Santosh Verma

Santosh Verma Lives in Azamgarh, Uttar Pradesh, India

संतोष वर्मा आजमगढ़ वाले।(कवि)

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"हाय कैसी फूटी किस्मत हमारी है, हर तरफ से नोच रही लाचारी है। उथल पुथल कर रही जिंदगी आके मुहाने पे, फिर भी जीवन का संघर्ष जारी है।। हिचकोले खा रहे सब ख्वाब यूं ही पड़े_पड़े, हर एक पहलू को संजोने की कोशिश सारी है।। निकल ना जाए हाथ से कोई सुनहरा पल, बस मौके को भुनाने की बारी है।। कर लूं फतह मकसद ज़िन्दगी का, अभी तो नाव भंवर में उतारी है।। मिल रही चुनौतियां हर पड़ाव पर, फिर भी हौसलों के उड़ान की तैयारी है।। छूट ना जाए बीच में रास्ता मेरा, अंगारों को छू निकलने की अब पारी है।। WRITTEN BY(Santosh Verma)आजमगढ़ वाले खुद की ज़ुबानी"

हाय कैसी फूटी किस्मत हमारी है,

हर तरफ से नोच रही लाचारी है।

उथल पुथल कर रही जिंदगी आके मुहाने पे,

फिर भी जीवन का संघर्ष जारी है।।

हिचकोले खा रहे सब ख्वाब यूं ही पड़े_पड़े,

हर एक पहलू को संजोने की कोशिश सारी है।।

निकल ना जाए हाथ से कोई सुनहरा पल,

 बस मौके को भुनाने की बारी है।।

कर लूं फतह मकसद ज़िन्दगी का,

अभी तो नाव भंवर में उतारी है।।

मिल रही चुनौतियां हर पड़ाव पर,

फिर भी हौसलों के उड़ान की तैयारी है।।

छूट ना जाए बीच में रास्ता मेरा,

अंगारों को छू निकलने की अब पारी है।।

WRITTEN BY(Santosh Verma)आजमगढ़ वाले
खुद की ज़ुबानी

हौसला...

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"तेरी यादों में खोया मैं हो बेखबर, रात भर करवटें बदलता रहा इधर से उधर। कौंध सी जाती रूह मेरी तुझे बस सोचकर, मशगूल तेरी चाहतों में, निकल आया मैं किधर से किधर।। पता है मुझे ये इश्क़ की राह कठिन है, फिर भी तेरी इक मुलाकात की खातिर, मैं भटकता रहा इस शहर से उस शहर।। कुछ ख्वाब मेरे भी थे, दिन ये तेरे संग बिताने थे। पर ये हो ना सका क्योंकि सब टूट कर हो गए तितर से बितर।। दो पल की जिंदगानी है, फिर तुम कहां हम कहां,, समझ ना पाए शायद तुम हमें, ना जाने उलझ गए किस कदर।। इश्क़ हसीं है यही हम सुने थे, हमसफ़र की आरज़ू में तुम्हें चुने थे। तेरी मुहब्बत में हम भूल गए, अपनी मंजिल की डगर।। WRITTEN BY ( Santosh verma) azamgarh Vale खुद की ज़ुबानी"

तेरी यादों में खोया मैं हो बेखबर,

रात भर करवटें बदलता रहा इधर से उधर।

कौंध सी जाती रूह मेरी तुझे बस सोचकर,

मशगूल तेरी चाहतों में,

निकल आया मैं किधर से किधर।।

पता है मुझे ये इश्क़ की राह कठिन है,

फिर भी तेरी इक मुलाकात की खातिर,

मैं भटकता रहा इस शहर से उस शहर।।

कुछ ख्वाब मेरे भी थे,

दिन ये तेरे संग बिताने थे।

पर ये हो ना सका क्योंकि

सब टूट कर हो गए तितर से बितर।।

दो पल की जिंदगानी है,

फिर तुम कहां हम कहां,,

समझ ना पाए शायद तुम हमें,

ना जाने उलझ गए किस कदर।।

इश्क़ हसीं है यही हम सुने थे,

हमसफ़र की आरज़ू में तुम्हें चुने थे।

तेरी मुहब्बत में हम भूल गए,

अपनी मंजिल की डगर।।

WRITTEN BY (  Santosh verma) azamgarh Vale
खुद की ज़ुबानी

तेरी याद..

