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राजपुरोहित

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1 year ago

|| श्री हरि: ||
9 - श्रद्धा की जय

आज की बात नहीं है; किंतु है इसी युगकी क्या हो गया कि इस बात को कुछ शताब्दियाँ बीत गयी। कुलान्तक्षेत्र (कुलू प्रदेश) वही है, व्यास ओर पार्वती की कल-कल-निदनादिनी धाराएँ वही हैं और मणिकर्ण का अर्धनारीश्वर क्षेत्र तो कहीं आता-जाता नहीं है।

कुलू के नरेश का शरीर युवावस्था में ही गलित कुष्ठ से विकृत हो गया था। पर्वतीय एवं दूरस्थ प्रदेशों के चिकित्सक व्याधि से पराजित होकर विफल-मनोरथ लौट चुके थे। क्वाथा-स्नान , चूर्ण-भस्म, रस-रसायन कुछ भी तो कर सका होता।

नरेश न उच्छृंखल थे, न भोगपरायण। उनके पूर्व पुरुषों ने कुलान्त क्षेत्र के दिव्य त्रिकोण (व्यास नदी के उद्गम, पार्वती नदी के उद्गम ओर दोनों के संगम स्थल की मध्यभूभि) को भगवान उमा-महेश्वर की, विहार-भूमि मानकर उसे अपने निवास से अपवित्र करना उचित नहीं समझा। मनुष्य रहेगा तो उसके साथ उसके प्रमाद त्रुटियाँ भी रहेंगी ही। अत: उन्होंने व्यास के दक्षिणतट पर अपनी राजधानी बनायी, जो आज कुलू कही जाती है। यों इस त्रिकोण में उनके वंशधरों ने पीछे एक निवास बना लिया था नगर में और वही आज पुरानी राजधानी के नाम से जाना जाता है।

इतने भावप्रवण कुल में जिनका जन्म हुआ, उनके रक्त में वासना की वृद्धि के लिए आहार कहाँ से मिलता। नरेश बचपन से अत्यन्त श्रद्धालु थे और श्रीरघुनाथजी के उपासक थे। शरीर में रोग के लक्षण प्रकट होते ही चिकित्सा के साथ पण्डितों के अनुष्ठान प्रारम्भ हो गये थे।

प्रारब्ध प्रबल होता है, तब पुरुषार्थ सहज सफल नहीं होता। वर्षा की उमड़तीं नदी में बाँध बनाने के प्रयत्न सफल हों, असीम शक्ति ओर साधना की अपेक्षा है। ग्रह-शान्ति, देवाराधन और चिकित्सा के प्रयत्न प्रारब्ध को रोक नही सके थे। नरेश के सर्वांग में कुष्ट फुट पड़ता था।

'यह घृणित रोग' - नरेश को देह का मोह नहीं रहा था किंतु उन्हें आंतरिक व्यथा थी कि अब न वे सत्पुरुषों-संतों के चरणों पर मस्तक रखने योग्य रहे और न कथा-सत्संग में बैठने योग्य। किसी तीर्थ में, पुण्यक्षेत्र में कैसे जाया जा सकता है? अपने रोग का संस्पर्श दूसरों को प्राप्त हो, बड़ी सावधानी से नरेश इसे बचाते थे। पत्नी तक को उन्होंने पद-वन्दना से वंचित कर दिया था। उस साध्वी को भी अपने आराध्य की आज्ञा स्वीकार करके दूर से ही दर्शन करना पड़ता था।

'यह संस्पर्श से फैलने वाला संक्रामक रोग है। किसी भी पावन तीर्थ में यह भाग्यहीन अब स्नान के योग्य नहीं रहा।' महाराज अत्यंत दुःखित रहने लगे थे। 'किसी मंदिर में प्रवेश काअधिकार नहीं रहा मुझे। पतितपावन प्रभु भी रूठ गये मुझसे।'

अंत में ऱाजपुरोहित ने नरेश को मणिकर्ण में निवास की सम्मति दी। मणिकर्ण क्षेत्र का उष्णोंदक सम्भव है, नरेश के रोग को दूर कर सके; राजपुरोहित की यह आशा निराधार नही थी। उष्ण जलस्रोत पृथ्वीपर बहुत हैं - भारत में भी बहुत हैं; किंतु प्राय: सर्वत्र उनमें एक गन्ध है और वे स्वाद में कषाय न भी हों, परन्तु स्वादिष्ट नही है। मणिकर्ण के क्षेत्र में खोलते जलस्त्रोत का विस्तार मीलों में है। लगभग पूरा मणिकर्ण ग्राम घर-घर में इस जल कों अपने कुण्डो में रोककर उससे भोजन सिद्ध कर लेता है। जल निर्गन्ध है, स्वादिष्ट है और अब भी अनेक रोग-चर्मरोग विशेषत: उससे दुर होते हैं।

