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पैर

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 8

।।श्री हरिः।।
16 – भाग्य-भोग

'भगवन! इस जीव का भाग्य-विधान?' कभी-कभी जीवों के कर्मसंस्कार ऐसे जटिल होते हैं कि उनके भाग्य का निर्णय करना चित्रगुप्त के लिये भी कठिन हो जाता है। अब यही एक जीव मर्त्यलोक से आया है। इतने उलझन भरे इसके कर्म है - नरक में, स्वर्ग में अथवा किसी योनि-विशेष में कहाँ इसे भेजा जाय, समझ में नहीं आता। देहत्याग के समय की इसकी अन्तिम वासना भी (जो कि आगामी प्रारब्ध की मूल निर्णायिका होती है) कोई सहायता नहीं देती। वह वासना भी केवल देह की स्मृति - देह रखने की इच्छा है। ऐसी अवस्था आने पर चित्रगुप्त के पास एक ही उपाय है, वे अपने स्वामी के सम्मुख उपस्थित हों।

धर्मराज ने चित्रगुप्त से उस जीव का क्रम लेख लिया और उसे लगभग बिना पढे ही उसके आगामी प्रारब्ध के तीनों कोष्ठक भर दिये। चित्रगुप्त ने देखा जाति के कोष्ठक में लिखा है - मनुष्य-श्वपच, आयु के कोष्ठक में उदारतापूर्वक 102 की संख्या है; किंतु भोग - भोग का विवरण देखकर चित्रगुप्त को लगा कि आज संयमनीपति विशेष क्रुद्ध हैं।

चित्रगुप्त कभी नहीं समझ सके कि जीव का जो कर्म-विधान उनको इतना जटिल लगता है, धर्मराज कैसे उसका निर्णय बिना एक क्षण सोचे कर देते हैं। यम एक मुख्य भागवताचार्य हैं और भक्ति का - भक्ति के अधिष्ठता का रहस्य जाने बिना, उसकी कृपाकोर की प्राप्ति के बिना कर्म का - धर्माधर्म का ठीक-ठीक रहस्य ज्ञान नहीं होता, यह बात चित्रगुप्तजी नहीं समझेंगे। वे तो कर्म के तत्त्वज्ञ हैं और कर्माकर्म की कसौटी पर ही सब कुछ परखना जानते हैं; किंतु जब उनकी कसौटी उन्हें उलझन में डाल देती है - यमराज कर्म के परम निर्णायक हैं। उनके निर्णय की कहीं अपील नहीं, अत: वे बिना हिचके निर्णय कर देते हैं। यह चित्रगुप्तजी के चित्त का समाधान है; किंतु धर्म के निर्णायक को आवेश में तो निर्णय नहीं करना चाहिये।

'यह अभागा जीव!' यमपुरी के विधायक, यमराज के मुख्य सचिव चित्रगुप्त - उन्हें किसी जीव को नरक का आदेश सुनाते किसी ने हिचकते नहीं देखा और आज वे क्षुब्ध हो रहे थे - 'कैसे सहन कर सकेगा यह दारुण दुख? इतना दुखदायी विधान एक असहाय प्राणी के लिये।'

'संयमनी के मुख्य सचिव प्राणी के सुख-दुख के दाता कब से हो गये?' चित्रगुप्त चौंक उठे। उन्होंने अपनी चिन्ता में देखा ही नहीं था कि देवर्षि नारद उनके सामने आ खड़े हुए हैं। उन्होंने प्रणिपात किया देवर्षि को।

‘धर्मराज को स्रष्टा ने केवल जाति, आयु और भोग के निर्णय का अधिकार दिया है।' देवर्षि ने अपना प्रश्न दुहराया - 'स्थुल शरीर तक ही कर्म अपना प्रभाव प्रकट कर सकते हैं, किंतु देखता हूँ; धर्मराज के महामन्त्री अब जीव के सुख-दु:ख की सीमा के स्पर्श की स्पर्धा भी करने लगे हैं।'

ऐसी धृष्टता चित्त में न आवे, आप ऐसा अनुग्रह करें।' चित्रगुप्त ने दोनों हाथ जोड़े - ‘किंतु इतना दारुण भोग प्राप्त करके भी जीव दुखी न हो, क्या सम्भव है?'

'असम्भव तो नहीं है। शरीर की व्यथा प्राणी को दुखी ही करे - आवश्यक नहीं है।' देवर्षि ने चित्रगुप्तजी के सम्मुख पड़ा कर्म-विधान सहज उठा लिया।

'स्वयं धर्मराज ने यह विधान किया है।' चित्रगुप्त डरे। परम दयालु देवर्षि का क्या ठिकाना, कहीं इतना कठोर विधान देखकर वे रुष्ट हो जायँ - उनके शाप को स्वयं स्त्रष्टा भी व्यर्थ करने में समर्थ नहीं होंगे।

'कुब्ज, कुरुप, बधिर, मूक, शैशव से अनाथ, अनाश्रय, उपेक्षित, उत्पीड़ित, मान-भोग वर्जित, नित्य देहपीड़ा-ग्रस्त मरुस्थल-निर्वासित......।' देवर्षि के साथ डरते-डरते चित्रगुप्त भी उस जीव के भोग के कोष्ठक में भरे गये विधान को पुन: पढते जा रहे थे मन-ही-मन। कहीं तो उसमें कुछ सुख-सुविधा मिलनेे का कोई संयोग सूचित किया गया होता।

'अतिशय दयालु हैं धर्मराज।' चित्रगुप्त की आशा के सर्वथा विपरीत देवर्षि के मुख से उल्लास व्यक्त हुआ - 'इस प्राणी को एक साथ स्वच्छ कर देने की व्यवस्था कर द उन्होंने। विपत्ति तो वरदान है श्रीनारायणका।'

अब भला इन ब्रह्मपुत्र से कोई क्या कहे और इन्हें ही इतना अवसर कहां कि किसी की बात सुनने को रुके रहें। चित्रगुप्त के कर्म-विधान का पोथा पटका उन्होंने और उनकी वीणा की झंकार दुर होती चली गयी।
***************************************

महाराजा की सवारी निकली थी नगर-दर्शन करने। यह भी कोई बात है कि उनके सामने राजपथ पर कोई कुबड़ा, गूंगा, काला, कुरूप चाण्डाल बालक आ जाय। राजसेवकों ने उसे पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और घसीट कर मरे कुत्ते के समान दुर फेंक दिया।

