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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 9

|| श्री हरि: ||
4 - मनुष्य क्या कर सकता है?

'पशुपतिनाथ। मुझ अज्ञानीको मागे दिखाओ।' उस ठिगने किन्तु सुपुष्ट शरीर वृद्ध के नेत्र भर आये। उसके भव्य भाल पर कदाचित ही किसीने कभी चिन्ता की रेखा देखी हो। विपत्ति में भी हिमालय के समान अडिग यह गौरवर्ण छोटे नेत्र एवं कुछ चपटी नाक वाला नेपाली वीर आज कातर हो रहा है -'भगवान । मुझे कुछ नहीं सूझता कि क्या करूं। मनुष्य को तुम क्यों धर्मसंकट में डालते हो? तुम्हें पुकारना छोड़कर मनुष्य ऐसे समय में और क्या करे? तुम बताओ, मुझे क्या करना चाहिये हैं?'

आँसू की बुंदें चौड़ी हड्डी वाले सुदृढ़ कपोलों पर से लुढ़क कर उजली मूछों में उलझ गयी। अपनी हुंकार से वन के नृशंस व्याघ्र को भी कम्पित कर देने वाला वज्र-पुरुष आज बालक के समान रो रहा था। उसकी कठोर काया के भीतर इतना सुकोमल ह्रदय है - उससे परिचित प्रत्येक व्यक्ति इसे जानता है।

नरेन्द्र सिंह वीर है - मृत्यु के मुख में भी पैर रख कर खुखड़ी के दो हाथ झाड़ देने का हौसला रखता है हृदय में, लेकिन धार्मिक है। आप उसे धर्मभीरु भी कहे तो चलेगा और आज वह धर्मभीरु घर्म-संकट में पड़ गया है। अब अपने पशुपतिनाथ को - नेपाल के आराध्य देव को पुकार रहा है वह।

'एक ब्राह्मण आशा लेकर गोरखे की शरण आया है। उसने मुझ पर विश्वास किया है। वह दुखी है - विवश है। दो पुत्रियाँ हैं उसके घर में विवाह करने योग्य और घर पर पुरुष तो दूर, उसकी पत्नी भी जीवित नहीं। फफक पड़ा नरेंन्द्र सिंह - 'वह मारा जा सकता है। क्रूर विदेशी उसे कुत्ते के समान गोली से भून देंगे। एक गोरखा यह विश्वासघात करे? नरेंन्द्र यह ब्रह्महत्या ले? मेरे नाथ ! तुम कहाँ सो गये हो? समाधी छोड़ दो आशुतोष। इस सेवक को मार्ग दिखलाओ।'

'मैं इस चौकी का रक्षक हूँ। चौकी के सैनिक मेरे भरोसे निश्चिन्त रहते हैं। मेरे महाराज मुझ पर विश्वास करते हैं। एक नेपाली अपने देश से अपने महाराज से विश्वासघात करे?' नरेन्द्र सिंह ने दोनों हाथ सिर पर पूरे वेग से पटक दिये - 'फिरंगी पता नहीं क्या चाहते हैं। वे रहस्य पाकर पता नहीं क्या अनर्थ करेंगे। चौकी के सैनिक भून जायेंगे और उन पिशाचों के लिये गौ, ब्राह्मण, देवता - वे तो हैं ही पिशाच। सतियों का सतीत्व उनके लिये विनोद का साधन है। मैं निमित्त बनूं उनकी पैशाचिकता को सफल बनाने में? मैं अपने देश से, महाराज से अनुगतों से, समाज से, और धर्म से ही विश्वासघात करूं?'

वृद्ध जैसे पागल हो जायगा। उसने मस्तक पटक दिया पृथ्वी पर - 'पशुपतिनाथ। तुम मुझे मार्ग नहीं दिखलाते तो मर जाने दो।' अपनी खुखड़ी उसने म्यान से खींच ली। ललाट पर एक लाल गोल सूजन आ गयी थी; किन्तु जो मृत्यु का आलिंगन करने जा रहा है उसे उसका क्या पता लगना था।

'गायें मारी जायँगी - नेपाल की इस पावन धरापर, भगवान तथागत के चरणों से पूत हुई इस पृथ्वी पर गोरक्त गिरेगा। मेरी बेटियों-बहुओं का सतीत्व फिरंगी सिपाही लूटेंगे या वे अपनी रक्षा के लिये खुखड़ी खोंस लेंगी हृदय में।' नरेन्द्र सिंह के हाथ से अपनी खुखड़ी छूट गिरी - 'मुझे मरने का अधिकार कहां है। मेरी मृत्यु का अर्थ भी तो शत्रु को सुविधा देना ही होगा। हाय । आज यह अधम मर भी नहीं सकता है।'

'अतिथि के साथ विश्वासघात - ब्राह्मण की हत्या। उसकी वे कुमारी कायाएँ।' नरेन्द्र सिंह को आखों के आगे अन्धकार छा गया। उसने उस स्वरमें, जिसमें किसी नृशंस हत्यारे के छुरे से आहत मरणोन्मुख प्राणी चीत्कार करता है - चीत्कार की- 'पशुपतिनाथ।'

आर्त प्राणों की कातर पुकार वह आशुतोष चन्द्रमौलि न सुने - ऐसा कभी हुआ है? जिस दिन वह गंगाधर सच्ची पुकार सुनने के लिए भी समाधीमग्न बनेगा, सृष्टि रहेगी कितने पल?

