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"घर से निकल कर घर को लौट आता हूँ, ये भी एक क़ायदा है सनम , एक मुसाफिर 🚶🏻‍♂️के लिए , जहा से मुशाफिर बनता हूँ ,वहाँ से लौट 🏃🏼‍♂️आता हूँ||"

घर से निकल कर घर को लौट आता हूँ,  ये  भी एक क़ायदा है सनम , एक मुसाफिर 🚶🏻‍♂️के लिए , जहा से मुशाफिर बनता हूँ ,वहाँ  से लौट 🏃🏼‍♂️आता हूँ||

लोट अटा हू 🌷
#Rupamrajbhar

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"घर से निकल कर घर को लौट आता हूँ, अपने तो अपने ही होते है, ये मैं गैरो से सीख आता हूँ।"

घर से निकल कर घर को लौट आता हूँ, अपने तो अपने ही होते है,
ये मैं गैरो से सीख आता हूँ।

#Home#2liner

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"घर से निकल कर घर को लौट आता हूँ, हर रोज निकलता हूं मुस्तकबिल की तलाश मे हर रोज ही राहे सफर छोड़ आता हूँ घर से निकलने ही नही देती माँ बाप गाँव गली की मोहब्बत हर बार मंजिल से राब्ता तोड़ आता हूँ हर बार बस घर से निकल कर घर को लौट आता हूँ मारुफ आलम"

घर से निकल कर घर को लौट आता हूँ, हर रोज निकलता हूं मुस्तकबिल की तलाश मे
हर रोज ही राहे सफर छोड़ आता हूँ
घर से निकलने ही नही देती माँ बाप गाँव गली की मोहब्बत
हर बार मंजिल से राब्ता तोड़ आता हूँ
हर बार बस
घर से निकल कर
घर को लौट आता हूँ

मारुफ आलम

घर को लौट आता हूँ/शायरी

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"घर से निकल कर घर को लौट आता हूँ, मंजिल का पता नहीं बस भटकता जाता हूं ना दिमाग काम करता है ना दिल काम करता है जहां से चला था फिर वही पहुंच जाता हूं"

घर से निकल कर घर को लौट आता हूँ, मंजिल का पता नहीं 
बस भटकता जाता हूं
ना दिमाग काम करता है
 ना दिल काम करता है
जहां से चला था 
फिर वही पहुंच जाता हूं

#myfeeling

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"घर से निकाल कर घर को लौट आती हूं, हर रोज अपने सपनों को वक्त के तराजू में तौल आती हूं कुछ पा लेती हूं कुछ खो देती हूं इस दुनियां के गर्दिश में थोड़ा हंस लेती तो थोड़ा रो भी देती हूं लोगो में हर रोज कहीं गुम हो जाती हूं और रोज खुद से ही खुद को ढूंढ़ लेती हूं कभी बिखर जाती कभी समेट लेती हूं हर रोज एक सफर तय करती और हर रोज रास्ते को बटोर लेती हूं हर रोज दास्तां लिखती हर रोज उस पर गौर फ़रमाती हूं हर रोज बहुत कुछ सिखाती हर रोज बहुत कुछ छोड़ आती हूं हर रोज घर से निकाल कर घर को ही लौट आती हूं!!"

घर से निकाल कर
घर को लौट आती हूं,
हर रोज अपने सपनों को 
वक्त के तराजू में तौल आती हूं
                
                                     कुछ पा लेती हूं कुछ खो देती हूं              
                                     इस दुनियां के गर्दिश में थोड़ा                 
                                     हंस लेती तो थोड़ा रो भी देती हूं  
         
लोगो में हर रोज कहीं गुम हो जाती हूं  
और रोज खुद से ही खुद को ढूंढ़ लेती हूं
कभी बिखर जाती कभी समेट लेती हूं      

                                          हर रोज एक सफर तय करती                 
                                         और हर रोज रास्ते को बटोर लेती हूं         
                                         हर रोज दास्तां लिखती हर रोज               
                                         उस पर गौर फ़रमाती हूं      
हर रोज बहुत कुछ सिखाती
हर रोज बहुत कुछ छोड़ आती हूं                   
हर रोज घर से निकाल कर                   
घर को ही लौट आती हूं!!

हर रोज का सफर....
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