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Sindoori (Part-3) इक दरिया से पाला पड़ा कहीं मैं

Sindoori (Part-3)

इक दरिया से पाला पड़ा कहीं
मैं बहा मगर कुछ कहा नहीं
भंवर में अटका सोच रहा था
खोजी होकर खोज रहा था
दख्खन में मुड़कर देखा तो
सूरज की कंचन किरणें उसको
पिला रही थी कस्तूरी
फिर दरिया दिल बौराया मेरा
और पलकों से छान रहा था सिंदूरी
इस माया को मैं समझ ना पाया
रे साकी तूने क्या है पिलाया
मुझ में बेमानी फूट रही है
क्या तू भी मुझसे छूट रही है
मेरी नासा से शोणित बूंदें 
तेरे माथे पर टूट रहीं हैं 
ये प्याला तेरे हाथों वाला
क्युं बना रहा मुझसे दूरी
आज तो तेरी मदिरा में भी
घुली हुई है सिंदूरी
......................गौतम

©Gautam
  Sindoori (Part-3)
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Gautam

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