Best अंजलि Stories, Video, Quotes, Shayari, Poem, Jokes, Songs, Music On Nojoto

Read Stories about अंजलि. Also Read about अंजलि Quotes, Shayari about अंजलि, अंजलि Poetry, Poetry on अंजलि, Poem about अंजलि, Stories about अंजलि, Whatsapp Status about अंजलि, अंजलि Whatsapp Status, अंजलि Message, Post about अंजलि, अंजलि Post, Post on अंजलि, Quotes on अंजलि, Quotes about अंजलि, अंजलि Shayari, Shayari on अंजलि, Poetry about अंजलि, अंजलि Poem, Poem on अंजलि, अंजलि Stories, Stories on अंजलि, अंजलि Jokes, अंजलि Memes, अंजलि Songs, अंजलि Video, Whatsapp Status on अंजलि, Message about अंजलि, Message on अंजलि, Stories, Video, Quotes, Shayari, Poem, Jokes, Songs, Music On Nojoto

Feedback & Ideas

X

How was your experience?

We would love to hear from you!

अंजलि

  • 3 Followers
  • 55 Stories
  • Latest Stories
  • Popular Stories

20 days ago

|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 9

||श्री हरिः||
6 - भगवत्प्राप्ति

'मनुष्य जीवन मिला ही भगवान को पाने के लिए है। संसार भोग तो दूसरी योनियों में भी मिल सकते हैं। मनुष्य में भोगों को भोगने की उतनी शक्ति नहीं, जितनी दूसरे प्राणियों में है।' वक्ता की वाणी में शक्ति थी। उनकी बातें शास्त्रसंगत थी, तर्कसम्मत थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि उनका व्यक्तित्व ऐसा था जो उनके प्रत्येक शब्द को सजीव बनाये दे रहा था। 'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।भगवत्प्राप्ति हो गई तो जीवन सफल हुआ और न हुई तो महान हानि हुई।'

प्रवचन समाप्त हुआ। लोगों ने हाथ जोड़े, सिर झुकाया और एक-एक करके जाने लगे। सबको अपने-अपने काम हैं और वे आवश्यक हैं। यही क्या कम है जो वे प्रतिदिन एक घंटे भगवच्चर्चा भी सुनने आ बैठते हैं। परंतु अवधेश अभी युवक था, भावुक था। उसे पता नहीं था कि कथा पल्लाझाड़ भी सुनी जाती है। वह प्रवचन में आज आया था और उसका हृदय एक ही दिन के प्रवचन ने झकझोर दिया था।

सब लोगों के चले जाने के बाद उसने वक्ता से कहा - 'मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है, उपाय बतलाइये।' वक्ता बोले - 'बस, भगवान् को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होनी चाहिए, फिर घर के सारे काम भगवान की पूजा बन जाएंगे।' उसने कहा - 'महाराज! घर में रहकर भजन नहीं हो सकता। आप मुझे स्नेहवश रोक रहे हैं, पर मैं नहीं रुकूंगा।' इतना कहकर वक्ता को कुछ भी उत्तर देने का अवसर दिए बिना ही युवक तुरंत चल दिया।

'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।' सात्विक कुल में जन्म हुआ था। पिता ने बचपन से स्त्रोतपाठादि के संस्कार दिये थे। यज्ञोपवीत होते ही त्रिकाल-संध्या प्रारंभ हो गई, भले पिता के भय से प्रारंभ हुई हो। ब्राह्मण के बालक को संस्कृत पढ़ना चाहिए, पिता के इस निर्णय के कारण कालेज की वायु लग नहीं सकी। इस प्रकार सात्विक क्षेत्र प्रस्तुत था। आज के प्रवचन ने उसमें बीज वपन कर दिया। अवधेश को आज न भोजन रुचा, न अध्ययन में मन लगा। उसे सबसे बड़ी चिंता थी - उसका विवाह होने वाला है। सब बातें निश्चित हो चुकी हैं। तिलक चढ़ चुका है। अब वह अस्वीकार करे भी तो कैसे और - भगवान को पाना है, इस बंधन में पड़े तो पता नहीं क्या होगा।

दिन बीता, रात्रि आयी। पिता ने, माता ने तथा अन्य कई ने कई बार टोका - 'अवधेश! आज तुम खिन्न कैसे हो?' परंतु वह, किससे क्या कहे। रात्रि में कहीं चिंतातुर को निद्रा आती है। अंत में जब सारा संसार घोर निद्रा में सो रहा था, अवधेश उठा। उसने माता-पिता के चरणों में दूर से प्रणाम किया। नेत्रों में अश्रु थे, किंतु घर से वह निकल गया।

'अवधेश का स्वास्थ्य कैसा है?' प्रातः जब पुत्र नित्य की भांति प्रणाम करने नहीं आया, तब पिता को चिंता हुई।

'वह रात को बाहर नहीं सोया था?' माता व्याकुल हुई। उन्होंने तो समझा था कि अधिक गर्मी के कारण वह बाहर पिता के समीप सोया होगा।

पुत्र का मोह - कहीं वह स्वस्थ, सुंदर, सुशील और गुणवान हो, मोह तो माता-पिता को कुरूप, क्षुद्र, दुर्व्यसनी पुत्र का भी होता है। विद्या-विनय सम्पन्न युवक पुत्र जिसका चला जाये, उस माता-पिता की व्यथा का वर्णन कैसे किया जाय। केवल एक पत्र मिला था - 'इस कुपुत्र को क्षमा कर दें! आशिर्वाद दें कि इसी जीवन में भगवत्प्राप्ति कर सकूँ।'
------------------------------------------------------------------------------------

'आपने यहां अग्नि क्यों जलायी?' वन का रक्षक रुष्ट था - 'एक चिंगारी यहां सारे वन को भस्म कर सकती है।'

'रात्रि में वन पशु न आवें इसलिए!' अवधेश - अनुभवहीन युवक, वह सीधे चित्रकूट गया और वहां से आगे वन में चला गया। उसे क्या पता था कि पहले ही प्रातः काल उसे डांट सुननी पड़ेगी। अत्यंत नम्रतापूर्वक कहा उसने - 'मैं सावधानी से अग्नि बुझा दूंगा।'

