Best अष्टपद Stories, Video, Quotes, Shayari, Poem, Jokes, Songs, Music On Nojoto

Read Stories about अष्टपद. Also Read about अष्टपद Quotes, Shayari about अष्टपद, अष्टपद Poetry, Poetry on अष्टपद, Poem about अष्टपद, Stories about अष्टपद, Whatsapp Status about अष्टपद, अष्टपद Whatsapp Status, अष्टपद Message, Post about अष्टपद, अष्टपद Post, Post on अष्टपद, Quotes on अष्टपद, Quotes about अष्टपद, अष्टपद Shayari, Shayari on अष्टपद, Poetry about अष्टपद, अष्टपद Poem, Poem on अष्टपद, अष्टपद Stories, Stories on अष्टपद, अष्टपद Jokes, अष्टपद Memes, अष्टपद Songs, अष्टपद Video, Whatsapp Status on अष्टपद, Message about अष्टपद, Message on अष्टपद, Stories, Video, Quotes, Shayari, Poem, Jokes, Songs, Music On Nojoto

Feedback & Ideas

Feedback & Ideas

X

How was your experience?

We would love to hear from you!

अष्टपद

  • 1 Followers
  • 13 Stories
  • Latest Stories
  • Popular Stories

श्री हरिः
5 - सच्ची पुकार

'तुम प्रार्थना करने आये थे अल्फ्रेड?' सभ्यता के नाते तो कहना चाहिये था, 'मि० वुडफेयर' किंतु विल्सन राबर्ट में जो सहज आत्मीयता है अपने अल्प परिचितों के प्रति, उसके कारण वे शिष्टाचार का पूरा निर्वाह नहीं कर पाते और न उसे आवश्यक मानते हैं।

उसका पूरा नाम है अल्फ्रेड जॉनसन वुडफेयर। चौंककर उसने पीछे मुड़कर देखा। समुद्र किनारे के इस छोटे से गांव में उसे जानने वाला, उसका नाम लेकर पुकारने वाला कौन है? उसे यहाँ आये अभी दो ही सप्ताह तो हुए हैं और एक खेतों में फसल काटने वाला मजदूर क्या इस योग्य है कि उसे लोग जानें और इतने स्नेह से नाम लेकर पुकारें।

'ओह आप हैं।' अल्फ्रेड पूरा पीछे घूम गया और उसने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। विल्सन से उसका घनिष्ठ परिचय है, यह तो वह नहीं कह सकता, किंतु इस अलमस्त घुमक्कड़ से कई बार पहले भी वह मिल चुका है। कई बार जब वह अपनी नौकापर समुद्र में मजदूरी करने निकला - विल्सन की नौका उसे मिली है। एक बार तूफानी रात्रि में विल्सन उसकी झोपड़ी में अतिथि रह चुका है।

'मैं जानता था तुम यहाँ आओगे। अन्ततः आये न।' विल्सन उसके बराबर आ गये हंसते हुए और उसका हाथ पकड़कर गिरजाघर की सीढियां उसके साथ ही उतरने लगे। 'मनुष्य कैसा भी हो, कोई भी हो, अपने पिता के सामने आये बिना रह कैसे सकता है।'
वह देखता रहा इस सुसज्जित सम्मान्य यात्री को। यात्री - विल्सन यात्री ही तो है। वे क्या करते हैं, कहाँ रहते हैं, यह सब तो वह जानता नहीं। जानता केवल इतना है कि वे सम्पन्न होने के साथ अत्यंत उदार हैं और पर्यटन का उन्हें व्यसन है। इस गांव में भी वे घूमते-घामते ही आ निकले होंगे। रविवार को प्रार्थना करके गांव के अधिकांश वृद्ध स्त्री-पुरुष, जिनके साथ घरों के बालक भी हैं, गिरजाघर से बाहर आ रहे हैं। बहुत थोड़े गिने-चुने युवक प्रार्थना करने आते हैं, युवतियां उनसे कुछ ही अधिक आती हैं। तारुण्य का गर्व जब शिथिल पड़ने लगता है, तभी तो मनुष्य में, जीवन के उस पार भी कुछ है, यह झांकने की समझदारी आती है।

'लेकिन अल्फ्रेड! मैं भूलता नहीं हूँ तो केवल बीस दिन पूर्व हम यहां से पर्याप्त दक्षिण समुद्र के वक्ष पर मिले थे।' विल्सन को इसकी चिंता नहीं जान पड़ती कि उनके जैसे मूल्यवान उज्ज्वल वस्त्रधारी को एक मजदूर का हाथ पकड़कर चलते देख पास से जाने वाले वृद्ध और वृद्धाएं किस प्रकार देखते हैं, किस प्रकार मुख सिकोड़ते हैं और परस्पर फुसफुसाकर क्या कहते हैं?

