जो रिश्ते नही समझते, वो प्यार क्या समझेंगे। कैसी होती है लाचारों की जिंदगी, बंगलो के रसूखदार क्या समझेंगे। लूटते हो अस्मत भरी महफ़िलो में, कमरों के अंदर की चीख पुकार क्या समझेंगे। होश में आओ अधर्मियों अभी वक़्त है, जो धर्म नही जानते वो गीता और रामायण क्या समझेंगे। जमीन को बंजर बनाने वाले ठेकेदार है वो, अनाज के दानों को उगाने में बहे पसीने की बून्दो को क्या समझेंगे। पाश्चात्य सभ्यता की चकाचोंध में अंधे, भारत की संस्कृति और सभ्यता को क्या समझेंगे। 'चाहत' मुझे अफसोस है विदेशी भाषा को बोलने वाले, हिंदी के भाबो की गहराई को क्या समझेंगे। (चाहत) ©Chahat Kushwah #भारतीयसंस्कृति