'बिना आज्ञा के यहाँ अग्नि जलाना अपराध है।' वन के रक्षक ने थोड़ी देर में ही अवधेश को बता दिया कि भारत के सब वन सरकारी वन-विभाग द्वारा रक्षित हैं। वहां अग्नि जलाने की अनुमति नहीं है। वहाँ के फल-कंद सरकारी सम्पत्ति हैं और बेचे जाते हैं। वन से बिना अनुमति कुछ लकड़ियां लेना भी चोरी है।

'हे भगवान!' बड़ा निराश हुआ अवधेश। वन में आकर उसने देखा था कि उसे केवल जंगली बेर और जंगली भिंडी मिल सकती है। वह समझ गया था कि ये भी कुछ ही दिन मिलेंगे, किंतु वैराग्य नवीन था। वह पत्ते खाकर जीवन व्यतीत करने को उद्यत था, परंतु वन में तो रहने के लिए भी अनुमति आवश्यक है। आज कहीं तपोवन नहीं है।

'आप मुझे क्षमा करें। मैं आज ही चला जाऊँगा।' वन-रक्षक से उसने प्रार्थना की। वैसे भी जंगली भिंडी और जंगली बेर के फल के आहार ने उसे एक ही दिन में अस्वस्थ बना दिया था। उसके पेट और मस्तक में तीव्र पीड़ा थी। लगता था कि उसे ज्वर आने वाला है।

'आप मेरे यहाँ चलें।' वन-रक्षक को इस युवक पर दया आ रही थी। यह भोला बालक तपस्या करने आया था - कहीं यह तपस्या का युग है। 'आज मेरी झोपड़ी को पवित्र करें।'

अवधेश अस्वीकार नहीं कर सका। उनका शरीर किसी की सहायता चाहता था। उनके लिए अकेले पैदल वन से चित्रकूट बस्ती तक जाना आज सम्भव नहीं रह गया था। 'यदि ज्वर रुक गया - कौन कह सकता है कि वह नहीं रुकेगा।' अवधेश तो कल्पना से ही घबरा गया। उसने सोचा ही नहीं था कि वन में जाकर वह बीमार भी पड़ सकता है।
------------------------------------------------------------------------------------

'आप मुझे अपनी शरण में ले लें।' बढ़े केश, फटी-सी धोती, एक कई स्थानों से पिचका लोटा - युवक गौरवर्ण है, बड़े-बड़े नेत्र हैं, किंतु अत्यंत दुर्बल है। सम्भ्रांत कुल का होने पर भी लगता है कि निराश्रित हो रहा है। उसने महात्मा के चरण पकड़ लिये और उनपर मस्तक रखकर फूट-फूटकर रोने लगा।

'मुझे और सारे विश्व को जो सदा शरण में रखता है, वही तुम्हें भी शरण में रख सकता है।' ये महात्माजी प्रज्ञाचक्षु हैं। गंगाजी में नौका पर ही रहते हैं। काशी के बड़े से बड़े विद्वान भी बड़ी श्रद्धा से नाम लेते हैं इनका। इन्होंने युवक को पहचाना या नहीं, पता नहीं किंतु आश्वासन दिया - 'तुम पहले गंगा स्नान करो और भगवत्प्रसाद लो। फिर तुम्हारी बात सुनूंगा।'

'आप मुझे अपना लें। मेरा जीवन व्यर्थ नष्ट हो रहा है।' युवक फूट-फूटकर रो रहा था - 'मुझे नहीं सूझता कि मुझे कैसे भगवत्प्राप्ति होगी।'

'तुम पहले स्नान-भोजन करो।' महात्मा ने बड़े स्नेह से युवक की पीठ पर हाथ फेरा - 'जो भगवान को पाना चाहता है, भगवान स्वयं उसे पाना चाहते हैं। वह तो भगवान को पायेगा ही।'

युवक ने स्नान किया और थोड़ा सा प्रसाद शीघ्रतापूर्वक मुख में डाल कर गंगाजल पी लिया। उसे भोजन-स्नान की नहीं पड़ी थी। वैराग्य सच्चा था और लगन में प्राण थे। वह कुछ मिनटों में ही महात्माजी के चरणों को पकड़कर उनके समीप बैठ गया।
'पहले तुम यह बताओ कि तुमने अबतक किया क्या?' महात्माजी ने तनिक स्मित के साथ पूछा।

'बडा़ लम्बा पुराण है।' अवधेश - हां, वह युवक अवधेश ही है - यह आपने समझ लिया होगा। उसने अपनी बात प्रारंभ की। उसने बताया कि वह खूब भटका है इधर चार वर्षों में। उसे एक योगी ने नेती, धोती, न्यौली, ब्रह्मदांतौन तथा अन्य अनेक योग की क्रियाएँ करायी। उन क्रियाओं के मध्य ही उसके मस्तक में भयंकर दर्द रहने लगा। बड़ी कठिनाई से एक वृद्ध संत की कृपा से वह दूर हुआ। उन वृद्ध संत ने योग की क्रियाएँ सर्वथा छोड़ देने को कह दिया।

'ये मूर्ख!' महात्माजी कुछ रुष्ट हुए - 'ये योग की कुछ क्रियाएँ सीखकर अपने अधूरे ज्ञान से युवकों का स्वास्थ्य नष्ट करते फिरते हैं। आज कहां है अष्टांग योग के ज्ञाता। यम-नियम की प्रतिष्ठा हुई नहीं जीवन में और चल पड़े आसन तथा मुद्राएँ कराने। असाध्य रोग के अतिरिक्त और क्या मिलता है इस व्यायाम के दूषित प्रयत्न में।'

'मुझे एक ने कान बंद करके शब्द सुनने का उपदेश दिया।' अवधेश ने महात्माजी के चुप हो जाने पर बताया - 'एक कुण्डलिनी योग के आचार्य भी मिले। मुझे घनगर्जन भी सुनाई पड़ा और कुण्डलिनी जागरण के जो लक्षण वे बताते थे, वे भी मुझे अपने में दीखे। नेत्र बंद करके मैं अद्भुत दृश्य देखता था, किंतु मेरा संतोष नहीं हुआ। मुझे भगवान नहीं मिले - मिला एक विचित्र झमेला।'

'अधिकारी के अधिकार को जाने बिना चाहे जिस साधन में उसे जोत दिया जाय - वह पशु तो नहीं है।' महात्माजी ने कहा - 'धारणा, ध्यान, समाधि - चाहे शब्दयोग से हो या लययोग से, किंतु जीवन में चांचल्य बना रहेगा और समाधि कुछ क्रिया मात्र से मिल जायगी, ऐसी दुराशा करनेवालों कहा क्या जाय। जो भगवद्दर्शन चाहता है उसे सिखाया जाता है योग....! भगवान की कृपा है तुम पर। उन्होंने तुम्हें कहीं अटकने नहीं दिया।'

