मैं खुद पर क्या अफ़सोस करूँ, मैं खुद पर हँसता रहता

मैं खुद पर क्या अफ़सोस करूँ, मैं खुद पर हँसता रहता हूँ
दिन भर मैं खामोश फिरूं, मैं खुद में फंसता रहता हूँ
काफिर था मैं, भटकता हूँ अब मक्के-मदीने में
क्यों ज़िन्दगी की इतनी कमी है, मेरे इस जीने में

कुछ लोग हैं , जो करते हैं मुझसे प्यार
कुछ दोस्त भी हैं, जो कहते हैं मुझे यार
मौकों की कमी नहीं होती, शाम-ए-महफ़िल में, पीने में
क्यों ज़िन्दगी की इतनी कमी है, मेरे इस जीने में

जो भूल गए, क्या उनकी कमी खलती है
जो कभी मिले ही नहीं, जहन में उनकी शमा कैसे जलती है?
वक़्त कम्बख्त ही जब रक़ीब हो, तो सालों कटते हैं एक महीने में
क्यों ज़िन्दगी की इतनी कमी है, मेरे इस जीने में

इतने पैसे तो हैं, की नहीं होती पैसों की कमी
आसमां तक तो पहुंचे नहीं, पर अपने नाम की है एक ज़मी
आने वाले कल के लिए सपने भी हैं, और मज़ा भी आता है उन सपनों को सीने में
क्यों ज़िन्दगी की इतनी कमी है, मेरे इस जीने में

शायद आलस है ये मेरा, कि खुशियां पास नहीं आती
नासमझी है ये मेरी, कि सुलझी राहें रास नहीं आती
चाहे जितने भी प्यार से तराशा हो, खामियां हीं ढूंढ़ता हूँ मैं हर नगीने  में 
क्यों ज़िन्दगी की इतनी कमी है, मेरे इस जीने में

सोता हूँ, मैं जगता हूँ,
रोता हूँ, मैं हँसता हूँ 
सांसें भी आती हैं सीने में
क्यों ज़िन्दगी की इतनी कमी है, मेरे इस जीने में
 #zindagi #yqbaba #yqdidi #eighthquote
मैं खुद पर क्या अफ़सोस करूँ, मैं खुद पर हँसता रहता हूँ
दिन भर मैं खामोश फिरूं, मैं खुद में फंसता रहता हूँ
काफिर था मैं, भटकता हूँ अब मक्के-मदीने में
क्यों ज़िन्दगी की इतनी कमी है, मेरे इस जीने में

कुछ लोग हैं , जो करते हैं मुझसे प्यार
कुछ दोस्त भी हैं, जो कहते हैं मुझे यार
मौकों की कमी नहीं होती, शाम-ए-महफ़िल में, पीने में
क्यों ज़िन्दगी की इतनी कमी है, मेरे इस जीने में

जो भूल गए, क्या उनकी कमी खलती है
जो कभी मिले ही नहीं, जहन में उनकी शमा कैसे जलती है?
वक़्त कम्बख्त ही जब रक़ीब हो, तो सालों कटते हैं एक महीने में
क्यों ज़िन्दगी की इतनी कमी है, मेरे इस जीने में

इतने पैसे तो हैं, की नहीं होती पैसों की कमी
आसमां तक तो पहुंचे नहीं, पर अपने नाम की है एक ज़मी
आने वाले कल के लिए सपने भी हैं, और मज़ा भी आता है उन सपनों को सीने में
क्यों ज़िन्दगी की इतनी कमी है, मेरे इस जीने में

शायद आलस है ये मेरा, कि खुशियां पास नहीं आती
नासमझी है ये मेरी, कि सुलझी राहें रास नहीं आती
चाहे जितने भी प्यार से तराशा हो, खामियां हीं ढूंढ़ता हूँ मैं हर नगीने  में 
क्यों ज़िन्दगी की इतनी कमी है, मेरे इस जीने में

सोता हूँ, मैं जगता हूँ,
रोता हूँ, मैं हँसता हूँ 
सांसें भी आती हैं सीने में
क्यों ज़िन्दगी की इतनी कमी है, मेरे इस जीने में
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