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योग

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13 days ago

|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 9

||श्री हरिः||
6 - भगवत्प्राप्ति

'मनुष्य जीवन मिला ही भगवान को पाने के लिए है। संसार भोग तो दूसरी योनियों में भी मिल सकते हैं। मनुष्य में भोगों को भोगने की उतनी शक्ति नहीं, जितनी दूसरे प्राणियों में है।' वक्ता की वाणी में शक्ति थी। उनकी बातें शास्त्रसंगत थी, तर्कसम्मत थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि उनका व्यक्तित्व ऐसा था जो उनके प्रत्येक शब्द को सजीव बनाये दे रहा था। 'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।भगवत्प्राप्ति हो गई तो जीवन सफल हुआ और न हुई तो महान हानि हुई।'

प्रवचन समाप्त हुआ। लोगों ने हाथ जोड़े, सिर झुकाया और एक-एक करके जाने लगे। सबको अपने-अपने काम हैं और वे आवश्यक हैं। यही क्या कम है जो वे प्रतिदिन एक घंटे भगवच्चर्चा भी सुनने आ बैठते हैं। परंतु अवधेश अभी युवक था, भावुक था। उसे पता नहीं था कि कथा पल्लाझाड़ भी सुनी जाती है। वह प्रवचन में आज आया था और उसका हृदय एक ही दिन के प्रवचन ने झकझोर दिया था।

सब लोगों के चले जाने के बाद उसने वक्ता से कहा - 'मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है, उपाय बतलाइये।' वक्ता बोले - 'बस, भगवान् को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होनी चाहिए, फिर घर के सारे काम भगवान की पूजा बन जाएंगे।' उसने कहा - 'महाराज! घर में रहकर भजन नहीं हो सकता। आप मुझे स्नेहवश रोक रहे हैं, पर मैं नहीं रुकूंगा।' इतना कहकर वक्ता को कुछ भी उत्तर देने का अवसर दिए बिना ही युवक तुरंत चल दिया।

'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।' सात्विक कुल में जन्म हुआ था। पिता ने बचपन से स्त्रोतपाठादि के संस्कार दिये थे। यज्ञोपवीत होते ही त्रिकाल-संध्या प्रारंभ हो गई, भले पिता के भय से प्रारंभ हुई हो। ब्राह्मण के बालक को संस्कृत पढ़ना चाहिए, पिता के इस निर्णय के कारण कालेज की वायु लग नहीं सकी। इस प्रकार सात्विक क्षेत्र प्रस्तुत था। आज के प्रवचन ने उसमें बीज वपन कर दिया। अवधेश को आज न भोजन रुचा, न अध्ययन में मन लगा। उसे सबसे बड़ी चिंता थी - उसका विवाह होने वाला है। सब बातें निश्चित हो चुकी हैं। तिलक चढ़ चुका है। अब वह अस्वीकार करे भी तो कैसे और - भगवान को पाना है, इस बंधन में पड़े तो पता नहीं क्या होगा।

दिन बीता, रात्रि आयी। पिता ने, माता ने तथा अन्य कई ने कई बार टोका - 'अवधेश! आज तुम खिन्न कैसे हो?' परंतु वह, किससे क्या कहे। रात्रि में कहीं चिंतातुर को निद्रा आती है। अंत में जब सारा संसार घोर निद्रा में सो रहा था, अवधेश उठा। उसने माता-पिता के चरणों में दूर से प्रणाम किया। नेत्रों में अश्रु थे, किंतु घर से वह निकल गया।

'अवधेश का स्वास्थ्य कैसा है?' प्रातः जब पुत्र नित्य की भांति प्रणाम करने नहीं आया, तब पिता को चिंता हुई।

'वह रात को बाहर नहीं सोया था?' माता व्याकुल हुई। उन्होंने तो समझा था कि अधिक गर्मी के कारण वह बाहर पिता के समीप सोया होगा।

पुत्र का मोह - कहीं वह स्वस्थ, सुंदर, सुशील और गुणवान हो, मोह तो माता-पिता को कुरूप, क्षुद्र, दुर्व्यसनी पुत्र का भी होता है। विद्या-विनय सम्पन्न युवक पुत्र जिसका चला जाये, उस माता-पिता की व्यथा का वर्णन कैसे किया जाय। केवल एक पत्र मिला था - 'इस कुपुत्र को क्षमा कर दें! आशिर्वाद दें कि इसी जीवन में भगवत्प्राप्ति कर सकूँ।'
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'आपने यहां अग्नि क्यों जलायी?' वन का रक्षक रुष्ट था - 'एक चिंगारी यहां सारे वन को भस्म कर सकती है।'

'रात्रि में वन पशु न आवें इसलिए!' अवधेश - अनुभवहीन युवक, वह सीधे चित्रकूट गया और वहां से आगे वन में चला गया। उसे क्या पता था कि पहले ही प्रातः काल उसे डांट सुननी पड़ेगी। अत्यंत नम्रतापूर्वक कहा उसने - 'मैं सावधानी से अग्नि बुझा दूंगा।'

'बिना आज्ञा के यहाँ अग्नि जलाना अपराध है।' वन के रक्षक ने थोड़ी देर में ही अवधेश को बता दिया कि भारत के सब वन सरकारी वन-विभाग द्वारा रक्षित हैं। वहां अग्नि जलाने की अनुमति नहीं है। वहाँ के फल-कंद सरकारी सम्पत्ति हैं और बेचे जाते हैं। वन से बिना अनुमति कुछ लकड़ियां लेना भी चोरी है।

'हे भगवान!' बड़ा निराश हुआ अवधेश। वन में आकर उसने देखा था कि उसे केवल जंगली बेर और जंगली भिंडी मिल सकती है। वह समझ गया था कि ये भी कुछ ही दिन मिलेंगे, किंतु वैराग्य नवीन था। वह पत्ते खाकर जीवन व्यतीत करने को उद्यत था, परंतु वन में तो रहने के लिए भी अनुमति आवश्यक है। आज कहीं तपोवन नहीं है।

'आप मुझे क्षमा करें। मैं आज ही चला जाऊँगा।' वन-रक्षक से उसने प्रार्थना की। वैसे भी जंगली भिंडी और जंगली बेर के फल के आहार ने उसे एक ही दिन में अस्वस्थ बना दिया था। उसके पेट और मस्तक में तीव्र पीड़ा थी। लगता था कि उसे ज्वर आने वाला है।

'आप मेरे यहाँ चलें।' वन-रक्षक को इस युवक पर दया आ रही थी। यह भोला बालक तपस्या करने आया था - कहीं यह तपस्या का युग है। 'आज मेरी झोपड़ी को पवित्र करें।'