नरेन्द्र के मुख पर शान्ति आयी। उसने नेत्र पोंछ लिये हाथों से ही खुखड़ी उठाकर म्यान में रख ली। उसके हृदय के पशुपतिनाथ ने उसे प्रकाश दे दिया था। दृढ़ निश्चय था उसके मुखपर।

'पण्डितजी! आप मुझे क्षमा करें।' जब वह अथिति के सम्मुख आया, उसके स्वर में कोई हिचक या कंपन नहीं थी। 'आपके खींचे मानचित्र मैं आपको लौटा नहीं सकूंगा। आपको काठमाण्डू जाना है।'

'नरेन्द्र सिंह। तुम विश्वासघात करोगे? तुम?' ब्राह्मण के नेत्र फटे-फटे हो गये। उसका मुख भय से सफेद पड़ गया - 'फिरंगी मेरी कन्याओं की क्या दुर्गति करेगा - सोचो तो तुम। मैं यहीं प्राण दे दूंगा। तुम्हें ब्रह्महत्या लेनी है?'

'मैं विवश हुँ।' नरेन्द्र सिंह ने मुख नीचे झुका लिया। ब्राह्यण के स्वरमें जो प्राण दे देने की दृढ़ता थी - दूसरा कोई मार्ग भी नहीं था उनके लिये। लेकिन नरेन्द्र ने उन्हें उसी स्थिर स्वर में कह दिया - 'यहाँ आपको प्राण देने नहीं दिया जा सकता। काठमाण्डू तो जाना ही है आपको। पशुपतिनाथ को प्रणाम करके जो कुछ करना आप चाहें - स्वतन्त्र रहेंगे।'
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(2)
अंग्रजों ने नेपाल पर चढाई तो कर दी, किंतु उन्हें अब छठी का दूध याद आ रहा है। उनकी बंदूकों की पिट्- पिट् गोरखा वीरों के पत्थर-कले के आघात के सम्मुख व्यर्थ सिद्ध हो रही है। इन जंगलों और पहाड़ों में आकर फिरंगी अपनी हेकड़ी भूल गया है। अब तो उसे यह समझ आने लगी है कि किसी प्रकार सम्मान सुरक्षित रखकर सन्धि हो जाना भी बड़ी बात है।

'चाहे जो हो कुछ चौकियों पर अधिकार स्थापित ही करना होगा।' स्थानीय कर्नल क्या करे? 'ऊपरवाले तो आदेश देना ही जानते हैं। यहाँ वस्त्रों के शिविरों में रात-दिन रहना पडे़ और सियार पत्थर-कले से छूटे पाषाण खण्ड तोपों के गोलों की भांति घहरायं तो पता लगे।' लेकिन कर्नल चाहे जितना असंतुष्ट होकर बड़बड़ाये और पैर पटके; ऊपरवालों के आदेशों को पूरा किये बिना उसके लिये भी कोई मार्ग नहीं है।

'हमें एक मानचित्र मिल जाय इस अगली गोरखा चौकी का।' कर्नल चिन्ता में पड़ गया। सामने छोटी-सी पहाड़ी है। घना जंगल है। जब सेना आगे बढ़ने का प्रयत्न करती है, पहाड़ी के ऊपर से पत्थरों की बौछार प्रारम्भ हो जाती है। कुछ का कचूमर निकल जाता है। अपना-सा मुँह लेकर लौटना पड़ता है। छोटा-सा घेरा है पहाड़ी पर बहुत छोटे घर जितना। उसमें कितने गोरखे सैनिक होंगे? कहाँ से वे जल और भोजन पाते हैं? उनका मार्ग क्या है?'

इतिहास देश के इस दुर्भाग्य का साक्षी है कि देशवासी ही सदा आक्रमणकारियों के सहायक हो गये हैं। उस अंग्रेज दुकड़ी के साथ संख्या में देशी सैनिक ही अधिक थे। उन्होंने पता लगाना प्रारम्भ किया। अन्त में कर्नल को सूचना मिली - 'नीचे गाँव में एक ब्राह्मण है। वे मानचित्र बनाना अच्छा जानते हैं। कई नरेशों के यहाँ इस काम पर रह चुके हैं। इस समय अर्थ-संकट में हैं। अगली पहाड़ी के पीछे तो गांव है, उसका सरदार पण्डितों को बहुत मानता है। काठमाण्डू तक भी उनका आना जाना है।'

'हम तुम्हें बहुत रुपया देंगे - दो हजार रुपया।' कर्नल के आदेस से पण्डितजी बुलवाये गये - पकड़ मंगाये गये कहना चाहिये। 'तुम इस पहाड़ी और उसके आस-पास का एक मानचित्र हमें बनाकर दे दो। हमारी बात नहीं मानना बहुत बुरा होगा।'

'मैं इस पहाड़ी पर या उसके मार्ग से कभी नहीं गया हूँ।' पण्डितजी राजदरबारों के अनुभवी थे। कर्नल कितने अत्याचार कर सकता है, यह जानना उनके लिये कठिन नहीं था। धन का लोभ - लेकिन दो-दो कन्याओं का विवाह दरिद्रता के कारण एक सम्मान्य व्यक्ति के यहाँ रुका हो और उसे लोभ हो जाय तो दोष कैसे दिया जा सकता है। इतनेपर भी पण्डितजी पिंड छुड़ाना ही चाहते थे।

'तुम अब जा सकते हो। तुम्हें जाकर मानचित्र लाना ही है।' कर्नल ने धमकी दी। 'तुम्हारे घर पर हमारा एक सैनिक बराबर रहेगा। परसों शाम तक तुम नहीं आ गये मानचित्र लेकर तो हम तुम्हारे घर में आग लगवा देंगे और तुम्हारी लड़कियों को यहाँ पकड़ मंगायेंगे।'

कर्नलकी धमकी में जो क्रूरता-पैशाचिकता थी, उसने ब्राह्मण को कंपा दिया। मस्तक झुका कर वे चले गये। घर जाने का उनमें साहस नहीं था। कर्नल ने उन्हें कागज पेंसिल पकडा दी थी। वन पथ उनके लिये अपरिचित नहीं था।

