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हमें जरूरत है कुछ नौजवान युवक युवतियों की,
युवक को कंधे से कंधा मिलाकर चल सके देश के निर्माण में,और युवतियां जो दुनियां को दिखा सकें कि भारत आत्मविश्वास से भरा हुआ देश है

आओ कंधे से कंधा मिलाकर चलें

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 10

।।श्री हरिः।।
5 – अक्रोध

'क्रोधं कामविवर्जनात्'

हम सब उन्हें दादा कहते थे। सचमुच वे हमारे दादा - बड़े भाई थे। सगे बड़े भाई भी किसी के इतने स्नेहशील केदाचित् ही होते हों। उनका ध्यान हम सबों की छोटी-से-छोटी आवश्यकता पर रहता था। किसे कब क्या चाहिये। किसे क्या-क्या साथ ले जाना चाहिये।

'तुम अपना झोला, बक्सा और बिस्तर दिखलाओ तो सही।' हम में से कोई ही कभी दस-पाँच दिन निवास स्थान पर रह पाता था। प्राय: यात्रा करनी थी। दादा भी रह नहीं पाते थे; किंतु दादा हों तो यात्रा को उद्यत होने वाले का बिस्तर बँध जाने पर वे अवश्य उसे खोलने को कहते और फिर उनकी स्नेहभरी झिड़की - 'पता नहीं तुम सबों में कब सावधानी और समझ आयेगी। न मार्ग में काम आने को मिट्टी रखी, न दातोन और न कम्बल। जहाँ जा रहे हो, वहां का मानचित्र तक साथ नहीं।'

वह कोई सुख-सुविधा का जीवन नहीं था। हमारे पास आवश्यक वस्त्र एवं बर्तनों तक का प्राय: अभाव रहता था। जिसे सबसे अधिक आवश्यकता हो, कम्बल, चद्दर, लोटा उसका होना चाहिये। प्राय: प्रत्येक को लगता कि दूसरों को उससे अधिक आवश्यकता है। फलत: हमारी यात्रा के समय दादा बँधा सामान अपर्याप्त लगना ही था और दादा के लिए अपनी तो जैसे कोई आवश्यकता थी ही नहीं।

बात उन दिनों की है, जब देश स्वतन्त्र नहीं हुआ था। अंग्रेज सरकार का दमन-चक्र पूरे वेग पर था। उस समय देश में कुछ ऐसे भी लोग थे, जिनका विश्वास अहिंसा में नहीं था। उन क्रान्तिकारियों का मान्यता ठीक नहीं थी, यह कहा जा सकता है; किंतु उनकी देश भक्ति में कहीं कुछ कमी थी, यह कहने का साहस किसी को नहीं हुआ।

अभाग्यवश कहिये या परिस्थितिवश, देश के सभी क्रान्तिकारी दल एक संगठन में कभी नहीं आ सके। यह असम्भव भले न रहा हो, अत्यन्त कठिन था। जितना सशंक, सतर्क एवं गुप्त उन्हें रहना था, उसे देखते हुए वे अनेक दलों में बिखरे रह गये, यह कोई अद्भुत बात नहीं है।

देश में बिखरे उन दलों में से ही एक छोटा-सा दल हमारा था। हमारे दल में कभी पूरे सौ युवक नहीं रहे और वह कार्यशील भी कुछ वर्ष ही रहा। हमारा कार्यक्षेत्र स्थानीय नहीं था। पूरे देश में हम सक्रिय रहते थे। बिना सम्पर्क एवं परिचय के दूसरे दलों को और जहाँ तक हो सके सत्याग्रह आन्दोलन को भी स्थानीयरूप में अपने ढंग से सहायता देने का प्रयत्न करते थे। हम अपने कार्य से संतुष्ट थे। हमें न यष अभीष्ट था, न सत्ता का स्वप्न हमने देखा। मातृभूमि के लिए अपना मस्तक अर्पित कर देना और वह भी अज्ञात रहकर, यह हमारी अभिलाषा थी।

दादा हमारे निर्देशक थे, संचालक थे, नायक थे। दल एक शरीर था और उसमें दादा मस्तिष्क तो थे ही, हाथ-पैर का काम भी सबसे अधिक करते थे। किंतु वे हमारे साथ अधिक दिन रह नहीं सके। उनको हमसे स्वेच्छापूर्वक पृथक होना पड़ा। हम इतने अबोध एवं उद्धत थे कि उन स्थितप्रज्ञ को हमारे मध्य रहना ठीक नहीं लगा।

दादा ही तो दल थे। दादा पृथक हुए और दल कुछ दिनों में छिन्न-भिन्न हो गया। पृथक होते समय दादा ने कहा था - 'अब इस सबकी आवश्यकता सम्भवतः नंही है।'

मैं अपने उन दादा का ही एक दिन का एक संस्मरण सुनाने चला हुँ। पृथक होने के बाद वर्ष, दो वर्ष तक उनका पता मुझे था, किंतु अब वे कहां होंगे - वर्षों से मुझे पता नहीं।
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'दादा! मुझे गोली मार दो। मैं अयोग्य सिद्ध हुआ। मैंने एक उत्तम अवसर खो दिया। माधव व्याकुल होकर फूट-फूटकर रो रहा था। बाहर जब नगर में पुलिस उसे पकड़ने के लिए गली-गली दौड़ती फिर रही थी, इस झोंपड़ी में वह दादा के पैर पकड़े कह रहा था - 'आप दण्ड नहीं देंगे तो मैं अपने को स्वयं गोली मार लूंगा।'

'तुम न अपने को गोली मार सकते और न पुलिस के सामने जा सकते।' दादा का स्वर स्थिर गम्भीर था - 'तुमने अपने आपको मातृभूमि के लिए दे दिया है। अपने सम्बन्ध में तुम कोई निश्चय नहीं कर सकते। तुम्हारे सम्बन्ध में निश्चय मैं करूंगा और जब मेरे निर्णय से तुम लोग सहमत न हो सको, मुझे दल के नायकत्व से पृथक कर देना।'

'मैं उस कुत्ते को जीवित छोड़ आया और .......' माधव फटे-फटे नेत्रों से दादा की ओर देखता रहा। उसे यहाँ के सिटी-मजिस्ट्रेट को गोली मार देने का कर्तव्य दिया गया था। सिटी-मजिस्ट्रेट अंग्रेज है और उसने जो निर्मम-चक्र चला रखा है, उसे देखते हुए दल ने निर्णय किया था कि उसे अब जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं।

दादा की योजनाओं ने दल के किसी सदस्य को कभी पुलिस के हाथ पड़ने नहीं दिया। हम में से किसी को फांसी के तख्ते या अपराधी के कठघरे के दर्शन का सौभाग्य नहीं मिला। इसलिए भी हमारे दल के सम्बन्ध में लोगों को कोई जानकारी नहीं हुई।

आज ही क्या हुआ था। क्रिकेट मैच देखने सिटी-मजिस्ट्रेट साहब पधारे थे। मैच जब जम चुका था, अचानक खेल के मैदान में कहीं से एक बम गिरा। धुएँ से मैदान भर गया। सर्वथा अहानिकारक बम - एक बड़ा सा पटाखामात्र था वह; किन्तु उससे भीड़ में भाग-दौड़ मच गयी थी।

पुलिस दौड़ी उधर जिधर बम गिरा था और उसी क्षण एक युवक की जेब से पिस्तौल निकली। उसने सामने मजिस्ट्रेट साहब पर लगातार तीन गोलियाँ चलायीं और भीड़ में कहाँ चला गया, कोई जानता नहीं। घबराहट में गोरा मजिस्ट्रेट अपनी कुर्सी पर से लुढक गया। युवक ने समझा कि वह गोली खाकर लुढका है।

