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ग़ज़ल- अजनबी शहर अजनबी लोगो, चाहता हूं मैं, दोस्त

ग़ज़ल-
अजनबी शहर अजनबी लोगो, चाहता हूं मैं, दोस्ती लोगो । जिसने पर्दा हटा के देख लिया, माँगेगा, जिंदगी लोगो । अब तो कुदरत से जंग है सबकी, बैर आपस के, मुल्तवी लोगो। पा के मंजिल भी मैं रहा प्यासा, क्यों नही बुझती, तिश्नगी लोगो। हुक्म आया, दिया जले घर घर, हो दिलों में भी, रोशनी लोगो । और सब खर्च कर दिया है कर दिया है "क़्फ़र कुल बचत मेरी, शाड्री लोगो ।। रोहिताश" क़फ़स"

©suraj doiwad
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