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बैठे

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बहू के घर पर होते हुए हेल्पर क्यों..??
     प्रिया ने आज जैसे ही झाड़ू हाथ पर लिया तभी मेरा 3 साल का बेटा झट से बोला "बुआ वह झाड़ू वही रख दो यह मम्मी का है.."
बेटे की यह बात सुनकर अचानक मेरे दिल में यह खयाल आया की इतना छोटा बच्चा भी यह समझने लगा है कि कौन से काम मम्मी के हैं और कौन से दुसरो के... 
     मैं किचन में खाना बना रही थी. फटाफट बाहर के सारे काम निपटा कर, किचन का भी बाकी बचा हुआ काम कर मैं सबको ब्रेकफास्ट करवाने लगी. सबके टिफ़िन पैक करने थे. मुझे भी ऑफिस के लिए तैयार होना था. हड़बड़ी में ही मैंने बेटे को खाना खिला के स्कूल के लिए तैयार किया. टिफिन पैक कर बस तक छोड़ आई.
     इनको भी तैयार कर टिफ़िन दिया, अपनी ननद प्रिया और देवर को भी लंचबॉक्स पकड़ा दिया. अपना भी टिफिन लेकर, मैं रूम पर जाकर जल्दी जल्दी तैयार होने लगी. 
मुझे पहले ही देर हो चुकी थी मैं आज भी नाश्ता नहीं कर पाउंगी. आतुरता में मैं ऑफिस बस पकड़ने को दौड़ी.
  बस में बैठते ही एक लंबी सांस ली और भगवान का धन्यवाद किया की समय पर पहुंच गई, नहीं तो प्राइवेट के लिए भी फिर बस स्टॉप तक भागना पड़ता.
     थक जाती हूं सुबह 5:00 बजे से 9:00 बजे तक बिना रुके लगातार की भागदौड़ में. खुद के लिए एक पल का भी समय नहीं मिलता. ना नाश्ता कर पाती हूं ना ठीक से तैयार ही हो पाती हूं.
        मैं सोचने लगी एक कामकाजी औरत के लिए ससुराल में रहकर जॉब करना एक बहुत ही मुश्किल काम है. मैं बस में बैठे बैठे अपने ही खयालो में डूबने लगी... सुबह उठते ही झाड़ू- पोछा फिर खाना बनाना, सब की चाय सबके टिफिन पैक करना और ब्रेकफास्ट करवाना बच्चे  को तैयार करना फिर पति को तैयार करना. खुद के लिए तो टाइम ही नहीं बचता... और फिर बस स्टॉप तक भागना. इस भागदौड़ में तो समय का पता ही नहीं लगता कि कब 4 घंटे बीत गए.
       सुबह इतनी व्यस्तता को देखते हुए, घर पर मैंने सुझाव भी दिया था कि एक हेल्पर रख लेते हैं. वो थोड़ा बहुत झाड़ू पोछा और बर्तन भी कर दे तो बाकी मैं सब संभाल लूंगी. तब सासु मां बोली  इतने लोगों के घर पर होते हुए हेल्पर की क्या जरूरत है...?? 
    परंतु जब सुबह हेल्प करनी होती है तब कोई अपने रूम से अपने बिस्तर से बाहर निकलने को तैयार नहीं होता. तब मैं अकेले ही सुबह से सारे काम निपटाती हूँ.
    चाहे कैसे भी हो मुझे वह सारे काम 9:00 बजे तक करने ही होते हैं. अगर ना भी करके जाऊं तो शाम को लौट कर भी मुझे वह सभी काम जैसे मैं छोड़ कर गई थी वैसे ही मिलते हैं. जस के तस..
मुझे वह आ के करने हीं होते हैं इसीलिए सुबह  जल्दी जल्दी कर लेती हूँ.
   हेल्पर रखने के तो पैसे देने पड़ेंगे और मैं तो यहां फ्री में सब करती हूं तो कोई हेल्पर क्यों रखना चाहेगा. सासु मां का मतलब साफ था कि इतने लोग के होते हुए... मतलब की बहू के होते हुए हेल्पर क्यों रखे..??
     ना जाने बहू को क्या  समझा है.. जो भी समझा है वो तो बच्चा बच्चा जान गया है. तभी इतना छोटा बच्चा आज ऐसी बात बोल गया. अभी इतनी छोटी सी उम्र में ही उनकी यह मानसिकता बना दी जाती है. जैसा वह देखते-सुनते हैं वही सोच में परिवर्तित होता जाता है. बड़े होते होते वह भी हमारे समाज की सोच का एक हिस्सा बन जाते हैं.
     हमारे समाज के इस रवैय्ये से केवल महिलाएं परेशान होती हैं. लेकिन सिर्फ परेशान होना ही काफी नहीं है. इस स्थिति को बदलना अत्यंत आवश्यक है. छुटपन-बचपन से ही हमें शुरुआत करनी होगी. तभी बच्चे जब बड़े होकर हमारे समाज की सोच का एक हिस्सा बनेगे तो समाज में क्रांति आएगी.
       अगर यही सब चलता रहा और यही मानसिकता बनी रहेगी तो महिलाओं की हालत कभी नहीं सुधर सकती और वे ऐसे ही दुनियाँ का सबसे सस्ता मजदूर बनके प्रताड़ित होती रहेंगी..
   

