छलके नयन, पर अश्रु न गिरे, अधर मौन की पीड़ा कहें, हृदय में उठी जो हूक मधुर, वह किससे अपनी व्यथा कहें? चंपा की शीतल छाया में, विरह का दीप जलाया था, स्वप्नों के नूपुर टूट गए, जब तेरा नाम बुलाया था। संध्या के अंतिम किरण तले, बैठी थी मैं एकाकी-सी, स्मृतियों के जाल में उलझी, बिखरी थी मैं बिन साखी-सी। बंसी की वह तान अधूरी, अब मन को और तड़पाती है, गीतों में जो गूँज थी पहले, वह शोक-स्वर बन जाती है। प्रिय! तुम थे तो हर ऋतु मधुमय, बिन तेरे सब कुछ रीता है, अब पुष्प खिले तो शूल बनें, यह मिलन अधूरा जीता है। ©DrNidhi Srivastava #poem #Poetry #hindipoet #hindikavita #fyp #foryoupage #seetji #ramayana