'मैं सम्मान्य धार्मिक अग्रणियों के समीप रहा और विश्रुत आश्रमों में। कुछ प्रख्यात पुरुषों ने भी मुझपर कृपा करनी चाही।' अवधेश में व्यंग्य नहीं, केवल खिन्नता थी - 'जो अपने आश्रम-धर्म का निर्वाह नहीं कर पाते, जहाँ सोने-चाँदी का सेवन और सत्कार है, जो अनेक युक्तियां देकर शिष्यों का धन और शिष्याओं का धर्म अपहरण करने का प्रयत्न करते हैं, वहां परमार्थ और अध्यात्म भी है, यह मेरी बुद्धि ने स्वीकार नहीं किया।'

'कलियुग का प्रभाव - धर्म की आड़ में ही अधर्म पनप रहा है।' महात्माजी में भी खिन्नता आयी - 'जहाँ संग्रह है, विशाल सौध हैं, वहां साधुता कहाँ है। जहाँ सदाचार नहीं, इन्द्रियतृप्ति है, वहाँ से भगवान या आत्मज्ञान बहुत दूर है। परंतु इतनी सीधी बात लोगों की समझ में नहीं आती। सच तो यह है कि हमें कुछ न करना पड़े, कोई आशिर्वाद देकर सब कुछ कर दे, इस लोभ से जो चलेगा वह ठगा तो जायगा ही। आज धन और नारी का धर्म जिनके लिए प्रलोभन हैं, ऐसे वेशधारियों का बाहुल्य इसीलिए है। ऐसे दम्भी लोग सच्चे साधु-महात्माओं का भी नाम बदनाम करते हैं।

'मैं करने को उद्यत हूँ।' अवधेश ने चरणों पर मस्तक रखा - 'मुझे क्या करना है, यह ठीक मार्ग आप बताने की कृपा करें।'

'घर लौटो और माता-पिता को अपनी सेवा से संतुष्ट करो।' महात्माजी ने कहा - 'वे चाहते हैं तो विवाह करो। घर के सारे काम भगवान की पूजा समझकर करो - यही तो उस वक्ता ने तुमसे कहा था।

'देव!' अवधेश रो उठा।

'अच्छा, आज अभी रुको।' महात्माजी कुछ सोचने लगे।
------------------------------------------------------------------------------------

'ये पुष्प अंजलि में लो और विश्वनाथजी को चढ़ा आओ।' प्रातः स्नान करके जब अवधेश ने महात्माजी के चरणों में मस्तक रखा, तब महात्माजी ने पास रखी पुष्पों की डलिया खींच ली। टटोलकर वे अवधेश की अंजलि में पुष्प देने लगे। बड़े-बड़े सुंदर कमल पुष्प - थोड़े ही पुष्पों से अंजलि पूर्ण हो गई। महात्माजी ने खूब ऊपर तक भर दिये पुष्प।

असीघाट से अंजलि में पुष्प लेकर नौका से उतरना और उसी प्रकार तीन मील दूर विश्वनाथजी आना सरल नहीं है। परंतु अवधेश ने इस कठिनाई की ओर ध्यान नहीं दिया। वह पुष्पों से भरी अंजलि लिए उठा।

'कोई पुष्प गिरा तो नहीं?' महात्माजी ने भरी अंजलि से नौका में पुष्प गिरने का शब्द सुन लिया।

'एक गिर गया।' अवधेश का स्वर ऐसा था जैसे उससे कोई बड़ा अपराध हो गया हो।

'कहाँ गिरा, गंगाजी में?' फिर प्रश्न हुआ।

'नौका में' अवधेश खिन्न होकर बोला - 'मैं सम्भाल नहीं सका।'

'न विश्वनाथ को चढ़ सका, न गंगाजी को।' महात्माजी ने कहा - 'अच्छा, अपनी अंजलि के पुष्प मुझे दे दो।'

अवधेश ने महात्माजी की फैली अंजलि में अपनी अंजलि के पुष्प भर दिये। महात्माजी ने कहा - 'बाबा विश्वनाथ!' और सब पुष्प वहीं नौका में गिरा दिये।

'भैया, ये पुष्प विश्वनाथजी को चढ़ गए?' पूछा महात्माजी ने।

'चढ़ गए भगवन।' अवधेश ने मस्तक झुकाया।

'बच्चे! तू जहाँ है, भगवान तेरे पास ही हैं। वहीं तू उनके श्रीचरणों पर मस्तक रख।' महात्माजी ने अबकी कुछ ऐसी बात कही जो भली प्रकार समझ में नहीं आयी।

'वहां किनारे एक कोढ़ी बैठता है।' साधु होते ही विचित्र हैं। पता नहीं कहां से कहां की बात ले बैठे महात्माजी।
'वह बैठा तो है।' इंगित की गयी दिशा में अवधेश ने देखकर उत्तर दिया।

'देख, वह न नेती-धोती कर सकता, न कान बंद कर सकता और न माला पकड़ सकता।' महात्माजी समझाने लगे - 'वह पढ़ा-लिखा है नहीं, इसलिए ज्ञान की बात क्या जाने। परंतु वह मनुष्य है। मनुष्य जन्म मिलता है भगवत्प्राप्ति के लिए ही। भगवान ने उसे मनुष्य बनाया, इस स्थिति में रखा। इसका अर्थ है कि वह इस स्थिति में भी भगवान को तो पा ही सकता है।'
'निश्चय पा सकता है।' अवधेश ने दृढ़तापूर्वक कहा।

'तब तुम्हें यह क्यों सूझा कि भगवान घर से भागकर वन में ही जानेपर मिलते हैं।' महात्माजी ने हाथ पकड़कर अवधेश को पास बैठाया - 'क्यों समझते हो कि गृहस्थ होकर तुम भगवान से दूर हो जाओगे। जो सब कहीं है, उससे दूर कोई हो कैसे सकता है।'
'मैं आज्ञा पालन करुंगा।' अवधेश ने मस्तक रखा संत के चरणों पर। उसका स्वर कह रहा था कि कुछ और सुनना चाहता है - कोई साधन।