अवधेश अस्वीकार नहीं कर सका। उनका शरीर किसी की सहायता चाहता था। उनके लिए अकेले पैदल वन से चित्रकूट बस्ती तक जाना आज सम्भव नहीं रह गया था। 'यदि ज्वर रुक गया - कौन कह सकता है कि वह नहीं रुकेगा।' अवधेश तो कल्पना से ही घबरा गया। उसने सोचा ही नहीं था कि वन में जाकर वह बीमार भी पड़ सकता है।
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'आप मुझे अपनी शरण में ले लें।' बढ़े केश, फटी-सी धोती, एक कई स्थानों से पिचका लोटा - युवक गौरवर्ण है, बड़े-बड़े नेत्र हैं, किंतु अत्यंत दुर्बल है। सम्भ्रांत कुल का होने पर भी लगता है कि निराश्रित हो रहा है। उसने महात्मा के चरण पकड़ लिये और उनपर मस्तक रखकर फूट-फूटकर रोने लगा।

'मुझे और सारे विश्व को जो सदा शरण में रखता है, वही तुम्हें भी शरण में रख सकता है।' ये महात्माजी प्रज्ञाचक्षु हैं। गंगाजी में नौका पर ही रहते हैं। काशी के बड़े से बड़े विद्वान भी बड़ी श्रद्धा से नाम लेते हैं इनका। इन्होंने युवक को पहचाना या नहीं, पता नहीं किंतु आश्वासन दिया - 'तुम पहले गंगा स्नान करो और भगवत्प्रसाद लो। फिर तुम्हारी बात सुनूंगा।'

'आप मुझे अपना लें। मेरा जीवन व्यर्थ नष्ट हो रहा है।' युवक फूट-फूटकर रो रहा था - 'मुझे नहीं सूझता कि मुझे कैसे भगवत्प्राप्ति होगी।'

'तुम पहले स्नान-भोजन करो।' महात्मा ने बड़े स्नेह से युवक की पीठ पर हाथ फेरा - 'जो भगवान को पाना चाहता है, भगवान स्वयं उसे पाना चाहते हैं। वह तो भगवान को पायेगा ही।'

युवक ने स्नान किया और थोड़ा सा प्रसाद शीघ्रतापूर्वक मुख में डाल कर गंगाजल पी लिया। उसे भोजन-स्नान की नहीं पड़ी थी। वैराग्य सच्चा था और लगन में प्राण थे। वह कुछ मिनटों में ही महात्माजी के चरणों को पकड़कर उनके समीप बैठ गया।
'पहले तुम यह बताओ कि तुमने अबतक किया क्या?' महात्माजी ने तनिक स्मित के साथ पूछा।

'बडा़ लम्बा पुराण है।' अवधेश - हां, वह युवक अवधेश ही है - यह आपने समझ लिया होगा। उसने अपनी बात प्रारंभ की। उसने बताया कि वह खूब भटका है इधर चार वर्षों में। उसे एक योगी ने नेती, धोती, न्यौली, ब्रह्मदांतौन तथा अन्य अनेक योग की क्रियाएँ करायी। उन क्रियाओं के मध्य ही उसके मस्तक में भयंकर दर्द रहने लगा। बड़ी कठिनाई से एक वृद्ध संत की कृपा से वह दूर हुआ। उन वृद्ध संत ने योग की क्रियाएँ सर्वथा छोड़ देने को कह दिया।

'ये मूर्ख!' महात्माजी कुछ रुष्ट हुए - 'ये योग की कुछ क्रियाएँ सीखकर अपने अधूरे ज्ञान से युवकों का स्वास्थ्य नष्ट करते फिरते हैं। आज कहां है अष्टांग योग के ज्ञाता। यम-नियम की प्रतिष्ठा हुई नहीं जीवन में और चल पड़े आसन तथा मुद्राएँ कराने। असाध्य रोग के अतिरिक्त और क्या मिलता है इस व्यायाम के दूषित प्रयत्न में।'

'मुझे एक ने कान बंद करके शब्द सुनने का उपदेश दिया।' अवधेश ने महात्माजी के चुप हो जाने पर बताया - 'एक कुण्डलिनी योग के आचार्य भी मिले। मुझे घनगर्जन भी सुनाई पड़ा और कुण्डलिनी जागरण के जो लक्षण वे बताते थे, वे भी मुझे अपने में दीखे। नेत्र बंद करके मैं अद्भुत दृश्य देखता था, किंतु मेरा संतोष नहीं हुआ। मुझे भगवान नहीं मिले - मिला एक विचित्र झमेला।'

'अधिकारी के अधिकार को जाने बिना चाहे जिस साधन में उसे जोत दिया जाय - वह पशु तो नहीं है।' महात्माजी ने कहा - 'धारणा, ध्यान, समाधि - चाहे शब्दयोग से हो या लययोग से, किंतु जीवन में चांचल्य बना रहेगा और समाधि कुछ क्रिया मात्र से मिल जायगी, ऐसी दुराशा करनेवालों कहा क्या जाय। जो भगवद्दर्शन चाहता है उसे सिखाया जाता है योग....! भगवान की कृपा है तुम पर। उन्होंने तुम्हें कहीं अटकने नहीं दिया।'

'मैं सम्मान्य धार्मिक अग्रणियों के समीप रहा और विश्रुत आश्रमों में। कुछ प्रख्यात पुरुषों ने भी मुझपर कृपा करनी चाही।' अवधेश में व्यंग्य नहीं, केवल खिन्नता थी - 'जो अपने आश्रम-धर्म का निर्वाह नहीं कर पाते, जहाँ सोने-चाँदी का सेवन और सत्कार है, जो अनेक युक्तियां देकर शिष्यों का धन और शिष्याओं का धर्म अपहरण करने का प्रयत्न करते हैं, वहां परमार्थ और अध्यात्म भी है, यह मेरी बुद्धि ने स्वीकार नहीं किया।'

'कलियुग का प्रभाव - धर्म की आड़ में ही अधर्म पनप रहा है।' महात्माजी में भी खिन्नता आयी - 'जहाँ संग्रह है, विशाल सौध हैं, वहां साधुता कहाँ है। जहाँ सदाचार नहीं, इन्द्रियतृप्ति है, वहाँ से भगवान या आत्मज्ञान बहुत दूर है। परंतु इतनी सीधी बात लोगों की समझ में नहीं आती। सच तो यह है कि हमें कुछ न करना पड़े, कोई आशिर्वाद देकर सब कुछ कर दे, इस लोभ से जो चलेगा वह ठगा तो जायगा ही। आज धन और नारी का धर्म जिनके लिए प्रलोभन हैं, ऐसे वेशधारियों का बाहुल्य इसीलिए है। ऐसे दम्भी लोग सच्चे साधु-महात्माओं का भी नाम बदनाम करते हैं।

