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हाल-ए-निशा क्या बयां करू यारों,,,
रात एक पल के लिए दीदार-ए-हुस्न हुआा उसका मुझे
क्या बताऊं उस एक पल में हज़ार मर्तबा उससे प्यार हुआ मुझे,,,,
एक अरसा हुआ था मिले उससे,,,,
रात जब निगाहें टकरायीं तो उसकी तडप का एहसास हुआ मुझे,,,,,
यूँ तो गुलों की ज़रूरत है चमन को महकाने के लिए,,,
लेकिन एक वक्त के बाद उसकी मुस्कुराहट ने त'निशा महकाया है मुझे,,,
आहा,,,लुत्फ ही आगया जब उसके खुले गेसू मेरी उगलियों में उलझ गए,,,
कल रात का वो दिलकश मंज़र क्या बताऊं उसे,,,
जब उसके शरबती लब मेरे लब से थे मिले,,।।
 #NojotoQuote

#रात #वो #और #मैं

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बहारों के सपने।
(पार्ट 11)

रात को देर तक राहुल से बात करने के बावजूद सुबह मेरी आँखें जल्दी खुल गई। घड़ी में देखा तो सिर्फ साढ़े-चार बज रहे थे। पहले सोचा थोड़ी देर सो जाऊं पर नींद नहीं आई।

में राहुल के बारे में सोचने लगी। पलक झपकते ही सब कुछ जैसे बदल गया था। मेरी शादी होने वाली थी। सब कितने खुश थे। सिवाय सचिन के। ना जाने कहाँ से सचिन का ख़याल आ गया। उसे आज ज़रुर कॉल करुँगी, मैंने सोच लिया।

***

"टीना! उठ जाओ।"मॉम ने आवाज़ दी।

"जाग ही रही हूँ में।"मैंने कहा।

"क्या बात है! आज खुद-ब-खुद जाग गई। लगता है कि ख़ुशी के मारे नींद नहीं आई।"

"क्या मॉम तुम भी!"मैंने चिढ़ते हुये कहा।

"अरे! थोड़ा अपने गुस्से पर काबू रखो। अब तुम्हारी शादी होनेवाली है।"

"क्या शादी-शुदा लोग गुस्सा नहीं करते?"मैंने भी कह दिया।

"जब देखो तब चिढ़ जाती हो। अपनी आदत बदल डालो अब जल्दी से।"

वैसे तो बात लंबी चलती लेकिन मॉम खुश थी तो ज़्यादा कहा-सुनी ना हुई।

***

में तैयार हो कर क्लासेज पहुँची। निशा पहले से वहाँ मौजूद थी।

"काँग्रेट्स टीना!"उसने मुस्कुराते हुये कहा।

"थैंक्स।"

"बड़ी खुश लग रही हो आज तो!" निशा ने मुझे चिढ़ाना शुरू कर दिया।

"ओफ्फो निशा! अब तुम शुरू मत हो जाना।"

"ठीक है। पर में सच में तुम्हारे लीये बहुत खुश हूँ।"

"थैंक यू, निशा। में भी अपने लीये बहुत खुश हूँ।"

हम दोनों हँस पड़े और अपने अपने क्लास की ओर चल पड़े।

बैच ख़तम होने के बाद में ऑफिस में बैठी थी की सचिन का कॉल आया।

"हाई सचिन! में तुम्हे ही कॉल करनेवाली थी। कहो, कैसे हो तुम?"

"सच बताऊँ तो में ठीक नहीं हूँ। तुमसे मिलना चाहता हूँ। में तुम्हारे क्लासेज के नीचे ही खड़ा हूँ। क्या मिल सकते है अभी? ज़रूरी बात करनी है।"

"ऐसी क्या बात है? अभी बता दो।"

"हाँ, तुम मिलने तो आओ।"

"ठीक है। अभी आती हूँ।"कह कर में उससे मिलने नीचे पहुँच गई।

"हैलो टीना!"

"क्या बात है, सचिन? कुछ प्रॉब्लम है क्या?"

"देखो टीना, मुझे घूमा-फिरा के बात नहीं करनी। इसलिये सीधे ही कह देता हूँ।"

"ठीक है। जल्दी कहो।"

"मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो। मुझसे शादी करोगी?"

सुनकर में भौचक्का रह गई। मुझे सचिन से ऐसी उम्मीद बिलकुल भी ना थी। हम तो सिर्फ अच्छे दोस्त थे।

"कुछ तो बोलो टीना!"सचिन ने कहा।

"सचिन, तुम अच्छी तरह से जानते हो की मेरी शादी तय हो गई है।"

"तो तुम्हारी ना है?"