'कौन था यह?' महाराजा ने पूछा।

'एक श्वपच का पुत्र!' मन्त्री ने उत्तर दे दिया।

'इसके अभिभावक इसे पथ से दुर क्यों नहीं रखते?' महाराज का क्रोंध शान्त नहीं हुआ था।

'इसका कौई अभिभावक नहीं।' कुछ देर लगी पता लगाने में और तब मन्त्री ने प्रार्थना की - 'माता-पिता इसके तब मर गये, जब यह बहुत छोटा था, अब तो यह इसी प्रकार भटकता रहता है।'

'नगर का अभिशाप है यह।' महाराज को कौन कहे कि गर्व के शिखर से नीचे आकर आप देखें तो वह भी आपके समान ही सृष्टिकर्ता की कृति है; किंतु धन, अधिकार का मद मनुष्य की विवेक-दृष्टि नष्ट कर देता है। महाराज ने आदेश दे दिया - 'इसे दूर मरुस्थल में निर्वासित कर दिया जाय। राजधानी में इतनी कुरुपता नहीं रहनी चाहिये।'

छोटा-सा अबोध बालक। वैसे ही वह दर-दर की ठोकरें खाता फिरता था। कूड़े के ढेर पर से छिलके उठा कर उदर की ज्वाला-शान्त करता था। लोग दुत्कारते थे। बच्चे पत्थर मारते थे। वृक्ष के नीचे भी रात्रि व्यतीत करने का स्थान कठिनता से पाता था और अब उसे नगर से भी निर्वासित कर दिया गया। हाथ-पैर बाँधकर ऊंट पर लादकर एक राजसेवक श्वपच उसे मरुभूमि में ले गया और वहां उसके हाथ-पैर उसने खोल दिये।

अंग में लगे घाव पीड़ा करते थे। मरुस्थल की रेत तपती थी और ऊपर से सूर्य अग्नि की वर्षा करते थे। आँधियाँ मरुभूमि में न आयेंगी तो आयेंगी कहाँ; लेकिन मृत्यु उस बालक के समीप नहीं आ सकती थी। उसके भाग्य ने उसे जो दीर्घायु दी थी - कितनी बड़ी विडम्बना थी उसकी वह दीर्घायु।

जब प्यास से वह मुर्छित होने के समीप होता, कहीं-न-कहीं से रेत में दबा मतीरा उसे मिल जाता। खेजड़ी की छाया उसे मध्याह्न में झुलस जाने से बचा देती थी। मतीरा ही उसकी क्षुधा भी शान्त करता था। वैसे उसे मरुस्थल के मध्य में एक छोटा जलाशय मिल गया बहुत शीघ्र और वहाँ कुछ खजूर के वृक्ष भी मिल गये, किन्तु खजूर बारहमासी फल तो नहीं है।

इस भाग्यहीन बालक का स्वभाव विपत्तियों को भोगते-भोगते विचित्र हो गया था। बचपन में तो वह रोता भी था; किंतु अब तो जब कष्ट बढता था तो वह उलटे हँसता था - प्रसन्न होता था। अनेक बार उसे मरुस्थल के डाकू मिले ओर उन्होंने जी भरकर पीटा। वह उस पीड़ा में खूब हँसा - मानो उसे पीड़ा में सुख लेने का स्वभाव मिल गया हो।

वह क्या सोचता होगा? वह जन्म से मूक और बधिर था। शब्दज्ञान उसे था नहीं। अत: वह कैसे सोचता होगा, यह मैं नहीं समझ पाता हुँ। लेकिन वह कुछ काम करता था। दिन निकलता देखता तो सूर्य के सम्मुख पृथ्वी पर बार-बार सिर पटकता। आंधी आती तो उसे भी इसी प्रकार प्रणाम करता और कभी आकाश में कोई मेघखण्ड आ जाय तो उसे भी। खेजड़ी के वृक्ष को, जलाशय को और यदि कभी कोई दस्युदल आ जाय तो उन लोगों को तथा उनके ऊँटों को भी वह इसी प्रकार प्रणिपात किया करता था।

दूसरा काम वह प्राय प्रतिदिन यह करता कि खेजड़ी की एक डाल तोड़ लेता और विभिन्न दिशाओं में दूर-दूर तक एक निश्चित दूरी पर उसके पत्ते, टहनियाँ तब तक डालता जाता - जबतक मध्याह्न की धूप उसे छाया में बैठ जाने को विवश न कर देती। अनेक बार उसके डाले इन पत्तों के सहारे मरुस्थल में भटके यात्री एवं दस्यु उसके जलाशय तक पहुँते थे। अनेक बार उन दस्युओं ने उसे पीटा था। बहुत कम बार किसी यात्री ने उसे रोटी का टूकड़ा खाने को दिया। लेकिन उसने खेजड़ी के पत्ते डालने का काम केवल तब बंद रखा, जब वह ज्वर से तपता पड़ा रहता था।

मरुस्थल में एकाकी, दिगम्बर, असहायप्राय भूख-प्यास से संतप्त रहते वर्ष-पर-वर्ष बीतते गये उसके। बहुत बीमार पड़ा और बार-बार पड़ा; किंतु मरना नहीं था, इसलिये जीवित रहा। बालक से युवा हुआ और इसी प्रकार वृद्ध हो गया। उसकी देह में हड्डियों और चमड़े के अतिरिक्त और था भी क्या। अनेक बार यात्री उसे प्रेत समझकर डरे थे।

दुर्भाग्य ही तो मिला था उसे। एक अकाल का वर्ष आया और वह नन्हा जलाशय सूख गया जो वर्षों से उसका आश्रय रहा था। खेजड़ी में पतों के स्थान पर काँटे रह गये। उसे वह स्थान छोड़कर मरुस्थल में भटकना
पड़ा।

अंधड़ से रेत नेत्रों में भर गयी। प्यास के मारे कण्ठ सूख गया। गले में कांटे पड़ गये और अन्तत: वह मूर्छित होकर गिर पड़ा।

सहसा आकाश में उत्तंक मेघ प्रकट हुए जो केवल राजस्थान की मरुभूमि में कभी-कभी - कुछ शताब्दियों के अन्तर से प्रकट होते हैं। बड़ी-बड़ी बूंदों की बौछार ने उसके संतप्त शरीर को शीतल किया। उसने नेत्र खोलने की चेष्टा की; किंतु उनमें रेत भर गयी थी। देह में भयंकर ताप था। वह जीवन में पहली बार वेदना से चीखा - मूक की अस्पष्ट चीत्कार उसके कण्ठ से निकली।