दुर्भाग्य आता है तो सब ओर से आता है। पण्डितजी ने लगभग पुरा मानचित्र घूम-घामकर बना लिया था, किंतु उन्हें एक गोरखे सैनिक ने देख लिया। वह पहाड़ी चौकी से झरने पर सम्भवत: जल लेने आया था।

पाप में साहस नहीं हुआ करता। यह भी हो सकता है कि गोरखे सैनिक ने कुछ न समझा हो - उसने तनिक भी शंका न की हो। उसने पण्डितजी को पहचानकर स्वाभाविक ढंगसे ही पुकारकर प्रणाम किया हो। लेकिन पण्डितजी मानचित्र की रेखाएँ स्पष्ट कर रहे थे वृक्ष की छाया में बैठे। सैनिक का शब्द सुनते ही उनका तो रक्त सूख गया। कागज समेटा और भाग खड़े हुए। उन्हें लगा कि सैनिक ने उन्हें ही नहीं, उनके काम को भी देख लिया है। उसके प्रणाम में उन्हें स्पष्ट व्यंग्य का स्वर लगा। 'वह अपनी खुखड़ी या पत्थर-कला लेने गया होगा। अपने नायक को कहने या उनकी अनुमति लेने गया होगा। वह और उसके साथी आते होंगे।' बेचारे पण्डितजी के अपनी आशंका के कारण ही अधमरे हो गये थे।

'नरेन्द्र सिंह। मैं तुम्हारी शरण हूँ। मेरी रक्षा करो। पास के गाँव में पण्डितजी भागते-दौड़ते पहुंचे गये। उनका शरीर पसीने से लथपथ हो रहा था। वे हाफ रह थे और भय से काँप भी रहे थे - 'तुम वीर हो। ब्राह्यणकी रक्षा तुम्हारे हाथ में है।'

'आप इतने भयभीत क्यों हैं?' नरेन्द्र सिंह ने पूछा - 'फिरंगी तो इधर नहीं आ रहे हैं?'

'फिरंगी नहीं, तुम्हारे सैनिक।' पण्डितजी ने सब बातें सच-सच बता दी।

'मानचित्र देखूं तो।' नरेन्द्र ने मानचित्र ले लिया, किंतु उसके मन में ब्राह्यण से पूरा विवरण सुनकर तुमुल द्वन्द्व प्रारम्भ हो गया। वह घर के भीतर जाते-जाते बोला - 'आप विश्राम करें। यहां कोई आपको छू नहीं सकता।'

ब्राह्यण ने संतोष की साँस ली। वे पास बिछे पलंग पर बैठ गये। लेकिन नरेन्द्र सिंह - उसे मार्ग नहीं सूझ रहा था। वह व्याकुल हो रहा था - क्या करे वह? अब उसका कर्तव्य क्या है? यह ब्राह्मण - यह अतिथि - यह शरणागत......।
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(3)
'आप ब्राह्मण हैं, आपको मैं और क्या कहूँ।' हिंदू नरेशों का औदार्य ही तो है जो वे देवताओं के लिये भी कभी वन्दनीय माने जाते हैं। अपराधी ब्राह्यण देवता जब तीन सरकार (नेपालके प्रधानमंत्री) के सामने पहुँचाये गये, तब राणा ने उन्हें उठकर प्रणाम किया। 'आशा है मार्ग में आपको कष्ट नहीं हुआ होगा। सैनिकों ने आपके साथ सम्मान का व्यवहार किया होगा। आप हमें क्षमा करें इस अविनय के लिये। नायक नरेन्द्र सिंह का पत्र है कि वे यहां कल प्रात: पहुंचेगे। तब तक आप हमारा आतिथ्य ग्रहण करें।'

'आप मुझे प्राण दण्ड नहीं देंगे - यह मैं जानता हूँ। बाह्यण अवध्य है न! लेकिन मैं तो मर चुका। यह आपके सामने मेरा प्रेत खड़ा है। इसे मर-मिटने के लिये स्वतंत्र कर दीजिये!' ब्राह्मण के नेत्र लाल-लाल हो रहे थे - 'मेरा सम्मान नहीं रहा, मेरी लड़कियाँ फिरंगी ले ही गया होगा और वे पिशाच। हाय भगवान्! मैं अब क्यों जीवित हूँ?' दोनों हाथों अपने केश नोच लिये ब्राह्मण ने।

'आपकी पुत्रियाँ? फिरंगी?' महाराणा रुक-रुककर भी पूरे वाक्य बोल नहीं सके। स्थिति समझते ही उनके नेत्र भी अंगार हो उठे, किंतु दो ही क्षण में शान्त हो गये वे। 'महाराज! नरेन्द्र सिंह को आपके साथ आना चाहिये था। वह नहीं आया है। कल प्रात: वह यहाँ पहुँचेगा - उसने लिखा है तो पहुँचेगा ही। अब तक उसने एक बार भी झुठा आश्वासन नहीं दिया है। मैं समझता हूँ कि आपकी पुत्रियाँ सुरक्षित हैं।'

'सुरक्षित हैं वे?' बाह्यण को विश्वास नहीं हुआ।

'मैं भी केवल अनुमान कर रहा हूँ। कल प्रात: तक प्रतीक्षा कीजिये।' राणा ने गम्भीरता से कहा - 'नरेन्द्र सिंह चौकी से एक भी सैनिक हटा नहीं सकता। ऊपर के आदेश के बिना इतना दुस्साहस वह नहीं करेगा। उसके पास गाँव में कुल दस युवक और हैं और फिरंगी सेना बहुत बड़ी है।'

