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उथल- पुथल करवटें बदलते रहे, पर नींद कहां आनी हैं,

उथल- पुथल

करवटें बदलते रहे,
पर नींद कहां आनी हैं,
मस्तिष्क में तरंगों की,
 उथल- पुथल मच चुकी,
वो कहां इतनी जल्दी भला,
शांत होने वाली हैं।

जुल्म, बेबसी, हैवानियत,
मक्कारी,अराजकता, शोषण
कि दुनिया में अभी तो,
कुछ कदम ही चले हो बस,
इतनी जल्दी टूट कर गर बिखर जाओगे,
तो मैदान-ए-जंग फतह कैसे कर पाओगे।

आवाज बुलंद करना न सीखा हो,
किसी कोने में सिसकियों की आदत हो,
सब कुछ भूल कर फिर से सीखना तुम,
तोड़ना उन सब बंदिशों को,
जो बस एक जिंदा लाश बनकर,
गर नहीं रहना चाहते तुम।

©Ruchi Jha
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