उत्तंक मेघ उसके लिये तो नहीं आये थे। मरु की राशि में शतियों से समाधिस्थ महर्षि उत्तंक उठे थे समाधि से। उनकी तृषा शान्त करने के लिये मेघ आते हैं। महर्षि ने अपने समीप से आयी वह चीत्कार-ध्वनि सुनी और आगे बढ आये।

कृष्णवर्ण, कुटज, श्वेत केश, कंकालमात्र एक मानवाकार प्राणी रेत में पड़ा था। अब भी वह अपने नेत्रों से रेत ही निकालने के प्रयत्न में था। महर्षि की दृष्टि पड़ी। वे सर्वज्ञ - उन्हें कहां सूचित करना था कि उनके सम्मुख पड़ा प्राणी बोलने और सुनने में असमर्थ है। लेकिन महर्षि का संकल्प तो वाणी की अपेक्षा नहीं करता। उनकी अमृत दृष्टि पड़ी उस सम्मुख के प्राणी पर और फिर वे अपनी साधना-भूमि की ओर मुड़ गये।
****************************

कुछ मास (क्योंकि देवताओं का दिन मनुष्यों के छः महीने के बराबर होता है और उतनी ही बड़ी होती है उनकी रात्रि) व्यतीत हुए होंगे, चित्रगुप्तजी के और एक दिन पुनः देवर्षि नारद संयमनी पधारे।

'आपके उस अतिशय भाग्यहीन जीव की अब क्या स्थिति है?' धर्मराज का सत्कार स्वीकार करके जाते समय देवर्षि ने सहसा चित्रगुप्त से पूछ लिया - 'जीवन में भाग्य का भोग उनको कितना दूखी कर सका, यह विवरण तो आपके समीप होगा नहीं।'

'आपका अनुग्रह जिसे अभय दे दे, कर्म के फल उसे कैसे उत्पीड़ित कर सकते हैं?' चित्रगुप्त ने नम्रतापूर्वक बताया - 'वे महाभाग देह की पीड़ा, अभाव, असम्मान से प्राय: अलिप्त रहे।'

'अनुग्रह तो उनपर किया था धर्मराज ने।‘ देवर्षि ने सहजभाव से बतलाया - 'भोग-विवर्जित करके संयमनी के स्वामी ने उन्हें अनेक दोषों से सुरक्षित कर दिया था। आपत्तियों ने उन्हें निष्काम बनाया। विपत्ति का वरदान पाये बिना प्राणी का परित्राण कदाचित् ही हो पाता है।'

'महर्षि उत्तंक के अनुग्रह ने उनके निष्कलुष वासनारहित चित्त को आलोकित कर दिया।' चित्रगुप्तजी ने बताया - 'अब हमारे विवरण में केवल इतना ही है कि उनका परम पवित्र देह धरा देवी ने अपनी मरुराशि में सुरक्षित कर लिया है।'

जिसके सम्बन्ध में श्रुति कहती है -

'न तस्य प्राणाश्चोत्क्रामन्ति तत्रैव प्रविलीयन्ते।'

उस मुक्तात्मा के सम्बन्ध में इससे अधिक विवरण चित्रगुप्तजी के समीप हो भी कैसे सकता है?

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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22 days ago

झुक कर चल 
हों पैर जमीं पर 
तो संग तेरे हैं तारे
अकड़ अहम की
परवाज़ भरे तो 
पैर कटेंगे सारे

दे कर देख 
देख ना दे
भरे रहेंगे हाथ
तू जो छीने 
सिक्के झीने
क्या तेरी औकात 

 #NojotoQuote

झुक कर देख
#shonameetha #mikyupikyu #hindinama #kavishala #spritual #Love #skand

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27 days ago

आज फ़कीरा पुछे रब से ,क्यों दर्द के उल्टे पैर
क्यों रेंग रेंग कर वक्त रगड़ता ,जब खुशी में जाता तैर

कदम कदम उल्झी गुत्थी सा,शक्श लगे हर गैर 
रब कैसे माशूक बनाऊँ,जग से है जब बैर 

साँसें साँसे सरक सरक कर ,देह की करती सैर 
ना जाने ये रूह कहाँ है ,नहीं पता ना ठैर

मंदिर सात दुआएँ माँगी,मस्जिद माँगी खैर
आज फ़कीरा पुछे रब से ,क्यों दर्द के उल्टे पैर

 #NojotoQuote

फकीर
#shonameetha #prayer #journeytoself #spritual #hindinama #kavishala

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2 months ago

|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 8

।।श्री हरिः।।
8 - जागे हानि न लाभ कछु

राजकुमार श्वेत के आनन्द का पार नहीं है। आज उनका अभीष्ट पूर्ण हुआ। आज उनकी तपस्या सार्थक हुई। उन्हें लगता है कि आज उनका जीवन सफल हो गया। उन्होंने भगवान् पुरारि से वरदान प्राप्त किया है कि पृथ्वी पर वे सहस्त्र वर्ष एकच्छत्र सम्राट रहेंगे और सौ अश्वमेघ निर्विघ्न सम्पन्न कर सकेंगे। भविष्य में इन्द्रासन उनका स्वत्व बनेगा।

पिता परम शिवभक्त हैं। श्वेत ने जब गुरुगृह को शिक्षा सम्पन्न करके कुछ काल तपोवन में रहने की अभिलाषा व्यक्त की, तब पिता ने अनुमति और आशीर्वाद दिया। आज वह आशीर्वाद फलित हुआ है।

पूर्णकाम कुमार श्वेत अपने उटज से ताम्रपर्णी में स्नान करने जा रहे हैं। आनन्द के अतिरेक में पद पथ में त्वरित पड़ रहे हैं। 'स्नान, मध्यान्ह-संध्या और फिर गुरुदेव के आश्रम पहुँचकर उनके चरणों में प्रणति! वहां से कोई सहाध्यायी स्वयं समाचार देने राजधानी दौड़ जायगा। रथ आ जायगा लेने के लिये। सम्भव है स्वयं महाराज विप्रवृन्द के साथ लेने पधारें!' श्वेत की कल्पना, पता नहीं क्या-क्या सोच रही है।