'वह क्या मेरी पुत्रियों को निकाल लाने वाले हैं?' ब्राह्मण को इसकी तनिक भी सम्भावना नहीं दीखती थी।
'भगवान पशुपतिनाथ जानते हैं।' राणा के पास भी कोई उत्तर नहीं था।
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नरेन्द्र सिंह दूसरे दिन प्रात:काल काठमाण्डू पहुँचे तो पहाड़ी टटुओं पर उनके साथ ब्राह्मण की दोनों पुत्रियाँ थी।

'धन्य वीर।' ब्राह्मण दौड़ा भुजाएँ फैलाकर।

'यह सम्भव कैसे हुआ?' राणा ने पूछा।

'मुझे भी पता नहीं।' नरेन्द्र सिंह ने भरें नेत्रों से कहा - 'मैं प्राण दे सकता था, वहीं देने गया था। मेरे दस साथी क्या कर लेते? लेकिन गांव तक पहुँचने में शत्रु मिला ही नहीं। वह सो रहा होगा। उसके सैनिक दौडे़ तब जब हम दो तिहाई मार्ग लौटते समय पार कर चुके थे। फिर हमारे पत्थर-कलों ने मृत्यु की वर्षा प्रारम्भ कर दी। करना तो जो कुछ था - पशुपतिनाथ को करना था, मनुष्य क्या कर सकता है?'

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 8

।।श्री हरिः।।
13 - आशा - उचित-अनुचित

'नम्बर सात ताला-जंगला सब ठीक है।' बड़े ऊंचे स्वर में पुकारा पीले कपड़े वाले नम्बरदार ने। दूसरे बैरेकों से भी इसी प्रकार की पुकारें लगभग उसी समय उठी।

यह कारागार का तृतीय श्रेणी का बैरेक नम्बर सात है। संध्याकालीन भोजन हो चुकने पर बंदी अपने फट्टे(मुँज की रस्सी से बनी चटाइयाँ), कम्बल, कपड़े लपेटे, तसला-कटोरी लिये दो पंक्तियों में बैठ गये थे। उनकी गिनती की गयी और फिर भरभराकर वे बैरेक में घुस गये।

घुटने से नीचे तक का जांघिया और बिना बाँह के कुर्ते। जांघिया और कुर्ते दोनों पर किन्हीं के लाल मोटी धारी हैं, किन्ही के नीली धारी। लाल-धारी बतलाती है कि बंदी पहली बार कारागार आया है और नीली धारी कहती है कि वह इससे पहले भी आ चुका है। किन्हीं-किन्हीं ने सिर पर लाल दुपलिया टोपियाँ भी लगा रखी हैं।

बीच में डेढ़-दो हाथ की दूरी छोड़ कर चबूतरे बने हैं सीमेंट के पंक्तिबद्ध। बंदियो ने अपने फट्टे चबूतरों पर डाल दिये हैं। लोहे के तसलों में पानी कुछ ले आये हैं दौड़कर, कुछ ड्रम के पास भीड़ लगाये खड़े हैं। कुछ के पास मिट्टी की हंडिया भी है पानी रखने को। जिनकी फूट चुकी है, इस ग्रीष्म में उन्हें अपने तसले के पानी से रात्रि को प्यास बुझानी है, यदि कोई अन्य मित्र अपनी हँडिया का पानी देने की उदारता न दिखलावे। कारागार-अधिकारी दुबारा हँडिया देने से रहे।

'सब अपने-अपने चबूतरे पर जल्दी बैठो!' नम्बरदार चिल्लाया और उसने हाथ का डंडा हिलाया। जैसे भेडों को हांकता हो, ऐसी ही चेष्टा - 'जल्दी करो, गिनती करनी है।'

दो-चार मिनट उपेक्षा चल सकती है इस नम्बरदार की। फिर वह गाली पर उतर आयेगा और कुछ कहो तो सवेरे 'पेशी' कर देगा जेलर के सामने। पानी गिनती के बाद भी लिया जा सकता है। एक बार सब बैठ गये चबूतरों पर - शान्त हो गये। अपने ही चबूतरे पर बैठे हों - आवश्यक नहीं था। एक चबूतरे पर दो व्यक्ति न हों, यह नम्बरदार ने कहा; किंतु इस पर बल नहीं दिया उसने। अपनी गिनती पूरी करके उसे 'ताला-जंगला ठीक है' की घोषणा करने की जल्दी थी इस समय।

'कल मुझे छुटकारा मिल जायगा! ' एक दुबले, गोरे रंग के अधेड़ व्यक्ति कह रहे थे- 'मेरा भाई अवश्य मेरी जमानत कल कर देगा। कल न्यायालय में मुझे जाना है।'

ये विचाराधीन बंदी हैं। अपनी सफेद कमीज में रहते हैं और पाजामा भी इनका घर का ही है। दाढी-मूंछ के बाल बुरी तरह बढ गये हैं। यहाँ नाई हैं सही; किंतु विचाराधीन बंदी को उनकी सुविधा प्राप्त नहीं होती। तृतीय श्रेणी का बंदी दाढी बनाने का अपना सामान साथ रख नहीं सकता।

'यह तो साक्षात् नरक है।' मच्छरों के मारे सब बैचेन हैं। सबके हाथ की चटपट गूंज रही है। बैरेक में ही एक कोने पर इन साठ बंदियों के मल-मूत्र-त्याग का स्थान है। उसकी दुर्गन्धि भरी है सब कहीं। जो थोड़े गिने-चुने चबूतरे खिड़किंयों के पास हैं - उन पर नम्बरदार के कृपापात्र या सशक्त लोग हैं। शेष इस दमघोटू वातावरण में घुट रहे हैं। पसीना, मच्छर, दुर्गन्धि - ठीक तो कहते हैं वे कि यह नरक है।