'भगवान साधन से नहीं मिलते।' महात्माजी बोले - 'साधन करके थक जाने पर मिलते हैं। जो जहां थककर पुकारता है - 'प्रभो! अब मैं हार गया, वहीं उसे मिल जाते हैं। या फिर उसे मिलते हैं जो अपने को सर्वथा उनका बनाकर उन्हें अपना मान लेता है।'
'अपना मान लेता है?' अवधेश ने पूछा।

'संसार के सारे संबंध मान लेने के ही तो हैं।' महात्माजी ने कहा - 'कोई लड़की सगाई होते ही तुम्हें पति मान लेगी और तुम उसके पति हो जाओगे। भगवान तो हैं सदा से अपने। उन्हें अपना नहीं जानते, यह भ्रम है। वे तुम्हारे अपने ही तो हैं।'

'वे मेरे हैं - मेरे भगवान।' पता नहीं क्या हुआ अवधेश को। वह वहीं नौका में बैठ गया - बैठा रहा पूरे दिन। लोग कहते हैं - कहते तो महात्माजी भी हैं कि अवधेश को एक क्षण में भगवत्प्राप्ति हो गई थी।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

2 Love
0 Comment

आँसू
#Hindi #story #merelafzonse
आँसू

कल की ही बात लगती है जब अंजलि अपने माँ-बाप का घर छोड़ राजेश से शादी कर लखनऊ उसके घर आई थी। कुछ ही पल में सबकी लाडली बन गयी थी। सब को उसकी फ़िक्र रहती थी उसको क्या पसंद है क्या नहीं। अंजलि की ननद माला उसकी भी शादी कुछ दिन बाद बनारस में हो गई थी। दोनों अपने-अपने घर में खुश थी। अब शादी को ५ साल बीत चुके थे और एक दिन अचानक अंजलि के घर से फ़ोन कॉल आया के उसकी माँ की तब्यत ख़राब है। माँ-बाप की एकलौती बेटी आखिर क्या करती सारी ज़िम्मेदारियाँ संभालने को वो अपने मायके आगरा चली गयी। अभी माँ का ख़याल रखते करते हुए एक हफ्ता ही बीता था के सास प्रेमा ने वापस बुलवा लिया। अपने मन को मार अंजलि लखनऊ वापस आ गयी। पर मन तो वही अपनी माँ की फ़िक्र में उलझा रहता था। पर अब वो पहले जैसे दिन कहा जो शादी के बाद थे जब सब उसकी सोचते थे उसकी फ़िक्र करते थे। अब तो अंजलि के सिर पर तो जिम्मेदारियों का बोझ था। सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ कर बस घर के काम में लगी रहेती थी। एक दिन अचानक उसकी जिंदगी में भूचाल आ गया जब अंजलि को पता चला के उसकी माँ इस दुनिया में को छोड़ के चली गयी है। उसने प्रेमा से कई दफा कहा के उसको आगरा जाने दे पर प्रेमा को जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था। तभी रोते हुए अंजलि ने अपनी प्रेमा से कह दिया के अगर ऐसी हालत माला की होती तो क्या तब भी यही निर्णय होता। इसपर प्रेमा ने बहुत खरी खोटी सुनाई ‘के तू तो चाहती ही है के मैं मर जाऊं तो तुझे घर में राज करने को मिले तुझे तो मुझसे नफरत है सास जो हूँ, माँ होती तो थोड़ी ऐसे बोलती।’ पर अंजलि की बदकिस्मती तो ऐसी थी के उसका साथ ही नहीं छोड़ रही थी। एक महीने बाद ही प्रेमा की तब्यत ख़राब हो गयी। देवर और पति तो काम पर रहते ससुर की भी उम्र हो चुकी थी तो वो भी ज्यादा समय लेट कर ही गुजारते थे। माँ की तो सेवा नहीं कर पायी पर अब सास की सेवा में सारा दिन गुज़र रहा था। दो दिन बाद प्रेमा ने राजेश से माला को बुलाने को कहा पर अब समय ने अब प्रेमा को आईना दिखाने की ठान रखी थ। माला प्रेमा के पास आ तो गयी पर दो दिन बाद ही अपने घर चली गयी और जाते जाते अपनी माँ से कह गयी।

माँ अब बनारस से लखनऊ बार बार आना मुस्किल होता है, और इनको काम से छुट्टी लेनी पड़ती है। और सास भी बार-बार आने पर नाराज़ होती है। इसलिए मैं अब जल्दी नहीं आ पाऊँगी। और वैसे भी यहाँ भाभी तो है ही तुम्हारा ध्यान रखने के लिए। माला के जाने के बाद प्रेमा तो जैसे पत्थर की मूरत बन गई थी। माला की कही बात बार-बार उसके कानों में गूंज रही थी। और सोचती रही के एक तरफ घर की बहू है जिसको मैंने उसकी माँ को आखरी बार देखने तक नहीं भेजा, न उसकी माँ की स्थिति समझी न अपनी बहू की और एक तरफ मेरी खुद की बेटी है जो ऐसे शब्दों के तीर चला के गई है की दिल चीर के रख दिया। आज प्रेमा को इस बात का एहसास हो गया था के बहू तो हमेशा सास को माँ मानती है बस सास इस बात को स्वीकार्य नहीं करती के ये बहू नहीं बेटी है। थोड़ी देर बाद जब अंजलि प्रेमा के पास आई तो प्रेमा पहली बार अंजलि से लिपट के रोई और आँखों से आंसुओ की गंगा बहती रही।

वैभव वर्मा

+91 9807825061

03/07/2018

0 Love
0 Comment

1 year ago

||श्री हरिः||
6 - भगवत्प्राप्ति

'मनुष्य जीवन मिला ही भगवान को पाने के लिए है। संसार भोग तो दूसरी योनियों में भी मिल सकते हैं। मनुष्य में भोगों को भोगने की उतनी शक्ति नहीं, जितनी दूसरे प्राणियों में है।' वक्ता की वाणी में शक्ति थी। उनकी बातें शास्त्रसंगत थी, तर्कसम्मत थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि उनका व्यक्तित्व ऐसा था जो उनके प्रत्येक शब्द को सजीव बनाये दे रहा था। 'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।भगवत्प्राप्ति हो गई तो जीवन सफल हुआ और न हुई तो महान हानि हुई।'