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"एक दिन की बात थी,हमारी बेगम हमसे नाराज थीं। हमने सोचा चलो आज बक_बक से फुर्सत तो मिली, तभी कड़कती आवाज आई,, सुनो! आज का खाना तुम खुद बनाओ, बेशर्मों की माफिक बैठो मत, राशन_पानी फौरन खरीद लाओ। हमने गौर से देखा.. मोहतरमा के चेहरे कुछ इस कदर बदल रहे थे, टेढ़े से मेढ़े _गोरे से पीले, फिर कुछ लाल हो रहे थे। छन मन छन मन इधर से उधर, तो कभी पैरों से कदमताल हो रहे थे।। हमने बड़े प्यार से बोला.., हे!रूप की मल्लिका , ये तुम क्या कर रही हो!, बेवजह घर सर पर उठा रही हो!। फिर क्या! लेना ना देना, कालिका रूप धारण कर बोली, तुम हो ही ऐसे,, तुम केवल मेरा मूड खराब करते हो, तुमसे होता कुछ नहीं बस बातों के नवाब बनते हो।। हमने कहा हे! प्रिये.. अपना गुस्सा तुम थूंक दो, मैं तुम्हारा हर कहना मानूंगा, लो पानी पियो और ठंड रखो, तूं है मेरी प्राण प्रिए, आज से नारी शक्ति को जानूंगा।। WRITTEN BY(संतोष वर्मा)आजमगढ़ वाले खुद की ज़ुबानी.."

एक दिन की बात थी,हमारी बेगम हमसे नाराज थीं।

हमने सोचा चलो आज बक_बक से फुर्सत तो मिली,

तभी कड़कती आवाज आई,,

सुनो! आज का खाना तुम खुद बनाओ,

बेशर्मों की माफिक बैठो मत,

राशन_पानी फौरन खरीद लाओ।

हमने गौर से देखा..

मोहतरमा के चेहरे कुछ इस कदर बदल रहे थे,

टेढ़े से मेढ़े _गोरे से पीले,

फिर कुछ लाल हो रहे थे।

छन मन छन मन इधर से उधर,

तो कभी पैरों से कदमताल हो रहे थे।।

हमने बड़े प्यार से बोला..,

हे!रूप की मल्लिका ,

ये तुम क्या कर रही हो!,

बेवजह घर सर पर उठा रही हो!।

फिर क्या! लेना ना देना,

कालिका रूप धारण कर बोली,

तुम हो ही ऐसे,,

तुम केवल मेरा मूड खराब करते हो,

तुमसे होता कुछ नहीं बस बातों के नवाब बनते हो।।

हमने कहा हे! प्रिये..

अपना गुस्सा तुम थूंक दो,

मैं तुम्हारा हर कहना मानूंगा,

लो पानी पियो और ठंड रखो,

तूं है मेरी प्राण प्रिए,

आज से नारी शक्ति को जानूंगा।।

WRITTEN BY(संतोष वर्मा)आजमगढ़ वाले
खुद की ज़ुबानी..

