Anubhuti Hajela

Anubhuti Hajela

लफ्ज़ नहीं जज़्बात हैं मेरे ज़रा ख़ुलूस से समझियेगा

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#मेरी माँ

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#myvoice #JNU attack#Azadi
se Azadi
#Stay United for India

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"ये सर्द सुनहरी सुबह है, और ये सर्द सुनहरी सुबह है, और अब तुम मेरे पास नहीं गुल, कली,बाग़, शहर कौन है जो उदास नहीं"

ये सर्द सुनहरी सुबह है, और ये सर्द सुनहरी सुबह है, और 
अब  तुम मेरे पास नहीं 
गुल, कली,बाग़, शहर 
कौन है जो उदास नहीं

#Sunhari_Subh

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"उस सर्द सुबह को उसने मिलने बुलाया था और मेरी धड़कने काबू में न थीं.चार साल पहले इन्हीं सर्दियों के दिनों में हम एक हुए थे....मेडिकल कॉलेज में साथ पढ़ते पढ़ते कब दोस्ती हुई और प्यार कब.... पता ही नहीं चला.... उसने चुपके से मेरी नोटबुक में प्यार भरा ख़त लिख कर मिलने बुलाया था.... मैं सातवें आसमान पर उड़ती परी सी जा पहुंची थी.... दिल की बात कही थी दोनों ने और कितनी आसानी से नज़रों ने हाँ कर दी थी.... उसके बाद साथ साथ मेडिकल की पढ़ाई.... साथ साथ सरकारी नौकरी और फिर एक ही अस्पताल में पोस्टिंग.... लगता था शाहरुख़ खान की फ़िल्म की तरह पूरी कायनात हमें मिलाने की साज़िश कर रही थी...... फिर हम दोनों ने साथ साथ न्यू यॉर्क से मास्टर्स करने का सपना देखा.... प्रेम पर मेरा विश्वास मज़बूत हो चुका था क़ि अब हम जहाँ जाएंगे...एक साथ.... कभी जुदा न होंगे..... आवेदन एक साथ कर के एक साथ पोस्ट किया.... उसने मेरा और मैंने उसका.... दिन रात बस अमेरिका में ज़िन्दगी बिताने का सपना मेरी नींदें ले गया.... नींद तो नींद... भूख, प्यास, चैन सब कुछ..... 2-3 महीने बाद परिणाम आया..... वो सेलेक्ट हो गया था और मेरा नाम वेटिंग लिस्ट में था.... मैं उदास हो गई.... आँसू छलक गए.... कई दिन तक खामोश सी हो गई.... फिर सोचा उसके साथ तो मैं अमेरिका जा ही सकती हूँ.....ये सब सोच ही रही थी कि उसका फ़ोन आ गया ....उसकी आवाज़ में अजीब सा बेगाना पन था जिसको सुनकर मैं सिहर गई.... मुझे उसने फ़ौरन मिलने बुलाया था..... मैं समझ नहीं पायी इतनी सुबह क्या काम हो सकता है..... आज वही दिन था ..... इतनी सर्दी में भी मेरे माथे पर पसीना की बूँदें थीं.... मैं कांपते पैरों से वहाँ पहुंची... बैठकर कॉफ़ी मंगाई और आँखें छलक गईं.... रुंधे गले से पुछा.... क्या हुआ? उसने कहा गीता मैं न्यूयॉर्क नहीं जा सकता.... मुझे अपनी बहनों की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी निभानी है.... अभी मैं अपने परिवार को छोड़ कर नहीं जा सकता.... उसके पिता जी जाने माने व्यापारी थे... घर में सबसुख सुविधाएं थीं.... मैंने जब कहा क़ि पापा तो समर्थ हैँ.... उसनेकहा कि पापा ने एक नये बिज़नेस में पैसा लगाया था जो डूब गया.... मैं अभी नौकरी नहीं छोड़ सकता.... मैंने बहुत समझाया कि हम दोनों मिलकर एक दो साल उसके घर को संभाल लेंगे पर उसकी ज़िद ने मेरी एक न सुनी.... आखिर में गुस्से में मैंने कहा कि मुझमें या परिवार में से एक को चुन ले.... उसने परिवार चुना..... वो सर्द सुबह मेरा सबसे अच्छा दोस्त और साथी ले गई.... उसके बाद वेटिंग लस्ट में पहला नंबर होने के कारण मुझे न्यूयॉर्क जाने का मौका मिल गया..... मैं वहाँ चली गई.... आपस में कोई सम्बन्ध न रहा और मैंने खुद को पढ़ाई और हॉस्पिटल की जॉब में इतना व्यस्त कर लिया कि मुड़ कर नहीं देखा. देखती भी क्या? प्रेम पर से मेरा विश्वास हट चुका था. मेरी मंज़िल मुझे मिल कर भी न जाने क्यूँ अधूरी सी थी............... पांच साल बीत गए और मुझे पता भी नहीं चला.... पिछले हफ्ते माँ का फ़ोन आया... उनकी तबियत ख़राब थी.... मैंने हफ्ते में काम निबटाया और छुट्टी लेकर फ्लाइट बुक की.... एयरपोर्ट पर इंतज़ार करते हुए अचानक एक जाना पहचाना चेहरा देख कर मैं हैरान हो गई..... मायरा यहाँ क्या कर रही है? मैंने सोचा..... तब तक वो मेरे पास आ कर गले लग गई.... हैरान सी मैंने पूछा..... तुम यहाँ कैसे? उसने बताया कि न्यूयॉर्क से एम. बी. ए कर रही है और इंडिया अपने घर जा रही है.... मायरा समर की छोटी बहन थी.... मैंने फ्लाइट में उससे पूछा की तुम्हारे पापा का बिज़नेस तो डूब गया था फिर कैसे आ पाई? उसने कहा कि मुझे कोई गलतफहमी हो गई है...पापा का बिज़नेस पहले से भी अच्छा हो गया है ... मैं चुप हो गई.... मेरे साथ अब कई सवाल और उनके जवाब उड़ रहे थे.. अचानक आसमान में बादलों के बीच उड़ते उड़ते मेरे मन के बादल छंट रहे थे...... घने कोहरे में धूप दिख रही थी... सच मेरे सामने आ चुका था .... परिवार की ज़िम्मेदारी एक बहाना था... मुझे मेरी मंज़िल तक पहुँचाने का.... मेरे सपने पूरे करने का.... वो भी मुझे बिन बताये ताकि मेरा आत्म सम्मान बना रहे.... प्रेम में मेरा विश्वास आज अटल हो चुका था...मेरे प्रेम को मंज़िल मिल चुकी थी....."

