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मैं नारी अंर्तमन में रजत-स्वप्नों का अंतरिम आस लिए

मैं नारी अंर्तमन में रजत-स्वप्नों का अंतरिम आस लिए जुझती।
मुग्ध-हुलास को में
मैं तिरोहित हो मन में बांट अगोरती,
अस्तगमित महिमा समाज की,
दुर्मद अवार चढ़ाये हुए हैं सब यहाँ, 
और कोपाकुल हो हमें ही है बस निहारती,
कराल है व्यथा हमारी,
मैं नारी अंर्तमन में रजत-स्वप्नों का अंतरिम आस लिए जुझती। 
परिपाटी अजीब है इस कुदेश की,
नारियों पर ही केवल क्यों हैं लांक्षन लगती, 
बलि-कृति-कला कि स्वरुप नारी, 
फिर अनल के कोढ़ में ही क्यों हैं समाती,
मैं नारी अंर्तमन में रजत-स्वप्नों का अंतरिम आस लिए जुझती।

©सिन्टु सनातनी "फक्कड़ "
  #फक्कड़