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एक पत्र आप सभी के लिए । एक रोज मेरी पत्नी ने मुझसे

एक पत्र आप सभी के लिए ।
एक रोज मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा कि आप अपना ही बीमा क्यों करवाते हैं। मेरा क्यों नहीं करवाते। मैंने कहा-अगर तुम ही जिंदगी से निकल गई तो मैं उसके एवज में पैसे लेकर क्या करूंगा..? जीवन में तुम्हारी भरपाई पैसा नहीं कर पाएगा, लेकिन खुदा न खास्ता अगर मैं पहले निकल लिया तो सिर्फ दो ही चीजें काम आएंगी, मेरे छोड़े हुए रिश्ते और मेरे छोड़े हुए पैसे। 
ये बात दरअसल मूल बात का प्रसंग मात्र है। लखनऊ में यूपी की एनकाउंटरबाज पुलिस की गोली से मारे गए विवेक तिवारी की पत्नी कल्पना तिवारी और परिवार वालों को 40 लाख रुपये का मुआवजा, नौकरी, सरकारी घर मिला तो वो शांत दिखीं। मुख्यमंत्री और सरकार पर भरोसा जताया, लेकिन उनकी ये संतुष्टि बहुतों को रास नहीं आई। जो लिखा जा रहा है उसका सीधा-सीधा सा मतलब है-कल्पना ने पति की हत्या का सौदा कर लिया है। 
तो क्या करती कल्पना तिवारी..। हत्यारे कांस्टेबल प्रशांत चौधरी को चाहे फांसी चढ़ा दिया जाए, योगी सरकार गिर जाए, कुछ भी हो जाए, विवेक तिवारी को वापस नहीं लाया जा सकता था। तो क्या विवेक तिवारी के विरह में कल्पना तिवारी अपनी पूरी उम्र काट देतीं, बच्चे यतीम की जिंदगी बिता रहे होते, तब लोग संतुष्ट होते। वो कहती-मुझे मुआवजे का एक भी पैसा नहीं चाहिए, मुझे मेरे पति का इंसाफ चाहिए। इस डायलॉग पर आप शायद तालियां बजाते, लेकिन दिल पर हाथ रखकर बताइए, अगर आपसे कहा जाता कि आप कल्पना तिवारी की सिर्फ एक बेटी की साल भर की फीस भर दीजिए, तो क्या आप भरते..? 
विवेक तिवारी पुलिस की गोली का शिकार हुए। उन्होंने सिर्फ अपना शरीर ही नहीं छोड़ा था। कुछ जिम्मेदारियां भी छोड़ गए हैं। बुजुर्ग मां, एक विधवा पत्नी, दो मासूम बच्चे। कौन जिम्मेदारी लेगा इनकी..? एक स्त्री के लिए पति से बढ़कर कुछ भी नहीं होता, लेकिन उसके बच्चे भी तो उस पति के ही अंश हैं। विवेक की मां की आंखों में भी तो अपने बेटे का अक्स है। एक जिम्मेदार और व्यावहारिक इंसान को 'हे भगवान, ये क्या हो गया', इस सवाल से ज्यादा इस सवाल पर सोचना चाहिए कि अब आगे क्या होगा..? ये परिवार कैसे चलेगा?...
विवेक तिवारी प्राइवेट नौकरी में थे। हो सकता है कि मोटा वेतन मिलता रहा हो, लेकिन उनके जाने के बाद ये घर कैसे चलता, पत्नी किससे आस रखती..। बच्चों की फीस कौन भरता, उनकी जिम्मेदारियां कौन उठाता। जब विवेक तिवारी की हत्या हुई तो कल्पना भावुकता के चरम पर थीं, उनका तो सब कुछ लुट चुका था। लेकिन भीतर एक समझदार और जिम्मेदार महिला ने आंखें खोलीं, पता चला कि नहीं, सब कुछ खत्म नहीं हुआ है, जो बचा हुआ है, उसे बचाना है। 
सबकी अपनी-अपनी सोच और समझ। मैं व्यक्तिगत रूप से कल्पना तिवारी के साथ हूं। बिल्कुल व्यावहारिक सोच अपनाई है। किसी के भरोसे रहने से बेहतर, खुद अपने दम पर अपना परिवार पालने का उपाय किया है। अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित किया है। उनके भीतर एक भावुक पत्नी और एक जिम्मेदार मां का संघर्ष जरूर चला होगा। लेकिन मां की जीत हुई है, मां को जीतना भी चाहिए। 
विवेक तिवारी ढेर सारे रिश्ते छोड़कर गए होंगे, रिश्तेदार, मित्र छोड़कर गए होंगे। आज बहुत लोग मानसिक तौर पर उनसे और उनके परिवार से जुड़े नजर आ रहे हैं, लेकिन रिश्तों का मेरा तजुर्बा है। जब सब कुछ बहुत हसीन होता है, तो रिश्ते भी बहुत हसीन होते हैं और जब हालात ऐसे हो जाएं, जो कल्पना तिवारी के सामने थे तो यकीन कीजिए, 10 फीसदी रिश्तेदार औऱ मित्र नजर नहीं आएंगे। दोस्ती की मस्ती अलग बात  है, दोस्त के परिवार की जिम्मेदारी उठाना अलग।