'यदि माधव सरलता से न निकल सके' दादा की योजनाओं में ऐसी अनेक संभावनाएँ पहिले से रहती हैं। आप अनुमान नहीं कर सकते कि मैदान में लगातार कई ओर से डेढ दर्जन बम गिरने पर क्या अवस्था होती। स्वयं दादा उपस्थित थे वहाँ और उनके साथ पूरे अठारह साथी और थे। उनके झोलोंमें बम थे और जेबों में दो पूरी भरी पिस्तौलें। साथ ही प्रत्येक को सुरक्षित वहाँ से निकल जाने की व्यवस्था थी।

केवल दादा और माधव को आना था उस झोपड़ी में। दूसरे साथी नगर से बाहर जा चुके थे। स्टेशन से दो ट्रेनें विपरीत दिशा में जा चुकी थी इसी समय।

माधव को भीड़ में से निकलते-निकलते पता लग गया कि वह सफल नहीं हुआ, किन्तु अब लौटने का समय नहीं था। दादा उसे लगभग घसीट लाये थे झोंपड़ी के भीतर और वह अब फुट-फुटकर रो रहा था।
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'तुम अब भी नहीं जानते कि क्यों तुम सफल नहीं हुए।' दादा ने समझाने का प्रयत्न सफल न होता देखकर कहा - 'मैं यह खतरा ले लूंगा। एक गोली तुम चलाओ और उस वृक्ष के उस फूल को उड़ा दो।'

आश्चर्य, माधव असफल हुआ। वह माधव असफल हुआ जिसका निशाना हम सबमें सबसे अधिक अचूक माना जाता है।

'तुम जब तक क्रोध में रहोगे, ऐसा होगा।' दादा ने बताया - 'उस समय भी तुम अत्यधिक क्रुद्ध थे।'

'उस कुत्ते पर क्रोध नहीं आयेगा तो क्या दया आयेगी!' माधव सचमुच अब भी क्रुद्ध था।

'पहली बात तो यह कि हमने उसे मारने का निर्णय किया किंतु जो सबके जीवन का नियन्त्रक है वह उसे जीवित रखना चाहता था।' दादा अत्यन्त गम्भीर हो गये। 'दूसरी बात यह कि हमने उसे मार देने का निर्णय किया, उस पर क्रोध करने का निर्णय नहीं किया। वह अपनी समझ से अपना कर्तव्य कर रहा है। अपने देश के प्रति ईमानदार है। तीसरी बात यह कि क्रोध करके तुम स्वयं दुखी एवं असफल हुए। जिस पर तुमने क्रोध किया, उसकी कोई हानि नहीं हुई। अत: अबसे यह समझ लो कि तुम्हें क्रोध कभी नहीं करना है।'

'क्रोध नहीं करना है?' माधव ने आश्चर्य से दादा की ओर देखा। वह स्वभाव से अत्यन्त क्रोधी है। उसके लिये क्रोध न करना क्या सम्भव होगा।

'हाँ, क्रोध नहीं करना है। केवल कर्तव्य का पालन करना है।' दादा कहते गये - 'मैं जानता हूँ कि तुम्हारे लिए यह बहुत कठिन है; किन्तु यह करना है तुम्हें। हम सब निष्काम, कर्म के साधक हैं। अपना लक्ष्य तो हमें सिद्ध ही करना है।'

'मुझ में कौन-सी कामना आ गयी?' कुछ चिढ उठा था माधव।

'कामात्मक्रोधोभिजायते' अथवा 'लोभात्क्रोधोभिजायते।' दोनों बातें कही गयी हैं। हम कुछ चाहते हैं और वह नहीं होता, नहीं मिलता तो क्रोध होता है या हमें कुछ मिला है, वह कोई मांगे या छीने तो क्रोध होता है। हम चाहते हैं कि अमुक अधिकारी अमुक ढंग से व्यवहार करे और वह नहीं करता तो हमें क्रोध आता है।' दादा के ये उपदेश कभी हमारे गले के नीचे उतरे नहीं, यह सत्य मुझे यहाँ स्वीकार कर लेना है।

'हम कुछ नहीं चाहते तो व्यर्थ पिस्तौल लेये घूमते हैं।' माधव खीझ उठा।

'हम देश को स्वाधीन करने के अपने कर्तव्य का पालन करने चले हैं।' दादा शान्त बने रहे - 'तुम केवल इतना स्मरण रखो। शेष सब मुझ पर छोड़ दो और कर्तव्य मानकर आदेश का पालन करो तो आज-जैसी असफलता नहीं आयेगी।

'क्रोध आयेगा नहीं, यदि कामना नहीं आयेगी।'

दादा के वे स्नेह भरे वचन - 'तुम क्रोध मत करो। चाहो कुछ मत। केवल कर्तव्य का पालन करो। जहाँ, जिस कर्तव्य में लगे हो उस कर्तव्य का पालन करो।'

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 10

।।श्री हरिः।।
3 - मा ते संगोस्त्वकर्मणि

'जीवन का उद्देश्य क्या है?' जिज्ञासा सच्ची हो तो वह अतृप्त नहीं रहती। भगवान की सृष्टि का विधान है कि कोई भी अपने को जिसका अधिकारी बना लेता है, उसे पाने से वह वंचित नहीं रखा जाता।

'आत्मसाक्षात्कार या भगवत्प्राप्ति?' उत्तर तो एक ही है। यही उत्तर उसे भी मिलना था और मिला - 'यह तो तुम्हारे अधिकार एवं रुचिपर निर्भर करता है कि तुम किसको चुनोगे। यदि तुम मस्तिष्कप्रधान हो तो प्रथम ओर हृदयप्रधान हो तो द्वितीय।'

वह राजपूत है - सच्चा राजपूत और यह समझ लेना चाहिये कि सच्चा राजपूत लगन का सच्चा होता है। वह पीछे पैर रखना नहीं जानता - किसी क्षेत्र में बढ़ने पर। सौभाग्य से पिता साधुसेवी थे और सत्संग ने उसे सिखा दिया था कि संसार के भोग तथ्यहीन हैं, उनमें सुख की खोज चावल के लिये तुस कुटने जैसा है।

'परमार्थ का मार्ग तो वह दिखला सकता है, जिसने स्वयं उसे देखा हो।' उसका निर्णय आप भ्रान्त तो नहीं कह सकते। कोई भी मार्ग वही दिखा बता सकता है, जो उसपर चला हो। सुन-सुनाकर बतानेवाले भूल कर सकते हैं। किसी की भूल से जब पूरे जीवन के भटक जाने की आशंका हो, ऐसा भय कौन आमन्त्रित करे। उसने निश्चय किया - 'समर्थ स्वामी रामदास के श्रीचरण ही मेरे आश्रय हो सकते हैं।'

कहाँ ढूँढे वह श्रीसमर्थ को। उन दिनों वे कहीं टिककर रहते नहीं थे। उन्होंने देश-भ्रमण प्रारम्भ कर दिया था। यह ठीक है कि वर्ष-दो-वर्ष में वे 'सातारा' आ जाते थे; किंतु जीवन के साथ जुआ तो नहीं खेला जा सकता जीवन वर्ष-दो वर्ष रहेगा ही - मृत्यु कल ही धर नहीं दबायेगी, इसका आश्वासन?