"में तुमसे शादी नहीं कर सकती, सचिन। लेकिन हम हमेशा अच्छे दोस्त रहेंगे।"

"मुझे नहीं चाहिये तुम्हारी दोस्ती।"सचिन ने गुस्से से कहा।

सचिन का यह रूप मैंने पहले कभी नहीं देखा था। उसका बर्ताव देख मुझे बड़ी ताज्जुबी हुई।

"जैसी तुम्हारी मरज़ी।"मैंने कह दिया।

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अश्क़ "भींगती यादें"
शहर बनारस और बात ख्याल-ए-इश्क की , खिड़की से बाहर बारिश पर टिकी निशा की नम नजरें और आंखों से निकलकर पलकों के सहारे गालों को छूते हुए उसके हाथों पर गिरती हुईं वो बेजान बूँदे हाल-ए-दिल को उस पल खामोशी में तब्दील करने के लिए काफी थी ।बारिश जोरदार थी मगर इसका असर निशा के कानों पर जरा सा भी नहीं था । पलकें झपकने का नाम नहीं ले रही थी और बूंदें कहूं या अश्क ,जो भी हो पर थम नहीं रहा था  । उसकी उँगलियाँ प्रेम के पहनाये हुए लॉकेट को इस कदर खींच रही थी कि मानो उस पल की सारी बौखलाहट और बेचैनी का जिम्मेदार वही हो । एक अरसा बीत चुका था दोनों की बात हुए बिना और हिस्से में मिली यादों के सहारे इसी तरह वो इश्क आज भी ज़िंदा था । मुस्कुराहट फ़ीकी पड़ चुकी थी , ख्वाहिशों दम तोड़ चुकी थीं पर कुछेक यादें आज भी हल्की सी नम मिलावट वाली मुस्कान बीच-बीच में ला ही देती थी ।बनारस की गलियाँ आज बारिश के पानी में और निशा ,प्रेम के साथ गुजारे इश्क के लम्हों को दोहराते हुए अश्कों के पानी में डूब चुके थे । तभी माँ की जोरदार आवाज निशा के ख्यालों को चीरते हुए उसे होश में ला देती हैं ,आंशू सोखकर खिड़कियों को काँपते हुए हाथों से बंद कर निशा की खामोश जुबान आखिर बोल ही पड़ती है -"जी माँ आई, बस बारिश देख रही थी..  
©मनोगुरु

#story #nojoto #nojotohindi

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बहारों के सपने।
(पार्ट 7)

में और मॉम बातें कर रहे थे। बात बात में निशा की बात निकली।

"मॉम, पता है निशा को घर और जॉब दोनों सँभालने में मुश्केली आ रही है।"

"हाँ। थोड़ी मुश्केली तो आयेगी ही। अभी नयी नयी शादी हुई है तो घर के काम की ज़िम्मेदारियाँ अचानक सर पर आ गई होगी। ऊपर से दस घंटे की जॉब।"मॉम ने कहा।

"हाँ, वह तो है। पर उसकी सास उसे ज़रा भी मदद नहीं करती। यह तो गलत है ना।"मैंने मॉम के सामने अपने विचार रखें।

"और जब निशा ने राज से बात करी तो उसने तो कह दिया की जॉब छोड़ दो। ऐसे में निशा करे भी तो क्या करे?"

"देख टीना, नयी बहु से हर किसी की उम्मीदें जुडी होती है। हाँ, सबकुछ बहु के सर पर थोप देना गलत तो है लेकिन हमारे समाज में यह आम बात है। जब सबकी सोच बदलेगी तभी यह बदलेगा।"

"और राज का कहना की जॉब छोड़ दो वह?"

"वह भी गलत है पर यह बात निशा को ही राज को समजानी होगी की उसकी कैरियर उसके लिये इम्पोर्टेन्ट है। पर सच यह भी है कि अब निशा के लिये पहले उसका परिवार होना चाहिये।"

इतना कह कर मॉम तो चली गयी पर मुझे सोच में डाल गई।

अगर मेरी मॉम ही ऐसा सोचती है कि यह सब गलत होने के बावजूद एक आम बात है और निशा को पहले अपना घर देखना चाहिये तो फिर किसी और से अलग सोच रखने की उम्मीद रखना बेकार है। में यह नहीं कहती की घर को कम इम्पोर्टेंस दो पर कैरियर को भी इतना इम्पोर्टेंस मिलना चाहिये।

***

दूसरे दिन जब क्लासेज़ गई तो निशा का मूड कुछ ठीक नहीं था।

"बहुत उखड़ी उखड़ी लग रही हो आज?"

"हाँ। शादी, शादी ना हुई जी का जंजाल हो गया।"निशा ने कहा।

"अरे! ऐसा क्या हो गया?"

