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रोग

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प्रेम रोग

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प्रेम रोग
किसी के प्रेम का क्यूँ मैं रोग लिए बैठी हूँ
अपने ही अंतर्मन का मृत्युशोक लिए बैठी हूँ

बैठी हूँ मैना की नाई दरख़्त की उसी शाख पर
जिसे काटने का मैं खुद सामान लिए बैठी हूँ
वो होगा ही नहीं जब मेरा किसी सूरत-ए-हाल में
क्यूँ उसके आने का अरमान लिए बैठी हूँ

घर बनाया है क्यूँ उसने रूह में मेरी
क्यूँ रुख़ पर अपने उसकी पहचान लिए बैठी हूँ
देखते ही मुझको अब पहचान हर कोई जाता है
क्यूँ मोहब्बत का मैं ऐसा पैग़ाम लिए बैठी हूँ

इक वो सच्चा और झूठा सारा संसार लगता है
क्यूँ उसके इश्क़ का गुमान लिए बैठी हूँ
लग जाये ए ख़ुदा मेरी भी उम्र अब उसको
दुआओं में हर दफा क्यूँ उसका नाम लिए बैठी हूँ

किसी के प्रेम का क्यूँ मैं रोग लिए बैठी हूँ
अपने ही अंतर्मन का मृत्युशोक लिए बैठी हूँ

©के मीनू तोष (१४ फरवरी २००९)

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धर्म है इंसानियत हमारी
जात मैं हिंदुस्तानी
देश की उत्थान के लिए,
हर एक पल जो ततपर और स्वाभिमानी।।
भटके हो तुम कान्हा,
धर्म और जात के नाम पर,
भूल गए हो कैसे ऐसे,
इंसानियत के धर्म और कर्म है कर्ण।।
रोग से पीड़ित उस इंसान को भी देखलो,
एक नजर काम करते उन्ह नहें हाथों पर भी फेरलो,
भटके हो कन्हा किस सम्मोहन की जाल मैं,
भेड़िये तो नही बन गए हो इंसनियतकी खाल मैं।।
उठो देश को आज तुम्हारी जरूरत है,
कलम पकड़ाओ उन हितों मैं,
जो कलके भारत के भबिस्य हैं,
पोषण और सेबा की बंदोबस्त करो उनकी जो 
गरीबी से टूटे और रोग से पीड़ित हैं।।
🌹

 #NojotoQuote

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#OnlyOneReligion #Indian
#LetsBeUnitedAgain #अखण्डभारत
#RM
Along with focusing your personal problems, try to focus on the Situation Indian is going through. It's not the time to think you need a temple or a Masjid, it's time to make India that encient Guru. Let's together address the problem of Making schools, colleges and Hospitals in rural areas, that are still under developed, even after so many years of Independence. Why don't we feel shame, What for we are waiting... once more someone will come n start ruling us...? Why can't you be a Gandhi now ?
धर्म है इंसानियत हमारी
जात मैं हिंदुस्तानी
देश की उत्थान के लिए,
हर एक पल जो ततपर और स्वाभिमानी।।
भटके हो तुम कान्हा,
धर्म और जात के नाम पर,
भूल गए हो कैसे ऐसे,
इंसानियत के धर्म और कर्म है कर्ण।।
रोग से पीड़ित उस इंसान को भी देखलो,
एक नजर काम करते उन्ह नहें हाथों पर भी फेरलो,
भटके हो कन्हा किस सम्मोहन की जाल मैं,
भेड़िये तो नही बन गए हो इंसनियतकी खाल मैं।।
उठो देश को आज तुम्हारी जरूरत है,
कलम पकड़ाओ उन हितों मैं,
जो कलके भारत के भबिस्य हैं,
पोषण और सेबा की बंदोबस्त करो उनकी जो गरीबी से टूटे और रोग से पीड़ित हैं।।
🌹

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3 months ago

साम्प्रदायिकता एक रोग है, संक्रामक रोग जो मनुष्य के अस्तित्व को तो खोखला करता ही है साथ ही सम्पूर्ण समाज को लंगड़ा कर देता है।

रामधारी सिंह 'दिनकर'
Satyaprem Mukesh Poonia Brijesh Maurya नयनसी परमार Tamanna Sharma

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3 months ago

|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 8

।।श्री हरिः।।
7 – धर्म-धारक

'आज लगभग तेंग का पूरा परिवार ही नष्ट हो गया।' बात मनुष्यों में नही, देवताओं में चल रही थी। 'वह कृष्णवर्णा दीर्धांगी कंकालिनी लताकण्टकभूषणा चामुण्डा किसी पर कृपा करना नहीं जानती। उसने मेरी अनुनय को उपेक्षा के निष्करुण अट्टहास में उड़ा दिया। आप सब देखते ही हैं कि किस शीघ्रता से वह प्राणियों के रक्त-माँस चाटती जा रही है।'