'मुझे निरपराध फसाया गया है!' सच-झूठ को राम जाने। यहां या तो लोग डींग हांकते है या अपने को निर्दोष बतलाते हैं; किंतु इनकेजैसा सीधा, चार बजे सुबह से ही भजन में लगने वाला - कुछ भी हो, ये कल यहाँ से मुक्त हों जायें तो उत्तम।

'सब लोग अपने-अपने चबूतरे पर जाओ।' नम्बरदार ने डंडा उठाया। अब तक लोग दो-दो चार-चार एकत्र बैठकर बातचीत कर रहे थे। थोड़ी देर उपेक्षा चली; किंतु नम्बरदार को कब तक टाला जा सकता है। वह घुम-घुम कर पुकार रहा है - 'बातचीत एकदम बंद। सब सो जाओ।'

बातचीत बन्द हो जायगी; किंतु यह गरमी, ये मच्छर, बत्ती के कारण उड़ते ये कीड़े-पतंगे और यह दुर्गन्धि - निद्रा क्या अपने वश में है?
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'मेरी जमानत नहीं हुई।' वही वातावरण, वही सायंकाल के बाद का समय, वही बैरेक। दूसरे दिन वे बहुत दुखी थे। न्यायालय से लौटकर आये तब से लगता था कि जैसे टूट चुके हैं। 'भाई ने सीधे देखा तक नहीं। वह मुख चुराकर चला गया।' आँसू गिर रहे थे नेत्रों से।

'संसार में किसी से भी आशा करना दुख ही देता है।' बैरेक में एक पण्डितजी हैं। सब उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं। वे कारागार क्यों आये, पता नहीं; किंतु बड़े सज्जन और अद्भुत शान्त पुरुष। वे आ गये हैं इन्हें दुखी देखकर। समीप बैठ गये हैं और सांत्वना देने लगे हैं।

'सब स्वार्थ के साथी हैं। विपत्ति में कोई साथ देने वाला नहीं।' दुख सान्त्वना पाकर पहले उबलता तो है ही।

'संसार के लोगों से आशा करना अनुचित है। यह आशा ही दुख की जड़ है।' पण्डितजी ने स्नेह भरे स्वर में कहा - 'किंतु दुखी और निराश होने की तो कोई बात नहीं है। एक है, जिस पर पूरा भरोसा किया जा सकता है। जिससे लगी आशा को वह कभी विफल नहीं करता। कोई दुखी उसी की ओर देखे तो वह सहायता न करे ऐसा कभी नहीं हुआ।'

'कोई नहीं है। मेरा कोई परिचित, कोई सम्बन्धी ऐसा नहीं जो अब मेरी सहायता करे।' उनकी घिग्घी बँध गयी।

'अच्छा है! संसार में जिसका सहायक कोई नहीं है, श्यामसुंदर उसका अपना है।' पण्डितजी की वाणी गम्भीर हुई - 'संसार से आशा अनुचित है और उस दयामय से आशा - उचित आसा एकमात्र यही है। आपने देख लिया कि लोगों से आशा करके क्या होता है। अब उसे पुकारकर देखिये।'

'वह सुनेगा मेरी?' संदेह के स्वर उठे - 'आप स्वयं भी तो इसी घिनौने कारागार में हैं।'

'मुझ यह अच्छा लगता है। उसने मेरे लिए कोई मंगल देखा होगा इस जीवन में!' पण्डितजी बोले - 'सब खटपट से छूट गया। एकान्त है यहां। भजन-चिन्तन ठीक बनता है। उसे जो अच्छा लगे - मैं उसमें कोई कष्ट देखता नहीं अपने लिये; किंतु आप दुखी हैं, आर्त हैं। उसे पुकारिये। आर्त की सच्ची पुकार उस दयाधाम के यहां से कभी विफल नहीं लौटी।'

पण्डितजी जाकर सो गये अपने आसन पर; किंतु वे सज्जन पूरी रात बैठे रहे। उनकी हिचकी और आँसू रुकने का नाम नहीं लेते थे।

घटना लगभग यहीं समाप्त हो जाती है। केवल इतना और बता देना है कि दूसरे दिन पण्डितजी दोपहर से पहले ही कारागार से बाहर हो गये। न्यायालय ने उसी दिन उन्हें दोषमुक्त घोषित कर दिया और दौड़-धूपकर पण्डितजी ने उन सज्जन को भी स्वयं जमानत देकर संध्या से पूर्व ही कारागार से बाहर कर लिया।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: ||
4 - मनुष्य क्या कर सकता है?

'पशुपतिनाथ। मुझ अज्ञानीको मागे दिखाओ।' उस ठिगने किन्तु सुपुष्ट शरीर वृद्ध के नेत्र भर आये। उसके भव्य भाल पर कदाचित ही किसीने कभी चिन्ता की रेखा देखी हो। विपत्ति में भी हिमालय के समान अडिग यह गौरवर्ण छोटे नेत्र एवं कुछ चपटी नाक वाला नेपाली वीर आज कातर हो रहा है -'भगवान । मुझे कुछ नहीं सूझता कि क्या करूं। मनुष्य को तुम क्यों धर्मसंकट में डालते हो? तुम्हें पुकारना छोड़कर मनुष्य ऐसे समय में और क्या करे? तुम बताओ, मुझे क्या करना चाहिये हैं?'