'तब मैं गोता लगाने को प्रस्तुत हो रहा था।' अल्फ्रेड ने इतनी देर बाद बोलना आवश्यक समझा। 'वही समुद्र में मेरा अंतिम गोता था और फिर जब मैं चल सकने योग्य हुआ, सीधे गिरजाघर पैदल चलकर गया। यद्यपि बहुत कष्ट हुआ उस दिन मुझे चलने में, किंतु बहुत आनंद भी मिला मुझे। प्रार्थना तो उसी दिन मैंने की। अब तो लकीर पीट लेता हूँ।' वह पता नहीं क्या और कितनी बातें एक साथ बता जाना चाहता था, लेकिन उस दिन की प्रार्थना का स्मरण करके ही उसके नेत्र भर आये थे रूमाल निकाल कर खांसने का बहाना बनाया उसने और मुख को एक ओर घुमा लिया।

'मैं तुम्हारे साथ चल रहा हूँ। आज तो विश्राम का दिन है।' विल्सन ने आमंत्रण की अपेक्षा नहीं की। जो व्यक्ति केवल बीस दिन पहले धर्म और आस्तिकता की बात सुनकर ठठाकर हंस पड़ता था, जिसे सुरा....... जाने दीजिए, किसी के दोषों का वर्णन भी दोष ही है। इतना जाना पर्याप्त होना चाहिए कि अल्फ्रेड 'खाओ, पियो, मौज उड़ाओ' के नियम को मानकर चलने वाला था। वह मृत्यु से संग्राम करके अपनी जीविका प्राप्त करता था और उसे अपने उल्लासों को प्राप्त करने के लिए व्यय करने में संकोच नहीं था। वह कहा करता था - 'धर्म तो कायर और अश्को लोगों के मन को संतोष देने का बहाना है।' गिरजाघर वह क्यों जाय, जब कि वह उन भव्य भवनों को जीवन संग्राम में थके अपंग लोगों के मिथ्या आश्वासन प्राप्त करने का स्थान मानता है। वही अल्फ्रेड किसी दिन की प्रार्थना का स्मरण करके गद्गद हो उठे, बिना किसी विशेष घटना के यह कैसे सम्भव है। लेकिन यहाँ मार्ग में कुछ पूछना शिष्टता नही होगी।

'आप मेरे यहाँ चलेंगे?' अल्फ्रेड ने मुख घुमाकर देखा। 'अब मशीनों ने खेत में काम करने वाले घोड़ों के अस्तबल खाली कर दिये हैं। बाहर से आये मजदूरों के साथ मुझे खेत के स्वामी ने कृपा करके उनमें से एक छोटा स्थान ठहरने को दिया है।'

'मेरे मित्र! मैं भी मनुष्य हूँ - ठीक तुम्हारे समान मनुष्य।' विल्सन ने उसके कंधे को थपथपा दिया। 'जब परमात्मा प्रत्येक स्थान पर है, हमें कहीं जाने में संकोच क्यों होना चाहिए?'

(2)
'नित्य की भांति मैं उस दिन भी समुद्रतल में उतरा।' अल्फ्रेड बिछी हुई घास पर बैठा था और उसके पास ही विल्सन बैठे उसी की ओर देख रहे थे। 'मेरे दोनों सहकारी बहुत सावधान और अपने कार्य में कुशल थे। लेकिन गोताखोर तो प्रत्येक गोते के समय मृत्यु के मुख में ही उतरता है और उसे केवल अपनी स्फूर्ति, प्रत्युत्पन्न बुद्धि तथा सतर्कता पर निर्भर करना पड़ता है।'

अल्फ्रेड मजदूर बनने से पहले - अभी बीस दिन पहले तक समुद्री गोताखोर था। समुद्र के गहरे तल में उतरकर मोती सीप उठा लाना ही उसका व्यवसाय था। सीप में मोती है या नहीं, यह बात तो ऊपर आकर देखने की होती है। समुद्रतल में तो यथाशीघ्र जो सीप मिलें, उन्हें समेटकर ऊपर आ जाना पड़ता है।

'मौसम अच्छा था। ऊपर चमकीली धूप निकल रही थी। जल के भीतर पर्याप्त दूरी तक इतना प्रकाश था कि मैं अपने आसपास दौड़ती-भागती छोटी-बड़ी मछलियों तथा तल प्रदेश की अद्भुत लताओं को सरलता से देख सकता था।' अल्फ्रेड बता रहा था - 'समुद्रतल में जो सृष्टिकर्ता ने उपवन लगा रखा है - कहीं-कहीं तो तल-प्रदेश के पौधे, घासें और लगाएं अद्भुत सुंदर हैं। उस दिन मैं ऐसे ही एक मनोहर समुद्री उद्यान में उतर पड़ा था।'

'वहां उद्यान-सौंदर्य देखने जितना अवकाश और धैर्य रहता है?' विल्सन ने बीच में पूछ लिया - 'भय नहीं लगता?'