एक पत्र आप सभी के लिए । एक रोज मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा कि आप अपना ही बीमा क्यों करवाते हैं। मेरा क्यों नहीं करवाते। मैंने कहा-अगर तुम ही जिंदगी से निकल गई तो मैं उसके एवज में पैसे लेकर क्या करूंगा..? जीवन में तुम्हारी भरपाई पैसा नहीं कर पाएगा, लेकिन खुदा न खास्ता अगर मैं पहले निकल लिया तो सिर्फ दो ही चीजें काम आएंगी, मेरे छोड़े हुए रिश्ते और मेरे छोड़े हुए पैसे। ये बात दरअसल मूल बात का प्रसंग मात्र है। लखनऊ में यूपी की एनकाउंटरबाज पुलिस की गोली से मारे गए विवेक तिवारी की पत्नी कल्पना तिवारी और परिवार वालों को 40 लाख रुपये का मुआवजा, नौकरी, सरकारी घर मिला तो वो शांत दिखीं। मुख्यमंत्री और सरकार पर भरोसा जताया, लेकिन उनकी ये संतुष्टि बहुतों को रास नहीं आई। जो लिखा जा रहा है उसका सीधा-सीधा सा मतलब है-कल्पना ने पति की हत्या का सौदा कर लिया है। तो क्या करती कल्पना तिवारी..। हत्यारे कांस्टेबल प्रशांत चौधरी को चाहे फांसी चढ़ा दिया जाए, योगी सरकार गिर जाए, कुछ भी हो जाए, विवेक तिवारी को वापस नहीं लाया जा सकता था। तो क्या विवेक तिवारी के विरह में कल्पना तिवारी अपनी पूरी उम्र काट देतीं, बच्चे यतीम की जिंदगी बिता रहे होते, तब लोग संतुष्ट होते। वो कहती-मुझे मुआवजे का एक भी पैसा नहीं चाहिए, मुझे मेरे पति का इंसाफ चाहिए। इस डायलॉग पर आप शायद तालियां बजाते, लेकिन दिल पर हाथ रखकर बताइए, अगर आपसे कहा जाता कि आप कल्पना तिवारी की सिर्फ एक बेटी की साल भर की फीस भर दीजिए, तो क्या आप भरते..? विवेक तिवारी पुलिस की गोली का शिकार हुए। उन्होंने सिर्फ अपना शरीर ही नहीं छोड़ा था। कुछ जिम्मेदारियां भी छोड़ गए हैं। बुजुर्ग मां, एक विधवा पत्नी, दो मासूम बच्चे। कौन जिम्मेदारी लेगा इनकी..? एक स्त्री के लिए पति से बढ़कर कुछ भी नहीं होता, लेकिन उसके बच्चे भी तो उस पति के ही अंश हैं। विवेक की मां की आंखों में भी तो अपने बेटे का अक्स है। एक जिम्मेदार और व्यावहारिक इंसान को 'हे भगवान, ये क्या हो गया', इस सवाल से ज्यादा इस सवाल पर सोचना चाहिए कि अब आगे क्या होगा..? ये परिवार कैसे चलेगा?... विवेक तिवारी प्राइवेट नौकरी में थे। हो सकता है कि मोटा वेतन मिलता रहा हो, लेकिन उनके जाने के बाद ये घर कैसे चलता, पत्नी किससे आस रखती..। बच्चों की फीस कौन भरता, उनकी जिम्मेदारियां कौन उठाता। जब विवेक तिवारी की हत्या हुई तो कल्पना भावुकता के चरम पर थीं, उनका तो सब कुछ लुट चुका था। लेकिन भीतर एक समझदार और जिम्मेदार महिला ने आंखें खोलीं, पता चला कि नहीं, सब कुछ खत्म नहीं हुआ है, जो बचा हुआ है, उसे बचाना है। सबकी अपनी-अपनी सोच और समझ। मैं व्यक्तिगत रूप से कल्पना तिवारी के साथ हूं। बिल्कुल व्यावहारिक सोच अपनाई है। किसी के भरोसे रहने से बेहतर, खुद अपने दम पर अपना परिवार पालने का उपाय किया है। अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित किया है। उनके भीतर एक भावुक पत्नी और एक जिम्मेदार मां का संघर्ष जरूर चला होगा। लेकिन मां की जीत हुई है, मां को जीतना भी चाहिए। विवेक तिवारी ढेर सारे रिश्ते छोड़कर गए होंगे, रिश्तेदार, मित्र छोड़कर गए होंगे। आज बहुत लोग मानसिक तौर पर उनसे और उनके परिवार से जुड़े नजर आ रहे हैं, लेकिन रिश्तों का मेरा तजुर्बा है। जब सब कुछ बहुत हसीन होता है, तो रिश्ते भी बहुत हसीन होते हैं और जब हालात ऐसे हो जाएं, जो कल्पना तिवारी के सामने थे तो यकीन कीजिए, 10 फीसदी रिश्तेदार औऱ मित्र नजर नहीं आएंगे। दोस्ती की मस्ती अलग बात है, दोस्त के परिवार की जिम्मेदारी उठाना अलग।

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