'मैं करने को उद्यत हूँ।' अवधेश ने चरणों पर मस्तक रखा - 'मुझे क्या करना है, यह ठीक मार्ग आप बताने की कृपा करें।'

'घर लौटो और माता-पिता को अपनी सेवा से संतुष्ट करो।' महात्माजी ने कहा - 'वे चाहते हैं तो विवाह करो। घर के सारे काम भगवान की पूजा समझकर करो - यही तो उस वक्ता ने तुमसे कहा था।

'देव!' अवधेश रो उठा।

'अच्छा, आज अभी रुको।' महात्माजी कुछ सोचने लगे।
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'ये पुष्प अंजलि में लो और विश्वनाथजी को चढ़ा आओ।' प्रातः स्नान करके जब अवधेश ने महात्माजी के चरणों में मस्तक रखा, तब महात्माजी ने पास रखी पुष्पों की डलिया खींच ली। टटोलकर वे अवधेश की अंजलि में पुष्प देने लगे। बड़े-बड़े सुंदर कमल पुष्प - थोड़े ही पुष्पों से अंजलि पूर्ण हो गई। महात्माजी ने खूब ऊपर तक भर दिये पुष्प।

असीघाट से अंजलि में पुष्प लेकर नौका से उतरना और उसी प्रकार तीन मील दूर विश्वनाथजी आना सरल नहीं है। परंतु अवधेश ने इस कठिनाई की ओर ध्यान नहीं दिया। वह पुष्पों से भरी अंजलि लिए उठा।

'कोई पुष्प गिरा तो नहीं?' महात्माजी ने भरी अंजलि से नौका में पुष्प गिरने का शब्द सुन लिया।

'एक गिर गया।' अवधेश का स्वर ऐसा था जैसे उससे कोई बड़ा अपराध हो गया हो।

'कहाँ गिरा, गंगाजी में?' फिर प्रश्न हुआ।

'नौका में' अवधेश खिन्न होकर बोला - 'मैं सम्भाल नहीं सका।'

'न विश्वनाथ को चढ़ सका, न गंगाजी को।' महात्माजी ने कहा - 'अच्छा, अपनी अंजलि के पुष्प मुझे दे दो।'

अवधेश ने महात्माजी की फैली अंजलि में अपनी अंजलि के पुष्प भर दिये। महात्माजी ने कहा - 'बाबा विश्वनाथ!' और सब पुष्प वहीं नौका में गिरा दिये।

'भैया, ये पुष्प विश्वनाथजी को चढ़ गए?' पूछा महात्माजी ने।

'चढ़ गए भगवन।' अवधेश ने मस्तक झुकाया।

'बच्चे! तू जहाँ है, भगवान तेरे पास ही हैं। वहीं तू उनके श्रीचरणों पर मस्तक रख।' महात्माजी ने अबकी कुछ ऐसी बात कही जो भली प्रकार समझ में नहीं आयी।

'वहां किनारे एक कोढ़ी बैठता है।' साधु होते ही विचित्र हैं। पता नहीं कहां से कहां की बात ले बैठे महात्माजी।
'वह बैठा तो है।' इंगित की गयी दिशा में अवधेश ने देखकर उत्तर दिया।

'देख, वह न नेती-धोती कर सकता, न कान बंद कर सकता और न माला पकड़ सकता।' महात्माजी समझाने लगे - 'वह पढ़ा-लिखा है नहीं, इसलिए ज्ञान की बात क्या जाने। परंतु वह मनुष्य है। मनुष्य जन्म मिलता है भगवत्प्राप्ति के लिए ही। भगवान ने उसे मनुष्य बनाया, इस स्थिति में रखा। इसका अर्थ है कि वह इस स्थिति में भी भगवान को तो पा ही सकता है।'
'निश्चय पा सकता है।' अवधेश ने दृढ़तापूर्वक कहा।

'तब तुम्हें यह क्यों सूझा कि भगवान घर से भागकर वन में ही जानेपर मिलते हैं।' महात्माजी ने हाथ पकड़कर अवधेश को पास बैठाया - 'क्यों समझते हो कि गृहस्थ होकर तुम भगवान से दूर हो जाओगे। जो सब कहीं है, उससे दूर कोई हो कैसे सकता है।'
'मैं आज्ञा पालन करुंगा।' अवधेश ने मस्तक रखा संत के चरणों पर। उसका स्वर कह रहा था कि कुछ और सुनना चाहता है - कोई साधन।

'भगवान साधन से नहीं मिलते।' महात्माजी बोले - 'साधन करके थक जाने पर मिलते हैं। जो जहां थककर पुकारता है - 'प्रभो! अब मैं हार गया, वहीं उसे मिल जाते हैं। या फिर उसे मिलते हैं जो अपने को सर्वथा उनका बनाकर उन्हें अपना मान लेता है।'
'अपना मान लेता है?' अवधेश ने पूछा।

'संसार के सारे संबंध मान लेने के ही तो हैं।' महात्माजी ने कहा - 'कोई लड़की सगाई होते ही तुम्हें पति मान लेगी और तुम उसके पति हो जाओगे। भगवान तो हैं सदा से अपने। उन्हें अपना नहीं जानते, यह भ्रम है। वे तुम्हारे अपने ही तो हैं।'

'वे मेरे हैं - मेरे भगवान।' पता नहीं क्या हुआ अवधेश को। वह वहीं नौका में बैठ गया - बैठा रहा पूरे दिन। लोग कहते हैं - कहते तो महात्माजी भी हैं कि अवधेश को एक क्षण में भगवत्प्राप्ति हो गई थी।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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3 months ago

|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 8

।।श्री हरिः।।
2 – ग्रह-शान्ति

'मनुष्य अपने कर्म का फल तो भोगेगा ही। हम केवल निमित्त हैं उसके कर्म-भोग के और उसमें हमारे लिये खिन्न होने की कोई बात नहीं है।' आकाश में नहीं, देवलोक में ग्रहों के अधिदेवता एकत्र हुए थे। आकाश में केवल आठ ग्रह एकत्र हो सकते हैं। राहु और केतु एक शरीर के ही दो भाग हैं और दोनों अमर हैं। वे एकत्र होकर पुन: एक न हो जायें, इसलिये सृष्टिकर्ता ने उन्हें समानान्तर स्थापित करके समान गति दे दी है। आधिदैवत जगत में भी ग्रह आठ ही एकत्र होते हैं। सिररहित कबन्ध केतु की वाणी अपने मुख राहु से ही व्यक्त होती है।

