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राधा।

राधा।                                                                             

वृंदावन की गलियां छुटी यमुना तट के घाट छूटे
गोपियों संग प्रेम नृतन, बृज के सारे ठाठ छूटे
मां का आंचल छोड़ आए सबसे नाता तोड़ आए
ग्वाल बालो को भी लगता राह में तुम छोड़ आए

दर्द देने वाले छलिया दर्द को क्या सह सकोगे
बोलो कान्हा कब तलक राधिका बिन रह सकोगे

राज में तुम खो गए हो रूक्मिणी के हो गए हो
रात में हमको जगाकर कान्हा तुम तो सो गए हो
आंख का आंसू पिया है हमने जख्मों को सिया हैं
जिससे हमने खुशियां मांगी उसने ही तो गम दिया है

प्रेम को समझाने वाले   विरह पर कुछ कह सकोगे
बोलो ना कान्हा.....
कब तलक तुम राधिका बिन यूं रह सकोगे

कान्हा।                                                                              
धर्म ने गोकुल छुड़ाया द्वारिका तक खींच लाया
सबसे जीता युद्ध लेकिन
अपनी राधिका को मैं हार आया
मोहिनी सूरत हैं भाती 
मुझको राधे तेरी याद आती
तेरे बिन राधे में कुछ नहीं हूं काश तू ये जान पाती

राधा का था कन्हैया राधा का ही रहेगा सारी दुनियां अब ये कहेगी

जब तलक कान्हा रहेगा तब तलक राधा रहेगी

©pihu sharma
  #राधाकृष्ण #विरह_वेदना