Best कामदा Stories

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।।श्री हरिः।।
26 - विनाद

'आ, दूध पीयेगा?' श्रीव्रजराज दोनों घुटनों में दोहनी दबाये गो-दोहन कर रहे हैं। पीछे कौन आकर खड़ा हुआ, यह जानने की उन्हें आवश्यकता नहीं। दाऊ, श्याम, भद्र, सूबल, तोक - कोई भी हों बाबा के लिए सब अपने ही हैं। नूपूरों की रुनझुन ध्वनि से केवल इतना समझा उन्होंने कि कोई शिशु है और वह उनके पीछे उनके कंधे को सहारा बनाकर खड़ा हुआ है।

'ले, मुख खोल तो!' बाबा ने देखा कि उनका कृष्ण अब उनके पीछे से सामने आ खड़ा हुआ है। यह अभी-अभी नींद से उठकर, मैया की आंख बचाकर गोष्ठ में चला आया है। अलकें बिखरी हैं, भालपर का कज्जल-बिन्दु भाल पर और नेत्रों का अञ्जन कपोलों पर फैला है। अब भी नेत्रों में आलस्य है। खड़ा-खड़ा यह दूध की उजली धार बड़े ध्यान से देख रहा है। इसका दिगम्बर रूप.....।

'दूध पीयेगा?' बाबा ने बड़े स्नेह से फिर पूछा।

'हूँ।' सिर हिलाकर स्वीकार करते हुए अपना छोटा-सा मुख खोल दिया इसने।

दूध की धारा सीधे मुख में पड़ी; पता नहीं कैसी गुदगुदी-सी लगी और मोहन ने मुख बंद कर लिया। पतले लाल-लाल अधरों पर पड़ कर बिखर उठी वह उज्जवल धारा। नील कमल-से मुख पर दुध की बूंद चमकने लगी। अलकों में कुछ उज्जवल सीकर उलझ गये।

'मुख खोल!' बाबा ने फिर प्यार से कहा, किन्तु श्याम ने हँसते हुए मुख घुमा लिया दुसरी ओर। उसे दूध की धारा जीभ पर लेने में गुदगुदी होती है।

'अब यह क्या करता है?' बाबा ने डांटा नहीं, उनके स्वर में प्रसन्नतापूर्ण वात्सल्य ही था। मोहन ने अपनी दाहिनी हथेली फैला दी है और उसे पात्र के ऊपर करके दुध की धारा रोक रहा है। हाथ पर दूध की धारा लेना उसे बहुत रुचा है। हंस रहा है यह।

'दादा!' श्याम हटा नहीं, हाथ भी नहीं हटाया इसने। बड़े भाई को देखकर इसने पुकारा और अपनी हथेली की ओर देख लिया। उसकी भंगिमा कह रही थी - 'दादा देख तो! यह कितना अच्छा खेल है।'

दाऊ अपने छोटे भाई को ढूँढता अकेला गोष्ठ में आ पहुंचा है। श्री नन्दबाबा घुटनों में दोहनी दबाये दोनों हाथों से खूब बड़ी, चांद-सी उज्जवल कामदा को दुह रहे हैं। इनके एक ओर श्याम और एक ओर राम खड़े हैं। दोनों ने एक-एक हाथ से बाबा का कंधा पकड़ रखा है और दूसरी हथेली पर दूध की धारा ले रहे हैं। लाल-लाल हथेली पर उजली धारा। दूध के बिन्दु दोनों के दिगम्बर अंगों पर और बाबा के मुख, दाढी, पेट पर बढते जा रहे हैं। दोनों बार-बार खिलखिलाकर-खीलखिलाकर हँसते हैं और देखते हैं हाथ पर पड़ी दूध की धारा को। बाबा आनन्द-विह्वल हो रहे हैं अपने पुत्रों का विनोद देखकर।

दूध-सा उज्जवल कामदा का बछड़ा फुदक रहा है, बार-बार सूंघता है राम-श्याम या बाबा को। उसकी माँ के दूध का इतना सुन्दर उपयोग हो सकता है? वह प्रसन्नता से कूद रहा है।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: ||
11 - गोपाल
'कनूँ तू देवता है?'