'भविष्य के देवेन्द्र!' सहसा एक झींगुर का स्वर श्वेत के कानों में पड़ा। स्वर में उन्हें वेदना लगी, व्यंग लगा। प्राणियों की भाषा का ज्ञान गुरुदेव से मिल चुका था। श्वेत के पैर रुक गये। उनको सफलता का संवाद क्या देवताओं ने जगती में फैलाया है! चकित से वे पीछे घूमे।

'भूतकाल के इन्द्र का सम्मान तुम भले न करते; किंतु एक प्राणी को इस प्रकार आहत करना तो तुम्हें शोभा नहीं देता!' झींगुर का एक पैर आहत हो गया था। असावधानी के कारण श्वेत का पैर पड़ गया था उसके ऊपर। वह धूलि में किसी प्रकार एक ओर घिसटता जा रहा था।

'आप मुझे क्षमा करें!' श्वेत ने उस कीट की भाषा में ही उत्तर दिया। 'आपका परिचय पाने का अधिकारी यदि मैं होऊँ.......।'

'इस शिष्टाचार की आवश्यकता एक कीड़े के साथ व्यवहार करने में नहीं है!' झींगुर ने घिसटना बंद कर दिया और बोला - 'इन्द्रत्व एक स्वप्न था और यह कीटदेह भी एक स्वप्न ही है! वैसे मैं अब भी इन्द्र हूँ।'

'आप इस दशा में इन्द्र हैं!' राजकुमार श्वेत को आश्चर्य हुआ। उन्हें संदेह भी हुआ कि कहीं शतक्रतु पुरन्दर यह रूप धारण करके उनकी कोई परीक्षा लेने तो नहीं आ गये हैं। स्वतः स्वर निकल गया - 'मैं आपकी वन्दना करता हूँ।'

'मैं आपका वन्दनीय नहीं हूँ।' उस कीट ने कहा - 'मुझे कोई खेद नहीं कि आपके पद से मैं आहत हो गया। प्राणिमात्र के परम वन्दनीय भगवान् शशांक-शेखर ने आपको आज ही दर्शन दिये हैं, अत: आपका चरणस्पर्श मेरा सौभाग्य ही है।'

'महाभाग।' श्वेत समझ नहीं पा रहे थे कि यह कीट वेश में किससे उनकी बातचीत हो रही है।

'आप कोई शंका न करें।' झींगुर ने राजकुमार की चकित भंगिमा लक्षित कर ली - 'इस समय मैं एक घृणित कीट मात्र हूँ; किंतु इस देह में दो क्षण पूर्व मैं उस सुंदर, सुरभित, सुकोमल, सुरंग पुष्ण पर बैठा था जो तृणशाखा पर मार्ग में झूम रहा है। किस इन्द्र के सिंहासन से वह हीन गौरव है? उस पर बैठा मैं झिल्ली राग आनन्द से अलाप रहा था। मेरी सात प्रेयसियाँ मेरे चारों ओर फुदक रही थी। आप आये तो वे कूदकर तृणों में अदृश्य हो गयी। मेरा एक पैर आहत हो गया। जैसे असुरों के आक्रमण से आहत-पराजित पुरन्दर मेरु की गुहा में आश्रय लेते हैं, मैं भी उस भू-विवर (दरार) में तब तक के लिये जा रहा हूँ, जब तक मेरा यह पैर ठीक न हो जाय और मैं कूदकर अपने पुषपासन पर पहुँचने योग्य न हो जाऊँ। इन्द्र के समान ही भोगवञ्चित इस समय हो गया मैं।'

‘तो यह वाग्मी सामान्य कीट ही है!' श्वेत ने मन में ही सोचा। उनके चित्त को इससे आश्वासन मिला। 'आप पहिले कभी देवराज रहे हैं।'

'रहा हूँ।' झींगुर ने उत्तर दिया - 'किंतु देवराज का पद कुछ इतना गौरवमय नहीं है जितना आप समझ रहे हैं। उसके भोगों में और इस देह के भोगों में अन्तर ही क्या है? एक मन्वन्तर देवाधिप रहा और एक ऋषि का तनिक अपराध हो गया, उनको उचित सम्मान देने में किंचित प्रमाद बन गया तो अब कीट बन चुका हूँ।'

'आपकी प्रज्ञा एवं स्मृत्ति विलक्षण है!' श्वेत के मन में इस कीट के प्रति पुन: गौरवबुद्धि जाग्रत हुई। वह इस समय भले कीट हो, देवराज रह चुका है। उससे अनेक अनुभव प्राप्त कर सकता है श्वेत।

'यही एक तथ्य है और वह भगवान गंगाधर की अनूकम्पा का परिणाम है।' झींगुर ने बतलाया - 'अन्यथा इन्द्रत्व एक स्वप्न था। उससे शाप के द्वारा कीटदेह में आगमन भी एक स्वप्न है। यह राजकुमार श्वेत के पद से आहत होकर उनसे मिलना भी स्वप्न और राजकुमार भी स्वप्न देखते हैं चक्रवर्ती पद का, इन्द्रत्व का तथा एक कीट से वार्तालाप करने का। स्वप्न का जैसा लाभ, वैसी हानि। इसमें हर्ष-विषाद को स्थान कहाँ है।'

'स्वप्न के जैसा लाभ और स्वप्न के समान हानि!' श्वेत की समझ में बात का कोई भी अंश नहीं आया। 'आप कहना यह चाहते हैं कि मैंने जो अध्ययन किया, तप किया और भगवान् शिव ने प्रत्यक्ष मुझे दर्शन दिये, वह सब स्वप्न है और उस वरदान से जो चक्रवर्ती पद तथा कालान्तर में इन्द्रत्व प्राप्त होगा, वह सब भी स्वप्न ही होगा? मैं अश्वमेघ यज्ञ भी सौ बार काल्पनिक ही करूँगा!'