'स्वामी! मैं आपके समीप से उठनेवाला नहीं हूँ।' उसने श्रीपवनकुमार के श्रीविग्रह के चरणों के पास आसन लगाया। 'श्रीसमर्थ आपके हैं, मैं उन्हें कहां ढूंढने जा सकता हूँ।'

बात सच थी, संत ढूंढ़ने से मिलते होते तो देवर्षि नारद अपने भक्तिसूत्र में न कहते -
'लभ्यतेपि तत्कृपयैव' (४०)

किंतु उन्होंने ही यह भी तो कहा है -
'तस्मिस्तज्जने भेदाभावात्।' (४१)

श्रीमारुति के चरणों में पहुँची आर्त पुकार कभी निष्फल नहीं लौटी है। इस बार भी उसे नहीं लौटना था। पता नहीं कहाँ से घूमते हुए श्रीसमर्थ आ पहुँचे और किसी ग्राम या नगर में पहुँचने पर वे पहले वहाँ के श्रीमारुति मन्दिर में प्रणाम करने पहुँचेंगे, यह तो निश्चित ही रहता है।

'मैं तुम्हें ढूंढ़ने आया हूँ।' श्रीसमर्थ ने पवनकुमार को साष्टांग प्रणिपात किया और अपने पदों में प्रणत उस राजपूत युवक को उठा लिया।

'कृपामय न ढूंढे तो अज्ञ असमर्थ जन उन्हें कहाँ कैसे प्राप्त कर सकता है।' युवक के नेत्रों से अश्रु झर रहे थे।

‘तुम इस प्रकार यहां क्यों बैठे हो?' समर्थ की ओजपूर्ण वाणी गूंजी। 'तुम्हारे-जैसे समर्थ तरुणों की सेवा आज जनतारूप में विद्यमान श्रीजनार्दन माँग रहे हैं।'

'मनुष्य-जीवन बार-बार प्राप्त नहीं होता, यह आप महापुरुषों से ही सुना है।' युवक अपनी जिज्ञासा पर आ गया था। 'आप कृपा करें! यह जीवन आपकी कृपाकोर प्राप्त करके कृतकृत्य हो जायगा।'

'श्रीरघुवीर समर्थ अनंत करुणावरुणालय हैं।' समर्थ स्वामी अभय दे रहे थे। कृपा की क्या कृपणता है वहाँ। उनके श्रीचरणों से कृपा की अजस्त्र स्त्रोतस्विनीं त्रिभुवन को आप्लावित करती झर रही है। तुम अपने को उन श्रीचरणों में अर्पित तो कर दो।'
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'मुझे आज्ञा दें प्रभु!' वह युवक अब एक आश्रम का मुख्य प्रबंधक था। अब वह साधु है - समर्थ का साधु। समर्थ के साधु का अर्थ है - दीनों का सेवक, रोगियों का उपचारक एवं पीड़ितों का मूर्तिमान् आश्वासन, किंतु वह स्वयं आज आर्त हो रहा है। श्रीसमर्थ की प्रतीक्षा कर रहा है वह गत दो महीनों से और आज जब उसके गुरुदेव पधारे हैं, वह उनके श्रीचरणों पर गिर पड़ा है।

'तुम बहुत उद्विग्न दीखते हो!' श्रीसमर्थ ने आसन स्वीकार कर लिया था। अपने को अयोग्य पाता हूँ मैं इस आश्रम के लिए। वह खुलकर रो पड़ा। 'श्रीचरण आज्ञा दें तो एकान्त में कुछ दिन प्रयत्न करुं।'

'कौन-सा प्रयत्न करोगे तुम!' समर्थ स्वामी के मुखपर स्मित आया - अपार वात्सल्यपूर्ण स्मित।

'मन की चंचलता को रोकने का प्रयत्न?' युवक ने उत्तर दिया। 'श्रीचरणों ने ही आदेश किया था कि नैष्कर्म्य की सिद्धि ही आत्मदर्शन का उपाय है।'

'उपाय नहीं - नैष्कर्म्य तथा आत्मदर्शन एक ही बात है।' श्रीसमर्थ ने संशोधन किया। किंतु नैष्कर्म्य का तुम सम्पादन कैसे करोगे? कर्म का त्याग करके?'

'यदि प्रभु आज्ञा दें!' युवक ने अपना मन्तव्य स्पष्ट किया। 'आश्रम में रहकर तो नित्य कार्यव्यग्र रहना ही पड़ता है।'

'एकान्त में जाकर तुम श्वासक्रिया वंद कर दोगे?' समर्थ समझाने के स्वर में बोल रहे थे। 'आहार एवं जल भी तथा शरीरस्थ यन्त्रों की क्रियाओं को भी? यदि यह कर भी लो तो उस पत्थर में और तुममें अंतर क्या होगा?'

'प्रभु!' युवक अपने मार्गद्रष्टा के चरणों पर गिर पड़ा। उसे लगा कि कोई घने अंधकार का पर्दा उसके सम्मुख पड़ा था और अब वह उठने ही जा रहा है।

'आत्मतत्व अक्रिय है। उसकी अनुभूति - समस्त क्रियाशीलता के मूल में जो एक निष्क्रिय सता है, जिसमें क्रिया आरोपितमात्र है, उससे एकत्व का अनुभव।'

सहसा श्रीसमर्थ रुक गये। उन्होंने देखा कि उनका यह अनुगत इस पद्धति को ह्रदयंगम नहीं कर पा रहा है। उन्होंने दिशा बदली - 'क्रिया के संचालक एवं उसके फल के दाता-भोक्ता श्रीरघुवीर हैं। हम-तुम सब उन समर्थ के हाथ के यन्त्र हैं। हमें उनके चरणों में अपने-आपको पूर्णतया अर्पण कर देना है।'

'श्रीचरणों में मैंने अपने को उसी दिन अर्पित कर दिया।' युवक के स्वर में विश्वास था।

'यन्त्र तो नित्य निष्क्रिय है। उसकी क्रिया तो संचालक की क्रिया है।' श्रीसमर्थ ने वह अज्ञान की अन्धयवनिका उठा दी। 'सचमुच तुमने अपने को अर्पित कर दिया है तो नैष्कर्म्य स्वत: प्राप्त है। मन के चांचलय के निग्रह के कर्ता बनने की इच्छा तुम में क्यों आती है?'

'यह अशान्ति - उस आनन्दघन की अनुभूति जो नहीं पा रहा हूँ।' बात सच है। यदि आन्तरिक शान्ति और आनन्द नहीं मिलता तो अवश्य हमसे भूल हो रही है, हमारे साधन में कहीं त्रुटि है।

'अपने को कर्ता मानना छोड़ दिया होता तुमने!' वह त्रुटि जो स्वयं साधक नहीं पकड़ पाता, उसका मार्गद्रष्टा सहज पकड़ लेता है। श्रीसमर्थ से यह त्रुटि छिपी नहीं रह सकती थी। 'कोई पीड़ित नहीं, कोई रोगी नहीं, कोई संतप्त नहीं। तुम न उद्धारक हो, न सहायक। इन रूपों में आनन्दघन श्रीरघुवीर तुम्हारी सेवा लेने आते हैं तुमपर कृपा करके। उनकी सेवा करके तुम कृतार्थ होते हो।'

युवक ने भूमिपर मस्तक रखा और उसके वे गुरुदेव उठ खड़े हुए। उन्हें अब प्रस्थान करना था।
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'तुम जा सकते हो, यदि तुम्हें एकान्त में जाने की आवश्यकता प्रतीत होती हो!' श्रीसमर्थ स्वामी रामदास जब दुसरी बार उस आश्रम पर लौटे, स्वागत-सत्कार समाप्त हो जाने पर अपने चरण के पास बैठे आश्रम के प्रधान की ओर उन्होंने सस्मित देखा।