'तुम्हारे यहाँ तो अद्भुत सुइयाँ एवं ओषधियाँ लेकर एक पूरा दल चिकित्सकों का आ गया है।' दूसरे देवता ने अधिक खिन्न स्वर में कहा - 'मेरे क्षेत्र की ओर तो मानव शासक भी ध्यान नहीं दे रहा। पूरा जनपद प्राय: खँडहर हो चुका है और दो-चार दिनों में रुद्र के गण जब वहां अधिकार कर लेंगे, मुझे भटकते घुमना पड़ेगा।'

'उन चिकित्सकों में से तीन की बलि विषूचिका ने ले ली। पाँच और शय्यापर पहुँच चुके हैं।' पहिले देवता का स्वर शिथिल बना रहा - 'मानव के ये प्रयत्न चामुंडा की चरणगति का अवरोध बन पायेंगे? वह कहाँ समझता है कि उसकी चेष्टा तभी सफल होती है, जब भगवान् धर्म सानुकूल हों। वे रूठे ओर रुद्र के गणों का कोई-न-कोई दल आया।'

'हम सब अब क्या कर सकते हैं!' एक तीसरे का दीर्घ निःश्वासयुक्त स्वर था - 'हमारे पूरे प्रदेश पर लगातार चार वर्ष से देवराज का प्रकोप है। मेघ आते हैं और चले जाते हैं। पशु-पक्षी तो पहिले ही नहीं रह गये थे; अब मनुष्य क्षुद्र कीटों के समान मृत्यु के ग्रास वन रहे हैं।'

आपको अद्भुत लग सकता है; किंतु यह सत्य है कि प्रत्येक नगर एवं ग्राम का एक क्षेत्रपाल होता है। प्रत्येक गृह का एक अधिदेवता होता है। नगर, ग्राम गृह स्वच्छ हों, सम्पन्न हों तो उसे प्रसन्नता होती है। वहां दुख, दरिद्रता, गंदगी हो तो उसको कष्ट होता है। अधिदेवता प्रसन्न हो तो नगर, ग्राम, गृह के निवासी सुखी रहते हैं और वह रुष्ट हो तो निवासियोंको रोग, शोक चिन्ता सताती है।

उस समय हिमालय के दुर्गम प्रदेश में चीन के कई प्रान्तों के क्षेत्रपाल देवताओं का समूह एकत्र हुआ था। वे विपत्ति में पड़ गये थे। मनुष्य उनकी सत्ता माने या नहीं माने, उनकी सत्ता और कार्य में कोई बाधा नहीं पड़ती; किंतु जब मनुष्य अधर्म पर उतर आता है - महामारो, अकाल आदि आपत्तियाँ उसे शिकार बना लेती हैं। ऐसी अवस्था में क्षेत्रपाल भी संकट में पड़ जाते हैं। गृह रहेगा तो गृहृ का अधिदेवता रहेगा। गृह खंडहर हो जाय या जनहीन हो जाय तो वहाँ प्रेत निवास कर लेंगे। क्षेत्रपाल निर्वासित हो जायगा। यही अवस्था ग्राम तथा नगर के देवताओं की भी है। जनहीन नगर तथा ग्राम रुद्रगणों के स्वत्व हैं।

महामारी, भुखमरी से चीन के ग्राम-के-ग्राम सूने होते जा रहे थे। अधिकारियों के बहुत प्रतिबंध रखने पर भी यह समाचार विश्व को मिल ही गया कि अकाल तथा रोग से वहाँ अत्याधिक जनहानि हुई है। इतनी बड़ी जनहानि, जो कई करोड़ की समझी जा रही है।

क्षेत्रपाल अधिदेवत्ताओं पर भी अकस्मात् इतनी बड़ी विपत्ति एक साथ कभी नहीं आयी थी। वे क्या करें, यह निर्णय करने के लिये उनका समुदाय एकत्र हुआ था। प्रलय का समय आया नहीं, आकस्मिक खण्ड-प्रलय की सूचना देकर भगवान् रुद्र ने उन्हें धरा का त्याग करने का अभी कोई आदेश नहीं दिया और उनके आवास नष्ट होते जा रहे हैं। उन्हें लगता है कि रुद्रगण शीघ्र ही उन्हें निर्वासित कर देने वाले हैं।

'महेश्वर की शरण में यदि हम लोग चलें!' एक ने बड़े संकोच से बात प्रारम्भ की - 'वे आशुतोष परम कृपालु हैं।'

'वे समाँधि में हैं।' तिब्बतीय क्षेत्र के एक क्षेत्रपाल ने सूचना दी - 'ऐसा न भी होता तो वे हमें कदाचित ही मानव की सहायता करने को कहते। मानव ने कैलास के आस पास जो हत्याएँ की हैं, तपस्वियों का आहार रोक कर जो उनका सामूहिक विनाश उसने किया है, उसकी उपेक्षा कैसे की जा सकती है।'