आँसू की बुंदें चौड़ी हड्डी वाले सुदृढ़ कपोलों पर से लुढ़क कर उजली मूछों में उलझ गयी। अपनी हुंकार से वन के नृशंस व्याघ्र को भी कम्पित कर देने वाला वज्र-पुरुष आज बालक के समान रो रहा था। उसकी कठोर काया के भीतर इतना सुकोमल ह्रदय है - उससे परिचित प्रत्येक व्यक्ति इसे जानता है।

नरेन्द्र सिंह वीर है - मृत्यु के मुख में भी पैर रख कर खुखड़ी के दो हाथ झाड़ देने का हौसला रखता है हृदय में, लेकिन धार्मिक है। आप उसे धर्मभीरु भी कहे तो चलेगा और आज वह धर्मभीरु घर्म-संकट में पड़ गया है। अब अपने पशुपतिनाथ को - नेपाल के आराध्य देव को पुकार रहा है वह।

'एक ब्राह्मण आशा लेकर गोरखे की शरण आया है। उसने मुझ पर विश्वास किया है। वह दुखी है - विवश है। दो पुत्रियाँ हैं उसके घर में विवाह करने योग्य और घर पर पुरुष तो दूर, उसकी पत्नी भी जीवित नहीं। फफक पड़ा नरेंन्द्र सिंह - 'वह मारा जा सकता है। क्रूर विदेशी उसे कुत्ते के समान गोली से भून देंगे। एक गोरखा यह विश्वासघात करे? नरेंन्द्र यह ब्रह्महत्या ले? मेरे नाथ ! तुम कहाँ सो गये हो? समाधी छोड़ दो आशुतोष। इस सेवक को मार्ग दिखलाओ।'

'मैं इस चौकी का रक्षक हूँ। चौकी के सैनिक मेरे भरोसे निश्चिन्त रहते हैं। मेरे महाराज मुझ पर विश्वास करते हैं। एक नेपाली अपने देश से अपने महाराज से विश्वासघात करे?' नरेन्द्र सिंह ने दोनों हाथ सिर पर पूरे वेग से पटक दिये - 'फिरंगी पता नहीं क्या चाहते हैं। वे रहस्य पाकर पता नहीं क्या अनर्थ करेंगे। चौकी के सैनिक भून जायेंगे और उन पिशाचों के लिये गौ, ब्राह्मण, देवता - वे तो हैं ही पिशाच। सतियों का सतीत्व उनके लिये विनोद का साधन है। मैं निमित्त बनूं उनकी पैशाचिकता को सफल बनाने में? मैं अपने देश से, महाराज से अनुगतों से, समाज से, और धर्म से ही विश्वासघात करूं?'

वृद्ध जैसे पागल हो जायगा। उसने मस्तक पटक दिया पृथ्वी पर - 'पशुपतिनाथ। तुम मुझे मार्ग नहीं दिखलाते तो मर जाने दो।' अपनी खुखड़ी उसने म्यान से खींच ली। ललाट पर एक लाल गोल सूजन आ गयी थी; किन्तु जो मृत्यु का आलिंगन करने जा रहा है उसे उसका क्या पता लगना था।

'गायें मारी जायँगी - नेपाल की इस पावन धरापर, भगवान तथागत के चरणों से पूत हुई इस पृथ्वी पर गोरक्त गिरेगा। मेरी बेटियों-बहुओं का सतीत्व फिरंगी सिपाही लूटेंगे या वे अपनी रक्षा के लिये खुखड़ी खोंस लेंगी हृदय में।' नरेन्द्र सिंह के हाथ से अपनी खुखड़ी छूट गिरी - 'मुझे मरने का अधिकार कहां है। मेरी मृत्यु का अर्थ भी तो शत्रु को सुविधा देना ही होगा। हाय । आज यह अधम मर भी नहीं सकता है।'

'अतिथि के साथ विश्वासघात - ब्राह्मण की हत्या। उसकी वे कुमारी कायाएँ।' नरेन्द्र सिंह को आखों के आगे अन्धकार छा गया। उसने उस स्वरमें, जिसमें किसी नृशंस हत्यारे के छुरे से आहत मरणोन्मुख प्राणी चीत्कार करता है - चीत्कार की- 'पशुपतिनाथ।'

आर्त प्राणों की कातर पुकार वह आशुतोष चन्द्रमौलि न सुने - ऐसा कभी हुआ है? जिस दिन वह गंगाधर सच्ची पुकार सुनने के लिए भी समाधीमग्न बनेगा, सृष्टि रहेगी कितने पल?

नरेन्द्र के मुख पर शान्ति आयी। उसने नेत्र पोंछ लिये हाथों से ही खुखड़ी उठाकर म्यान में रख ली। उसके हृदय के पशुपतिनाथ ने उसे प्रकाश दे दिया था। दृढ़ निश्चय था उसके मुखपर।

'पण्डितजी! आप मुझे क्षमा करें।' जब वह अथिति के सम्मुख आया, उसके स्वर में कोई हिचक या कंपन नहीं थी। 'आपके खींचे मानचित्र मैं आपको लौटा नहीं सकूंगा। आपको काठमाण्डू जाना है।'

'नरेन्द्र सिंह। तुम विश्वासघात करोगे? तुम?' ब्राह्मण के नेत्र फटे-फटे हो गये। उसका मुख भय से सफेद पड़ गया - 'फिरंगी मेरी कन्याओं की क्या दुर्गति करेगा - सोचो तो तुम। मैं यहीं प्राण दे दूंगा। तुम्हें ब्रह्महत्या लेनी है?'

