुँह लगाया, मैं चीख पड़ा - 'हे भगवान!' लेकिन मुझे अपने पर ही क्रोध आया। 'मेरे जैसे पामर नास्तिक की पुकार भगवान सुनेगा भी - यदि वह हो!' अब वह हिचकियाँ लेने लगा था।

'किंतु भगवान् है। उसने मेरे जैसे पापी की पुकार भी सूनी। घंटे भर भी वह देर करता तो जापानी सैनिक मारते या छोडते, चूहे मुझे नोंच-नोंचकर खा लेते। उन्होंने गर्दन, पैर ओर कंधेपर केवल तीन घाव किये कि मेरी कोठरी का द्वार खुल गया। मुझे वह जापानी सैनिक भगवान का दूत ही लगा। वह मुझे गोली भी मार देता तो मैं उसे ऐसा ही मानता; किंतु वह मुझे मोटर में बैठाकर नेताजी के समीप ले गया।' उसने अपने अश्रु पोंछ लिये और दो क्षण को चुप हो गया।

'मुझे आज पता लगा कि भगवान है और वह मुझ जैसे की पुकार भी सुनता है। उसने मुझे बचाया है। अब यह जीवन उसका, उसी के स्मरण में अब जीना या मरना है।' वह बता रहा था कि उसने नेताजी से ये बाते कही थीं - 'अब शस्त्र उठाकर किसी ओर से किसी की भी हत्या करने की इच्छा मेरी नही है। भगवान है, तो पूरी पृथ्वी उसकी है। सब मनुष्य उसके अपने हैं। अत: मैं युद्ध में अब किसी ओर से नहीं लडूंगा।'

'आप पर प्रभू की कृपा है। आप सच्चे अर्थों में भगवद-भक्त हैं। भले यह भक्ति आपको इसी क्षण मिली हो।' नेताजी का स्वर भी भर आया था - 'हम आप पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाने की धृष्टता नहीं कर सकते। आप चाहे जहाँ जाने को स्वतन्त्र हैं। हम केवल प्रार्थना करेंगे कि आप मेरा आतिथ्य स्वीकार कर ले आज के दिन।'

'मुझ से कुछ पूछा नहीं गया। मैंने स्वयं जो कुछ बता दिया, वही नोट कर लिया गया। मेरी हथकड़ियां तो नेताजी ने पहुँचते ही खुलवा दी थीं। उन्होंने जिस श्रद्धा से मुझे भोजन कराया, उसका स्मरण करता हूँ तो मुझे अपने आप से घृणा होने लगती है। उन लोक पूज्य की श्रद्धा मिली मुझे केवल इसलिए कि मैंने भगवान को स्वीकार किया था। मैंने किया ही क्या था, मेरा मृत्युमुख से उद्धार तो स्वयं उस भगवान ने किया था जो कदाचित मेरे जैसों के पाप देखना जानता ही नही! भगवान! भगवान!' और वह फूटकर रो पड़ा। उन्मत्त के समान उठा और एक ओर दौडता चला गया। पता नहीं कहाँ गया वह।

'पागल है!' एक सज्जन ने कहा। फटे वस्त्र, बढ़े केश, चिड़िया का घोंसला बनी दाढ़ी। उसका वेश देख कर दूसरा अनुमान लगाया भी कैसे जा सकता है।

'वह मौज में आता है तब कहता है - मित्र भगवान! मेरे प्यारे मित्र! आप सबके मित्र!' उन वृद्ध महोदय ने बताया जिनसे अभी वह बातें कर रहा था - 'वह रंगून से युद्धकाल में ही वन के मार्ग से पैदल भारत आया। वह कहता है कि वन के भयानक जंतु और उनसे भयानक नरभक्षी मानव भी उसके लिए मित्र ही थे। भगवान सबका मित्र और उस भगवान ने उसे मित्र जो बना लिया। अब वह अपनी धुन में पागल है।'

'सबका सुहृद् वह श्यामसुंदर! उसे अपने सुहृद् रूप में पाने वाले ये महाभाग धन्य हैं।' पास सुनते एक साधु ने कहा।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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