जीवन का सबसे खुशनुमा पढा़व/पल बचपन...
 
उन ठहरी हु
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"जीवन का सबसे खुशनुमा पढा़व/पल बचपन... उन ठहरी हुई शामों में तारों को गिनना अच्छा लगता था। यें बहकी हुई बेसब्र शामें जिन्हे अच्छी लगती हैं। होंगी भी, पर हमें तो अपना बचपन अच्छा लगता था। उस छोटी सी गिरी हुई साइकिल को चलाना अच्छा लगता था। यह आज बड़ी गाड़ियां जिन्हें अच्छी लगती है। होंगी भी, पर हमें तो अपना बचपन अच्छा लगता था। वो बेपरवाह धूल में सनकर खेलना अच्छा लगता था। यह साफ-सुथरे खेल जिन्हे अच्छे लगते हैं। होंगे भी, पर हमें तो अपना बचपन अच्छा लगता था। वो बिना शर्त के हर काम में खुद को झोंक देना अच्छा लगता था। आज जिन्हें ये गर्ज की शान अच्छी लगती है। होंगी भी, पर हमें तो अपना बचपन अच्छा लगता था। अगर यें खुदगर्जी है तो सही है होनी भी चाहिए। आपको यें जवानी अच्छी लगती होगी। पर हमें तो अपना बचपन अच्छा लगता था।!! TRIलोकी TRIपाठी...✨"

जीवन का सबसे खुशनुमा पढा़व/पल बचपन...
 
   उन ठहरी हुई शामों में तारों को गिनना अच्छा लगता था।
       यें बहकी हुई बेसब्र शामें जिन्हे अच्छी लगती हैं।
    होंगी भी, पर हमें तो अपना बचपन अच्छा लगता था।

उस छोटी सी गिरी हुई साइकिल को चलाना अच्छा लगता था।
        यह आज बड़ी गाड़ियां जिन्हें अच्छी लगती है।
    होंगी भी, पर हमें तो अपना बचपन अच्छा लगता था।

     वो बेपरवाह धूल में सनकर खेलना अच्छा लगता था।
         यह साफ-सुथरे खेल जिन्हे अच्छे लगते हैं।
     होंगे भी, पर हमें तो अपना बचपन अच्छा लगता था।

वो बिना शर्त के हर काम में खुद को झोंक देना अच्छा लगता था।
        आज जिन्हें ये गर्ज की शान अच्छी लगती है।
     होंगी भी, पर हमें तो अपना बचपन अच्छा लगता था।

       अगर यें खुदगर्जी है तो सही है होनी भी चाहिए।
           आपको यें जवानी अच्छी लगती होगी।
        पर हमें तो अपना बचपन अच्छा लगता था।!!
                                                TRIलोकी TRIपाठी...✨

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