'मैं विवश हुँ।' नरेन्द्र सिंह ने मुख नीचे झुका लिया। ब्राह्यण के स्वरमें जो प्राण दे देने की दृढ़ता थी - दूसरा कोई मार्ग भी नहीं था उनके लिये। लेकिन नरेन्द्र ने उन्हें उसी स्थिर स्वर में कह दिया - 'यहाँ आपको प्राण देने नहीं दिया जा सकता। काठमाण्डू तो जाना ही है आपको। पशुपतिनाथ को प्रणाम करके जो कुछ करना आप चाहें - स्वतन्त्र रहेंगे।'
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अंग्रजों ने नेपाल पर चढाई तो कर दी, किंतु उन्हें अब छठी का दूध याद आ रहा है। उनकी बंदूकों की पिट्- पिट् गोरखा वीरों के पत्थर-कले के आघात के सम्मुख व्यर्थ सिद्ध हो रही है। इन जंगलों और पहाड़ों में आकर फिरंगी अपनी हेकड़ी भूल गया है। अब तो उसे यह समझ आने लगी है कि किसी प्रकार सम्मान सुरक्षित रखकर सन्धि हो जाना भी बड़ी बात है।

'चाहे जो हो कुछ चौकियों पर अधिकार स्थापित ही करना होगा।' स्थानीय कर्नल क्या करे? 'ऊपरवाले तो आदेश देना ही जानते हैं। यहाँ वस्त्रों के शिविरों में रात-दिन रहना पडे़ और सियार पत्थर-कले से छूटे पाषाण खण्ड तोपों के गोलों की भांति घहरायं तो पता लगे।' लेकिन कर्नल चाहे जितना असंतुष्ट होकर बड़बड़ाये और पैर पटके; ऊपरवालों के आदेशों को पूरा किये बिना उसके लिये भी कोई मार्ग नहीं है।

'हमें एक मानचित्र मिल जाय इस अगली गोरखा चौकी का।' कर्नल चिन्ता में पड़ गया। सामने छोटी-सी पहाड़ी है। घना जंगल है। जब सेना आगे बढ़ने का प्रयत्न करती है, पहाड़ी के ऊपर से पत्थरों की बौछार प्रारम्भ हो जाती है। कुछ का कचूमर निकल जाता है। अपना-सा मुँह लेकर लौटना पड़ता है। छोटा-सा घेरा है पहाड़ी पर बहुत छोटे घर जितना। उसमें कितने गोरखे सैनिक होंगे? कहाँ से वे जल और भोजन पाते हैं? उनका मार्ग क्या है?'

इतिहास देश के इस दुर्भाग्य का साक्षी है कि देशवासी ही सदा आक्रमणकारियों के सहायक हो गये हैं। उस अंग्रेज दुकड़ी के साथ संख्या में देशी सैनिक ही अधिक थे। उन्होंने पता लगाना प्रारम्भ किया। अन्त में कर्नल को सूचना मिली - 'नीचे गाँव में एक ब्राह्मण है। वे मानचित्र बनाना अच्छा जानते हैं। कई नरेशों के यहाँ इस काम पर रह चुके हैं। इस समय अर्थ-संकट में हैं। अगली पहाड़ी के पीछे तो गांव है, उसका सरदार पण्डितों को बहुत मानता है। काठमाण्डू तक भी उनका आना जाना है।'

'हम तुम्हें बहुत रुपया देंगे - दो हजार रुपया।' कर्नल के आदेस से पण्डितजी बुलवाये गये - पकड़ मंगाये गये कहना चाहिये। 'तुम इस पहाड़ी और उसके आस-पास का एक मानचित्र हमें बनाकर दे दो। हमारी बात नहीं मानना बहुत बुरा होगा।'

'मैं इस पहाड़ी पर या उसके मार्ग से कभी नहीं गया हूँ।' पण्डितजी राजदरबारों के अनुभवी थे। कर्नल कितने अत्याचार कर सकता है, यह जानना उनके लिये कठिन नहीं था। धन का लोभ - लेकिन दो-दो कन्याओं का विवाह दरिद्रता के कारण एक सम्मान्य व्यक्ति के यहाँ रुका हो और उसे लोभ हो जाय तो दोष कैसे दिया जा सकता है। इतनेपर भी पण्डितजी पिंड छुड़ाना ही चाहते थे।

'तुम अब जा सकते हो। तुम्हें जाकर मानचित्र लाना ही है।' कर्नल ने धमकी दी। 'तुम्हारे घर पर हमारा एक सैनिक बराबर रहेगा। परसों शाम तक तुम नहीं आ गये मानचित्र लेकर तो हम तुम्हारे घर में आग लगवा देंगे और तुम्हारी लड़कियों को यहाँ पकड़ मंगायेंगे।'

कर्नलकी धमकी में जो क्रूरता-पैशाचिकता थी, उसने ब्राह्मण को कंपा दिया। मस्तक झुका कर वे चले गये। घर जाने का उनमें साहस नहीं था। कर्नल ने उन्हें कागज पेंसिल पकडा दी थी। वन पथ उनके लिये अपरिचित नहीं था।

दुर्भाग्य आता है तो सब ओर से आता है। पण्डितजी ने लगभग पुरा मानचित्र घूम-घामकर बना लिया था, किंतु उन्हें एक गोरखे सैनिक ने देख लिया। वह पहाड़ी चौकी से झरने पर सम्भवत: जल लेने आया था।

पाप में साहस नहीं हुआ करता। यह भी हो सकता है कि गोरखे सैनिक ने कुछ न समझा हो - उसने तनिक भी शंका न की हो। उसने पण्डितजी को पहचानकर स्वाभाविक ढंगसे ही पुकारकर प्रणाम किया हो। लेकिन पण्डितजी मानचित्र की रेखाएँ स्पष्ट कर रहे थे वृक्ष की छाया में बैठे। सैनिक का शब्द सुनते ही उनका तो रक्त सूख गया। कागज समेटा और भाग खड़े हुए। उन्हें लगा कि सैनिक ने उन्हें ही नहीं, उनके काम को भी देख लिया है। उसके प्रणाम में उन्हें स्पष्ट व्यंग्य का स्वर लगा। 'वह अपनी खुखड़ी या पत्थर-कला लेने गया होगा। अपने नायक को कहने या उनकी अनुमति लेने गया होगा। वह और उसके साथी आते होंगे।' बेचारे पण्डितजी के अपनी आशंका के कारण ही अधमरे हो गये थे।

'नरेन्द्र सिंह। मैं तुम्हारी शरण हूँ। मेरी रक्षा करो। पास के गाँव में पण्डितजी भागते-दौड़ते पहुंचे गये। उनका शरीर पसीने से लथपथ हो रहा था। वे हाफ रह थे और भय से काँप भी रहे थे - 'तुम वीर हो। ब्राह्यणकी रक्षा तुम्हारे हाथ में है।'

'आप इतने भयभीत क्यों हैं?' नरेन्द्र सिंह ने पूछा - 'फिरंगी तो इधर नहीं आ रहे हैं?'