उस सर्द सुबह को उसने मिलने बुलाया था और         


 मेरी धड़कने काबू में न थीं.चार साल पहले इन्हीं सर्दियों के दिनों में हम एक हुए थे....मेडिकल कॉलेज में साथ पढ़ते पढ़ते कब दोस्ती हुई और प्यार कब.... पता ही नहीं चला.... उसने चुपके से मेरी नोटबुक में प्यार भरा ख़त लिख कर मिलने बुलाया था.... मैं सातवें आसमान पर उड़ती परी सी जा पहुंची थी.... दिल की बात कही थी दोनों ने और कितनी आसानी से नज़रों ने हाँ कर दी थी.... उसके बाद साथ साथ मेडिकल की पढ़ाई.... साथ साथ सरकारी नौकरी और फिर एक ही अस्पताल में पोस्टिंग.... लगता था शाहरुख़ खान की फ़िल्म की तरह पूरी कायनात हमें मिलाने की साज़िश कर रही थी...... फिर हम दोनों ने साथ साथ न्यू यॉर्क से मास्टर्स करने का सपना देखा.... प्रेम पर मेरा विश्वास मज़बूत हो चुका था क़ि  अब हम जहाँ जाएंगे...एक साथ.... कभी  जुदा न होंगे..... आवेदन एक साथ कर के एक साथ पोस्ट किया.... उसने मेरा और मैंने  उसका.... दिन रात बस अमेरिका में   ज़िन्दगी बिताने का सपना मेरी  नींदें ले गया.... नींद तो नींद... भूख, प्यास, चैन सब कुछ..... 2-3 महीने बाद परिणाम आया..... वो सेलेक्ट हो गया था और मेरा नाम वेटिंग लिस्ट में था.... मैं उदास हो गई.... आँसू छलक  गए.... कई दिन तक खामोश सी हो गई.... फिर सोचा उसके साथ तो मैं अमेरिका जा ही सकती हूँ.....ये सब सोच ही रही थी कि  उसका फ़ोन आ गया ....उसकी आवाज़ में अजीब सा बेगाना पन था जिसको सुनकर मैं सिहर गई....  मुझे उसने फ़ौरन मिलने बुलाया था..... मैं समझ नहीं पायी इतनी सुबह क्या काम हो सकता है..... आज वही दिन था ..... इतनी सर्दी में भी मेरे माथे पर पसीना की बूँदें थीं.... मैं कांपते पैरों से वहाँ पहुंची... बैठकर कॉफ़ी मंगाई और आँखें छलक  गईं.... रुंधे गले से पुछा.... क्या हुआ?  उसने कहा गीता मैं न्यूयॉर्क नहीं जा सकता.... मुझे अपनी बहनों की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी निभानी है.... अभी मैं अपने परिवार को  छोड़  कर नहीं जा सकता.... उसके पिता जी जाने माने व्यापारी थे... घर में सबसुख सुविधाएं थीं.... मैंने जब कहा क़ि  पापा तो समर्थ हैँ.... उसनेकहा कि  पापा ने एक नये बिज़नेस में पैसा लगाया था जो डूब गया.... मैं अभी नौकरी नहीं छोड़  सकता.... मैंने बहुत समझाया कि हम दोनों मिलकर एक दो साल उसके घर को संभाल लेंगे पर उसकी ज़िद ने मेरी एक न सुनी.... आखिर में गुस्से में मैंने कहा कि मुझमें या परिवार में से एक को चुन ले.... उसने परिवार चुना..... वो सर्द सुबह मेरा सबसे अच्छा दोस्त और साथी ले गई.... 