'किसी का कोई दोष वे सर्वाधार कभी नहीं देखते।' दूसरे के स्वर में यह कहते कोई उल्लास नहीं था। 'किंतु जब वे उत्थित ही नहीं, उनके समीप जाने का प्रश्न नहीं अठता और हम सीधे उनके समीप जा भी कैसे सकते हैं। हमें अपनी समस्या नियमानुसार देवराज के समीप उपस्थित करनी चाहिये।'

'और देवराज अत्यन्त रुष्ट हैं इस देश के मानवों पर इन दिनों!' एक नगरपाल कह रहे थे - 'अवर्षण बनकर उनका क्रोध इतने असह्य रूप में आया है कि मेरे पास अब थोड़े-से गृह रह गये हैं। मेरे नगर की जन-संख्या सहस्त्रों के स्थान में 'शत' में गणना की जायगी। देवराज के समीप जाकर कोई आश्वासन प्राप्त करने की आशा कहाँ है।'

'मानव हमें मानता या न मानता।' एक वृद्ध क्षेत्रपाल बोले - 'वह भगवान् धर्म से तो विमुख न होता। वह अहिंसा, दया, सत्य, क्षमा आदि को अपनाये रखता। हमने कहाँ उसकी उपेक्षा पर कभी क्रोध किया है।'

'हम सब धर्म के ही समीप चलें।' प्रस्ताव आया और स्वीकृत हो गया।
*********************************

देवताओं को भी बहुत परिश्रम करना पड़ा धर्म को प्राप्त करने के लिये। उनका हिमधवल विशाल वृषभ देह सूखकर अत्यन्त कृश हो गया था। चार में से उनके तीन चरण तो पहले ही नष्ट ही गये थे, एक चरण भी इतना दुर्बल हो चुका था कि उसके बलपर वे किसी प्रकार ही कुछ हिल-डूल सकते थे। उनके पूरे शरीर पर घाव थे।

'आप सबका स्वागत!' नेत्रों में अश्रु भरकर धर्म ने क्षेत्रपालों को देखते ही कहा - 'आपके कष्ट का अनुमान मैं अपनी अवस्था से ही कर सकता हूँ।'

'आपने इस भूमि का लगभग परित्याग ही कर दिया और जब आप प्रजा का धारण नहीं करते...…! ' एक युवक क्षेत्रपाल चपलतापूर्वक बोलने लगे।

'मैं कभी किसी का परित्याग नहीं करता!' धर्म ने उन्हें बीच में हो रोक दिया - 'मैं प्रजा का धारण पोषण ही करना जानता हूँ। इसी से मेरा नाम सृष्टिकर्त्ता ने धर्म रखा है, किंतु मानव स्वयं जब मेरा त्याग कर देता है मोह के वश होकर, मैं कर भी क्या सकता हूँ? कर्म-स्वतन्त्र मानव को विवश करने का विधान नहीं है और उसने अपने कर्मों से मेरी जो अवस्था कर दी है, आप देख रहे हैं।'

'हम सब आपके ही आश्रित हैं!' बड़े संकोचपूर्वक क्षेत्रपालों में से एक वृद्ध ने कहा - 'यदि आप हमारी ओर नहीं देखेगें............।'

'हम सब हरि के आश्रित हैं।' धर्म के स्वर में अतिशय नम्रता थी - 'मनूष्य आज आत्महत्या करने पर उतर आया है। उसने पक्षियों को समाप्त कर दिया, बिना यह सोचे कि वे कृषि तथा मानव-प्राणों के शत्रु कीटवर्ग पर अंकुश रखते हैं। उसने यन्त्रों के भरोसे पशुओं को समाप्त कर दिया, बिना यह ध्यान दिये कि भूमि की उर्वराशक्ति उन पशुओं का ही वरदान है। किंतु मनुष्य को दीखता कहाँ है कि वनराज नहीं रहता तो वन उजड़ने लगते हैं। अब इस पीतवर्णी मानवों के समूह में यहाँ तक दुर्बुद्धि आ गयी है कि वृद्ध, अपंग रोगी मानव कों भी अनावश्यक मानकर दुर्गम स्थलों में निर्वासित कर रहा है क्षुधा-कष्ट से मृत्यु प्राप्त करने के लिये। इस बर्बरता से पूर्ण वातावरण में मुझे अपनी प्राणरक्षा के लिये इस एकान्त का आश्रय लेना पड़ा है।'

'आप यदि प्रजा का त्याग कर देंगे!' बोला नहीं गया क्षेत्रपाल से - 'कितनी भयंकर बात है - धर्म ही यदि प्रजा का त्याग कर दें तो प्रजा रहेगी कैसे। मनुष्य के अन्तःकरण में यदि किसी प्रकार आपकी तनिक छाया भी प्रवेश करे!'