नरेश ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उनकी दृष्टि दूसरी थी। शरीर जाता ही हो तो उमा-महेश्वर की गोद में ही जाय।

भगवती हिंमवान-सुता का साक्षात भौतिक रूप है - पार्वती नदी और उनकी धारा को अंकमाल देते चलनेवाला खौलता उष्णोंदक स्रोत साक्षात शिव का ही तो रूप है। मणिकर्ण, क्षेत्र का प्राकट्य तो शम्भू-उमा की क्रीड़ा में हुआ है। वहां कहीं भी स्नान किया जा सकेगा, मुख्य स्थल से कुछ नीचे हटकर। जन सम्पर्क का प्रश्न ही वहाँ नहीं उठता।

राज्य का भार वैसे भी अब मंत्रियों पर था। अाज के समान भुंतर के समीप व्यास पर सेतु नहीं था। रस्सियों को बांधकर किसी प्रकार पर्वतीय जन व्यास को पार करते थे। नरेश के लिए कुछ अच्छा सेतु बना। व्यास-पार्वती के संगम में स्नान करके वहाँ से दस कोस ऊपर मणिकर्ण क्षेत्र में नरेश का शिविर पड़ा। गिने-चुने सेवक थे साथ में और तब मणिकर्ण गाँव का कोई अस्तित्व नहीं था। केवल पर्व के समय वहाँ कुछ लोग आ जाते थे।

'इस क्षेत्र में पाण्डु-पुत्रों ने निवास किया था। इसके मूर्धन्य भाग में ही धनञ्जय ने तप करके चंद्रमौलि की आराधना की और अपने पराक्रम से उन पिनाकपाणि को संतुष्ट किया। भगवान गंगाधर अर्जुन पर कृपा करने के लिये यहाँ किरात-वेश में विचरण कर चुके हैं। भगवती जगदम्बा पार्वती के शबरकन्या-रूप में श्रीचरण यहाँ पड़े हैं।' नरेश इस क्षेत्र में आकर अपने रोग को - अपनी व्यथा को विस्मृत हो गये। वे दूर से चमकते धवल वर्ण इलावर्त-शिखर को प्रणिपात करते, उष्णोदक में स्नान करते और प्राय: भाव-विव्हल रहते।

'श्रीराम जय राम जय जय राम।'

जिह्वा पर यह नाम तो उनके बचपने से बसा था। अब इस क्षेत्र में आकर उन्होंने अन्न और दूध भी त्याग दिया था। उनका राज्य स्वादिष्ट फ़लों का आकर है; किंतु उनके लिए वे फल भी अब अग्राह्य बन गये थे। वन में मिलने वाला चावल(कहा जाता है कि यह पाण्डवों की तीर्थयात्रा के समय उनकी की हुई कृषी का अवशेष है), जंगली गोभी और कुछ ऐसे ही शाक - इनको मणिकर्ण के उष्णोदक में उबाल लिया जाता और दिन में एक बार नरेश उसे ग्रहण करते। अब तो यह चावल-गोभी मणिकर्ण से चौदह मील ऊपर क्षीर-गंगाक्षेत्र के वन में ही उपलब्ध है।

आस-पास के क्षेत्रों में भी नरेश हो आते थे। तप, जप और भावना - उनके देह की बाह्यावस्था कुछ भी हो, उनका हृदय इलावर्त शिखर पर जमे हिम के समान उज्जवल हो गया था, इसमें संदेह नहीं।

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सहसा एक दिन राजधानी में संदेश आया कि नरेश लौट रहे हैं। राजसदन सजाया गया। प्रजा प्रसन्न हुई। उनके प्रजावत्सल नरेश रोगी सही, उनके मध्य में तो रहें।