उसके बाद वेटिंग लस्ट में पहला नंबर होने के कारण मुझे न्यूयॉर्क  जाने का मौका मिल गया..... मैं वहाँ चली गई.... आपस  में कोई सम्बन्ध न रहा  और मैंने खुद को पढ़ाई और हॉस्पिटल की जॉब में इतना व्यस्त कर लिया कि मुड़  कर नहीं देखा. देखती भी क्या?  प्रेम पर से मेरा विश्वास हट  चुका था. 
मेरी मंज़िल मुझे मिल कर भी न जाने क्यूँ अधूरी सी थी............... 
पांच साल बीत गए और मुझे पता भी नहीं चला.... पिछले हफ्ते माँ का  फ़ोन आया... उनकी तबियत ख़राब थी.... मैंने हफ्ते में काम निबटाया और छुट्टी लेकर फ्लाइट बुक की.... एयरपोर्ट पर इंतज़ार करते हुए अचानक एक जाना पहचाना चेहरा देख कर मैं हैरान हो गई..... मायरा  यहाँ क्या कर रही है?  मैंने सोचा..... तब तक वो मेरे पास आ कर गले लग गई.... हैरान सी मैंने पूछा..... तुम यहाँ कैसे? उसने बताया कि  न्यूयॉर्क से एम. बी. ए कर रही है और इंडिया अपने घर  जा रही है.... मायरा समर की छोटी  बहन थी.... मैंने फ्लाइट में उससे पूछा की तुम्हारे पापा का बिज़नेस तो डूब गया था फिर कैसे आ पाई? उसने कहा कि  मुझे कोई गलतफहमी हो गई है...पापा का बिज़नेस पहले से भी अच्छा हो गया है ... मैं चुप हो गई.... मेरे साथ अब कई  सवाल और उनके जवाब  उड़ रहे थे.. अचानक आसमान में बादलों के बीच उड़ते उड़ते मेरे मन के बादल छंट  रहे थे...... घने कोहरे में धूप दिख रही थी... 
सच मेरे सामने आ चुका  था .... 
परिवार की  ज़िम्मेदारी एक बहाना था...
मुझे मेरी मंज़िल तक पहुँचाने का.... 
मेरे सपने पूरे करने का.... वो भी मुझे बिन बताये ताकि मेरा आत्म सम्मान बना रहे.... प्रेम में मेरा विश्वास आज अटल हो चुका था...मेरे प्रेम को मंज़िल मिल चुकी थी.....

#Sard_subh_ki_mulakat

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"हज़ारों ख्वाइशें ऐसी कि हर ख्वाइश पे दम निकले बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले..... "

हज़ारों ख्वाइशें ऐसी कि हर ख्वाइश पे दम निकले 
बहुत निकले मेरे अरमान
लेकिन फिर भी कम निकले.....

#हज़ारों ख्वाइशें ऐसी

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