'मुझसे कोई अपराध हो गया?' प्रधान ने मस्तक रखा श्रीचरणों पर। अन्य आश्रमस्थ साधु सशंक हो उठे। उनके निष्पाप प्रधान ने ऐसा क्या किया कि उन्हें दण्ड प्राप्त हो? किसी अपने चरणाश्रित साधु को समर्थ स्वामी आश्रम से पृथक होकर एकान्त-सेवन का आदेश तभी देते हैं, जब वह कोई अक्षम्य अपराध करता है। यह तो उनका सबसे बड़ा दण्ड है।

'अपराध की बात मैं नहीं कहता!' स्मर्थ स्वामी प्रसन्न थे। 'यह तो तुम्हारी आवश्यकता की बात है। आंतरिक शांति एवं निरपेक्ष आनन्द की उपलब्धि के लिये यदि तुम्हें एकान्त की आवश्यकता प्रतीत होती हो.......।'

'श्रीचरणों को छोड़कर मेरी और कोई आवश्यकता कभी न बने!' आश्रम के प्रधान का स्वर भाव-विह्वल हुआ। 'अज्ञानी आश्रित से त्रुटि होती ही है और दयाधाम शरण्य उसे क्षमा करते हैं। सेवक को सेवा का प्रभु ने सौभाग्य दे रखा है, उसे आनन्द का अभाव कैसे हो सकता है।'

'यही कहने इस बार मैं आया हूँ।' समर्थ रामदास स्वामी ने एक दृष्टि समस्त शिष्यवर्ग पर डाली। 'जो इस विश्व का निर्माता, संचालक एवं संरक्षक है, वह न दुर्बल है न असमर्थ। उसे हमारी सेवा की आवश्यकता नहीं है। यह झूठा अंहकार है कि हम किसी की सेवा करेंगें या हम लोकोपकार करेंगे।'

'तब हमारा यह आश्रम...............।' एक नवीन साधु कुछ कहना चाहता था; किंतु स्वयं उसे अपनी भूल ज्ञात हो गयी। समर्थ स्वामी बोलते जा रहे थे - 'उन प्रभु ने हमें अपनी सेवा प्रदान की, यह उनकी कृपा। प्रत्येक जीव पर उनकी यह अहैतु की कृपा है। सबको उन्होंने एक कार्य देकर यहाँ भेजा है और यदि अपने कार्य का वह ठीक सम्पादन करता है तो सर्वेश की आराधना करता है। इसी आराधना से वह उनकी प्राप्ति करता है।'

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 9

।।श्री हरिः।।
14 - कर्मण्येवाधिकारस्ते

'हमारा काम बहुत र्शीघ्र प्रगति करेगा।' बात यह है की कार्यारम्भ में ही आशा से अधिक सफलता मिली थी और इस सफलता ने श्री बद्रीप्रसादजी को उल्लसित कर दिया था।

'ग्राम-संगठन की ओर कोई ध्यान नहीं देता।' आज से एक सप्ताह पूर्व बद्रीप्रसादजी ने अपने एक मित्र के साथ मिलकर योजना बनायी। 'हम दोनों इस ओर लग जायें तो कार्य बहुत बड़ा नहीं है।'

'पहिले एक ग्राम का संगठन हाथ में लेना होगा।' मित्र ने सलाह दी।

'गाँव के लोग अपने खेत-खलिहान को छोड़कर दूसरी बातों में रुचि ही नहीं लेते।' बद्रीप्रसादजी ने कहा। 'अगले मंगल से प्रतिदिन अपने यहाँ के हनुमानजी पर शाम को रामायण-गान प्रारम्भ किया जाय और रामायण के अन्त में लोगों को संगठन के लिए समझाया जाय।'

'आपके गाँव से श्रीगणेश करना रहेगा तो उत्तम।' मित्र से कहा। 'यहाँ आमका प्रभाव अच्छा है और कुछ उत्साही युवक भी हैं। जो कार्यकर्ता के रूप में मिल जायेंगे। स्थान है ही आपके पास तथा प्रारम्भ में व्यय भी कुछ पड़ना नहीं है।'

'रामायण की कथा के नाम पर लोग एकत्र हो जायेंगे।' बद्रीप्रसादजी का सोचना ठीक ही था। 'कथा-कीर्तन के लिये प्रसाद की व्यवस्था भी लोग सहर्ष कर देंगे और उतने से अभी काम चल निकलेगा।'

गांव में रामायण की कथाके प्रति आदर-भाव है। कभी-कभी लोग मंगलवार को हनुमानजी के पास एकत्र होकर रामायण गाते भी हैं। बड़ा पवित्र मनोविनोद है यह ग्राम के भोले कृषकोंका।

आप जानते ही हैं कि अर्थ की प्रधानता अब गाँवों में भी अपना प्रभाव बढाती जाती है और ग्रामीणों की सरलता, श्रद्धा, ईमानदारी को वह धीरे-धीरे निगलती जा रही है। रात में कोई पशु न खोल ले जाय, खेत चरा न ले, खडी फसल चोर न काट लें - इस प्रकार खेत, खलिहान और घर पर कृषक को सदा सचेत रहना पड़ता है। उसके पसीने की कमाई पर उसी के सहचरों की आँखें रात-दिन लगी रहती हैं। मार-पीट, थाना-कचहरी बराबर चलता रहता है।

'यह सब बंद होना चाहिये।' बद्रीप्रसाद तथा उनके मित्र अभी युवक हैं। उनके रक्त में यौवन की उष्णता है। 'यह होना चाहिये । इसके आगे वे सोचना नहीं चाहते कि वैसा होने में कितनी बाधाएँ हैं। युवक का ओज बाधाओं की गणना करना पसन्द नहीं करता।

'ग्राम के लोग संगठित हो जायें,' बद्रीप्रसादजी ने मित्र से कहा, 'तो सारी घूसखोरी सारी लूट-खसोट और नयायालयों की पूरी धाँधली समाप्त हो जाय।'

'हम ग्राम-संगठन कर लें - भले वे चार गाँव ही हों।' मित्र का रोष नेताओं पर था; क्योंकि उनके सुहृद इन बद्रीप्रसादजी को चुनाव में कांग्रेस टिकट मिला नहीं था। 'तो इन नेताओं का सिर अपने आप ठिकाने आ जायगा।'

'उनकी चिन्ता कौन करता है' बद्रीप्रसादजी को भी संगठन की बात टिकट न मिलने की प्रतिक्रिया के रूप में ही सूझी थीं। वे यह समझ नहीं सके थे कि देश के उच्च नेता तो चाहते ही हैं कि लोग ग्रामों में जाकर जन-सेवा एवं जन-संगठन का कार्य करें।
इस बात को आज सात दिन हो गये। आज मंगलवार है। दोनों युवकों का श्रम सफल रहा है। हनुमानजी पर रामायण-गान में तीन चौथाई ग्रामके लोग एकत्र थे। अन्त में बद्रीप्रसादजी के समझाने पर दस युवक ग्राम कार्यकर्ता बनने को प्रस्तुत हो गये। यह अकल्पनीय सफलता थी उनके लिये।
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'एक वर्ष में यहाँ का संगठन-कार्य पूरा हो जायगा।' बद्रीप्रसादजी जी-तोड़ श्रम कर रहे थे। 'लोंगों को खेत-खलिहान की चोरी से निश्चिन्तता प्राप्त हो जायगी। वे अपनी बहुत सी आदत सुधार लेंगे। नशों के साथ पुलिस तथा न्यायालय को भी यह गाँव नमस्कार कर लेगा।'