प्रवचन समाप्त हुआ। लोगों ने हाथ जोड़े, सिर झुकाया और एक-एक करके जाने लगे। सबको अपने-अपने काम हैं और वे आवश्यक हैं। यही क्या कम है जो वे प्रतिदिन एक घंटे भगवच्चर्चा भी सुनने आ बैठते हैं। परंतु अवधेश अभी युवक था, भावुक था। उसे पता नहीं था कि कथा पल्लाझाड़ भी सुनी जाती है। वह प्रवचन में आज आया था और उसका हृदय एक ही दिन के प्रवचन ने झकझोर दिया था।

सब लोगों के चले जाने के बाद उसने वक्ता से कहा - 'मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है, उपाय बतलाइये।' वक्ता बोले - 'बस, भगवान् को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होनी चाहिए, फिर घर के सारे काम भगवान की पूजा बन जाएंगे।' उसने कहा - 'महाराज! घर में रहकर भजन नहीं हो सकता। आप मुझे स्नेहवश रोक रहे हैं, पर मैं नहीं रुकूंगा।' इतना कहकर वक्ता को कुछ भी उत्तर देने का अवसर दिए बिना ही युवक तुरंत चल दिया।

'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।' सात्विक कुल में जन्म हुआ था। पिता ने बचपन से स्त्रोतपाठादि के संस्कार दिये थे। यज्ञोपवीत होते ही त्रिकाल-संध्या प्रारंभ हो गई, भले पिता के भय से प्रारंभ हुई हो। ब्राह्मण के बालक को संस्कृत पढ़ना चाहिए, पिता के इस निर्णय के कारण कालेज की वायु लग नहीं सकी। इस प्रकार सात्विक क्षेत्र प्रस्तुत था। आज के प्रवचन ने उसमें बीज वपन कर दिया। अवधेश को आज न भोजन रुचा, न अध्ययन में मन लगा। उसे सबसे बड़ी चिंता थी - उसका विवाह होने वाला है। सब बातें निश्चित हो चुकी हैं। तिलक चढ़ चुका है। अब वह अस्वीकार करे भी तो कैसे और - भगवान को पाना है, इस बंधन में पड़े तो पता नहीं क्या होगा।

दिन बीता, रात्रि आयी। पिता ने, माता ने तथा अन्य कई ने कई बार टोका - 'अवधेश! आज तुम खिन्न कैसे हो?' परंतु वह, किससे क्या कहे। रात्रि में कहीं चिंतातुर को निद्रा आती है। अंत में जब सारा संसार घोर निद्रा में सो रहा था, अवधेश उठा। उसने माता-पिता के चरणों में दूर से प्रणाम किया। नेत्रों में अश्रु थे, किंतु घर से वह निकल गया।

'अवधेश का स्वास्थ्य कैसा है?' प्रातः जब पुत्र नित्य की भांति प्रणाम करने नहीं आया, तब पिता को चिंता हुई।

'वह रात को बाहर नहीं सोया था?' माता व्याकुल हुई। उन्होंने तो समझा था कि अधिक गर्मी के कारण वह बाहर पिता के समीप सोया होगा।

पुत्र का मोह - कहीं वह स्वस्थ, सुंदर, सुशील और गुणवान हो, मोह तो माता-पिता को कुरूप, क्षुद्र, दुर्व्यसनी पुत्र का भी होता है। विद्या-विनय सम्पन्न युवक पुत्र जिसका चला जाये, उस माता-पिता की व्यथा का वर्णन कैसे किया जाय। केवल एक पत्र मिला था - 'इस कुपुत्र को क्षमा कर दें! आशिर्वाद दें कि इसी जीवन में भगवत्प्राप्ति कर सकूँ।'
------------------------------------------------------------------------------------

'आपने यहां अग्नि क्यों जलायी?' वन का रक्षक रुष्ट था - 'एक चिंगारी यहां सारे वन को भस्म कर सकती है।'

'रात्रि में वन पशु न आवें इसलिए!' अवधेश - अनुभवहीन युवक, वह सीधे चित्रकूट गया और वहां से आगे वन में चला गया। उसे क्या पता था कि पहले ही प्रातः काल उसे डांट सुननी पड़ेगी। अत्यंत नम्रतापूर्वक कहा उसने - 'मैं सावधानी से अग्नि बुझा दूंगा।'

'बिना आज्ञा के यहाँ अग्नि जलाना अपराध है।' वन के रक्षक ने थोड़ी देर में ही अवधेश को बता दिया कि भारत के सब वन सरकारी वन-विभाग द्वारा रक्षित हैं। वहां अग्नि जलाने की अनुमति नहीं है। वहाँ के फल-कंद सरकारी सम्पत्ति हैं और बेचे जाते हैं। वन से बिना अनुमति कुछ लकड़ियां लेना भी चोरी है।

'हे भगवान!' बड़ा निराश हुआ अवधेश। वन में आकर उसने देखा था कि उसे केवल जंगली बेर और जंगली भिंडी मिल सकती है। वह समझ गया था कि ये भी कुछ ही दिन मिलेंगे, किंतु वैराग्य नवीन था। वह पत्ते खाकर जीवन व्यतीत करने को उद्यत था, परंतु वन में तो रहने के लिए भी अनुमति आवश्यक है। आज कहीं तपोवन नहीं है।

'आप मुझे क्षमा करें। मैं आज ही चला जाऊँगा।' वन-रक्षक से उसने प्रार्थना की। वैसे भी जंगली भिंडी और जंगली बेर के फल के आहार ने उसे एक ही दिन में अस्वस्थ बना दिया था। उसके पेट और मस्तक में तीव्र पीड़ा थी। लगता था कि उसे ज्वर आने वाला है।

'आप मेरे यहाँ चलें।' वन-रक्षक को इस युवक पर दया आ रही थी। यह भोला बालक तपस्या करने आया था - कहीं यह तपस्या का युग है। 'आज मेरी झोपड़ी को पवित्र करें।'

अवधेश अस्वीकार नहीं कर सका। उनका शरीर किसी की सहायता चाहता था। उनके लिए अकेले पैदल वन से चित्रकूट बस्ती तक जाना आज सम्भव नहीं रह गया था। 'यदि ज्वर रुक गया - कौन कह सकता है कि वह नहीं रुकेगा।' अवधेश तो कल्पना से ही घबरा गया। उसने सोचा ही नहीं था कि वन में जाकर वह बीमार भी पड़ सकता है।
------------------------------------------------------------------------------------

