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लिखो, न कुछ पाने के लिए, न कुछ खोने के लिए... लिख

लिखो,
न कुछ पाने के लिए, 
न कुछ खोने के लिए...
लिखो,
तो बस खुद, 
खुद होने के लिए...
लिखते वक्त ये न सोचो कि
कितना लिखा जा चुका है?
या क्या लिखा जा सकता है?
लिखते वक्त बस ये सोचो कि
और कितना कुछ अब भी लिखा जा सकता है...
इतना कुछ लिखे रहने के बाद भी,
कितना कुछ लिखना बाकी रह गया है...
इस ब्रह्माण्ड का कोई कोना, सब से,
जीना अब भी बाकी रह गया है...

©Chandan Bharati
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