'मनुष्य प्रमत्त हो गया है इन दिनों। अत: उसे अपने अपकर्मों का फल भोगना चाहिये।' शनिदेव कुपित हैं, भूतलपर मनु की संतति जब उनके पिता भगवान् भास्कर की उपेक्षा करने लगती है, मनुष्य जब संध्या तथा सूयोंपस्थान से विमुख होकर नारायण से परांगमुख होता है, शनि कुपित होते हैं। यह उनका स्वभाव है। सूर्य भगवान के अतिरिक्त वे केवल देवगुरु का ही किञ्चित् संकोच करते हैं।

'कलि का कुप्रभाव मनुष्यों को श्रद्धा-विमुख बनाता है।' बृहस्पति स्वभाव से दयालु हैं। उन्हें यह सोचकर ही खेद होता है कि धरा जो रत्नगर्भा हैं, अब अकालपीड़िता, संघर्षसंत्रस्ता, रोग-पीड़िता होकर उत्तरोत्तर अभावग्रस्त होती जायगी। विश्वस्त्रष्टा की महत्तम कृति मानव अब क्षुत्क्षाम, कंकाल-कलेवर, अशान्त भटकता फिरेगा।

'हम कर क्या सकते हैं?' बुध जो बुद्धि के प्रेरक हैं, प्रसन्न नहीं थे। उनके स्वर में भी खेद था - 'हम शक्ति और प्रेरणा दे सकते हैं, किंतु मनुष्य आज कल ऐसी समस्त प्रेरणाओं को विकृत बना रहा है। वह अपनी सम्पूर्ण शक्तियों के दुरुपयोग पर उतर आया है।'

'देवताओं का मनुष्य अर्चन करे। उन्हें अपने यज्ञीय भाग से पुष्ट करे और देवता मनुष्यों को सुसम्पन्न, स्वस्थ, सुमंगलयोजित रखें, यह विधान ब्रह्माजी ने बनाया था।' अकस्मात् ही देवराज इन्द्र आ गये थे उस सभा में। वे वज्रपाणि रुष्ट थे - 'मनुष्य ने यज्ञ का त्याग कर दिया। पितृतर्पण से उसने मुख मोड़ लिया। अब वह कुछ हवन-श्राद्ध करता भी है तो स्वार्थ-कलुषित होता है वह। सम्यक विधि न सही, अल्पप्राण, अल्पशिक्षित नर का अज्ञान क्षमा किया जा सकता है; किंतु जब उसमें सम्यक श्रद्धा भी न हो, जब वह दान तथा पूजन के नाम पर भी स्वजन, सेवक तथा अपने स्वार्थ के पूर्ति-कर्ताओं का ही सत्कार करना चाहे, उसके कर्म सत्कर्म कहाँ बनते हैं?'

'देवता और पितर हव्य-कव्य की अप्राप्ति से स्वतः दुर्बल हो रहे हैं।' देवराज ने दो क्षण रुककर कहा। 'हमारे आशीर्वाद की मनुष्य को अपेक्षा नहीं रही है। वह अपने बुद्धिबल से ही सब कुछ प्राप्त कर लेना चाहता है। अत: आप सबका यह योग यदि धरा पर आपत्तियों का क्रम प्रारम्भ करता है तो इसमें न आपका दोष है और न
देवताओं का।'

'युद्ध, अकाल, महामारी - बहुत दीर्धकाल तक चलेगा यह प्रभाव।' सूरगुरु ने दयापूर्वक कहा। 'अल्पप्राण आज का अबोध मनुष्य आपकी कृपा का अधिकारी है। कलि के कल्मष से दलित प्राणी आपके कोप के योग्य नहीं।'

'मैं कोई आदेश देने नहीं आया। आप सब यदि आपकी अर्चा धरा पर हो अथवा आप कृपा करना चाहें, अपने कुप्रभाव को सीमित कर सकते हैं।' देवराज ने कहा। वैसे विपत्ति विश्वनियन्ता का वरदान है मनुष्य के लिये। उसे वह प्रमाद से सावधान करके श्रीहरि के सम्मुख करती है। मनुष्य भगवान के अभिमुख हो, यही उसकी सबसे बड़ी सेवा है।'

'आप चाहते हैं कि मनुष्य भोगविवर्जित रहे? संगीत, कला, विनोद तथा विलास केवल सूरों का स्वत्व बना रहे?' शुक्राचार्य ने व्यंग किया।

'मैं आचार्य से विवाद नहीं करूँगा। वैसे वैभव देकर मनुष्य को विषयोन्मुख कर देना उसका अहित करना है, यह मैं मानता हूँ। मनुष्य तो आज वैसे ही बहिर्मुख हो रहा है।' देवराज ने अपनी बात समाप्त कर दी। 'मैं केवल एक प्रार्थना करने आया था। ब्रह्मावर्त के उस तरुण की चर्चा अनेक बार आपने देवसभा में सुनी है। देवताओं, पितरों की ही नहीं, आप सबकी (ग्रहों की) वह सत्ता मानता है, शक्ति मानता है और फिर भी सबकी उपेक्षा करता है। उसे विशेष रूप से आप ध्यान में रखेंगे।'

'जो आस्थाहीन हैं, उन पर दया की जा सकती है। वे अज्ञ अभी समझते ही नहीं; किंतु जो जानता है, आस्था रखता है, वह उपेक्षा करे - मैं देख लूंगा उसे।' क्रूर ग्रह मंगल के सहज अरुण नेत्र अंगार बन गये।

'वह आश्रम-वर्णविवर्जित एकाकी मानव लगता है कि देवराज के लिये आतंक बन गया है।' शुक्राचार्य ने फिर व्यंग किया। ‘किंतु वह न तपस्वी है और न शतक्रतु बनने की सामर्थ्य है उसमें। धर्माचरण के कठोर नियमों की उपेक्षा के समान ही वह अपने स्खलनों को भी महत्व देता नहीं। ऐसी अवस्था में उसका देवराज बिगाड़ भी क्या सकते हैं? कुसूमधन्वां को वहां विजय का कोई अर्थ नहीं। वह इच्छा करे तो आज अमरावती उसकी होगी, यह आशंका हो गयी लगती है। अत: उसे संत्रस्त करने को अब हम सब ग्रहगण इन्द्र की आशा के आधार बने हैं।'
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'वत्स! तुम्हें विशेष सावधान रहना है इन आगे आने वाले महिनों में।' अमल ने ब्रह्मावर्त में गंगा-स्नान करके नित्यचर्या किया और जाकर जब ब्रह्माजी के मन्दिर में ठहरे उन साधु को प्रणाम करके बैठ गया तो वे बोले - 'अष्टग्रही का योग तुम्हारे व्यवस्थान में पड़ता है। वैसे भी शनि, मंगल तथा सूर्य तुम्हारे लिये अनिष्टकर रहे हैं और राहु-केतु किसी को कदाचित् ही शुभद होते हैं। तुम ग्रहशान्ति का कुछ उपाय कर लो तो अच्छा।'