'आप मुझे अपनी शरण में ले लें।' बढ़े केश, फटी-सी धोती, एक कई स्थानों से पिचका लोटा - युवक गौरवर्ण है, बड़े-बड़े नेत्र हैं, किंतु अत्यंत दुर्बल है। सम्भ्रांत कुल का होने पर भी लगता है कि निराश्रित हो रहा है। उसने महात्मा के चरण पकड़ लिये और उनपर मस्तक रखकर फूट-फूटकर रोने लगा।

'मुझे और सारे विश्व को जो सदा शरण में रखता है, वही तुम्हें भी शरण में रख सकता है।' ये महात्माजी प्रज्ञाचक्षु हैं। गंगाजी में नौका पर ही रहते हैं। काशी के बड़े से बड़े विद्वान भी बड़ी श्रद्धा से नाम लेते हैं इनका। इन्होंने युवक को पहचाना या नहीं, पता नहीं किंतु आश्वासन दिया - 'तुम पहले गंगा स्नान करो और भगवत्प्रसाद लो। फिर तुम्हारी बात सुनूंगा।'

'आप मुझे अपना लें। मेरा जीवन व्यर्थ नष्ट हो रहा है।' युवक फूट-फूटकर रो रहा था - 'मुझे नहीं सूझता कि मुझे कैसे भगवत्प्राप्ति होगी।'

'तुम पहले स्नान-भोजन करो।' महात्मा ने बड़े स्नेह से युवक की पीठ पर हाथ फेरा - 'जो भगवान को पाना चाहता है, भगवान स्वयं उसे पाना चाहते हैं। वह तो भगवान को पायेगा ही।'

युवक ने स्नान किया और थोड़ा सा प्रसाद शीघ्रतापूर्वक मुख में डाल कर गंगाजल पी लिया। उसे भोजन-स्नान की नहीं पड़ी थी। वैराग्य सच्चा था और लगन में प्राण थे। वह कुछ मिनटों में ही महात्माजी के चरणों को पकड़कर उनके समीप बैठ गया।
'पहले तुम यह बताओ कि तुमने अबतक किया क्या?' महात्माजी ने तनिक स्मित के साथ पूछा।

'बडा़ लम्बा पुराण है।' अवधेश - हां, वह युवक अवधेश ही है - यह आपने समझ लिया होगा। उसने अपनी बात प्रारंभ की। उसने बताया कि वह खूब भटका है इधर चार वर्षों में। उसे एक योगी ने नेती, धोती, न्यौली, ब्रह्मदांतौन तथा अन्य अनेक योग की क्रियाएँ करायी। उन क्रियाओं के मध्य ही उसके मस्तक में भयंकर दर्द रहने लगा। बड़ी कठिनाई से एक वृद्ध संत की कृपा से वह दूर हुआ। उन वृद्ध संत ने योग की क्रियाएँ सर्वथा छोड़ देने को कह दिया।

'ये मूर्ख!' महात्माजी कुछ रुष्ट हुए - 'ये योग की कुछ क्रियाएँ सीखकर अपने अधूरे ज्ञान से युवकों का स्वास्थ्य नष्ट करते फिरते हैं। आज कहां है अष्टांग योग के ज्ञाता। यम-नियम की प्रतिष्ठा हुई नहीं जीवन में और चल पड़े आसन तथा मुद्राएँ कराने। असाध्य रोग के अतिरिक्त और क्या मिलता है इस व्यायाम के दूषित प्रयत्न में।'

'मुझे एक ने कान बंद करके शब्द सुनने का उपदेश दिया।' अवधेश ने महात्माजी के चुप हो जाने पर बताया - 'एक कुण्डलिनी योग के आचार्य भी मिले। मुझे घनगर्जन भी सुनाई पड़ा और कुण्डलिनी जागरण के जो लक्षण वे बताते थे, वे भी मुझे अपने में दीखे। नेत्र बंद करके मैं अद्भुत दृश्य देखता था, किंतु मेरा संतोष नहीं हुआ। मुझे भगवान नहीं मिले - मिला एक विचित्र झमेला।'

'अधिकारी के अधिकार को जाने बिना चाहे जिस साधन में उसे जोत दिया जाय - वह पशु तो नहीं है।' महात्माजी ने कहा - 'धारणा, ध्यान, समाधि - चाहे शब्दयोग से हो या लययोग से, किंतु जीवन में चांचल्य बना रहेगा और समाधि कुछ क्रिया मात्र से मिल जायगी, ऐसी दुराशा करनेवालों कहा क्या जाय। जो भगवद्दर्शन चाहता है उसे सिखाया जाता है योग....! भगवान की कृपा है तुम पर। उन्होंने तुम्हें कहीं अटकने नहीं दिया।'

'मैं सम्मान्य धार्मिक अग्रणियों के समीप रहा और विश्रुत आश्रमों में। कुछ प्रख्यात पुरुषों ने भी मुझपर कृपा करनी चाही।' अवधेश में व्यंग्य नहीं, केवल खिन्नता थी - 'जो अपने आश्रम-धर्म का निर्वाह नहीं कर पाते, जहाँ सोने-चाँदी का सेवन और सत्कार है, जो अनेक युक्तियां देकर शिष्यों का धन और शिष्याओं का धर्म अपहरण करने का प्रयत्न करते हैं, वहां परमार्थ और अध्यात्म भी है, यह मेरी बुद्धि ने स्वीकार नहीं किया।'

'कलियुग का प्रभाव - धर्म की आड़ में ही अधर्म पनप रहा है।' महात्माजी में भी खिन्नता आयी - 'जहाँ संग्रह है, विशाल सौध हैं, वहां साधुता कहाँ है। जहाँ सदाचार नहीं, इन्द्रियतृप्ति है, वहाँ से भगवान या आत्मज्ञान बहुत दूर है। परंतु इतनी सीधी बात लोगों की समझ में नहीं आती। सच तो यह है कि हमें कुछ न करना पड़े, कोई आशिर्वाद देकर सब कुछ कर दे, इस लोभ से जो चलेगा वह ठगा तो जायगा ही। आज धन और नारी का धर्म जिनके लिए प्रलोभन हैं, ऐसे वेशधारियों का बाहुल्य इसीलिए है। ऐसे दम्भी लोग सच्चे साधु-महात्माओं का भी नाम बदनाम करते हैं।

