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बचपन ही वो उम्र थी जिसमें सपने बोने कद से भी रोज़ ब

बचपन ही वो उम्र थी जिसमें सपने बोने कद से भी रोज़ बड़े दिखते थे
वो कागज़ की कश्ती, धकेलते हुए पहिए
आज कश्ती भी सुराख़ वाली मिली है
 वक़्त का पहिया बिना धकेले चल रहा है

©Z. Khan
  #ये कब हुआ।
manfoolsingh1863

Z. Khan

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#ये कब हुआ। #ज़िन्दगी

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