'आप जैसी आज्ञा करे।' अमल ने प्रतिवाद नहीं किया। ये साधू वृद्ध हैं, विरक्त हैं, पर्यटनशील हैं। ज्योतिष के उत्कृष्ट ज्ञाता लोग इन्हें कहते हैं। बिना पूछे अकारण कृपालु हुए हैं अमल पर, अत: इनके वचन काटकर इन्हें दुःखी करना वह चाहता नहीं। वैसे कोई जप-तप, अनुष्ठान-पाठ करना अमल के स्वभाव में नहीं है। सकाम अनुष्ठान के नाम से ही चिढ है उसे।

'जिसे रुष्ट होकर जो बिगाड़ना हो, बिना रुष्ठ हुए ही वह उसे ले ले।' अमल अनेक बार हँसी में कहता है। परिवार में कोई है नहीं। न घर है, न संम्पत्ति। सम्मान अवश्य है समाज में; किंतु वह उससे सर्वथा उदासीन है। बच रहा शरीर। वह कहता है - 'यह कुत्ते, शृणाल, पक्षियों, कछुओं अथवा कीड़ों का आहार - इसे अग्नि लेगी या कोई ओर लेगा, इसकी चिन्ता मूर्खता है। कल जाना हो इसे तो आज चला जाय।'

'मृत्यु उतनी दारुण नहीं है, जितने दारुण हैं रोग। शरीर देखने, सुनने, चलने की शक्ति से रहित, वेदना-व्याकुल खाट पर पड़ा सड़ता रहे......।' एक दिन एक मित्र ने कहा था।

'कन्हाई न असमर्थ होता कभी, न निष्करुण। उसके स्वभाव में नटखटपन तो है; किंतु-कृपणता नहीं है।' अमल हँसा था। 'ये सारे अभाव, सारे कष्ट तब तक, जब-तक इनको प्रसन्नता से सहा जाय। ये असह्य बनेंगे तो श्रीकृष्ण डांट खायेगा। इनको विवश सहना पड़े उसे, जो नन्द के लाल का कोई न होता हो।'

'मैने सुना है कि तुम अनुष्ठान में अरुचि रखते हो। ग्रहों में सबसे उत्पीड़क शनि ही हैं। तुम नील मणि धारण
करो। उससे राहु-केतु की भी शान्ति हो जायगी। शनि अनकूल हों तो शेष सबके अरिष्ट अधिक अनर्थ नहीं करते।' साधु ने समझाकर कहा।

'जैसी आपकी आज्ञा।' आश्चर्य ही है कि अमल ने कोई आपत्ति नहीं उठायी। वैसे उसे कोई जप-तप बतावे तो कह बैठता है - 'व्यायाम मेरे वश का नहीं। बाजीगरों-नटों और मल्लों के लिये मैंने उसे छोड़ दिया है।'
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अष्टग्रही का योग आ रहा था। गंगातट अनुष्ठानों, यज्ञों के मण्डपों से सजा था। शतचण्डी, महस्त्रचण्डी तथा श्रीमद्भागवत के सप्ताह चल रहे थे स्थान-स्थान पर। अष्टोतरशत सप्ताह भी हुए। अखण्ड कीर्तन, अखण्ड रामायणपाठ के पवित्र स्वर दिशाओं को उन दिनों गुञ्जित करते रहते थे। कलि में जैसे सत्ययुग उत्तर आया था। आतंक स्वयं तामस सही, उसमें मनुष्य को कितनी सत्वोन्मुख करने की शक्ति है, उस समय यह प्रत्यक्ष हो गया था।

'गं गणपतये नम:।' सर्वविघ्नविनाशक भगवान् गणपति की पूजा तो प्रत्येक पूजन, यज्ञ, अनुष्ठान के प्रारम्भ में होनी ही थी। सभी पाठ-पारायण मण्डपों में पार्वती-नन्दन की प्रतिष्ठा, पूजा हुई - हो रही थी।

'मं मंगलाय भौमाय भूमिसुताय नम:।' युद्धप्रिय, रक्तविकारकारी, रक्तोद्गारी अंगार की शान्ति के लिये रक्त वस्त्र, रक्त-चंदन, लाल पुष्प का संभार तो था ही, लाल गाय, ताम्र तथा मसूर का दान भी अनेक लोगों ने किया। बहुतों ने मूंगा पहना।

'शं शनिश्चराय सूर्यसुताय यमानूजाय नम:।' तैल और लौहे का दान तो शनिवार को अनेक लोग नियमपूर्वक करते हैं। उस समय काले तिल, उड़द, काले अथवा नीले वस्त्रों का दान बहुत लोगों ने किया। अनेक ग्रह-शान्ति समारोहों में अपराजिता के पुष्प अर्चन में प्रयुक्त हुए। हाथीदान किसी ने किया या नहीं, पता नहीं; किंतु भैंस का दान सुनने में आया। जौहरियों के यहाँ उन दिनों नीलम के ग्राहक भी पर्याप्त आये।

राहु-केतु की शान्ति के लिये भी मन्त्र-जप हुए। काली वस्तुओं का दान हुआ। वैदूर्य (लहसनियाँ) की अंगूठियाँ पहनी लोगों ने। इनके अतिरिक्त भगवान् सूर्य की भी अर्चा हुई। 'आँ आदित्याय नमः' पर्याप्त सून पड़ा। सूर्य को रक्त कर्णिकार पुष्प तथा रक्त चंदन, रक्त वस्त्र अर्पित हुए। रविवार को लवणहीन एकाहार व्रत भी बहुतों ने किया। कम-से-कम एक स्थान पर लाल रंग के वृषभ(साँड) को छोड़ा गया, यह मुझे पता है। लाल मणि तो मिलती नहीं। माणिक उन लोगों ने अँगूठियों में लगाया, जिन्हें सूर्य प्रतिकूल पड़ते थे।

'भले भले कहि छोड़िये, खोटे ग्रह जप-दान।'

यह बात उन दिनों सर्वथा सार्थक हुई। जहां नवग्रह पूजन हुआ, उन स्थानों को छोड़ दें तो चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र की अकेले-अकेले अर्चना प्राय: नहीं हुई। एक जौहरी ने बतलाया था - 'सामान्य समय में अनेक लोग चन्द्रमा की संतुष्टि के लिये मोती, बुध के लिये पन्ना, गुरु के लिये पुखराज और शुक्र के लिये हीरा लेने आते थे; किंतु इस काल में इन रत्नो का विक्रय अत्यल्प हुआ। लोग जैसे इनका उपयोग ही भूल गये।'