'मैं करने को उद्यत हूँ।' अवधेश ने चरणों पर मस्तक रखा - 'मुझे क्या करना है, यह ठीक मार्ग आप बताने की कृपा करें।'

'घर लौटो और माता-पिता को अपनी सेवा से संतुष्ट करो।' महात्माजी ने कहा - 'वे चाहते हैं तो विवाह करो। घर के सारे काम भगवान की पूजा समझकर करो - यही तो उस वक्ता ने तुमसे कहा था।

'देव!' अवधेश रो उठा।

'अच्छा, आज अभी रुको।' महात्माजी कुछ सोचने लगे।
------------------------------------------------------------------------------------

'ये पुष्प अंजलि में लो और विश्वनाथजी को चढ़ा आओ।' प्रातः स्नान करके जब अवधेश ने महात्माजी के चरणों में मस्तक रखा, तब महात्माजी ने पास रखी पुष्पों की डलिया खींच ली। टटोलकर वे अवधेश की अंजलि में पुष्प देने लगे। बड़े-बड़े सुंदर कमल पुष्प - थोड़े ही पुष्पों से अंजलि पूर्ण हो गई। महात्माजी ने खूब ऊपर तक भर दिये पुष्प।

असीघाट से अंजलि में पुष्प लेकर नौका से उतरना और उसी प्रकार तीन मील दूर विश्वनाथजी आना सरल नहीं है। परंतु अवधेश ने इस कठिनाई की ओर ध्यान नहीं दिया। वह पुष्पों से भरी अंजलि लिए उठा।

'कोई पुष्प गिरा तो नहीं?' महात्माजी ने भरी अंजलि से नौका में पुष्प गिरने का शब्द सुन लिया।

'एक गिर गया।' अवधेश का स्वर ऐसा था जैसे उससे कोई बड़ा अपराध हो गया हो।

'कहाँ गिरा, गंगाजी में?' फिर प्रश्न हुआ।

'नौका में' अवधेश खिन्न होकर बोला - 'मैं सम्भाल नहीं सका।'

'न विश्वनाथ को चढ़ सका, न गंगाजी को।' महात्माजी ने कहा - 'अच्छा, अपनी अंजलि के पुष्प मुझे दे दो।'

अवधेश ने महात्माजी की फैली अंजलि में अपनी अंजलि के पुष्प भर दिये। महात्माजी ने कहा - 'बाबा विश्वनाथ!' और सब पुष्प वहीं नौका में गिरा दिये।

'भैया, ये पुष्प विश्वनाथजी को चढ़ गए?' पूछा महात्माजी ने।

'चढ़ गए भगवन।' अवधेश ने मस्तक झुकाया।

'बच्चे! तू जहाँ है, भगवान तेरे पास ही हैं। वहीं तू उनके श्रीचरणों पर मस्तक रख।' महात्माजी ने अबकी कुछ ऐसी बात कही जो भली प्रकार समझ में नहीं आयी।

'वहां किनारे एक कोढ़ी बैठता है।' साधु होते ही विचित्र हैं। पता नहीं कहां से कहां की बात ले बैठे महात्माजी।
'वह बैठा तो है।' इंगित की गयी दिशा में अवधेश ने देखकर उत्तर दिया।

'देख, वह न नेती-धोती कर सकता, न कान बंद कर सकता और न माला पकड़ सकता।' महात्माजी समझाने लगे - 'वह पढ़ा-लिखा है नहीं, इसलिए ज्ञान की बात क्या जाने। परंतु वह मनुष्य है। मनुष्य जन्म मिलता है भगवत्प्राप्ति के लिए ही। भगवान ने उसे मनुष्य बनाया, इस स्थिति में रखा। इसका अर्थ है कि वह इस स्थिति में भी भगवान को तो पा ही सकता है।'
'निश्चय पा सकता है।' अवधेश ने दृढ़तापूर्वक कहा।

'तब तुम्हें यह क्यों सूझा कि भगवान घर से भागकर वन में ही जानेपर मिलते हैं।' महात्माजी ने हाथ पकड़कर अवधेश को पास बैठाया - 'क्यों समझते हो कि गृहस्थ होकर तुम भगवान से दूर हो जाओगे। जो सब कहीं है, उससे दूर कोई हो कैसे सकता है।'
'मैं आज्ञा पालन करुंगा।' अवधेश ने मस्तक रखा संत के चरणों पर। उसका स्वर कह रहा था कि कुछ और सुनना चाहता है - कोई साधन।

'भगवान साधन से नहीं मिलते।' महात्माजी बोले - 'साधन करके थक जाने पर मिलते हैं। जो जहां थककर पुकारता है - 'प्रभो! अब मैं हार गया, वहीं उसे मिल जाते हैं। या फिर उसे मिलते हैं जो अपने को सर्वथा उनका बनाकर उन्हें अपना मान लेता है।'
'अपना मान लेता है?' अवधेश ने पूछा।

'संसार के सारे संबंध मान लेने के ही तो हैं।' महात्माजी ने कहा - 'कोई लड़की सगाई होते ही तुम्हें पति मान लेगी और तुम उसके पति हो जाओगे। भगवान तो हैं सदा से अपने। उन्हें अपना नहीं जानते, यह भ्रम है। वे तुम्हारे अपने ही तो हैं।'

'वे मेरे हैं - मेरे भगवान।' पता नहीं क्या हुआ अवधेश को। वह वहीं नौका में बैठ गया - बैठा रहा पूरे दिन। लोग कहते हैं - कहते तो महात्माजी भी हैं कि अवधेश को एक क्षण में भगवत्प्राप्ति हो गई थी।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

6 Love
0 Comment

2 years ago

41 - रेणुक्रीड़ा
|| श्री हरि: ||






'दादा, तू
अपना पेट मत हिला।' श्यामसुंदर अपने छोटे हाथों की नन्ही अंजलि में कोमल बालक का भरकर
दाऊ के पेट पर डालता जा रहा है। दाऊ बीच - बीच में पेट फुला देता है और सब बालु खिसक
जाती है।




प्रातः नन्दव्रज
के छोटे-छोटे शिशु श्रीयमुना जी के पुलिन पर खेलने आ गये हैं। प्रभात का समय, तनिक
- तनिक धूप, ठंडी नर्म रेत - बालकों को खेलने के लिए मन माना क्षेत्र मिल गया है।




बहुत थोड़े
हैं, जिनकी कटि में ठिकाने से कछनी बंधी है। प्रायः दिगंबर हैं। बहुतों ने कछनी खोल
फेंकी हैं। कछनी के वस्त्र का इससे सुंदर क्या उपयोग होगा कि उसमें रेत भरी जाय?