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13 hours ago

बुला कर ,बेइज्जत करना
 खता क्या इसमें
है हॉस्टल वाले
नया क्या इसमें।।
कभी होश ,तो कभी मदहोश
हो जाते है
जन्मदिन आता है न
तो बेहोश हो जाते हैं।
जमीर का जगना क्या
शाम होते ही ढल जाता है
साथ मिलता जब ऐय्याशों का तब
अपना अपनों को भूल जाता हैं।।
कहानी नही,जो सुन कर 
भूल जाना तुम 
हकीकत है,जिंदगी भर बोझ उठाना तुम।।
गलत तू नही,हम भी है
बिना सोचे तेरी बात समझ बैठे थे
अरे वो दोस्त ही तो था
उसे अपनी-जान समझ बैठे थे।।

मैं और मेरे अपने...
मैं@मेरे#अपने%हॉस्टल वाले।।

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अजीब फलसफा है इस जीवन का ऐ "अनिता"
कई लोग यहां अजीब सा मुखौटा  लगाए बैठे है,
अंदर से कितने आंसू पीकर भी ,
 औरो को दिल से हंसाएं बैठे हैं।

 

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आखिरी किरण की नुमाइश  लगाए बैठे ...
वक़्त को थाम कर..
उम्मीद लगाए बैठे...
तमन्ना तो थी ज़िद्द पर aडे रहने की
हम फिर भी नाकाम कोशिश लगाए बैठे ..
अब चलना उसकी फितरत
आगे बढ़ना उसका जुनून
डूब कर बेनजर हो जाना 
फिर कही ओर निकल जाना 
उसका सुकून

हम यू ही उम्मीद लगाए बैठे...........

 #NojotoQuote

 

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Rishton ki naajuk door...
काफी समय से अदिति और सौरभ के बीच मनमुटाव चल रहा था. करीब एक महीने से भी ऊपर हो गया था, ठीक से बात भी नहीं हो रही थी. आज झगड़ा खत्म करके दोनों एक दूसरे से माफी मांग चुके थे. इसलिए आदिति बहुत खुश है. परंतु यह खुशी कितनी देर की है यह नहीं कहा जा सकता.
अक्सर अदिति और सौरभ के रिश्ते में तकरार होती रहती है, जोकि हर पति-पत्नी के रिश्ते में होती ही है. लेकिन इनका रिश्ता बहुत उतार-चढ़ाव से गुजरा है और फिर लड़ाइयां तो हर दूसरे दिन का ड्रामा है. कुछ दिन सब सामान्य हो जाता है. चार दिन बाद फिर वही दोहराया जाता है.
अदिति अपने रिश्ते को ले के और अपने पति से बहुत परेशान-हताश सी हो गई थी.