'फिरंगी नहीं, तुम्हारे सैनिक।' पण्डितजी ने सब बातें सच-सच बता दी।

'मानचित्र देखूं तो।' नरेन्द्र ने मानचित्र ले लिया, किंतु उसके मन में ब्राह्यण से पूरा विवरण सुनकर तुमुल द्वन्द्व प्रारम्भ हो गया। वह घर के भीतर जाते-जाते बोला - 'आप विश्राम करें। यहां कोई आपको छू नहीं सकता।'

ब्राह्यण ने संतोष की साँस ली। वे पास बिछे पलंग पर बैठ गये। लेकिन नरेन्द्र सिंह - उसे मार्ग नहीं सूझ रहा था। वह व्याकुल हो रहा था - क्या करे वह? अब उसका कर्तव्य क्या है? यह ब्राह्मण - यह अतिथि - यह शरणागत......।
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(3)
'आप ब्राह्मण हैं, आपको मैं और क्या कहूँ।' हिंदू नरेशों का औदार्य ही तो है जो वे देवताओं के लिये भी कभी वन्दनीय माने जाते हैं। अपराधी ब्राह्यण देवता जब तीन सरकार (नेपालके प्रधानमंत्री) के सामने पहुँचाये गये, तब राणा ने उन्हें उठकर प्रणाम किया। 'आशा है मार्ग में आपको कष्ट नहीं हुआ होगा। सैनिकों ने आपके साथ सम्मान का व्यवहार किया होगा। आप हमें क्षमा करें इस अविनय के लिये। नायक नरेन्द्र सिंह का पत्र है कि वे यहां कल प्रात: पहुंचेगे। तब तक आप हमारा आतिथ्य ग्रहण करें।'

'आप मुझे प्राण दण्ड नहीं देंगे - यह मैं जानता हूँ। बाह्यण अवध्य है न! लेकिन मैं तो मर चुका। यह आपके सामने मेरा प्रेत खड़ा है। इसे मर-मिटने के लिये स्वतंत्र कर दीजिये!' ब्राह्मण के नेत्र लाल-लाल हो रहे थे - 'मेरा सम्मान नहीं रहा, मेरी लड़कियाँ फिरंगी ले ही गया होगा और वे पिशाच। हाय भगवान्! मैं अब क्यों जीवित हूँ?' दोनों हाथों अपने केश नोच लिये ब्राह्मण ने।

'आपकी पुत्रियाँ? फिरंगी?' महाराणा रुक-रुककर भी पूरे वाक्य बोल नहीं सके। स्थिति समझते ही उनके नेत्र भी अंगार हो उठे, किंतु दो ही क्षण में शान्त हो गये वे। 'महाराज! नरेन्द्र सिंह को आपके साथ आना चाहिये था। वह नहीं आया है। कल प्रात: वह यहाँ पहुँचेगा - उसने लिखा है तो पहुँचेगा ही। अब तक उसने एक बार भी झुठा आश्वासन नहीं दिया है। मैं समझता हूँ कि आपकी पुत्रियाँ सुरक्षित हैं।'

'सुरक्षित हैं वे?' बाह्यण को विश्वास नहीं हुआ।

'मैं भी केवल अनुमान कर रहा हूँ। कल प्रात: तक प्रतीक्षा कीजिये।' राणा ने गम्भीरता से कहा - 'नरेन्द्र सिंह चौकी से एक भी सैनिक हटा नहीं सकता। ऊपर के आदेश के बिना इतना दुस्साहस वह नहीं करेगा। उसके पास गाँव में कुल दस युवक और हैं और फिरंगी सेना बहुत बड़ी है।'

'वह क्या मेरी पुत्रियों को निकाल लाने वाले हैं?' ब्राह्मण को इसकी तनिक भी सम्भावना नहीं दीखती थी।
'भगवान पशुपतिनाथ जानते हैं।' राणा के पास भी कोई उत्तर नहीं था।
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नरेन्द्र सिंह दूसरे दिन प्रात:काल काठमाण्डू पहुँचे तो पहाड़ी टटुओं पर उनके साथ ब्राह्मण की दोनों पुत्रियाँ थी।

'धन्य वीर।' ब्राह्मण दौड़ा भुजाएँ फैलाकर।

'यह सम्भव कैसे हुआ?' राणा ने पूछा।

'मुझे भी पता नहीं।' नरेन्द्र सिंह ने भरें नेत्रों से कहा - 'मैं प्राण दे सकता था, वहीं देने गया था। मेरे दस साथी क्या कर लेते? लेकिन गांव तक पहुँचने में शत्रु मिला ही नहीं। वह सो रहा होगा। उसके सैनिक दौडे़ तब जब हम दो तिहाई मार्ग लौटते समय पार कर चुके थे। फिर हमारे पत्थर-कलों ने मृत्यु की वर्षा प्रारम्भ कर दी। करना तो जो कुछ था - पशुपतिनाथ को करना था, मनुष्य क्या कर सकता है?'

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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