'हमें सावधान रहना पड़ता है और शीघ्रता रहती है।' अल्फ्रेड तनिक हंसा - 'लेकिन जो डरेगा, वह गोताखोर नहीं बन सकेगा और उद्यान को तो अपने बचाव के लिए सावधानी से देखते रहना पड़ता है, क्योंकि हमारे सबसे भयंकर शत्रु उन पौधों में ही किसी पौधे के समान बने छिपे रह सकते हैं।'

'मुझे घोंघे बहुत दीखे और छोटे-बड़े, रंग-बिरंगे जीवित चलते-फिरते शंख भी अधिक थे।' वह अपनी मुख्य बात पर आ गया। 'लेकिन आप जानते हैं कि मैं घोंघे या शंख निकालना एकदम पसंद नहीं करता। मेरे अद्भुत वेश के कारण और अपने बीच में मुझे अचानक आया देख मछलियों में हलचल मच गई थी। उनमें से अनेक मुझसे बार-बार टकरायी। भय का कोई कारण नहीं था, क्योंकि मैं जानता था कि समुद्री सिंह (शार्क) इस समुद्र में बहुत थोड़ी हैं और उनके मिलने का समय दूसरा ही होता है।'

'मुझे धीरे-धीरे उतारा गया था। नीचे पहुंच कर मैं खड़ा हो गया और झुककर कुछ सीपों को मैंने अपने झोले में झट से डाल दिया।' विल्सन उत्सुकता से उसकी बातें सुन रहे थे। 'मैं बहुत प्रसन्न था, वहाँ पर्याप्त सीपें थी। आज का गोता मुझे पर्याप्त रकम दे देगा। सहसा ऐसा लगा कि कोई कोमल गिलगिली वस्तु दाहिने पैर में लिपट गई है। मैं चौंका, बायें हाथ का चाकू दाहिने में लेकर झुक गया। अष्टपद के दो पैर मेरे चाकू ने काट दिये। इसी समय मुझे कसकर झटका लगा।'

'अष्टपद - समुद्र का सबसे भयंकर प्राणी और गोताखोरों का सबसे बड़ा शत्रु।' अल्फ्रेड सिहर उठा - 'वह किसी भी चट्टान पर एक पौधे के समान जमा बैठा रहेगा या चट्टान के नीचे छिपा रहेगा। पता नहीं किस चट्टान के नीचे से निकल कर एक भयानक अष्टपद ने अपनी सूंड जैसे पैर मेरी कमर और कंधे में लपेट दिये थे। उसकी दोनों आखें मेरी आंखों के सामने चमक रही थी और वह दुष्ट अपनी चोंच मेरे मुख के पास ला रहा था। मेरे मुख से भय के कारण चीख निकल गई।'

'जैसे हाथी किसी बालक को सूंड में पकड़कर झटके दे।' अल्फ्रेड दो क्षण रुक गया और फिर बोला - 'वह दारुण मांसाहारी प्राणी मेरा मनोभाव समझ गया था। जब मैं अपना हाथ ऊपर समाचार देने वाली रस्सी खींचने को बढ़ाता था, वह मुझे भयंकर झटका देता था। मेरे मुख पर लगा भारी नकाब खिसक पड़ता था। मुझे भय था कि कहीं प्राणदायिनी वायु-नलिका (आक्सीजन ट्यूब) टूट न जाए। मेरा मुख और नाक स्थान-स्थान से नकाब की रगड़ से छिल गये। उनमें असह्य वेदना होने लगी। बार-बार नकाब ठीक करने को मैं विवश हो रहा था और कहीं भी तलभूमि पर पैर नहीं जमा पाता था।'

