जिंदगी हर पल ही मेरी, जहमत से जूझती रहती है। देती ना सूकून एक पल को, बस उलझती रहती है। ना कोई साथी है, ना कोई सहारा है इस राह- गुजर में मझधार में है नैया हमारी, दिखता नहीं कोई किनारा है। जिम्मेदारियों के कफस में कैद हो रह गई है जिंदगी। अपनी खातिर तो, जिंदगी की कोई आस ही ना बची है। कोई साथी मिले तो, अपनी जहमतों को बांट लें हम। उसपर यकीन कर सारी जिंदगी उसके संग काट ले हम। "अजीज/प्रिय" "कातिबों/लेखकों" 👉आज की बज़्म/प्रतियोगिता के लिए आज का हमारा अल्फ़ाज़/शब्द है 👇👇👇 🌹" ज़हमत / زحمت"🌹 🌷"Zahmat"🌷 👉तहरीर/मतलब= मन की परेशानी, विपदा, दर्द