'तू देवता है।' कुछ चिढे स्वर में इस प्रकार कन्हाई ने कहा जैसे कोई किसी को गाली के बदले गाली दे दे।

पता नहीं क्या बात है कि इस श्रीदाम से कन्हाई खटपट करता ही रहता है! इसी को चिढाने-खिझाने पर उतारु रहता है। इतने पर भी श्रीदाम रहेगा इसी के साथ। इससे लडेगा, झगड़ेगा, खीझेगा; किन्तु इस व्रजराजतनय का साथ तो नहीं छोडा जा सकता।

स्वर्णगौर, नीलवसन, हंसपिच्छ केश में लगाये रत्नाभरण सज्जित्त बृषभानु बाबा का ज्येष्ठ कुमार श्रीदाम आज वन में गोचारण के लिए आते ही श्याम से पूछ बैठा था। कल बरसाने में अपने बाबा को बडे गोपों से चर्चा करते सुना था उसने। एक वृद्ध गोप ने कहा था - 'नन्दनन्दन कोई बहुत बड़ा देवता है।'

श्रीदाम को विचित्र लगा था। वह तब से श्याम से ही पूछने का निश्चय कर चुका था। वन में आते ही पुछ न ले तो यह बात फिर भूल जायेगी; क्योकिं तब तत्काल गुंजा, वनधातु, किसलय आदि संग्रह करने में लगेंगे। फिर एक दुसरे का श्रृंगार करेंगे और फिर खेलने में लग जायेंगे। लेकिन यह कन्हाई तो पूछते ही चिढ़ गया।

'देवता होना क्या कोई बुरी बात है कि तू चिढ़ता है?' श्रीदाम अभी भी इस नटखट से झगड़ना नहीं चाहता।

'बुरी बात नहीं है, अच्छी बात है तो तू देवता बन जा।' उसी चिढ़े स्वर में श्याम ने कह दिया।

सचमुच मनुष्य को देवता कहना मानवता का अपमान तो है ही। मानव है आरोहण-समर्थ, कर्म-स्वतंत्र ऩाराण का सखा नर और देवता भले पुण्यात्मा जीव हो, अब पतनोन्मुख प्राणी है। देवलोक में भोगों से उसके पुण्य का क्षय हो रहा है। उसका पतन वहाँ से सुनिश्चित है। इसलिए कन्हाई देवता कहने से चिढ़ता है तो अनुचित क्या करता है।

'मैया कहती है कि गायें देवता हैं।' श्रीदाम ने तर्क किया - 'तब क्या तेरी कामदा बुरी है?'


'कामदा।' कन्हाई मुड़कर अपनी हिमधवला, हथिनी जैसी ऊँची, पध्मगन्धा सर्वश्रेष्ठ गाय को देखा और उसके समीप दौड़ गया। गौ से ही पूछने लगा - 'कामदा। तू देवता है?'

कामदा ने धीरे से गर्दन झुकाकर अपना मुख कन्हाई के वाम स्कन्ध पर धर दिया। श्याम ने दोनों भुजाएँ कामदा के गले में डाल दीं और फिर दाहिने हाथ से गाय का मुख, गर्दन सहलाने लगा। इस गोपाल को अब भूल ही गया कि कामदा से यह कुछ पूछ रहा था।

श्रीदाम कुछ पद पीछे खड़ा देख रहा है। दूसरे बालक भी इसी ओर मुड़ पड़े हैं। धीरे पदों से, मन्द गति से चलते दाऊ दादा भी अनुज के समीप आ रहे हैं।

अभी किसी के अंग पर वनधातू के चित्र नहीं हैं। अभी अलकों में न किसलय लगे हैं, न पुष्प। माताओं ने जो श्रृंगार किया है, केवल वही है।

तैल-स्निग्ध अलकों में कोई पंख लगा है। नैत्र अंजन-रंजित हैं। भालपर तिलक है। कर्णों में कुण्डल हैं। कण्ठ में मुक्तामाल या मणिमालाएं हैं। भुजाओं में अंगद, कर में कंकण, कटि में कांचन मेखला, चरणों में नूपुर - मधुमंगल के अतिरिक्त प्रायः सब आभूषण-भूषित हैं और गले में मोटी वैजयन्ती माला पहिने हैं।

मधुमंगल ब्राह्मण है। यज्ञोपवीतधारी है। आभूषण नहीं पहिनता। अपने श्वेत वस्त्र, श्वेत तीलक से ही सुशोभित होता है। वह तो रज्जु, लकुट या शृंग भी नहीं रखता, किन्तु गोपकुमार तो सिर या कन्धे पर रज्जु लपेटे, दण्ड लिए, शृंग या वंशी सहित ही हैं।

कोई दाऊ के समान मन्द गति से आ रहा है और कोई दौड़ पड़े हैं। सबको कन्हाई के समीप आना है, लेकिन इस समय कन्हाई के समीप पहुँचना सरल नहीं है। उसे तो इस दौड़कर आते उमड़ती मेघमाला जैसे गायों, वृषभों, बछड़ों, बछड़ियों के चारों ओर से घिरे समूह से निकलना है और इन पशुओं को चरने के लिए बलपूर्वक श्याम से पृथक हाँकना है।

कन्हाई कामदा के कन्ठ में वाम भुजा लपेटे दक्षिण कर से उसका मुख सहला रहा है। कामदा ने बहुत धीरे से श्याम के वाम स्कन्ध पर अपना मुख रखा है और आनन्द के अपार आवेश में नेत्र बन्द कर लिये हैं।