गाँव में काम हो रहा था, यह मानना पड़ेगा। सरकार के आर्थिक सहयोग से गाँव की गलियाँ ईंटों से पाट दी गयी। चार पक्के कुएँ बन गये। बद्रीप्रसादजी, स्वयं एक रात्रि-पाठशाला चलाते हैं और एक पुस्तकालय तथा औषधालय भी उनके उद्योग से स्थापित हो गया है। अधिकांश किसानों ने खाद के व्यवस्थित गढ्ढे बना लिये हैं।

'हमारे दस कार्यकर्ता वर्ष भर में दक्ष हो जायंगें।' मित्र का स्वप्न बहुत बड़ा है। 'उन्हें अगले वर्ष पाँच गांवों में भेजा जा सकेगा और एक वर्ष में वे हमें पचास दक्ष कार्यकर्ता दे देंगे। इस प्रकार प्रतिवर्ष पाँच गुने अधिक ग्राम हम हाथ में ले सकेंगे।'

इस उत्साह में दोनों मित्रों को यह दिखायी नहीं पड़ता था कि मनुष्यों के सम्बन्ध में इस प्रकार अंक गणित का हिसाब कभी सच नहीं निकाला है।

दो महीने भी पूरे नहीं हुए थे कि ग्राम के लोगों का उत्साह शिथिल पड़ने लगा था। बद्रीप्रसादजी और उनके मित्रपर कार्य का भार बढता चला जा रहा था।

'मुझे अपनी बहिन की ससुराल जाना है।'

'मुझे ज्वर आ रहा है।'

'इस समय तो बीज बोनेकी शीघ्रता है।'

जो कार्यकर्ता ग्राम सेवा के लिये प्रस्तुत हुए थे, उनमें एक ने भी पूरा समय कभी नहीं दिया - आरम्भ के आठ-दस दिन छोड़कर। कभी बीज बोना है, कभी फसल काटना है, कभी खलिहान सम्हालना है। किसान के पास कार्य की कमी कहाँ है। फिर उसे कभी रिश्तेदारी में जाना पड़ता है और कभी घर के किसी सदस्य के रोगी होने पर सेवा भी करनी पड़ती है।

कार्यकर्ताओं ने पहले समय देना कम किया, फिर दो-चार दिन लगातार सेवा-कार्य से अवकाश लेने लगे और अन्त में एक-एक करके वे सब तटस्थ होते गये।

'उसने मेरा खेत चुरा लिया है। मैं उसे देख लूंगा।'

जहाँ चार आदमी रहते हैं, कहा-सुनी हो ही जाती है। पशु यदा-कदा छूट ही जाते हैं। जो समझदारी एक बार आयी थी, धीरे-धीरे समाप्त होने लगी।

'बद्रीप्रसाद उसका पक्ष करता है। वह उससे मिला हुआ है।' जब स्वार्थ या द्वेष बलवान होता है और सहिष्णुता नहीं रह जाती, मनुष्य अपने हितैषी को भी शत्रु मानने लगता है।

संगठन स्वार्थ की इस चट्टान से टकराकर टूटता जा रहा था। बद्रीप्रसाद एवं उनके मित्र पर वे लोग आक्षेप करने लगे थे, जिनका स्वार्थ रुकता था या जो अपने मनोनुकूल निर्णय कही करा पाते थे। इक्के-दुक्के मुकदमें भी प्रारम्भ हुए और उन्होंने फुट को बढाने में सहायता भी की।

'हम दोनों कब तक इस गाडी को पेल सकेंगे?' अन्त में बद्रीप्रसाद के मित्र हताश होने लगे। उन्हें अपने भीतर स्पष्ट थकावट का अनुभव होने लगा। सच तो यह है कि उनका उत्साह एक स्वप्न को लेकर था - ग्राम, परगना, तहसील, जिले के क्रम से कुछ गिने-चुने वर्षों में एक सुदृढ़ अखिल भारतीय किसान संगठन और उसका वह सर्वोच्च नेता - इतना महान स्वप्न जिसका भग्न हो जाय, वह हिमालय के शिखर से नीचे नहीं गिरेगा? उसका उत्साह चूर-चूर होकर बिखर जाय तो क्या आश्चर्य।
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'हम दोनों ही अब यहाँ से बाहर चले जाना चाहते हैं। ' बद्रीप्रसादजी ने अपने सबसे श्रद्धय उन वृद्ध कर्मठ महापुरुष से प्रार्थना की। 'आप कुछ कर सकें तों इस गाँव के लिये भी कीजिये।'

'सेवा का कार्य वही कर सकता है, जिसकी कर्म में निष्ठा है, जो अपने उद्योग को - अपने श्रम को ही अपना सबसे सुन्दर फल और महान पुरस्कार मानता है।' उन वृद्ध ने कहा। 'मेरे बच्चों।'

'फलाशा के सुनहले स्वप्न तथा निराशा के प्रबल झोंके, ये दोनों कर्म के राजमार्ग के दो ओर हैं। एक उत्तुंग शिखर है, दूसरा गहरा खड्ड - इन दोनों से बचकर चलना है तुम्हें।'

'कार्यकर्ता सब-के-सब बहाने बनाकर पृथक हो गये।' बद्रीप्रसाद ने स्थिति का स्पष्टीकरण किया। 'जिनके लिये श्रम करते हैं, वे पक्षपाती, स्वार्थी और पता नहीं क्या-क्या कहते हैं।'

'ऐसी स्थिति में कोई कबतक लगा रहे, यही कहना चाहते हो ना।' तनिक हंसे वे वृद्ध। 'सफलता, सुयश एवं सम्मान तुम्हारा पुरस्कार नहीं है। इन्हें पुरस्कार के रूप में पानेकी कामना हो तो तुम्हारा सेवा कार्य से पृथक होना ही अच्छा, अन्यथा तुम्हारे द्वारा अनजान में ही कुसेवा होने लगेगी, तुम परार्थ के स्थान पर स्वार्थ चाहोगे। और जहाँ स्वार्थ है - छल, पार्टीबंदी, असत्य, द्वेष, द्रोह, आक्षेप, हिंसा, प्रतिहिंसा आकर रहते है।'

'आप कहना क्या चाहते हैं?' बद्रीप्रसाद गंभीर हुए। वे समझने लगे थे कि उनसे कहाँ भूल हुई है।

'स्वप्न मत देखो। कर्मिष्ठ व्यक्ति भूमि पर रहता है। वर्तमान से संतुष्ट और निराश मत हो। यह तो अन्धकूप में कूदने के समान है।' वृद्ध ने भी पूरी गम्भीरतापूर्वक समझाया। 'तुम जो श्रम, जो उद्योग कर रहे हो - यहीं तुम्हारा पुरस्कार है।'

'उस श्रम को नष्ट करने वाली शक्तियाँ बढ़ रही हैं।' बद्रीप्रसाद की यही मुख्य कठिनाई थी।

'वे तो सदा से हैं। तुम्हारा उत्साह प्रबल था तो वे दीख नही रही थीं। उत्साह शिथिल हुआ तो वे ऊपर आ गयी।' अब वे वृद्ध एक गम्भीर दार्शनिक की भाँति बोल रहे थे। 'देखो, सृष्टि में विनाश तो सदा सक्रिय है। उसके लिए कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता। एक भवन, एक पदार्थ, एक संस्था या एक अन्तःकरण - किसी एक की सुरक्षा एवं स्वच्छता का प्रयत्न शिथिल कर दो, वह मलिन होता जायगा, क्षीण होता जायगा, नष्ट होता जायगा। नवनिर्माण एवं निर्मित को बनाए रखने के लिए, स्वच्छता के लिए निरन्तर जागरूक एवं कर्मशील रहना है। यह कर्म ही हमारा पुरस्कार है।'