'गगनचुम्बी हिमगौराकृति पर्वतशिखर उन ज्योतिर्मय के घुटनो तक भी नहीं था। कह नहीं सकता कि द्वितिया का चन्द्र उनके भाल पर था या क्षितिज पर, किंतु पिंगल जटाजूट का अन्त दृष्टि नहीं पाती थी। लौटकर नरेश ने एकान्त में राजगुरु को जो कुछ बतलाया, वह यही था - 'मणिकर्ण के उष्णोदक से उठती वाष्पराशि स्पष्ट नही देखने देतीं थी और संध्याकाल का अन्धकार भी प्रारम्भ हो गया था; किन्तु लगता था हिमशीतल पार्वती की धारा सेे एक पाटल गौरमूर्ति उठ खड़ी हुई है और उसे वामभाग में किये कर्पूरगौर, अमित तेजोमय अहिभूषण भवानीनाथ स्वयं सम्मुख खड़े हैं।'

गद्गद् कण्ठ, अश्रु झरते नयन नरेश कह रहे थे - 'प्रभु की मूर्ती, लगता था, क्षण में प्रकट होती है, फिर अदृश्य हो जाती है अथवा जल में परिणत हो जाती है। उन्होनें मुझे आदेश दिया - 'अयोध्या से अपने श्रीरघुनाथ को ले आ। उनका स्नानोदक लेकर स्नान कर - तेरा शरीर स्वस्थ हो जायगा।'

नरेश ने बताया कि रात्रि में उन्होंने स्वप्न में अयोध्या की वह छोटी-सी श्रीरघुनाथ-जानकी की श्रीमूर्ति देखी है। उसका स्थान देखा है और उन मर्यादा पुरूषोत्तम ने भी इस पर्वतीय प्रान्त को अपने पदार्पण से धन्य करने का वचन दिया है।

राजपुरोहित को तो जैसे निधि प्राप्त हुई। मार्ग मिल गया तो लक्ष्य भी मिलकर ही रहेगा। स्वयं राजपुरोहित ने अयोध्या जाने का निश्चय किया। सेवक, सचिव आदि सबको आदेश दे दिये गये।

यह समूह पैदल यात्रा करके अयोध्या पहुँचा। उसे निर्दिष्ट स्थल पर श्रीरघुनाथजी की उस मृर्ति के दर्शन भी हो गये; किंतु त्रिभुवन के स्वामी का अपने घर ले जाने के पूर्व उनके सत्कार की प्रस्तुति भी तो चाहिये। राजपुरोहित पूरे एक वर्ष अयोध्या रहे। उन्होंने प्रत्येक दिन, प्रत्येक पर्वपर जैसी, जिस विधि से सेवा श्रीरघुनाथजी की होती थी, उसका सावधानीपूर्वक निरीक्षण किया और उस सबको लिखते गये।

एक वर्ष पश्चात योजना बनाकर एक रात्रि में राजपुरोहित के नेतृत्व में यह पर्वतीय लोगों का समूह मन्दिर से उस श्रीमूर्ती को लेकर चल पड़ा। प्रातःकाल जब मन्दिर में मूर्ती नहीं मिली, अयोध्या में हुई हलचल का आप अनुमान आप कर सकते हैं।

अयोध्या के लोग पिछा करेंगे, यह बात तो निश्चित थी। उन्होंने पिछा किया, किंतु राजपुरोहित इसके लिए प्रस्तुत थे। क्रोध से उबलते अवधवासी जब समीप आये, राजपुरोहित अपने पूरे समाज के साथ हाथ जोड़े, सर झुकाए खड़े थे। उन्होने कहा - 'आप मर्यादापुरूषोत्तम श्रीरघुनाथजी के अपने जन हैं। हमारे परम आदरणीय हैं और हम पर्वत के पापी-अपराधी प्राणी हैं। आप हमें दण्ड देंगे तो हम पवित्र होंगे। किंतु श्रीरघुनाथजी को हम उनकी आज्ञानुसार लाये हैं। वे विश्वनाथ पर्वतों की यात्रा करने निकले हैं। यदि वे लौटना स्वीकार करें, तो आप उन्हें प्रसन्नतापूर्वक ले जाइये।

अयोध्या के लोग क्रुद्ध तो बहुत थे, किंतु प्रतिवाद के ईंधन के स्थान पर नम्रता का जल पड़े तो क्रुद्धाग्नि कबतक जलती रह सकती है। सबसे अद्भूत बात यह हुई कि वह कुछ तोले की श्रीरघुनाथजी की श्रीमूर्ती किसी के उठाये उठती नहीं थी। सब प्रयत्न करके थक गये और अंत में अयोध्या से आगतों को कहना पड़ा - 'जब प्रभु ही जाना चाहते हैं, तो उन्हें रोकने वाले हम कौन होते हैं। किंतु श्रीरघुनाथजी के आराधकों का एक परिवार उन्हें छोड़कर जाने को तैयार नहीं था। वह परिवार श्रीरघुनाथजी के साथ ही कुलू आया और अभी कुछ वर्ष पुर्वतक उस परिवार के वंशधर कुलू में थे।