रेत से भरी
अलकें, धूसर देह, सुंदर नन्हें शिशुओं का समुदाय। कोई लोटपोट होता है, कोई पैरों से
रेत रगड़ता है, कोई 'कुआं' खोदता है, कोई टीला बनाता है और कोई दूसरे के ऊपर रेत उछालता
है। एक - दूसरे का चरण पकड़ कर रेत में घसीटते हैं। ताली बजाते हैं। कूदते हैं। नाचते
हैं। दौड़ते हैं और लदबद गिरकर लोटपोट होते हैं।




'मोहन, तुझे
भूख लगी होगी। बहुत देर हो गई। आ बेटा।' माता रोहिणी तनिक दूर खड़ी पुकार रही है। दूसरी
ओर जल भरने को जाती तथा जल भरकर लौटती गोपियां खाली या भरे घड़े लिए ठगी - सी खड़ी
हैं।




'दादा, हम
तुझे देवता बनायेंगे।' श्याम को अवकाश नहीं मां की पुकार सुनने का। गोपियों की ओर देखने
की बात उसे स्मरण ही नहीं आ सकती इस समय।




दाऊ लेटा
है रेत में। शिशुओं की एक भीड़ इसके चारों ओर बैठी है। सब इसे रेत से ढक देने के प्रयत्न
में हैं। यह बीच-बीच में कुलबुला पड़ता है। सब रेत खिसक जाती है। यह हंसता है और सब
खिलखिलाकर हंसते हैं।




'तू अब हिल
मत।' श्याम ठीक तो कहता है। कहीं देवता भी हिला करता है। बड़े भाई के चरण सखाओं के
साथ पकड़ कर हंसते हुए दूर तक घसीट ले गया यह और अब फिर अंजलि में रेत भरकर पेटपर डालने
लगा है।




दाऊ के पास अंजलि में रेत
लिए धूलिधूसर कन्हाई। रेत से भरी इसकी अलकें। दूर पीछे पड़ी पीली कछनी। साथ में बैठे
हंसते शिशु। घाट के मार्ग में ठगी खड़ी गोपियां और मां पुकार रही है - 'मोहन, आजा बेटा।
राम, बेटा। छोटे भाई को ले आ।'

लेखक : सुदर्शन
सिंह
'चक्र' 

4 Love
0 Comment

2 years ago

23 - भेंट
|| श्री हरि: ||




'दादा!' बड़ी
कठिनाई तो यह है कि इस समय सिर उठाकर इधर-उधर देखा नहीं जा सकता और यह दाऊ तो पूरा
मौनी बाबा है। पुकारने पर भी चुपचाप देखता और मुस्कराता रहता है। उत्तर तो कदाचित्
ही देता है।




किसी ने श्यामसुंदर
के नन्हे - नन्हे दोनों हाथ सुंदर पके फलों से भर दिये हैं। नन्हा कन्हाई, उसकी नन्ही
- सी अंजलि - कितने फल आ सकते हैं हैं उसमें? परंतु लाल, पीले रंग - बिरंगे बड़े सुंदर
फल हैं। कृष्णचंद्र अपने पेट के सहारे अंजलि लगाये बहुत सावधानी से सम्हल - सम्हल कर
चलता, सम्हालकर लिए आ रहा है उन फलों को। कोई फल नीचे न गिर जाय।




दिगम्बर श्याम
- चरणों के नुपुर और कटि की किंकणी इस मंद गति में क्वचित ही तनिक - सा शब्द कर पाती
है। मस्तक झुकाकर फलों को देखने और गिरने से बचाने के प्रयत्न में व्यस्त है मोहन।
घनी अलकें झुककर मुखमंडल पर चारों ओर से लटक आयी हैं। पदों की गति शिथिल और अस्त व्यस्त
है।




'दादा!' खड़े
होकर कन्हाई ने सिर उठाया और कुछ झुके हुए फलों को सम्हाले हुए ही देखा इसने। यह क्या
बैठा है, उसका दादा। पालथी मारे आंगन में बैठा है और छोटे भाई की ओर देखकर मंद - मंद
हंस रहा है। मोहन के अधरों पर भी स्मित आया। इसने फिर मस्तक झुका लिया। चरणों में उल्लसित
गति आ गयी। फद् - फद् जल्दी - जल्दी चलने के प्रयत्न में लग गया है यह किंतु इतने फलों
को लेकर चलना क्या सरल काम है?




'दादा!' श्यामसुंदर
दाऊ के पास आकर धीरे से भूमि पर बैठ गया। सारे फल बड़े भाई के सामने फैला दिये - धर
दिये इसने अपने फैले हुए दोनों पैरों के बीच में और दोनों हाथ भूमि पर टेककर, मस्तक
झुकाकर बड़ी प्रसन्नता से दो क्षण देखता रहा फलों को। देहली से यहां तक बीस डग की भारी
दूरी इतने फल अंजलि और पेट पर लाद कर यह सुकुमार चल कर आया है - थक नहीं गया होगा?
किंतु इसे थकान का ध्यान नहीं। यह तो प्रसन्न हो रहा है - 'कितने फल लाया हूँ मैं।
कितने सारे कितने सुंदर।'




पालथी मारे
नीली कछनी मात्र बांधे गोरे दाऊ के सामने दोनों चरण दोनों ओर फैलाकर उनके बीच में रंग
- बिरंगे फल बिखेरे, दोनों हाथ भूमि पर टेके, उसका यह नव - नील नीरद दिगम्बर अनुज!
अब यह वैसे ही बैठा मुस्कराता अग्रज के मुख की ओर मुख ऊपर उठाकर मुग्ध भाव से देख रहा
है - 'दादा क्यों उसी को देख रहा है? कितने अच्छे फल हैं - खा न इन्हें!' किंतु दाऊ
तो एक फल उठाकर इसी के मुख में लगाने जा रहा है।


लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र' 

8 Love
0 Comment
×

More Like This

add
close Create Story Next

Tag Friends

camera_alt Add Photo
person_pin Mention
arrow_back PUBLISH
language

Language

 

Upload Your Video close