'जहाँ कर्म जाग्रत नहीं रहेगा - वह मर जायगा?' बद्रीप्रसाद ने पूछा।

'बच्चे। यह सृष्टि ब्रह्मा के संकल्प से चलती है। वे जब अपना संकल्प त्यागकर सो जाते हैं, यहाँ प्रलय हो जाती है।' वृद्ध ने सूत्र सूना दिया। 'लोक मंगल हो, आत्मकल्याण हो या और कुछ हो, उसमें प्रयत्न की निश्चिन्तता का कुछ अर्थ नहीं। जबतक प्रयत्न है, तभी तक सुरक्षा एवं स्वच्छता है। इसी से कहता हूँ - भागो मत। कहीं भी जाओगे, सेवा में ये सब बाधाएँ आयेंगी ही। तुम्हारा कर्म में ही अधिकार है। कर्म को ही अपना पुरस्कार मानो। उसी में तुम स्वतंत्र हो।'

आगे क्या हुआ, पता नहीं। उस दिन तो वे दोनों युवक उत्साह लेकर लौट आये थे।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 9

|| श्री हरि: ||
13 - ज्ञानी

आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भविंत इत्थम्भूतगुणो हरि:।।

'तुम काश्मीर से स्वास्थ्य सुधार आये?' श्रीस्वामीजी ने समीप बैठे एक हृष्ट-पुष्ट संम्भ्रान्त नवयुवक से पूछा।
'जी, अभी परसों ही घर लौटा हूँ। लगभग छ: महीने लग गये वहाँ। बड़ा रमणीक प्रदेश है।' युवक संभवत: बहुत कुछ कहना चाहता था।

'सो तो है, किन्तु' स्वामीजी वहां के सौष्ठव का गुणगान सुनने को तनिक भी उत्सुक नहीं थे। उनका स्वभाव नही है इधर-उधर की बातों में लगने का। 'यह छ: महीने का श्रम, अहर्निश शरीर की सेवा, निरन्तर स्वास्थ्य का ध्यान, क्या फल है इसका? वर्षों का श्रम एक क्षण में नष्ट हो जाता है। क्या दशा हो इस काश्मीर प्रवास के छः महीने के सुपरिणाम की, यदि केवल एक दिन कसकर ज्वर आ जाये?' युवक ने मस्तक झुका लिया। वह सिहर उठा था।

'डरो मत। मैं न कोई शाप दे रहा हूँ और न कोई भविष्यवाणी कर रहा हूँ। केवल एक बात कह रहा हूँ।' युवक की भीत मुद्रा महात्मा से छिपी न रही। 'जिसपर ज्वर का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, जो कभी अस्वस्थ नहीं होता, वस्तुतः वही तुम्हारा स्वरूप है।'

'जी इस शरीर का क्या ठिकाना। आज है तो कल नहीं।' एक सेठजी ने, जो बहित समीप ही बैठे थे, बड़ी नम्रता से बात आगे चलायी। 'इसके द्वारा तो जो कुछ पुण्यकार्य हो जाय, वही थोड़ा है।'

'आप प्रसिद्ध दानी हैं। आपका सुयश बहुत व्यापक है।' स्वामीजी ने सेठजी के आत्म-प्रशंसा-प्रयत्न को लक्षित कर लिया था। 'यश धर्म के द्वारा ही प्राप्त होता है, अतः वह दूसरी कामनाओं से श्लाध्य है।'

'मैं कहाँ कुछ कर पाता हूँ।' कोई भी समझ लेता कि सेठजी की यह नम्रता स्वाभाविक नही है।

'मैं दूसरी बात कह रहा था। यश का संबंध भी स्थूल शरीर से ही है।' स्वामीजी का स्वभाव हो गया है, प्रत्येक बात को घुमा-फिराकर अध्यात्मचर्चा का रूप दे देना। 'मरने पर क्या सम्बन्ध रहेगा तुम्हारा इस सुयश से? तुम कह सकते हो कि पिछले किसी भी जन्म में तुम्हीं नेपोलियन, राणा प्रताप या दूसरे कोई विख्यात पुरूष नहीं थे? क्या सुख देती है तुम्हें वह पुर्व प्रख्याती? किसका सुयश और किसका कुयश? सभी यश-अपयश तुम्हारे ही तो हैं। जो परम प्रख्यात, एक एवं अविभाज्य है, उसको यश या अयश देगा भी कौन?'

'घनन, घनन' मन्दिर की घण्टी बज उठी। बड़ा घण्टा बजाया जाने लगा। नगाड़ेपर चोप पड़ी और पुजारी ने मन्दिर का पर्दा हटा दिया भीतर से। दक्षिण हाथ में आरती का प्रदीप एवं वाम में घण्टी लिये वह खड़ा था मूर्ती के समीप। 'श्रीबाँके बिहारीलाल की जय।' सबसे पहले स्वामीजी ही उठ खड़े हुए थे दर्शनार्थ। वस्तुतः तो सभी दर्शनार्थ ही आये थे। मन्दिर के पट बंद होने के
कारण प्रांरण में ही बैठ गये थे और स्वामाजी से बातचीत प्रारम्भ हो गयी थी।

'बडे विचित्र हैं ये स्वामीजी भी।' बाहर आते ही एक ने कहा। स्वामीजी तो अभी भी दर्शनार्थियों में सबसे पीछे खड़े थे और पट बन्द होने के भी दो-चार क्षण पश्चात तक खड़े रहेंगे। उनका तो यही नित्य नियम है। 'बातें तो बडी गम्भीर करते हैं। तत्वज्ञान से नीचे बोलते ही नही और मन्दिर में बच्चों की भाँति आँसू बहाते खड़े हैं।' सम्भवत: स्वामीजी को उन्होंने प्रथम बार
देखा है।

'वे केवल रोते ही नहीं, खूब कूद-फाँदकर नाचते भी हैं।' दूसरे ने गम्भीरता से ही कहा। 'उनकी कुटिया पर कभी कीर्तन के समय आप पधारें तो देखेंगें। यह ब्रज है भाई साहब! यहाँ की वायु में बड़े-बड़े बह जाया करते हैं। आप अभी नये-ही-नये आये हैं यहां।' दोनों साथ-ही-साथ आगे निकल गये।
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(2)
दर्शक चौंक पड़े थे। छोटी-मोटी भीड़ ने उन्हें आवृत कर लिया था। सबको आशचर्य था कि नित्य सबके पीछे शान्त खड़े अश्रु बहाने वाले महात्मा आज इस प्रकार क्यों अट्टहास कर रहे हैं। क्यों इस प्रकार लोट-पोट हो रहे हैं। आज न तो वे भगवद्विग्रह को प्रणाम करते हैं और न उठकर खड़े होते हैं। पागल तो नहीं हो गये।

स्वामीजीने श्रीयमुनाजी के किनारे एक झोपड़ी डाली थी। आज तो भक्तों ने उसे भव्य भवन बना दिया है। चारों ओर पुष्पित उपवन से आवृत हो गया है उनका 'गोविन्द-निवास'। आज कई वर्ष से वृन्दावन की सीमा से बाहर नहीं गये हैं वे।

वेदान्त के वे विख्यात आचार्य हैं। उनके लिखित ग्रन्थों की पंक्तियाँ दूसरे बड़े-बड़े विद्वान कठिनता से लगा पाते हैं। न्याय तो जैसे उन्हीं के मुख से बोलता है और योग की क्रियाएँ उनसे भली प्रकार यहाँ कौन समझता सकता है? कर्म-सिद्धान्त, व्याकरण, साहित्य, कोई भी विषय ऐसा नहीं, जिसमें कोई स्वामीजी की शिष्यता का भी ठीक-ठीक गर्व कर सके। भगवती मरालवाहिनी ने इस युग में उनको ही चुना है अपने वरदहस्त का अधिकारी। ऐसा उद्भट एवं प्रख्यात विद्धान, नैष्ठिक वीतराग इस प्रकार मन्दिर में हँसते-हँसते लोट-पोट हो, पागल नहीं तो और क्या कहा जाय उसे?