'इसमें सदाशिव की अनुकम्पा मात्र सत्य है!' कीट कह रहा था - 'कोई अद्भुत बात मैं नहीं कह रहा हूँ। मैंने भी इसी प्रकार अध्ययन किया था, तपस्या की थी और मैं चक्रवर्ती सम्राट हुआ था। सम्राट न होता तो सौ अश्वमेघ कर कैसे पाता और इन्द्र तो सर्वदा शतक्रतु होता है। इस सब में आशुतोष की अहैतु की कृपा जो मुझे प्राप्त हुई वही सत्य है। उसी का यह परिणाम है कि मुझे पिछले स्वप्नों की स्मृति है और यह मेरा कीटदेह स्वप्न है, इसे मैं समझ सका हूँ।'

'किंतु यह तथ्य अभी मेरी बुद्धि ग्रहण नहीं कर पा रही है!' श्वेत में जिज्ञासा जाग्रत् होने लगी थी।

‘स्वाभाविक है।' कीट बोला - "स्वप्न देखते समय कदाचित ही यह बुद्धि आती है कि जो दृश्य सम्मुख है, वह स्वप्न है। जाग्रत् हुए बिना स्वप्न के हानि-लाभ उस स्वप्नकाल में तो वास्तविक बने ही रहते हैं।'

'यह जागरण कैसे हो!' विनम्र स्वर हो चुका था श्वेत का। वह जानता था कि ज्ञान श्रद्धालु एवं विनयावनत को ही प्राप्त होता है।

'आप देख ही रहे हैं कि मेरा यह देह तामस देह है और इस समय आहत पैर की व्यथा भी मुझे चञ्चल कर रही है।' झींगुर ने समझाया - 'आपमें जिज्ञासा है, अधिकार है और तत्त्वज्ञ पुरुषों का भारत में कभी अभाव नहीं रहा है। अत: आप अब मुझे अनुमति दें।'

झींगुर ने श्वेत की अनुमति की अपेक्षा नहीं की। वह एक पैर घसीटता समीप के दरार में धीरे से प्रवेश कर गया। दो क्षण श्वेत वहीं सिर झुकाये खड़े रहे। अब सरिता की और उठते उनके पद शिथिल थे और सावधान थे। दृष्टिपूत स्थल पर ही पादक्षेप करना चाहिये, इस आदेश का प्रथम अतिक्रमण ही उन्हें खिन्न बनाये दे रहा था।
************************************

'मुझे चक्रवर्ती सम्राट का पद नहीं चाहिये। इन्द्रत्व की मेरी अभिलाषा भी मर गयी है।' श्वेत का वैराग्य सच्चा था। हम आप बड़ी सरलता से कह देते हैं यही बात - प्राय: साधकों के मुख से यह सुनता हूँ, किंतु जो भिक्षुक पैसे-पैसे को जन-जन के सम्मुख हाथ फैलाता हुआ गिड़गिड़ाता है, वह भी कहता है - 'मुझे करोड़पति नहीं बनना है।' यह न वैराग्य है, न त्याग। अपनी सामर्थ्य में जिसका स्वप्न भी देख न पाती; उसका लोभ मन में जागता नहीं। यदि वह प्राप्य लगने लगे - रुपये का लोभी स्वर्ण की खदान छोड़ पायेगा? किंतु श्वेत को तो चक्रवर्ती पद तथा इन्द्रत्व का वरदान प्राप्त हो चुका था। उनका वैराग्य उपलब्ध का त्याग कर रहा था।

'मैं मूर्ख नहीं बनूंगा।' श्वेत का संकल्प दृढ था - 'जागरण क्या! बिना जाग्रत् हुए सत्य का स्वरूप अवगत नहीं हो सकता। मुझे जागृति चाहिये।'

'वत्स! तुम खिन्न प्रतीत होते हो।' श्वेत स्नान-सध्या के उपरान्त सीधे गुरुदेव के आश्रम पहुंचे थे। अपने पदों में प्रणत शिष्य को ऋषि ने आशिर्वाद देकर उठाया। किंतु तपस्या के लिये गया यह राजकुमार खिन्न क्यों
लौटा? पूछा ऋषि ने - 'कोई विघ्न बाधा दे रहा है तुम्हें?'

'आपका अनुग्रह जिनकी सुरक्षा को सतर्क है, विघ्न के अधिनायक उसकी छाया से भी आतंकित होते हैं।' राजकुमार ने अपनी वरदान-प्राप्ति तक का समाचार शिथिल स्वर में ही सूना दिया।

'किंतु तुममें योग्य उल्लास क्यों नहीं है?' ऋषि आसन पर सावधान बैठ गये।

'आपका अन्तेवासी अज्ञानान्धकार में भटकता रहे, यह उसी का अनधिकार!' राजकुमार के नेत्र भर आये - 'अन्यथा आपकी अहैतु की कृपा के प्रसाद कहां परिसीम होते हैं।'

'वत्स।' कृमि-संवाद की बात सुनकर महर्षि का स्वर भी गद्गद हो गया। अन्तत: उनका छात्र त्रिवर्ग की लिप्या से ऊपर उठ गया। वह वैराग्य की परम सम्पत्ति लेकर उनके समीप ज्ञान की ज्योति प्राप्त करने आया है। 'भगवान् शंकर का आशीर्वाद अमोघ है। चक्रवर्ती साम्राज्य और इन्द्रत्व अब तुम्हारे स्वत्व हैं। उनकी प्राप्ति का आग्रह जैसा अज्ञान-मूलक था, मोह था, वैसा ही आग्रह उनके त्याग का भी है। स्वप्न के सम्बन्ध में क्या आग्रह कि वह अमुक प्रकार का ही रहे, अमुक प्रकार का न रहे।'

'भगवन्! जागरण चाहिए मुझे।' राजकुमार श्वेत ने महर्षि के पदों में मस्तक रखा।

'वह तुम्हारा स्वरूप है।' महर्षि कह रहे थे - 'तुम स्वप्न देख रहे हो, यही भ्रम है। तुम नित्य जाग्रत् हो। नित्य चिन्मय हो। तुममें स्वप्न की सत्ता कहां है।'

श्वेत ने दो क्षण में सब समझ लिया। शास्त्र अवश्य कहते हैं कि क्षणार्ध में ज्ञानोपलब्धि होती है; किंतु होती है अधिकारी को। देवेन्द्र और विरोचन भी प्रजापति के पास गये थे और उन्हें दीर्घकाल तक व्रत धारण करना पड़ा था। श्वेत को गुरू गृह में अधिक नहीं रहना पड़ा। किंतु उन्हें जब वे राजधानी पहूँचे - कोई हर्ष नहीं था उस स्वागत-सत्कार का जो उनका किया गया। जागरण का स्वरूप यदि वाणी में आता होता - लेकिन वह अनिर्वचनीय है। कहा इतना ही जा सकता कि जाग्रत के लिये न कुछ लाभ रह जाता, न हानि।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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2 months ago

|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 8

।।श्री हरिः।।
4 – कर्म

'कुछ कर्मों के करने से पुण्य होता है, और कुछ के न करने से। कुछ कर्मों के करने से पाप होता है और कुछ के न करने से।' धर्मराज अपने अनुचरों को समझा रहे थे। 'कर्म संस्कार का रूप धारण करके फलोत्पादन करते हैं। संस्कार होता है आसक्ति से और आसक्ति क्रिया एवं क्रियात्याग, दोनों में होती है। यदि आसक्ति न हो तो संस्कार न बनेंगे। अनासक्त भाव से किया हुआ कर्म या कर्मत्याग, न पुण्य का कारण होता है और न पाप का।'

