Mr. Bolbachan

Mr. Bolbachan Lives in Ludhiana, Punjab, India

पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या

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Dear Dad हाँ  वो  माँ  की   तरह  हरदम   लाड  नहीं लड़ाता 
हाँ  वो   चाचा  की की  तरह  झूला  नहीं   झुलाता 
लेकिन    रोता   वो    भी   है   जब    तू   रोता   है 
बस  उसे  तेरे   आगे   आँसू   बहाना   नहीं  आता

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होंठ खंजर थे उसके, जिसने हमारे होंठों को घायल कर दिया
पाँव चूम हमने उसके, लहु की बूँद को उनकी पायल कर दिया

अब बताओ इससे बढ़कर उनके लिए क्या करें।
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मजबूत दरख्तों को उखाड़ने के बाद
गुमान से भरी आँधी
कई पंछियों के घोंसले उजाड़ गयी
अब बारी थी घरों की
बड़ी आस से सूखे खेतों में खड़ा किसान
विनती करता कि आँधी 
ना जाने कब से बारिश
नहीं हुई तुम ही तरस
खाओ 
बस दो बूँदे ही उधार दे दे पानी की
पीछे से पोता दौड़ता हुआ बताता है
आँधी से घर टूट गया
है ये सुनते ही आँधी ने किसान की
दुआ कबूल ली
और उसकी आँखों से दो
बूँद सूखी जमीं पर गिरा दिए

बताओ कैसी थी आँधी। काश आँधी हमारे दुख दर्द भी उड़ा कर ले जाती।
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उम्र   भर  बस   लाइक और  कमेंट  करते  रहे
बेवजह    टेंशन    को     पर्मानेंट    करते    रहे

मोबाइल को छोड़ कभी बाहर नहीं निकले हम
हर   छोटी   बात   पर  हम   गवर्मेंट  करते  रहे

सात   जन्मों   में   किसी   की   रूचि  ना  रही
शादी  के   नाम   पर  बस  एग्रीमेंट  करते  रहे

नीम  दातुन  से  अब   दाँत  मजबूत  नहीं होते
बूढ़े  भी  अब  कोलगेट, पेप्सूडेन्ट   करते  रहे

घर  बनाने  के  लिए  परिवार   भी  तो चाहिए
वो  बेवकूफ  बस   बजरी  सीमेंट    करते  रहे

कलम  बीमार   है,  ठीक   नही  होती  नीरज
डॉक्टर   इलाज़   छोड़  पेमेंट  पेमेंट करते रहे

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पतीला:- क्या लगता है नई दुल्हन संभाल पाएगी। उसके हाथों को तो देख कितने मुलायम है ऐसे लगता है कभी कोई काम किया ही ना हो।
कुकर: हाँ सही कह रहे हो भईया। अभी मेरे पास छिपकली आ बैठी थी डर के ऐसे भागी की पूछो मत।
पतीला: ( हँसते हुए) तुम्हे डर नहीं लगा।
कुकर: (पसीना पोंछते हुए) डर तो लगा था भाई। इसी कारण मेरी सीटी बज गयी। और दो बार दुलहिन दौड़ कर भागी आई कहीं दाल पक तो नहीं गयी।
(ये कह कर दोनों हँसने लगे)

पसीने से तरबतर नई बहू जिसने मायके में सीखा नहीं था खाना बनाना
खाली बर्तन को गर्म कर
जब ऊपर से दूध डाला तो सारा दूध जल के
बर्तन में चिपक गया, सभी इंतज़ार करते रह गए चाय का,
कच्ची रोटी बिल्कुल भारतीय सड़कों जैसी देखने में भी अच्छी ना लगी
आधी पकी दाल जैसे हिन्द महासागर
दाल मछलियों के जैसे तैरती हुई
ऊपर से इतना बड़ा घुँघट
किसको संभाले पहले समझ से परे था
तड़का लगाते समय जब जीरा डाला तो तेल छिटक
कर मेहंदी भरे हाथ और लाल कर गया।
देखो, वो नमक का डिब्बा उतारना
हाँ वही नमक जो तुम्हारे पिताजी मेरे जख्मों पर छिड़क देते हैं
हनिमून कैंसिल हुआ, बम्बई का
गुस्सा निकल ही गया
पत्नी ने झल्लाते हुए अपना घूँघट ओढ़ लिया
क्योंकि ससुर जी आ गए खाँसते खखारते

टेबल पर लगे भोजन की हालत देख
ससुर जी को भारतीय गरीबी की याद आ गयी
जब निवाला मुँह में डाला।
कुछ पल के लिए शाँत
ही रहे और गहरी चुप्पी साध ली। बहू
घुँघट के अंदर से किचन के दरवाजे पर खड़ी
देख रही थी जैसे कोई एग्जाम दिया है और मास्टर नतीजा बताने वाला है
बहु ने धीरज का बाँध तोड़ पूरा पहली रसोई
कैसी रही पिताजी। पिताजी ने मुस्कुराते हुए बेटे से
कहा दुलहिन को एक दो हफ्ते
खातिर बाहर घुमा लाओ।
लेकिन खाना कैसा बना जवाब ढूँढ पाया कोई।
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