क्षेत्रपालों को एकमात्र धर्म का आश्रय है। मनुष्य जड़वादी हो सकता है; किंतु देवता तो सत्य देखने में समर्थ हैं। वे देख सकते हैं कि मनुष्यों की दया, दान, प्राणिपोषण आदि उसे स्वयं पुष्ट करते हैं। वह धर्म ही सानुकूल वृष्टि तथा पृथ्वी की उर्वराशक्ति बनता है और मनुष्य की स्वार्थपरता, हिंसा, क्रूरता आदि गगन तथा धरा दोनों के रस को चूस लेते हैं। इनसे तो केवल प्राणहारी, अन्नविनाशी महामारी के रोगाणु तथा टिड्डी कीट आदि ही अभिवृद्धि पाते हैं।'

'मानव विश्वस्त्रष्टा की श्रेष्ठतम कृति है। स्वयं नारायण का निवास है उसके अन्तःकरण में। वह उन्हें कितना भी अस्वीकार करे; किन्तु उन जगदात्मा की ज्योति नर में व्यक्त हुई है।' धर्म बड़े विश्वासपूर्ण स्थिर स्वर में कह रहे थे - 'स्वभाव में चाहे जितनी विकृति आ गयी हो, मूलत: मानव में देवत्व है। उसके देवत्व में विश्वास नहीं खोया जा सकता। अतएव मैं उसका पूर्णतः त्याग कभी नहीं करता। समय की प्रतीक्षा अवश्य करनी पड़ती है और मैं यही कर रहा हूँ।'

'समय की प्रतीक्षा!' क्षेत्रपालों के समुदाय ने दीर्घ निःश्वास लिया - 'यदि भगवती चामुण्डा भी समय की प्रतीक्षा करतीं। किंतु वे तो आज हमारे आवास उजाड़ती चली जा रही हैं। आज हम निर्वासित होने के समीप हैं।'

'अनेक बार महाकाली को यह अप्रिय कार्य करना पड़ता है।' धर्म का पूरा शरीर कम्पित हो गया। 'अधर्म से कलुषित धरा को उनके श्रीचरण स्वच्छ करते हैं। वे महामाया आज मानव के हृदय को मोहाच्छन्न करके अपने महाताण्डव की उसी के हाथों तैयारी करवा रही है। विनाश के प्रचण्ड साधन मानव के कर निर्माण कर रहे हैं; किंतु विश्व के पालक प्रसुप्त नहीं हुआ करते। उनकी इच्छा का संकेत हम सुरों को भी प्राप्त नहीं होता, यह भिन्न बात है। किंतु हम सबके वही परमाश्रय हैं। हमे उनका आह्वान करने के लिये तो कहीं जाना नहीं है।'

क्षेत्रपालों का समुदाय भी धर्म के साथ ही उन जगद्धाता के ध्यान में तन्मय हो गया।
**********************************

'धर्म ही प्रजा का धारण करते हैं! धर्म ही प्रजा का धारण करेंगे।' एक अव्यक्त दिव्य वाणी अंतःकरण में ही उठी क्षेत्रपालों के। 'धर्म अविनाशी हैं, शाश्वत हैं। मैं ही स्वयं धर्म हूँ।'

पता नहीं क्षेत्रपालों ने इस रहस्यात्मक परावाणी का क्या अर्थ समझा। उन्हें आश्वासन प्राप्त हुआ या नहीं, कैसे कहा जा सकता है। लेकिन जहां तक अपनी बुद्धि की बात है, लगता यह है कि मनूष्य को यदि जीवित रहना है, मानव सभ्यता को बनाये रखना है तो धर्म का आश्रय लेना होगा, अन्यथा धर्म तो मिटेंगे नहीं, मानवता भले ध्वंस को प्राप्त हो जाय; क्योंकि प्रजा तो धर्म के धारण करने पर ही रहेगी।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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वो आशिक है, तो बदनाम हैँ महफ़िलो मे, 
बदनाम आशिको को करते आशिक देखता हूं !
छुटा कौन है शहर मे, इस रोग से भला? 
पीछे दौड़ते इस रोग के हकीम देखता हूं !

मोहब्बत नाम देते हैँ, 
चंद रंगीन रातों को, 
हर महताब सँग ढलती उल्फत देखता हूं !

वो आशिक है, तो बदनाम हैँ महफ़िलो मे,
बदनाम आशिको को करते आशिक देखता हूं !
छुटा कौन है शहर मे, इस रोग से भला?
पीछे दौड़ते इस रोग के हकीम देखता हूं !

मोहब्बत नाम देते हैँ,
चंद रंगीन रातों को,
हर महताब सँग ढलती उल्फत देखता हूं !

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