बड़ी विकट समस्या थी। कर्म के निर्णय के लिए जो सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, दिशाएँ, सन्ध्या, दिन-रात्रि, चन्द्रमा, गौएँ, मन, बुद्धि एवं काल - ये द्वादश साक्षी नियत किये गये थे, उनमें से केवल मन और बुद्धि ही आसक्ति अनासक्ति के साक्षी हो सकते थे। वे तो उसी जीव के हैं यदि उन्होंने कहीं पक्षपात किया तो!

'एक बात और' धर्मराज ने अपनी बात आगें बढायी। 'अधर्म भी धर्म बनकर धोखा देता है और परिस्थिति भेद से धर्म भी अधर्म हो जाता है। दुसरे के वर्णाश्रम धर्म अपने लिये परधर्म हैं। धर्म का केवल बाह्यनाटक तो दम्भ है। शास्त्रों के शब्दों का जान-बूझकर अन्यथा अर्थ करना छल है। जो अपने धर्म में बाधा डाले, वह किसी के लिए धर्म होने पर भी विधर्म है! अपने धर्म से भिन्न किसी भी धर्म की स्वेच्छा स्वीकृति धर्माभास है। ये पाँचों अधर्म अथवा त्याज्य कर्म हैं।'

बेचारे यमदूत - सिर पकड़ लिया उन्होंने। यह अटपट परिभाषा समझ लेना सरल नहीं था और समझे बिना उनका कल्याण नहीं। यदि तनिक भी चूके, किसी भी जीव को भ्रान्तिवश कष्ट मिला तो धर्मराज क्षमा करना जानते ही नहीं। उन्होंने जब कभी बूढे ब्रह्माजी से पढा होगा - पितामह बहुत व्यस्त रहे होंगें सृष्टि कार्य में। धर्मराज को क्षमा का पाठ पढाना ही वे भूल गये।

'विवश होकर किया गया त्याग, कष्ट-सहन, ये सब पुण्य नहीं हैं और इसी प्रकार किसी विशेष परिस्थिति में या किसी के द्वारा बलपूर्वक कराया गया, अनिच्छा पाप भी पाप नहीं है।' यही एक सीधी बात कही थी संयमनीपति ने। दूतों ने बड़े आनंद से सिर हिलाकर सूचित कर दिया कि वे यह अन्तिम वाक्य समझ गये।

'अब तुम जा सकते हो।' उन्होंने देख लिया था कि दूतों के हाथ में पाश और दण्ड उपस्थित हैं। उनके दूत
कभी प्रमाद नहीं करते। भूलें भी यदा-कदा ही उनसे होती हैं। कार्यक्षेत्र में ही वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञानोद्गम का सर्वश्रेष्ठ स्थान अनुभूतिका क्षेत्र है। उन्हें उपदेश के लिये अवकाश भी कहाँ मिलता है। अहर्निश अविराम न्यायाधीश का स्वरुप उन्हें दूसरी ओर कहां ध्यान देने देता है।

'अनुभूति के क्षत्र में भ्रान्ति की संभावना तो रहती है।' डरते-डरते वक्रतुण्ड ने, जो सबसे अधिक धृष्ट हो गया था, बहुत ही नम्र शब्दों में निवेदन किया। 'और उसका परिणाम होता है दण्ड..............।'

'भ्रान्ति हो तो चेतनता का लक्षण है। भूलें या तो पूर्णपुरुष परमात्मा से नहीं होती या जड़ से। पितामह भी कभी-कभी दो सिर, तीन पैर या किसी नेत्रादि गोलक से सर्वथा हीन प्राणों की सृष्टि कर डालते हैं और यही भूलें बतलाती हैं सृष्टिकर्ता कोई चेतन है - जड़ नहीं।' कुछ रुष्ट होकर धर्मराज ने डाँटा। 'तुम मनुष्यकृत जड़ यन्त्र बनना चाहते हो या तुमने अपने को पूर्णपुरुष मान लिया है।'

'पर दण्ड........।' दूत भयाक्रान्त होने पर भी इतना कह ही गया।

'दण्ड?' यमराज ने फटकारा 'मूर्ख हो तुम! दण्ड ही शिक्षा है। वही भ्रान्ति से सावधान करता है और प्रमाद को दूर रखता है।'

कोई फिर बोलने का साहस कर नहीं सकता था। मस्तक झुकाकर अभिवादन किया और चुपचाप वहाँ से खिसक गया।
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'दान, सत्य, सेवादि करने से पुण्यप्रद होतें हैं।' यमदुतों ने अपनी एक बैठक कर ली थी। 'वत्रत उपवास, संयम प्रभृति कर्मों के न करने में पुण्य हैं।' वक्रतुण्ड ने धर्मराज के प्रथम वाक्यांश का भाष्य किया।

'हिंसा, चोरी, अनाचारादि करने से पाप होता है।' बड़ी सीधी बात कह दी भीमदर्शन ने। 'और सन्धयादि नित्यकर्म न करने से।' नैमित्तिक एवं काम्य कर्मों की फलोत्पादकता पर उन्हें कुछ समझना नहीं था। सभी सकाम कर्म विधिपूर्ण होने पर कामनारूप एवं विधिभंग होने पर या तो निष्फल होते हैं या विपरीत फल देते हैं। लेकिन इस झमेले में यमदूतों को कुछ लेना-देना नहीं था। ये कर्म इसी लोक में फलाफल देने के लिए थे।