पूरे मार्ग में विधिपूर्वक श्रीरघुनाथजी की पूजा-अर्चा होती आयी थी। केवल विश्राम के कुछ समय में ही उनकी पालकी यात्रा करती थी। मार्ग में ही वे पर्वोत्सव भी मनाये गये जो उस समय पड़े।

कुलू में श्रीरघुनाथजी के पहुंचने से पूर्व ही उनके मन्दिर का निर्माण पूरा हो गया था। धूम-धाम के साथ श्रीरघुनाथजी कुलू पधारे और मन्दिर में उन्हें विराजमान कराया गया। नरेश ने मन्दिर में प्रवेश नहीं किया; किंतु श्रीरघुनाथजी के पधारते समय दूर से उनकी पालकी को साष्टांग प्रणिपात कर लिया था।

उत्तम मुहूर्त में श्रीरघुनाथजी का विधिपूर्वक महाभिषेक सम्पन्न हुआ। अभिषेक का जल स्वयं राजपुरोहित सेवकों द्वारा लिवाकर राजाके पास आये और उल्लसित स्वर में बोले 'आप चौकीपर विराजें। अब आपका अभिषेक सम्पन्न हो।'

'आप भी ऐसी अनुचित आज्ञा देंगे, ऐसी आशा मुझे नहीं थी।' नरेश दोनों हाथ जोडकर दूर खड़े रोते-रोते कह रहे थे - 'यह मेरे आराध्य के अभिषेक का परम-पावन जल है। इसे क्या इस कुष्ठ से अपवित्र देह पर डाला जा सकता है? यह मेरा वन्दनीय है। मैं कैसे यह कर सकता हूँ कि इसका कोई कण मेरे पैरों तक जाये?'

दो क्षण राजपुरोहित हतप्रभ खड़े रह गये। अन्त में बोले - 'भगवान शंकर और स्वयं रघुनाथजी का ही तो यह आदेश है। श्रीगंगाजी भगवान का मादोदक ही हैं और उनमें स्नान करना शास्त्र-संत सभी परम सौभाग्य मानते हैं।'

'मैं अज्ञ प्राणी हूँ। तर्क करने की क्षमता मुझमें नहीं है।' नरेश ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा - 'उमा-महेश्वार तो माता-पिता हैं हम पर्वतीय जनों के। वे स्नेह से शिशु को गोद में लें या मस्तक पर बैठावें; किंतु जब शिशु में अपनी कुछ समझ आ जाय - अपनी अधूरी-पूरी, भ्रान्त या ठीक समझ से वह जो कुछ सम्मान व्यक्त करने का प्रयत्न करता है, वही तो पूजा है।'

राज़पुरोहित को बड़ा खेद हुआ। राजा को वे समझा सकेंगे, ऐसी आशा उन्हें नही थी और नरेश को स्वस्थ देखने की भी दूसरी युक्ति सूझती नहीं थीं। अंतत: उन्हें वह अभिषेक-जल लेकर लौटना पड़ा। स्वस्तिपाठ के साथ केवल कुछ जल कण वे अपने नरेश के मस्तक पर डाल सके थे और एक कलश जल नरेश ने अपने पीने के लिये रख लिया था।

'श्रीरघुनाथजी की जय!' राजपुरोहित अभी उस कक्ष के द्वार तक पहुँचे थे कि उन्हें पीछे से नरेश की भावविह्वल जयध्वनि सुनायी पड़ी। वे पीछे मुड़े, इससे पूर्व नरेश, दौड़कर उनके सम्मुख साष्टांग गिर गये थे - सुंदर, स्वस्थ, युवा, निर्मल देह नरेश!
दो क्षण फिर चकित थकित राजपुरोहित हर्षविह्वल अपने यजमान की सम्पूर्ण स्वस्थ काया को देखते रहे और तब उनके कण्ठ से अस्पष्ट गद्गद स्वर निकला - 'श्रद्धा की जय!'
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कुलू के श्रीरघुनाथ मन्दिर में आज भी अयोध्या से आया श्रीरघुनाथजी का वही श्रीविग्रह विराजमान है। देवताओं की इस घाटी के वे अध्यक्ष हैं। विजयादशमी को घाटी के सब देवता उनका अभिवादन करने कुलू आते हैं।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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