'मैं हूँ, मैं हूँ, मैं ही हुँ!' आत्मचिन्तन अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया। इन्द्रिय-निग्रह का प्रश्न ही व्यर्थ था। मन केन्द्र पर एकाग्र हो गया। बुद्धि ने मन से एकात्मता प्राप्त कर ली। शरीर विस्मृत हो चुका था और तब दृश्य की चर्चा करना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती।

स्थिर आसन पर पर्याप्त समय बीत चुका था। प्राणों की गती को मन की गती स्थिरता ने ठप कर दीया था। आप उसे धारणा-ध्यान तथा समाधि का एकीकरण कह सकते हैं। जैसे एक तरंगायमान तत्व है। आकृतियाँ तरंगों का रूप मात्र हैं। तरंगें सीधी होती गयी और अन्तत: एक स्थिर, शान्तस्थिति थी। उसके पश्चात। वह भी नहीं कह सकते कि उसके पश्चात क्या हुआ। क्या स्थिति रही ।

धीरे-धिरे नेत्र खुले। सम्मुख हँसती हुई ललित-त्रिभंगी मूर्ति विराजमान थी। मध्य के दर्शकों पर दृष्टि गयी ही नहीं। जैसे आज दर्शकों की सत्ता ही नहीं थी। थी वह शरारतभरी मुसकराती मूर्ति और पूर्णता से उत्थित हुए वे। आज कुछ अधिक पहले दर्शनार्थ आ गये थे स्वामीजी। उस समय मन्दिर-प्रांगण में कोई भी नही आया था। सामने के बरामदे में ठीक मन्दिर के द्वार के सम्मुख बैठ गये आसन लगाकर। न बिछाने को आसन की आवश्यकता हुई और न कोई उपकरण। नेत्र बन्द हो गये अपने-आप।

'त्वमेवेदं सर्वम्' जैसे मूर्ती बढ़ रही थी, बढ़ती जा रही थी। सम्पूर्ण अनन्त विराट उसने अपने में अन्तर्हित लिया। 'रोम-रोम प्रति राजहिं कोटी-कोटी ब्रह्मांड।' उसमें साकार हो उठा। नहीं - यह सब कुछ नहीं। न ब्रह्मांड न ब्रह्मांड की कोई विशेषता। केवल वही-वही - एकमात्र वही। नेत्र खुले थे, किंतु सन्यासी स्तब्ध हो गये। मूक-चेष्टाहीन।

'क्या निर्वाण तो नहीं लेंगे स्वामीजी यहीं?' लोगों में हलचल मच गयी। फटे-फटे नेत्र, जडवत् शरीर। स्वामीजी की इस स्थिति ने लोगों को भयभीत कर दिया।

'नाहं न में' धीरे-धीरे पलकें हिली। शरीर में चेतेना के लक्षण प्रगट हुए। कुछ बड़बड़ा रहे थे स्वामीजी। 'मैं ही हूँ और मैं नही, केवल तू ही है। बड़ा सुन्दर है तब तो। हम दोनों मित्र हैं। अभेद ही तो मित्रत्व है।' वे ठठाकर हँस पड़े।

'सुहृद सर्वभूतानाम्' वह मन्दिर का देवता तो जाने कब का स्वीकार कर चुका है। स्वामीजी ने फिर कह-कहा लगाया 'बड़ा प्रसन्न हुआ होगा वह ऋषि, जिसने समाधि में वेदमन्त्र का अर्थ स्पष्ट किया होगा।' एक क्षण रुक गये वे। दूसरे ही क्षण उनका कण्ठ सस्वर था - 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखायौ।'
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(3)
जय कन्हैया लालकी। गिरधर गोपाल की।।

एक चमचमाते थाल में ढेरों बत्तियाँ जलायी गयी थी। मध्य में कपूर की सुगन्धित लपटें उठ रही थीं। दाहिने हाथपर ऊपर से नीचे नाच रहा था थाल। स्वामीजी का नृत्य उद्दाम हो गया था। उत्तरीय गिर चुका था कौपीन के ऊपर का अधोवस्त्र। केवल कौपीन पहिने वह कुछ स्थूलकाय, मुण्डित मस्तक, गौरवर्ण, तेजमूर्ती थिरक रहे थे। नेत्र जैसे छत की ओर किसी को देख रहे थे। उनसे आनन्दाश्रु चल रहे थे। प्रांगण की भीड़ कभी इधर, कभी-उधर हट-बढ़ रही थी। उन्हें भीड़ का सम्भवतः भान भी नहीं था।
आज जन्माष्ठमी थी। कई दिनों से प्रतिवर्ष की भाँति स्वामीजी के यहाँ महोत्सव की प्रस्तुति हो रहीं थी। केले के खम्भों पर की छित्रकला संगमरमर की भ्रांती उत्पन्न कर रही थी। मोगरे के फूलों से पुरा मन्दिर ही बना डाला गया था। पर्याप्त दर्शनार्थी आ गये थे जन्म के समय।

पूर्व दिशा में अनुराग बिखर गया। निशीथ का ठीक समय आ पहुँचा। कुमुदकान्त की प्रथम किरण क्षितिज पर थिरक उठी। साथ ही यमुना किनारे एक धड़ाका हुआ। जैसे मन्दिर की वह पीतयवनिका फट गयी हो। पर्दा हटाने में सीमा की स्फूर्ति प्रदर्शित की पुजारी ने।

बाहर शहनाई का मधुर स्वर गूँज रहा था। मन्दिर में घण्टा, घड़ियाल के शब्द कों दबाकर अष्टादश शंख अपने निनाद से संभवत: सृष्टि संलग्न स्त्रष्टा को उनके ब्रह्मलोक में भी सूचित करने दौड़ा जा रहा था पितामह, कन्हैया के जन्म का समय आ गया। एक क्षण को अपने व्यस्त हाथ रोकिये और आप भी ताली बजाकर गाइये तो सही 'जय कन्हैया लाल की।'

ब्राह्मणों ने वेदध्वनी प्रारम्भ की। दुग्धाभिषेक के अनन्तर सहस्त्र तुलसीदल समान्त्रिक चढाये गये। षोडशोपचार पूजन हुआ। अन्त में पुजारी ने आरती की। नीराजन का थाल लेकर दर्शकों को आरती देने मन्दिर से बाहर निकला था वह। अबतक स्वामीजी एकटक मन्दिर में पलने की ओर देख रहे थे। सहसा आगे बढ़े और पुजारी से थाल ले लिया उन्होंने।