'शुद्र यदि वेदाध्ययन या यज्ञ कराने लगे तो यह परधर्म होगा।' वज्रनख ने भी चुप रहना ठीक नहीं समझा। 'विषयचिंतन करते हुए दिखावटी इन्द्रिय-निग्रह दम्भ है! धूम्रपान को भी यज्ञ कहने - जैसी व्याख्या छल है। गृहस्थ जीवनाश के भय से हवन भी छोड़ दे तो ऐसे कर्म विधर्म होंगे। सन्यासी संग्रह करके अत्तिथिसत्कार में लगे तो यह धर्माभास ही होगा।' लगे हाथ उन्होंने पाँचों अधर्म-शाखाओं का भाष्य कर दिया।

'अन्न न मिले तो उपवास पुण्यप्रद न होगा।' ह्रस्वांग ने अपने लिए सीधा स्थान ही चुना। 'किसी के मुख में बलात् मांस डाल देने से वह मांसाहार का अपराधी भी नही बनेगा।'

'पागल, पशु और शिशु किसी कर्म से युक्त नहीं होते।' यही सबसे कठिन स्थल था। 'किन्तु बुद्धिमान पुरुष भी आसक्ति न रखकर कर्म करेगा और उसके फल का भागी न होगा - बड़ा टेढा प्रश्न है। ऐसे पुरुष का निर्णय कैसे होगा?' सबसे वृद्ध बृहदोदर ने मुख्य प्रश्न उठाया। इसी के निर्णयार्थ तो यह गोष्ठी बैठी थी। शेषांश तो निर्णीत ही थे। उन पर कुछ न भी कहा गया होता तो क्या हानि थी।

'म्याँऊँ का ठोर' कौन पकड़े। सभी निस्तब्ध हो गये। किसी के पास कोई उत्तर नहीं था।

'चलो अनुभूति के क्षेत्र में!' वक्रतुण्ड अपने व्यंग पर स्वयं दुखित हो गया।

'वहाँ भ्रान्ति हो तो दण्ड तो धरा ही है।' ह्रस्वकाय ही दण्ड से सबसे अधिक डरा करता था।

'दण्ड ही शिक्षा है!' महाहनु ने धर्मराज के शब्द दुहरा दिये। 'सच्ची बात तो यह है कि अनुभव की अपेक्षा अपने नायक का मोटा दण्ड ही हमें अधिक ज्ञान देता है।' जब बुद्धि कोई मार्ग नहीं पाती तो अन्तर या तो झुंझला उठता है या शून्य अट्टहास में परिस्थिति की गम्भीरता को उड़ा देने का व्यर्थ यत्न करता है।

'महाराजाधिराज श्रीधर्मराज.................।' अग्रचर का उच्च स्वर कानों में पड़ा। सम्भवत: आज धर्मराज स्वयं किसी विशिष्ट पुरुष को अपनी पुरी दिखलाने उठ पड़े थे। 'महाराज इधर ही आ रहे हैं।' दूतों ने शीघ्रतापूर्वक अपने पाश एवं दण्ड उठाये और अस्त-व्यस्त मर्त्यलोक को ओर चल पड़े।
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'इनका क्या होगा?' एक संड-मुसंड दिगम्बर पड़े थे, एक छोटी-सी नदी के किनारे यों ही घास पर। खूब परिपुष्ट शरीर था और इतना मैल उस पर जम गया था कि मानो वर्षों से स्नान न किया हो। सिर के बढे बाल उलझ गये थे। श्मश्रुजाल में तिनके एवं धूलिभरी थी। हाथ, पैर के नख खूब बढ गये थे। उनके मुख पर एक ज्योति थी और नेत्र अर्धमुंदे हो रहे थे।

'इसने तो एक ओर से सभी कर्मों का त्याग कर दिया है।' वक्रतुण्ड ने महाहनु के उत्तर में कहा। 'भोजनादि छोड़ा तो है नहीं, कोई लाकर खिला दे तो चाहे जो भी खा लेता है। खाद्याखाद्य का कोई विचार नही। विधि-निषेध का तनिक भी ध्यान नहीं। पकड़ ले चलो! इस प्रकार के कर्महीन तमोलोक के अतिरिक्त और कहां
जायेंगे।'

'मुझे तो रंग-ढंग और ही दिखायी पड़ते हैं। यह आनंद, यह मस्ती और मुख का यह तेज!' महाहनु ने प्रतिवाद किया। 'मुझे तो अजामिल के समय की मार अब भी कंपा देती है। दुष्कर्मियों के लक्षण तो इनमें हैं नहीं। मैं तो साहस नहीं करता आगे बढ़ने का।'

'पुण्यात्मा सही। ले चलो फिर भव्यरूप रख कर।' झल्ला पड़ा वक्रतुण्ड। 'अन्ततः समय तो इनका हो ही गया है और ले चलना ही होगा किसी रूप में।'

'पुण्य भी कहाँ हैं इनके पास!' बृहदोदर ने खिन्न होकर कहा। 'आज अपने सब-के-सब साक्षी मूक हो गये हैं। इनके मन और बुद्धि का तो कोष ही रिक्त पड़ा है।' आश्चर्य था स्वर में।

'राजा के कर्म का षष्ठांश, गुरु के कर्मों का दशमांश और शिष्य के कर्म का दशमांश, माता-पिता के कर्मों का भी कुछ भाग।' महाहनु विस्मित हो रहे थे। मान लिया कि ये गृहस्थ नहीं। पत्नी और पूत्र के कर्मांश इन्हें आबद्ध नहीं करते। सम्भव है गुरु न किया हो और न किया हो कोई शिष्य। माता-पिता के बिना आकाश से टपके न होंगे। किसी न किसी राजा का ही राज्य होगा यह इनके कर्मों का अंश भी यहां क्यों उपलब्ध नहीं होता?'

