White सपने में सपना देखा था थी दूर एक बड़े पेड़ की छांव, सुलगती धूप की प्रताड़ना थी जल चुके थे मेरे पांव। मैं जितना चलता उसकी ओर वो उतना ही दूर जा रहा था, मृगतृष्णा का अर्थ कुछ आज मेरी समझ में आ रहा था। दर्द और तड़पन में मेरा कुछ कर दिया था बुरा हाल, बचने की ना कोई राह थी दर्शन देने वाला ही था काल। जाने कहाँ से अचानक वो एक आशा की किरण बन आई, बन कर बादल की मेघा वो थी सकल नील गगन में छायी। जी उठा था मन वो जो छोड़ चुका था हर आस, वो दुल्हन सी सजी थी और मैंने पहना था दूल्हे का लिबास। चल रही थी रस्में बारिश ने सब कुछ बहा दिया, बड़ी देर लगी समझने में की माँ ने गिरा कर पानी उठा दिया। बस यही थी मेरी कहानी जिसमें सारा, सपना रेत सा बह गया, और कुछ इस तरह उस दिन (या कहें रात) मैं फिर से दूल्हा, बनते बनते रह गया।। ©Sagar Parasher #love_poetry #HindiPoem #funnypoetry #random_thoughts #sagarparasher #sagarkivaani