"राज से फिर आज सुबह झगड़ा हो गया। एक तो पाँच बजे उठकर खाना पकाओ, सबके लिये गरम नास्ता तैयार करो, घर का सारा काम करो वह भी बिना किसी की मदद के। और ऊपर से राज का सुबह सुबह चिल्लाना,"मेरी फाइल किधर है? मोज़े नहीं मिल रहे।"
एक काम वह खुद से नहीं करता। मेरी मानो तो तुम कभी शादी ना करना।"निशा ने अपनी बढास निकालते हुये कहा।

निशा हँसी-मज़ाक करने वाली, एक खुश-मिजाज़ लड़की थी। पर शादी के बाद वह लड़की ना जाने कहाँ खो गई थी। अब वह सारा दिन टेंशन में रहती और जल्दी चीड़ जाती थी।

में बस यही उम्मीद कर सकती थी के वक़्त के साथ सबकुछ ठीक हो जाये।

अपनी बात कहूँ तो मेरी ज़िन्दगी ठीक-ठाक चल रही थी। लेकिन तब मुझे पता नहीं था कि मेरे जीवन में बदलाव आने वाला था।

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बहारों के सपने।
(पार्ट 6)

निशा छुट्टी पर चली गयी थी। शादी की तैयारी और शॉपिंग जो करनी थी। इसलिये उसके स्टूडेंट्स को भी मुझे पढ़ाना होता था। में ज़्यादा बिज़ी रहने लगी थी। पढ़ने का टाइम भी कम ही मिलता।

हाँ, सचिन से दोस्ती ज़रूर बढ़ने लगी थी। कभी कभार यदि हम रेस्टोरेंट में मिल जाते तो साथ ही बैठ कर नास्ता करते। और फिर कभी कभी उसका फ़ोन आ जाता या में उसे फ़ोन कर लेती।

निशा की शादी का दिन नज़दीक आ रहा था। मैंने अपने लिये साड़ी भी पसंद कर ली थी। पर उसकी शादी में सरीक होना मेरे नसीब में नहीं था। उसकी शादी के दो दिन पहले मुझे तेज़ बुख़ार हुआ। पहले तो हम हमारे फॅमिली डॉक्टर से दवाई ले आये पर बुख़ार कम होने का नाम नहीं ले रहा था। आखिरकार मुझे हॉस्पिटल में एड्मिट होना पड़ा। हॉस्पिटल में कई टेस्ट किये गये पर कोई नतीजे पर डॉक्टर्स नहीं पहुँच पाये। आख़िरकार वायरल इन्फेक्शन की वज़ह से बुख़ार हुआ होगा ऐसा कहा गया। पर अच्छी बात यह थी की में ठीक हो रही थी। टेम्परेचर नॉर्मल रहने लगा था। और फिर मुझे हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गयी। में घर तो आ गयी पर वीकनेस फिर भी रहती थी। कुछ दिन लगे मुझे पूरी तरह ठीक होने में। घर बैठ कर में बोर हो गयी थी। निशा की शादी मिस करने का भी अफ़सोस था। पर चीज़ें मेरे हाथ में नहीं थी।

***

ठीक होने के बाद में फिर से क्लासेज जाने लगी। निशा ने भी फिर से क्लासेज ज्वाइन कर लिये थे। वह खुश तो थी पर थोड़ी परेशान भी। घर और क्लासेज के बीच ताल-मेल बिठाने में उसे तकलीफ़ हो रही थी। उसके सास-ससुर वैसे तो अच्छे थे पर उसकी सास ने घर की सारी ज़िम्मेदारी उसके सर पर रख दी थी। यह मैंने कई बार होते देखा है। घर में बहु आते ही घर के सारे लोग उससे कई उम्मीदें लगाये बैठ जाते है। पर यह नहीं सोचते की जो लड़की अपना सबकुछ छोड़ के आपके घर आई है उसके भी कुछ सपने, कुछ अरमान होंगे। निशा ने राज से बात कर के भी देखी पर उसने कह दिया की जॉब करने की कोई ज़रूरत नहीं। भगवान का दिया हमारे पास सबकुछ तो है। निशा अपनी जॉब नहीं छोड़ना चाहती थी। इसीलिये किसी तरह से सबकुछ मैनेज कर रही थी।

में जानती हूँ की शादी कोम्प्रोमाईज़ का दूसरा नाम है। दो अलग घर, विचार और तौर-तरीके वाले लोगों को साथ रहना होता है। तो थोड़ी दिक़्क़त तो आयेगी ही। पर मैंने यह भी देखा है कि ज़्यादातर दिक़्क़त लड़की को झेलनी पड़ती है। शायद यही समाज का दस्तूर है। पर इस वज़ह से मुझे शादी से डर लगता था।

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