'समस्या सीधी नहीं है।' बृहदोदर ने गम्भीरता से कहा। तीन ही यमदूत इधर आये थे। साक्षी मौन हैं। मन और बुद्धि को छोड़ दें तो संस्कारात्मक चित्त ही ढूंढे नहीं मिलता। अब इन्हें ले भी चलें तो किस रूप में?' यमदूतों की दृष्टि दूर से ही प्रत्येक के अंत:प्रदेश को साक्षात् कर लिया करती है।

'एक उपाय है' वक्रतुण्ड ने सबको किञ्चित् आश्वस्त होने का अवकाश दिया। 'हम इनके सम्मुख प्रत्यक्ष हो
जायं। अपने आप निर्णय हो जायगा कि हम इन्हें ले चलें या यहाँ से नौ-दो ग्यारह हों।' बात यह है कि धर्मराज ने उन्हें बता रखा था कि तुम्हें देखकर भी यदि कोई भयभीत न हो तो समझ लेना कि यह तुम्हारे अधिकारक्षेत्र से परे का जीव है। उसके सम्बन्ध में मुझे सूचना दे देना। जो तुम्हें देखकर भयभीत हो जाय - बस, उसी के सम्बन्ध में तुम्हें विचार करना है।

'यदि कोई समर्थ हुआ' चौोककर महाहनु ने सुझाया, 'कहीं दुर्वासा की भांति क्रोधी भी हो साथ ही? लेने-के-देने
पड़ जायेंगे केवल सम्मुख प्रत्यक्ष होने में।'

'अन्ततः इनके कर्म हो क्या गये?' कर्म छूमन्तर तो हुआ नहीं करते और सृष्टि में आकर कोई निष्कर्म रह नहीं सकता। ये अनासक्तकर्मी होंगे। जो थोड़ा बहुत भोजनादि कर्म करते भी हैं, उसमें इनकी आसक्ति नहीं है।' वक्रतुण्ड सम्मान करने लगा था महापुरुष का।

'अनासक्ति फलोत्पादन नहीं करती, ऐसी बात तो है नहीं।' बृहदोदर ने धर्मराज के उपदेश पर ही शंका उठायी। 'कर्म होगा तो उसका परिणाम भी होगा। विश्व में कुछ नष्ट तो होता नहीं। यह परिणाम कर्ता को स्पर्श नहीं करते तो होते क्या हैं?'

'उँह, पशुओं एवं उन्मत्तों के कर्मफल क्या होते हैं?' महाहनु हँस पड़ा सहचर के अर्थशून्य तर्कपर। प्रश्न तो यहां है कि अनासक्त भाव से किया कर्म फल भले न उत्पन्न करे; किन्तु अनन्त अपार सञ्चित, रागादि के कर्मांश का वह नाश तो नहीं करता। इनके सञ्चित और इनके भाग के इतरजनों के कर्मांश का क्या हुआ?'

यह विवेचन चल ही रहा था। एक क्षण के लिए दृष्टि हट गई थी तीनों की महापुरुष पर से। दूसरे क्षण उधर उन्होंने देखा और हक्के-बक्के हो रहे। अधखुले नेत्र पूरे बंद हो गये थे। केवल स्थूल शरीर घासपर पड़ा था। इधर-उधर, ऊपर-नीचे, सब कहीं देख डाला - सूक्ष्म शरीर या कारण शरीर का पता नहीं था। इनसे पृथक जीव की कल्पना उन्होंने कभी नहीं की।

'महाराज से शीघ्र निवेदन कर देना चाहिये। भागे वे संयमनी की ओर। उन्हें कौन बतावे - 'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति।' वे किसी को सुनने को रुक भी कहाँ सकते थे।
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'जिनके अन्त:करण के किसी कर्म-संस्कार की उपलब्धि न हो, उनसे तुम्हें मतलब भी क्या है।' वही संयमनी, वही धर्मराज और वही यमदूत। विवश धर्मराज आज फिर अपने दुतों को समझा रहे थे। झल्ला भी रहे थे इन अज्ञ दूतों पर।

'हमने कान पकड़ा। झांकेंगे भी नहीं ऐसे महापुरुषों की ओर।' बड़ी दीनता थी महाहनु के स्वरों में। 'एक जिज्ञासामात्र की हमने। यदि प्रभु अधिकारी समझें......।'

'स्कटिक या कमलपत्र को देखा है?' धर्मराज ने कुछ शान्त होकर पूछा।

'उसपर कीचड़ या जल लिप्त नहीं होता।' वक्रतुण्ड ने आशय समझ लिया था। 'स्पर्श करके भी गिर जाता है।'

'ठीक इसी प्रकार ज्ञानादि साधनों से विशुद्ध चित्तपर कोई संस्कार ठहरता नहीं।' धर्मराज ने उपदेश को यथा सम्भव संक्षिप्त करने का प्रयत्न किया।

'तब उस संस्कार का होता क्या है?' बृहदोदर ने शंका का उत्तरार्ध उत्थित किया 'क्या उसका नाश हो जाता है?' वह जानता है कि विश्वात्मा की सृष्टि में विनाश-जैसा कोई शब्द है ही नहीं। वहाँ केवल रुपान्त्र मात्र होता है।

'शुभांश सेवक एवं शुभचिंतकों में तथा अशुभांश उत्पीड़क एवं निन्दकों में वितरित हो जाता है।' धर्मराज ने बड़े मजे से कह दिया। उनके प्रेमाकर्षण या द्वेषाकर्षण की तीव्रता या लघुता के अनुसार।'

'अजामिल के पास से तो गये नहीं थे।' कहीं से आकर ह्रस्वकाय भी पीछे खड़ा हो गया था। सुनन्द के गदाघात का चिन्ह अभी भी उसके भालपर बना हुआ था। उसका समाधान उस दिन के धर्मराज के उपदेशों से हुआ नहीं था।

'तू तो पूरा बच्चा है।' धर्मराज मुसकरा पड़े। न्यायाधीश के कठोर मुख पर हास्य भी भयभीत होकर ही आता है। 'तुझे बता तो दिया कि मेरे नियम मेरी अधिकार सीमा तक ही हैं। जो मेरे और सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं, उनके जनों के सम्बन्ध में नियम निर्धारण करना मेरी शक्ति से बाहर है। वहां नियम की ओर न देखकर तुम्हें केवल इतना ही देखना है कि जीव किस प्रकार प्रभू के नाम,रूप, गुण, लीला, धामादि से तनिक भी सम्बन्धित तो नहीं है? ऐसा होने पर उधर का मार्ग ही छोड़ दो।'

'जी हमने उधर का मार्ग ही छोड़ दिया आज।' पता नहीं कहाँ से हँसते हुए देवर्षि नारद खड़ाऊँ खटकाते, वीणा लिए, खड़ी चुटिया फहराते आ धमके। 'सोचा कि भक्तराज को 'जय गोविन्द' करते चलें। नहीं तो जाना तो था कैलाश।'

दूत एक ओर खिसक कर दण्डवत् करने लगे। धर्मराज हड़बड़ाकर उठे और उन्होंने भी पृथ्वी में लेटकर मस्तक देवर्षि के पद्मारुण पदों पर रखा।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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