हास्य कविता..हमारी बेगम से नोक झोंक

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"जब आवाज़ आती उसकी घुंघरू की मेरे कानों में, दबे पांव खिसक लेता मैं दूसरे के मकानों में। मेरी हिम्मत तो देखो आगे उसके, ताले लग जाते हैं मेरी जुबानों में।। चाह के भी न बोल पाऊं मैं, उलझ के रह जाता मैं उसके फालतू फसानों में।। तरस गया सुनने को मैं प्यार की इक बोली, ढूंढ़ने बैठ जाता मैं खुद को पुराने गानों में।। क्या दास्तां सुनाऊं मैं अपनी बेगम की, कूंट जाती मुझे किसी न किसी बहानो में।। भंवर में फंस चुकी ज़िन्दगी मेरी, खुशियां अब कहां ढूंढू आके बिरानो में।। सोचता हूं आखिर ये बंधन बना किस खातिर, जब किच किच होती हर घरानों में।। WRITTEN BY(SANTOSH VERMA) आजमगढ़ वाले खुद की ज़ुबानी"

जब आवाज़ आती उसकी घुंघरू की मेरे कानों में,

दबे पांव खिसक लेता मैं दूसरे के मकानों में।

मेरी हिम्मत तो देखो आगे उसके,

ताले लग जाते हैं मेरी जुबानों में।।

चाह के भी न बोल पाऊं मैं,

उलझ के रह जाता मैं उसके फालतू फसानों में।।

तरस गया सुनने को मैं प्यार की इक बोली,

ढूंढ़ने बैठ जाता मैं खुद को पुराने गानों में।।

क्या दास्तां सुनाऊं मैं अपनी बेगम की,

कूंट जाती मुझे किसी न किसी बहानो में।।

भंवर में फंस चुकी ज़िन्दगी मेरी,

खुशियां अब कहां ढूंढू आके बिरानो में।।

सोचता हूं आखिर ये बंधन बना किस खातिर,

जब किच किच होती हर घरानों में।।


WRITTEN BY(SANTOSH VERMA) आजमगढ़ वाले
खुद की ज़ुबानी

मेरी दास्तां

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"यूं कहूं तो ये कहने की न बात थी, क्योंकि उनसे हमारी पहली मुलाकात थी। कुछ लफ्ज तो फर्राटे में कह गए, पर कुछ होठों में दबे रह गए,, एक टक निहारते रहे हम उनको, शायद सादगी उनके चेहरे की बिल्कुल साफ थी।। शर्मीली नजरों से जब देखा उन्होंने, हम उनकी मासूमियत पर मर मिटे,, बस सुध अपनी खो बैठे हम, सर हमारा उनकी अदायगी पर जा झुके। दिल हमारा भी बाग_बाग हो रहा था, जब तक वो हमारे पास थी।। लालसा उनसे इश्क़ की मन में जगने लगी, धड़कनें भी रफ्तार पकड़ने लगी। जपने लगे माला उनके नाम की, दरअसल ये खूबसूरत इश्क़ की बस शुरुआत थी।। WRITTEN BY(संतोष वर्मा) आजमगढ़ वाले खुद की ज़ुबानी...."

यूं कहूं तो ये कहने की न बात थी,

क्योंकि उनसे हमारी पहली मुलाकात थी।

कुछ लफ्ज तो फर्राटे में कह गए,

पर कुछ होठों में दबे रह गए,,

एक टक निहारते रहे हम उनको,

शायद सादगी उनके चेहरे की बिल्कुल साफ थी।।

शर्मीली नजरों से जब देखा उन्होंने,

हम उनकी मासूमियत पर मर मिटे,,

बस सुध अपनी खो बैठे हम,

सर हमारा उनकी अदायगी पर जा झुके।

दिल हमारा भी बाग_बाग हो रहा था,

जब तक वो हमारे पास थी।।

लालसा उनसे इश्क़ की मन में जगने लगी,

धड़कनें भी रफ्तार पकड़ने लगी।

जपने लगे माला उनके नाम की,

दरअसल ये खूबसूरत इश्क़ की बस शुरुआत थी।।

WRITTEN BY(संतोष वर्मा) आजमगढ़ वाले
खुद की ज़ुबानी....

कुछ बात...

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