ब्राह्मणों को भी श्वेत, पीत, हरित, धान्य, वस्त्रादि केवल नवग्रह-पूजन-जैसे अवसरों पर ही प्राप्त हुए।

'तुम्हें नीलम नहीं मिला कानपुर में?' ऐसे समय में अमल को अंगूठीरहित देखकर उन साधू ने एक दिन पूछ लिया। वैसे भी उत्तम नीलम कठिनाई से मिलता है और अष्टग्रही के दिनों में कानपुर-जैसे महानगर में भी उसका न मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।

'नीलम? आपने तो मुझे नीलमणि धारण करने को कहा था। मैं कानपुर तो गया ही नहीं।' अमल ने सहज भाव से कहा। 'नीलम तो रत्न है पत्थर है। वह मणि तो है नहीं। विश्व में आज मणि - स्वत:प्रकाश रत्न कहीं मिलता नहीं। केवल रत्न हैं जो दूसरे प्रकाश में चमकते हैं। वैसे भी मैं पत्थरों में नहीं, प्रकाशपुञ्ज में आस्था रखता हूँ। इस नश्वर शरीर को सज्जित करने की अपेक्षा मैंने हृदय को यशोदा मैया के लाडले नीलमणि से अलंकृत करना अच्छा माना। आपका तात्पर्य समझने में मैंने भूल तो नहीं की?'

'भूल तो मैं कर रहा था' - साधु ने अमल को दोनों भुजाओं में भर लिया। 'तुम्हारा उपाय तो भव-महाग्रह को शान्त कर देने में समर्थ है। क्षुद्र ग्रहों की शान्ति का अर्थ तब क्या रह जाता है!'
*************************************************

'आप सब एक क्षुद्र मनुष्य का भी कुछ नही कर सके?' अष्टग्रही को बीते पृथ्वीपर पूरे छ: महीने हो चुके थे। देवलोक में वे पुनः एकत्र हुए थे देवराज के आमन्त्रण पर। देवराज को कोई आक्रोश इसपर नहीं था कि पृथ्वी पर कोई महाविनाश नहीं हुआ। जो यज्ञ, अनुष्ठान, दान मनुष्यों ने किये थे, उसे प्राप्त कर देवाधिप संतुष्ट हुए थे। उन्हें क्षोभ केवलं यह था कि उन्होंने जिस व्यक्ति विशेष को लक्ष्य बनाया था, वह अप्रभावित ही रह गया था।

'किसी का अमंगल करना मेरा स्वभाव नहीं है। वक्र होने पर भी मैं केवल व्यय कराता हूँ और बृहस्पति अशुभ क्रमों में अर्थ-व्यय तो करायेगा नहीं।' देवगुरु ने इन्द्र को झिड़क दिया। 'वक्री होकर भी जो मैं नहीं करता, व्यय-स्थान में स्थित होकर मैंने वह किया है। अमल ने अपने छोटे से संग्रह का प्राय: सब कुछ दुखियों, दीनों, अभावग्रस्तों को दे दिया है।'

'व्ययस्थान पर स्थित बुध जब गुरु के साथ हो, केवल सुरगुरु की सहायता कर सकता है।' आकार से कुछ ठिगने, गठीले और गोल मुखवाले बुध ने कहा - 'देवराज सहस्त्राक्ष हैं। उन्होंने देखा है कि इसमें मैंने कोई प्रमाद नहीं किया है।'

'आप दोनों से पहले भी अधिक आशा नहीं थी।' देवेन्द्र ने उलाहना दिया। 'आपने तो उस प्रतिपक्ष को प्रबल ही बनाया। दान और धर्म व्यक्तियों को दुर्बल तो बनाया नहीं करते। संसार मे कोई कंगाल हो जाय, इससे हम देवताओं का क्या लाभ?'

'सूरेन्द्र भूलते हैं कि अभ्भोधिसम्भवा बुध की भी कुछ होती हैं।' आचार्य शुक्र व्यगप्रवीण हैं। उनका स्वभाव सुरों पर कटाक्ष करना है - 'बुध उसके प्रतिकूल हो कैसे सकते हैं जो श्री के परम श्रेय का आश्रित हो।'

'आपने भी तो कुछ किया नहीं।' इन्द्र के मुख से सहज निकल गया।

'शुक्र से सुर स्वहित की आशा कबसे करने लगे?' दैत्याचार्य ने फिर कटाक्ष किया। 'द्वादश भवन में स्थित शुक्र शुभ होता है शक्र! सूर्य के साथ मेरा प्रभाव अस्त न हो गया होता श्रीकृष्ण के उस आश्रित को अमित ओज दे आता। मैंने उसकी श्रद्धा और संयम को शक्ति नहीं दी, उसे आनन्दोपलब्धि का शुभ मार्ग नहीं दिखलाया, यह आक्षेप मेरे प्रतिस्पर्धी बृहस्पति भी मुझपर नहीं कर सकते।'

'श्रीकृष्ण ने मेरे वंश को कृतकृत्य किया, धन्य किया मुझे। नित्य सौम्य अत्रितनय चन्द्रमा उठ खड़े हुए। 'वैसे भी रमा के नाते वे मेरे पूजनीय स्वजन हैं। उनका कोई आश्रय लेता हो - मेरी अनुकूलता-प्राप्ति के लिये उसे क्या और कुछ करना आवश्यक रह जाता है?' उसके लिये यह विचार व्यर्थ है कि चंद्र अष्टम है अथवा द्वादश। उसे तो मेरा सदा आशीर्वाद प्राप्त है।'

'हम दोनों तुम्हारे मित्र हैं।' राहु ने रूक्ष स्वर में बिना संकेत पाये ही बोलना प्रारम्भ किया। 'वैसे भी हमारे साहस की सीमा है। जिसके चक्र का आतंक अब भी हमें विह्वल करता है, उसके आश्रित पर हमारी छाया अनिष्ट बनकर नहीं उतर सकती। हम उसका रोष नहीं - कम-से-कम उदासीनता तो पा सकते हैं अनुकूल बनकर। उसकी श्रद्धा-पूजा का स्वप्न हम नहीं देखते।'

'मैंने सुरेन्द्र की आज्ञा का सम्मान किया है।' युद्ध के अधिष्ठाता मंगल उठे। रक्तारुण वस्त्र, विद्रुममाल उन ताम्रकेशी के अंगारनेत्र इस समय शान्त थे - 'अमल को ज्वर आया, थोड़ी चोट लगी और रोष आया। अब मैं इसका क्या करूं कि वह अपना क्रोध श्रीकृष्ण पर ही व्यक्त करता है। वे मेरे पूज्य पिता हैं। अपनी माता भूदेवी के उन आराध्य पर जब उनका कोई स्नेह-भाजन रुष्ट होता है, भौम इतना अशिष्ट नहीं है कि वहाँ उपद्रव करता रहे। फलत: विजय का नीरव वरदान तो मुझे अपनी धृष्ठटता का मार्जन करने के लिये देना पड़ा। अमल ने उसे मनोजय में प्रयुक्त किया, शत्रु जय में भी कर सकता था और सुरेन्द्र इस समय आप उसके शत्रु हैं, यह आप भूले नहीं होंगे।'