'ओह! आपकी तो पूरी हथेली ही फफोला हो गयी है।' प्रसाद वितरण हो चुका था। रात्रि जागरण करना ही था और भजनीकों के तबले की खुट-खुट अभी घंटे भर से कम समय न लेगी। सितार के कान एँठते भी समय लगेगा ही। स्वामीजी को घेर कर कुछ लोग बैठ गये थे। 'अंगुलियों के फफोले तो फुट गये हैं। आरती के थाल के नीचे एक गमछा भी नहीं रखा गया।' दुखित स्वर था कहने वाले का। घृत लगाने लगे वे उस दाहिने हाथ में।

'पवित्र हो गया यह मांसपिण्ड।' स्वामीजी जैसे कोई कष्ट ही नहीं हुआ और न हो रहा था। 'आज जन्माष्टमी है तुम यदि देख सकते है।' उनका कंठ भर आया था। अश्रु टपकने लगे थे। नेत्र अधमुंदे हो चले थे।

'तपोलोक में सब महर्षि ही रहते हैं। बड़ी-बड़ी ज़टा और दाढ़ियों वाले महर्षि।' तनिक आश्वस्त हो कर उन्होंने कहा। 'चिरशिशु सनकादि चारों कुमार ताली बजाते, उछलते-कूदते सचमुच आज शिशु हो जाते हैं। 'जय कन्हैया लाल की।' सबकी दाढियाँ हिला आते हैं। सबकी गम्भीरता, आत्मनिष्ठा आनन्द में डूब जाती है। उन पूर्वजों के पूर्वजों को कौन रोके?' एक-एक योगिराज अपने अन्तर्नेत्रों से तपोलोक का साक्षात करते होंगे, यह किसी के लिये सन्देह का विषय नहीं था।

'सनकादि तो परम ज्ञानी हैं' मैंने ही शंका की।

'तुम क्या समझते हो कि ज्ञानी हृदयहीन होता है?' बड़ी सुन्दर फटकार पड़ी मुझपर। 'वह आनन्द कल्लोलिनी में कभी स्नान कर ही नही पाता? अरे, तुम्हे इतना भी पता नहीं कि सभी शरीरधारियों के लिये फिर वे दिव्य शरीरी हों या भौतिक शरीरधारी, एक ही प्रशस्त मार्ग है -

हिय निरगुन, नयननि सगुन, रसनाराम सुनाम ।
मनहु पुरट सम्पुट लसत, 'तुलसी' ललितललाम ।।
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(4)
'कोई भी काम निरुद्देश्य नहीं किया जा सकता। कुछ-न-कुछ कामना तो होती है उसके मूल में।' मेरा समाधान नही हो सका था जन्माष्टमीको। उस समय अवसर नही था। स्वामीजी भाव-विभोर हो रहे थे। बहुत से लोग थे वहाँ। मैंने आज दोपहरी का एकान्त अवसर अनुकूल पाया था। स्वामीजी भी स्वस्थ थे। 'ज्ञानी पूर्णकाम होता है। वह कोई भी प्रयत्न क्यों करेगा?'

'तुम चाहते हो कि ज्ञानी भोजन-पान-शयन एवं श्वास-प्रश्वास भी बंद कर दे।' स्वामीजी तनिक हंस रहे थे। 'उसके लिए जीवन अपराध है। उसे मर जाना चाहिए और वह भी मरने का बिना कोई प्रयास किये। क्यों?' खुलकर हंसना उनके लिए नवीन बात नहीं है।

'मेरा ऐसा उद्देश्य तो नहीं है।' मैं भी गम्भीर नहीं रह सका। 'प्रकृति प्रेरित कार्य तो उसके द्वारा होंगे ही, किंतु वे कार्य जो अप्रयास नहीं होते, जिन्हें प्रयत्नपूर्वक करना पड़ता है, जिनके लिए प्रकृति विवश नहीं करती, उनके लिए वे क्यों प्रयतन करेंगे? विधि-निषेध का बन्धन तो है नहीं उनके लिए और कोई कामना शेष रही नहीं है।'

'ठीक तो है। तुमको इसमें पूछना क्या रह गया है!' स्वामीजी ने मेरे तर्क को ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया। 'यदि तुम किसी व्यक्ति विशेष की चर्चा कर रहे हो तो मैंने किसी का ठेका नहीं लिया है और यदि मेरे सम्बन्ध में तुम्हें शंका हो तो तुमसे कहा किसने कि मैं ज्ञानी हूँ?'

'मैं किसी की समालोचना नहीं कर रहा हूँ।' स्वामीजी की स्पष्टवादिता ने मुझे कुण्ठित कर दिया था। 'जब प्रयत्न नहीं किया जाता तो हृदय में जो कुछ है, मन उसका चिंतन करता है और वाणी उसी को प्रकट करती है।' मैंने अपना प्रश्न अब भी स्पष्ट न करके भूमिका ही विस्तृत की।

'अच्छा इतना ओर जोड़ दो कि यदि मन में उसे चिन्तन करने और वाणी में उसे प्रकट करने की शक्ति हो।' वे खिलखिलाकर हंस पड़े। मैं जो कुछ कहनेवाला था, उसे समझ लिया था उन्होने। 'भोले बच्चे! तुम गोस्वामी तुलसीदास के वचनों पर शंका करते हो?' चेतावनी के साथ स्नेह और आत्मीयता थी स्वर में।

'मैं केवल समझना चाहता हूँ।' मैंने सच ही कहा। कुतर्क करना भी चाहूँ तो विवाद में स्वामीजी से पार पाने का स्वप्न देखना भी मेरे लिये सम्भव नहीं हो सकता।

'वाणी कोई-न-कोई नाम ही ले सकती है। किसी-न-किसी का गुण दोष ही कहेगी वह। क्यों न वह भगवन्नाम ले और भगवान का ही गुण गाये, यदि उसे मौन नहीं रहना है।' गम्भीर थी वह वाणी।स्थिर दृष्टि जैसे सीधे हृदय तक जाकर उसे पढ़ रही थी। 'नेत्र व्यक्ति को ही देखेंगे और तब मायिक को देखने के बदले वे अमायिक सगुण-साकार के दर्शनार्थ क्यों न समुत्सुक बने?' एक क्षण को रुक गये कुछ सोचते हुए।

'निर्गुण तो हृदय की ही वस्तु है। उसका तो केवल अनुभव हो सकता है।' फिर वही सुशान्त वाणी गुँजी। 'मन बिना कुछ सोचे तो रहेगा नहीं। निर्गुण को भला क्या सोचेगा वह। विश्व एवं विषयों के चिन्तन से तो यही परम श्रेष्ठ है कि वह लीलामय, सकल गुणगणार्णव की दिव्य लीलाओं, परमपावन गुणोंका चिंन्तन करे।'

'क्या श्रेष्ठ है और क्या निकृष्ट, क्या चाहिये और क्या नही चाहिये, यह एक आप्तकाम आत्माराम सोचे ही क्यों?' मैं समझ रहा था कि संभवत: जिज्ञासा हठधर्मी का रूप लेती जा रही है। फिर भी प्रश्न तो हो गया । 'ज्ञानी के नेत्र जो चाहें सो देखें। मन जो चाहे सो सोचे।'

'वही तो होता है।' स्वामीजी भावजगत में पहुँच गये। 'माया तो उससे भीत होकर भाग जाती है। प्रकृति उसे प्रेरित नहीं करती। उसे वह चीर-चोर प्रेरित करने लगता है। उसकी स्वतःचालित गति सर्वसामान्य से भिन्न हो जाती है।' मुझे स्मरण आया -

अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्याः
स्वाराज्यसिहांसनलब्धदीक्षा:।
शठेन केनापि वयं हठेन
दासीकृता गोपवधुविटेन।।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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