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सोचता हुं मे अपने कमरे में काश होता में तेरे कमरे

सोचता हुं मे अपने कमरे में
काश होता में तेरे कमरे में 

नूर बिखरा था सबके कमरे में
था फ़क़त चांद मेरे कमरे में


जो भी हौ मुब्तिलाए दर्दे - दिल? 
उसको बिठलाऔ मेरे कमरे में 

चीख़ती फिर रही थी तनहाई ,
एक कमरे से दूजे कमरे में

में अकेला रहा तन्हा बाहर
वोह भी तन्हा था अपने कमरे में 

दूर से किसकी आरही है सदा, 
मेरे कमरे में तेरे कमरे में 

सिफ़-ह-ते इश्क़ , मुश्क जैसी  हैँ 
छुप न पाएगी दिल के कमरे में

उनकी यादें को रखा है कौसर
दिल के शफ़ाफ उजले कमरे में

©Kausar Raza
  #Ghazaliat
#KamreMein