कामदा का यह सौभाग्य देखते ही गायें, वृषभ, बछड़े, बछड़ियों सब दौड़ पड़ीं। सबने नन्दनन्दन को घेर लिया है रों ओर गसे। सिर ऊपर उठाये, एक-दूसरे-से सटे, एक दुसरे के मध्य से आगे बढ़ने को कसमसाते गायों, वृषभों का यह अपार समूह! सब हुंकार करने लगे हैं। सब मानो कहते है - 'मुझे! मुझे भी तनिक ऐसे ही सहला दो।'

श्रीदाम अपनी देवतावाली बात भूल चुका है। गायें और वृषभ भी देवता होंगे किन्तु इऩ गायों, वृषभों के अपार यूथ से घिरा वह इसका सखा कनूँ वह तो गोपाल है! वह गोपाल - गोपकुमार है, इसीलिए तो अपना है - अपना परम प्रिय सखा है।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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37 - गो - दोहन
|| श्री हरि: ||






'बाबा! मैं
गाय दुहूंगा।' कन्हाई बड़े सवेरे एक छोटी - सी दोहनी लेकर गोष्ठ में पहुंच गया है।
कई दिनों से बराबर यह बाबा से मचल रहा है कि इसे गाय दुहना सिखा दिया जाय। जब महर्षि
शांडिल्य ने गो - पूजन कराके गो - दोहन संस्कार करा दिया इससे, तब इसे गाय क्यों नहीं
दुहने दिया जाता?




लगभग तीन
वर्ष का कृष्णचंद्र - अभी मैया ने मुख भी नहीं धोया है इसका! अलकें बिखरी हैं मुखपर।
अंजन कपोलों तक फैला है और कटि की कछनी गिरने को हो रही है। चरणों के नुपुर और कटि
की मेखला रुनझुन करता भागा आया है यह और बाबा के दोनों पैरों से लिपट गया है। मैया
घर में पुकारती ही रह गई, किंतु इसे शीघ्रता थी। नित्य की भांति देर होने पर गोप सब
गाएं दुह लेंगे और फिर सांय काल तो बाबा मना ही कर देते हैं।




'तू कौन
- सी गाय दुहेगा?' जब यह चपल रात में सोते समय अपनी दोहनी शैया के नीचे रखकर सोया,
तब आज इसकी हठ मान ही लेना उत्तम है। बाबा ने मना नहीं किया।




'मैं कामदा
को दुहूंगा।' श्यामसुंदर प्रसन्न हो गया है। इसने बाबा के पैर छोड़ दिये हैं और कामदा
का बछड़ा खोलने दौड़ गया है; किंतु यह बछड़ा अपनी मैया का दूध पीने क्यों नहीं जाता?
यह तो कन्हाई को सूंघ - सूंघकर इसके चारों ओर फुदकने लगा है। अब बाबा इसे पकड़कर कामदा
के थनों से लगायेंगे।




'दादा! आ,
तू भी कामदा को दुह।' मोहन हर्ष से नाच उठा है। यह उसका अग्रज भी एक छोटी दोहनी लिए
आ गया है। मैया ने इसका मुख धो दिया है। कछनी सम्हाल दी है। अलकें सवारी हुई हैं। वैसे
अपने छोटे भाई के पास आने की शीघ्रता में मैया को इसने एक माला तक अलकों में लगाने
का अवकाश नहीं दिया है।




'तू ऐसे बैठ!'
बाबा के आगे बैठा है कृष्णचंद्र। एक प्रकार से इसे गोद में लेकर बाबा दुहना सिखा रहे
हैं। दाऊ को गाय दुहना आ गया है। वह कामदा की दूसरी ओर बैठा है। दोनों भाई आमने-सामने
बैठकर एक ही गाय दुहेंगे। बाबा बता रहे हैं अपने हाथों में श्याम का हाथ लेकर - 'ऐसे
गाय का थन पकड़।'




'दादा!' कन्हाई
दोनों हाथों ताली बजा रहा है। इसने दूध की उजली धार अपने हाथ से निकाल ली है। क्या
हुआ जो धार पात्र में न पड़कर भूमि पर चली गई है।




'दादा! दादा!' लेकिन दादा
क्या करे। इस चंचल कनूं ने दूध की धार उसके मुख पर मार दी है। नेत्र में दूध चला गया
है। आंख मलते दाऊ की अलकों और कपोल पर दूध की उजली बूंदें - दाऊ हंस रहा है - कितना
प्रसन्न है उसका भाई। कन्हाई ताली बजाता हुआ बाबा की गोद में हंसी से झुका जा रहा है।

लेखक : सुदर्शन
सिंह
'चक्र' 

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