'श्रीकृष्ण मेरे स्नेहभाजन हैं।' भगवान् सूर्य ने बड़े मृदुल स्वर में कहा - 'महेन्द्र उनके किसी जन का अनिष्ट चाहेंगे तो यह चिन्तन स्वयं उन्हें भारी पड़ेगा! स्वर्ग का सम्मान मुझे अपनी पुत्री कालिन्दी से अधिक प्रिय नहीं है।

'न मुझे है।' इस बार कृष्णवर्ण, निम्ननेत्र, भयानकाकृति शनैश्चर खड़े हुए - 'यम से मेरा इस विषय में सर्वथा मतैक्य है। यमुना मुझे यम से कम प्रिय नहीं है। कालिन्दीकान्त जिसके स्वजन हैं, उसका अपकार न यम करेंगे और न शनैश्चर। मैंने स्वर्ग की ओर दृष्टि नहीं उठायी - यही मेरा कम अनुग्रह नहीं है।'

'सुरेन्द्र! तुमसे मेरे शिष्य दैत्य-दानव अधिक बुद्धिमान हैं।' शुक्राचार्य फिर बोले - 'श्रीकृष्ण को जो भूल से भी अपना कहता है, उसकी ओर ये देखते ही नहीं और तुम आशा करते हो कि ग्रह उसे उत्पाड़ित करेंगे? सम्यक ग्रह-शान्ति - सबकी सर्वानुकूलता श्रीकृष्ण के श्रीचरणों में रहती है देवाधिप!'

इन्द्र ने मस्तक झुका लिया था।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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बैठ जाता हूं टॉयलेट में अक्सर.......
 क्योंकि जिंदगी के बड़े बड़े फैसले टॉयलेट में बैठ कर ही होते हैं।....
          
  .....continue in caption.. plz read

बैठ जाता हूं टॉयलेट में अक्सर क्योंकि जिंदगी के बड़े बड़े फैसले टायलेट में बैठ कर ही होते हैं।
मैंने कमल से सीखा है कीचड़ में खिलना और अपनी मौज में रहना।
ऐसा नहीं है कि मैं किसी काम का नहीं पर सच कहता हूं मुझे कोई काम नहीं...।
जल जाते हैं मेरे दिमाग के तार अक्सर क्योंकि ना तो मैंने मुद्दतों से ना तो कोई ढंग का इरादा किया और ना ही कोई फैसला लिया ..।
सोचा था बैठूंगा सुकून से और लूंगा कोई ढंग का डिसीजन पर बदबू ने बैठना दुश्वार कर डाला...।
खुशबू की बात मत कर ऐ ग़ालिब फ्रेशनर हमारी औकात में नहीं आता..।
डिसीजन तो टॉयलेट में बैठकर ही होते हैं योगमुद्रा मे चिंतन करने से तो बस चिंता बढ़ती है....।
एक सवेरा था जब हम 5 मिनट में टॉयलेट से बाहर निकल जाते थे तो कभी कभी सोचते सोचते शाम ही हो जाती है...।
लोग कहते हैं हम ह*ते बहुत हैं पर वहां हम तो डूब जाते हैं अपने फ्यूचर की सोचते सोचते...।
खुश हूं और सबको खुश रखता हूं बेरोजगार हूं समय की परवाह नहीं करता हूं...।
चाहता तो हूं कि टॉयलेट मे बैठा ही सोचता रहूं.. पर बंधू ये बदबू सोचने नहीं देगी..।
दोस्तों अच्छे से अच्छा योग कर लिया अच्छे से अच्छा चिंतन कर लिया पर यह सोच मेरे हिसाब से ना चली और अच्छा विचार तो टायलेट मे ही आया...।
अब अब यूं ही हम टायलेट को खुशबूदार रखा करते हैं, पता नहीं था कि टॉयलेट में बैठकर ही बड़े-बड़े डिसीजन होते हैं...।

सभी लोग गौर फरमाइएगा दो लाइनें कहना चाहता हूं ....
किसी भी योग चिंतन में अपना समय बर्बाद मत कर..।
बड़े से बड़ा डिसीजन भी हो तो टॉयलेट में बैठकर ही कर..।।..


Disclaimer > ये कविता एक विख्यात कवि की एक कविता से उत्प्रेरित है...माफ कीजिएगा इस कविता के साथ उनका नाम लेना उचित न होगा, पर आप सब तो समझदार हैं,समझ ही गए होंगे..

P.S. > दिल पर ना लें यह सिर्फ हंसने हंसाने के लिए लिखी है,

#Nojoto #nojotopoetry #Poetry #nojotohindi #Hindi #neelWritings #Funny #Pun #hindipoems #HindiPoem #Hindi #ghazals #writersnetwork #FUNtasticNEEL #2liner #2liners #kavita #Trending #poems

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#अन्तरराष्ट्रीय_या_अंतर्राष्ट्रीय​ #कमलेश_कमल #KamaleshKamal #शब्द_सामर्थ्य
अत्यंत दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि हिंदी पट्टी से प्रकाशित लगभग सभी समाचार पत्रों ने “अन्तर्राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस” (intranational yoga day) मनाया जबकि 21 जून “अंतरराष्ट्रीय योग दिवस” (international yoga day) है ।

# अंतर् का अर्थ अंदर है, जबकि अंतर का अर्थ है दूरी । अंतर्राष्ट्रीय में अंतर् (अंदर) है जबकि अंतरराष्ट्रीय में अंतर (फ़र्क ) है।

# अंतर्देशीय पत्र देश के अंदर ही तो होते हैं। इसी प्रकार अंतर्दशा का अर्थ अंदर की दशा ! अंतर्जातीय जाति के अंतर्गत ।

# इसी तर्ज पर अंतर्+ देशीय =अंतर्देशीय । देश के अंतर् का या अंदर का ।( रकारस्योर्ध्वगमणं का नियम)

# अंतरराष्ट्रीय शब्द का अर्थ हुआ दूर-दूर के राष्ट्र या विविध राष्ट्रों से संबंधित । वैसे कई विद्वान साथी भी इसे भ्रमवश ग़लत लिखते हैं। वैसे, व्याकरण के अनुसार अंतर्,+राष्ट्रीय =अंताराष्ट्रीय जो कालांतर में अंतरराष्ट्रीय बन गया । इसलिए इसे अंतर (फ़र्क) से समझाया है।