अदिति बैठे-बैठे सोचने लगी,आज ऐसा लग रहा है मानो सर से कोई भारी बोझ हट गया है. आज तो सब ठीक है. दो दिन तो प्यार से रहेंगे... फिर न जाने कल क्या होगा, न जाने कौन सी बात पर यह चिढ़ जाएं और कोई नया ड्रामा शुरू कर दे... फिर तो महीने भर तक मुंह फुला ही रहेगा.

शादी को पांच साल होने को हैं.जो समय पति पत्नी के लिए बहुत ख़ास होता है.. जब वो ये समय एक-दुसरे को समझने,प्यार जताने और अपनी भवनाओ का एहसास दिलाने में बिता देते हैं. लेकिन तब हमने इस कीमती समय को बस इन्हीं लड़ाई-झगड़ों में ही खत्म कर दिया.

पता भी नहीं लगा और शादी के पांच साल गुजर गए. शादी के बाद का समय जिसके लिए हम वर्षों से अरमान सजाते है. चाहत होती है की शादीशुदा ज़िन्दगी में प्यार ही प्यार होगा.. जिसमें हम पति से बहुत ज्यादा उम्मीदें करते हैं. वो एक ऐसा समय होता है, जहां उस वक्त हमारे रिश्ते में प्यार बहुत ज्यादा मायने रखता है... पर मेरी लाइफ में ये प्यार आने से पहले ही खत्म हो गया. मेरी ज़िन्दगी से "प्यार" नाम जैसे खो सा गया है. शादी के बाद प्यार और रोमांस ऐसे शब्द जुबान पे तो दूर जिंदगी में ही नहीं आए कभी ...

क्या प्यार रोमांस वह सब कुछ फिल्मी बातें होती हैं...?
क्या जिंदगी में प्यार सिर्फ जरूरतें पूरी करने तक ही सीमित होता है..??

मैंने अपनी शादी के इन पांच सालों में कभी निष्चिंत हो अपना एक हफ्ता भी नहीं बिताया होगा. हर दूसरे दिन का लड़ाई-झगड़ा और बढ़ते बढ़ते बात गाली-गलौज और मारपीट तक पहुंच जाती है.
लड़ाई झगड़ा तक तो ठीक है वो तो हर रिश्ते में होता है और होना भी जरूरी है लेकिन गाली-गलौज और मारपीट यह में कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती.
बात फिर मेरे स्वाभिमान पे आ जाती है. जब इस तरीके के अपशब्द कोई मुझे बोले भले ही वह गुस्से में हो, परंतु मुझे यह कतई बर्दाश्त नहीं होगा. हाथ उठाना तो कहीं से कहीं तक भी जायज नहीं है. हाथ उठाने का तो किसी को भी कोई हक नहीं है,, और यह सब सहना मेरी फितरत में भी नहीं है. मैं यह सब बर्दाश्त नहीं करूंगी.

मैं उसे बाहर से तो माफ कर सकती हूं पर यह बातें मेरे दिल की गहराई में समा जाती है. मैं चाह कर भी भूल नहीं पाती. मुझे बार-बार वही सब याद आता रहता है. जब भी मैं अकेले में होती हू. मुझे अजीब सी घुटन महसूस होती है. ऐसे शख्स के साथ में अपनी जिंदगी कैसे बिता पाउंगी, जो बात बात पर चिढ़ जाए और हमेशा अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन कर अपनी सारी सीमाएं तोड़ कर दूसरे को जलील करें. वह भी इस हद तक कि वह गाली-गलौज और मारपीट तक पहुंच जाएं.
हर आदमी की एक सीमा होती है कोई समझदार और सभ्य व्यक्ति ऐसा नहीं होता है कि वो इतना उत्तेजित हो जाए कि वह गुस्से में आकर अपनी सीमाएं तोड़ दे... किसी को भी मारने पीटने लगे और यह तभी संभव है जब वो आदमी जाहिल और घटिया सोच रखता हो. किसी और की ज़िन्दगी को भी अपनी जागीर समझने लग जाए. जब मर्जी पटक दो जमीन पे, जब मर्जी झुनझुना पकड़ा के ख़ुश करवा दो..
लेकिन मैं कोई कटपुतली नही हूँ मुझे भी सब समझ आता है बस कुछ कहती नहीं... यह सब हरकतें करने के बावजूद भी सौरव को ये उम्मीद होती है कि मैं उसे माफ कर दूँ. सब कुछ भूल कर रिश्ता फिर पहले जैसा हो जाए. और तो और माफी मांगने का तरीका ये होता है की गाली-गलौज और मारपीट के लिए भी मैंने ही उसे उकसाया था.. अपनी इतनी गंदी और जाहिल गलती का जिम्मेदार भी वह मुझे ठहरा देता है और मैं भी पागल उसकी बातों में आ के भावुक हो जाती हूँ. उन सब बातों को भूल कर आगे के सपने देखने लगतीं हूँ, की अब आगे वो ऐसा नहीं करेगा..
पर वो उसका ब्यक्तित्व है वो मेरी वजह से नहीं खुद अपनी वजह से मजबूर होता है, ये उसकी आदत है जिसे वो बदल नही सकता वो मजबूर है अपनी आदतों से.. लेकिन अपनी गलती को स्वीकारने की हिम्मत उसे तब भी नहीं होती और फिर भी चाहता हैं कि सब सामान्य हो जाये...
सब कुछ पहले जैसा कैसे होगा???
अब सब कुछ सामान्य नहीं हो सकता.....

