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ना सोना - चांदी घर पे है। हां,मां का आंचल सर पे

ना  सोना  - चांदी घर पे है।
हां,मां का आंचल सर पे है।।
है  डरना  क्यूं  अंधेरों  से ?
इक हंसता दीपक दर पे है।।

©डॉ मनोज सिंह,बोकारो स्टील सिटी,झारखंड। (कवि,संपादक,अंकशास्त्री,हस्तरेखा विशेषज्ञ 7004349313)
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