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आँखे किसी नए रास्ते को तलाशती हैं शायद, किसी नए का

आँखे किसी नए रास्ते को तलाशती हैं शायद,
किसी नए कारवां को, किसी नए सफ़र को,
पुराने रास्ते से मंजिल दूर लगती है,
बहुत दूर, कुछ धुंधली सी दिखती है,
रास्ते में गड्ढे बहुत हैं,
पत्थर भी पैरों में चुभते बहुत हैं,
काँटों की डगर पर कहॉं तक चलें अब,
पैरों से रिसता है लहू, कब तक सहें अब।
तो क्यूं न सफ़र में अब सुकूँ के रंग भर दें,
किसी खूबसूरत मोड़ पर रास्ता बदल दें।
अब निगाहें बस ढूंढती है एक ऐसे रास्ते को,
जिसे खुद इंतजार हो मुसाफ़िर का।
रास्ता जिसे खुद भी मुसाफ़िर की जरूरत हो,
जिसे एहसास हो मुसाफ़िर की तकलीफों का,
हाँ,आँखे ऐसे ही नए रास्ते को तलाशती हैं शायद,
ऐसे ही नए कारवां को, ऐसे ही किसी नए सफ़र को।

©Miraaj
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