'अष्टपद ने मुझे एक और झटका कसकर दिया। मेरा पूरा ललाट और कपोल छिल गये। नकाब कंधे पर खिसक आया। मेरी नाक से कुल चार इंच दूर मुझे अष्टपद के क्रूर नेत्र चमकते दीखे। उसकी चोंच - उसकी रक्त पिपासु चोंच निकट आ रही थी।' दीर्घश्वास ली अल्फ्रेड ने - 'नकाब ठीक करने का समय भी, नहीं रह गया था। मैं निराश हो गया था। भय के कारण चीख पड़ा मैं - 'हे भगवान!' और फिर मुझे पता नहीं क्या हुआ। मेरे नेत्रों के आगे अंधकार छा गया।'

(3)
'मिस्टर विल्सन! एक बात अबतक मेरी समझ में नहीं आती।' अल्फ्रेड ने बीच में दूसरी बात कही - 'मुझे ठीक-ठीक स्मरण है कि अष्टपद के पहले ही झटके में चाकू मेरे हाथ से छूट कर गिर गया था। दुष्ट अष्टपद मुझे कई झटके - बीसों झटके बाद तक देता रहा। उसके वे पैर जो मेरी कमर और कंधों को पकड़े थे, काटे कैसे गये?'

'यह तुम्हारे सहायक की तत्परता होगी।' विल्सन ने कहा।

'मेरा सहायक बहुत सावधान है। उसी की सावधानी ने मेरे प्राण बचाये। वह कहता है कि यद्यपि समुद्रतल से उसे कोई संकेत नहीं मिला था, किंतु अपेक्षित समय से अधिक देर लगते देख उसे आशंका हो गई और वह स्वयं नीचे उतर पड़ा।' अल्फ्रेड ने कहा - 'मैंने उससे बार-बार पूछा है। वह कहता है कि उसने मुझे मूर्छित पाया। मेरी नकाब उसने ठीक की। मेरी कमर और कंधे में अष्टपद के पैर ऊपर आने तक लिपटे थे, किंतु वे कटे हुए पैर थे। भारी अष्टपद सब पैरों के कट जाने से मेरे पैरों के पास ही समुद्रतल में तड़फड़ा रहा था।'

'तुम्हारा छूरा तुम्हारे सहायक को मिला?'

'आप कहना चाहते हैं कि मूर्छित होते-होते मैंने ही अष्टपद के पैर काट दिये थे?' अल्फ्रेड ने मुख उठाकर देखा - 'मिस्टर विल्सन! मेरी स्मरण-शक्ति गोताखोर की स्मरण शक्ति है। गोताखोर का ह्रदय, मस्तिष्क और स्नायु असाधारण पुष्ट होते हैं। मेरा छूरा मेरे सहकारी को मिला ही नहीं। वह तो अब भी समुद्रतल में पड़ा होगा।'

'तुमने अभी बताया है कि तुमने मूर्छित होते-होते कहा था 'हे भगवान!' विल्सन के स्वर में दृढ़ता और विश्वास था।

'और भगवान ने मेरी रक्षा की!' अल्फ्रेड के नेत्र भर गये - 'सचमुच भगवान ने ही मेरी रक्षा की मि० विल्सन। मैं इतना घायल हो गया था कि छूरा मेरे हाथ में होने पर भी मैं कुछ न कर पाता। मैं अपने सहकारी द्वारा जब ऊपर लाया गया, तब मेरा मुख रक्त से लथपथ था। पूरे तीन दिनों बाद मैं उठकर चलने योग्य हुआ और तब सीधे गिरजाघर गया।'

'भगवान तो सुनते हैं और रक्षा भी करते हैं, किंतु - ' विल्सन रुके दो क्षण - 'किंतु हम मनुष्य इतने भाग्यहीन हैं कि प्राण-संकट में भी वे दयामय हमें स्मरण नहीं आते। उस समय भी हम अपने उस कृपालु पिता को पुकार नहीं पाते।'

'मैं नित्य पुकारता हूँ, प्रतिदिन पुकारता हूँ, तब से दो रविवार मात्र पड़े हैं और दोनों को गिरजाघर प्रार्थना करने गया हूँ।'
अल्फ्रेड ने बहते आंसू पोंछने का कोई प्रयत्न नहीं किया - 'किंतु मेरे मित्र! अब मेरी पुकार वे दयालु पिता क्यों फिर नहीं सुनते?'

'वे सुनते हैं - सुनते तो हैं, पर जब पुकार सच्ची हो।' विल्सन ने दीर्घ श्वास लेकर कहा - 'वह समुद्रतल की तुम्हारी पुकार - बस, वैसी सच्ची पुकार वे सुनते हैं।'

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

4 Love
0 Comment
×
add
close Create Story Next

Tag Friends

camera_alt Add Photo
person_pin Mention
arrow_back PUBLISH
language

Language

 

Upload Your Video close