# कुछ विद्वान इसे अंतर ( फ़र्क)+राष्ट्रीय = अंतरराष्ट्रीय कहते हैं। ध्यान दें कि इस स्थिति में यह संधि नहीं संयोग कहा जाएगा क्योंकि संधि के लिए विकार उत्पन्न होना आवश्यक है।

# ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा’ देश के अंदर का मुद्दा है , जबकि ‘अंतरराष्ट्रीय मुद्दा’ कई देशों से जुड़ा मुद्दा है।

# अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में विविध राष्ट्रों के खिलाड़ी भाग लेते हैं ,जबकि अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में सिर्फ देश भर के ही खिलाड़ी भाग लेते हैं।

# आशा करता हूँ कि मीडिया के साथी और आप सब इसका ख्याल रखेंगे । आज से अंतरराष्ट्रीय ही लिखें नहीं तो अंतर्देशीय पत्र ( inland letter) को विदेश भी भेजें (जो संभव नहीं है।) !


आपका ही,
कमल​

हिन्दी के बारे में विस्तार से जानने के लिये जय हिन्दी एप्प डाउनलोड करें -https://play.google.com/store/apps/details?id=com.pratibimb.kamalkikalam
Aastha Sharma Nojoto News Monika sharma Shruti Tuli Prerna Sharma

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7 months ago

योग कीजिए, रोग दूर भगाइए।
रोज कीजिये, और जीते जाईये।।

जो करता योग, उसको नहीं छूता रोग।
योगी बनो पवित्री बनो, जीवन को सार्थक बनाओ

स्वयं को बदलो, जग बदलेगा।
योग से सुखमय हर दिन खिलेगा।

जिसने योग अपनाया।
रोग को हमेशा के लिए दूर भगाया।।

नियमित योग कीजिए।
जिन्दगी भर रोग से दूर रहीए।।

सुबह हो या शाम, रोज कीजिए योग।
निकट ना आएगा कभी आपके कोई रोग।।

योग है स्वास्थ्य के लिए क्रांति।
नियमित योग से जीवन मे हो सुख शांति।।

रोगमुक्त जीवन जीने की हो चाहत।
नियमित योग करने की डालो आदत।।

योग है स्वास्थ्य के लिए लाभकारी।
योग रोगमुक्क्त जीवन के लिए गुणकारी।।

स्वास्थ्य जीवन जीना जिंदगी की जमा पूँजी।
योग करना रोगमुक्त जीवन की कुंज

स्वास्थ सबसे बड़ा उपहार हैं, संतोष सबसे बड़ा धन हैं, यह दोनों योग से ही मिलते हैं।

कमजोरियाँ हमारे अंदर डर पैदा करती हैं, योग उन्हें दूर करता हैं।

जिस तरह से मोबाइल फोन हमारे जीवन का हिस्सा बन गया है ठीक उसी प्रकार आप योग को भी अपने जीवन का एक हिस्सा बना सकते हैं।

योग से सिर्फ रोगों, बीमारियों से छुटकारा ही नही मिलता है बल्कि यह सबके कल्याण की गारंटी भी देता है।

आज के इस भागमभाग भरी जिन्दगी में हम सब अपने आप से ही अलग हो गये है इसलिए योग हमें अपने आप से पुन: जोड़ने में में मदद करता है।

योग भी अब व्यवसाय के रूप में बदल रहा है और कई लोगों को रोजगार भी प्रदान कर रहा है।

योग के बारे में यह कभी भी मत सोचिये की योग से क्या मिल सकता है बल्कि यह सोचिये की योग के द्वारा हम क्या नही प्राप्त कर सकते है।

हमारे पास प्राचीनकाल में स्वास्थ्य बीमा नहीं था लेकिन हम सभी के के पास योग एक ऐसा अभ्यास है जो बिना एक पैसे खर्च किये हमारे स्वास्थ्य की गारंटी देता है।

योग किसी भी व्यक्ति के लिए संभव है जो वास्तव में इसे चाहता है योग सार्वभौमिक है …लेकिन व्यावहारिक लाभ की तलाश में एक व्यवसाय के दिमाग से योग का दृष्टिकोण नही करना चाहिए।

जो कोई व्यक्ति भी अभ्यास करता है वह योग के द्वारा सफलता प्राप्त कर सकता है लेकिन आलसी व्यक्ति के लिए योग का कोई महत्व नहीं है और निरंतर अभ्यास अकेले सफलता का रहस्य है।

योग एक धर्म नहीं है बल्कि यह एक विज्ञान, कल्याण का विज्ञान, युवाता का विज्ञान, शरीर को नियंत्रित करने, मन और आत्मा का विज्ञान है

योगा हमे वो ऊर्जा प्रदान करता है जो हम हज़ारो घंटे भी अपना काम करके अर्जित नहीं कर सकते। ~ हैप्पी योगा दिवस

योग सिर्फ आत्म सुधार के बारे में नहीं बतलाता है, बल्कि यह आत्म स्वीकृति के बारे में सिखाता है।

मैं योग को प्यार करता हूँ क्योंकि यह न केवल यह हमारे शरीर के लिए कसरत है बल्कि हमारी श्वास भी है जो अत्यधिक तनाव को मुक्त करने में मदद करता है योग सचमुच हमे दिन की दिनचर्या के लिए तैयार करता है।

कहा जाता है कि एक व्यक्ति को योग के द्वारा स्वयं के साथ मिलना है जब पूरी तरह अनुशासित होकर अपने मन से सभी इच्छाओं से नियन्त्रण प्राप्त कर लेते हैं तब हम अपने आप को जान पाते है।

योग सिर्फ कसरत ही नहीं है बल्कि यह खुद अपने आप पर काम करता है।

योग बहुत ही आश्चर्यजनक है इससे हमारे स्वास्थ्य की समस्याएं दूर तो होती हैं तथा साथ में खुद का अवलोकन होता भी होता है।

योग हमारे जीवन की शक्ति, ध्यान करने की क्षमता और उत्पादकता को बढ़ाता है योग मनुष्य के शरीर, मन और भावना को स्थिर और नियंत्रित भी करता है।


योग हमे खुशी, शांति और पूर्ति की एक स्थायी भावना प्रदान करता है।

योग मन के उतार-चढ़ाव को स्थिर करने की प्रक्रिया है।

योग हमारी कमियों पर प्रकाश डालता हैं, उन्हें दूर करने का नया रास्ता तलाशता हैं

योग आपके मन को शांत करने का एक प्राचीन तरीका |||

yoga Modi yoga

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