जब तुम असामान्य व्यवहार करते हो तब तुम यह क्यों नहीं सोचते कि हम सामान्य तरीके से भी यह बात बोल सकते हैं. सामान्य रहते हुए भी कई मुद्दों का हल निकला जा सकता है. प्यार से कही हुई बात मारपीट से कहीं हुई बात से ज्यादा असरदार और स्वीकार्य पूर्ण होती है....

आपने भी देखा होगा जब एक बार डोर टूट जाती है तो उसे जोड़ने के लिए गांठ तो लगानी ही पड़ती है. फिर डोर पहले की जैसी नहीं रहती. बीच में गांठ आ ही जाती है.
यही सब रिश्ते के साथ भी हैं. जितना हम उसे प्यार से सहेजने की कोशिश करते हैं रिश्ता लंबे समय तक टिकता है और माजबूत रहता है.. जितनी खींचातानी करते हैं तो रिश्ते की डोर भी कमजोर पड़ने लगती है और टूट जाती है....
अब इस टूटी हुई डोर को फेंकना है या फिर उसे जोड़ के रखना है यह हमारे ही हाथ में होता है. ज्यादातर हम रिश्ते को जोड़ने की ही कोशिश में रहते हैं.
अगर बार-बार उस रिश्ते की डोर को खींचा जाए तो बार-बार टूटने पर गांठ लगाना भी मुश्किल सा हो जाता है. अंततः रिश्ता खत्म होने की कगार पर पहुंच जाता है.

इसलिए वक्त रहते ही अपने रिश्ते को संभालने में भलाई है. अगर आपने रिश्ता बनाया है तो उसकी कदर करना भी सीखना चाहिए. कैसे रिश्ते में प्यार बड़े आपकी हमेशा यही कोशिश होनी चाहिए. रिश्ते बहुत नसीबों से बनते हैं. उन्हें प्यार से निभाने की शिद्दत होनी चाहिए. समय पर अपने रिश्ते की नाजुक डोर को सहेजना सीख लो नहीं तो रिश्ते की डोर खींचेगी फिर टूट जाएगी और रिश्ता भी बिखरेगा. इससे आपकीं ही नहीं परिवार के कई अन्य लोगों की ज़िंदगिया भी बिखर जाएंगी.
आपकी खुशहाल जिंदगी और परिवार की खुशहाली की पतवार आपके हाथों में है. इस नाव को डूबने ना दे, खुश रहे और खुशहाली लाए...

इसी के साथ मैं आपसे विदा लेती हूं और मिलती हूँ एक नए ब्लाग में तब तक के लिए अलविदा...
अगर आपको ब्लॉग पसंद आया हो तो लाइक करें और कमेंट करके फीडबैक जरूर दीजिए और फॉलो कीजिए मेरे इस ब्लॉग को... धन्यवाद 🙏🙏

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