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बीती पीड़ा में ज़िन्दगी सारी, खुशियों का भी होता रह

 बीती पीड़ा में ज़िन्दगी सारी,
खुशियों का भी होता रहा नुक़सान..!

क्या पाया आख़िर किसी दूसरे का,
करके सरेआम अपमान..!

जीते रहे इसी दम्भ में,
मैं ही मैं हूँ सर्वशक्तिमान..!

इतनी क्रूर आख़िर क्यों,
बना रखी है अपनी पहचान..!

न किया भला कभी,
न दी किसी के चेहरे पे मुस्कान..!

अब जल रही है चिता में देह,
और बची है आखिरी मुस्कान..!

ख़त्म किया होता बैर यदि,
बने रहते सदा यज़मान..!

न बनी होती कब्र चिंता की,
न होता जीवन शमशान..!

दबी दबी सी रह गई है हंसी,
चेहरे पे न जँची है आखिरी मुस्कान..!

©SHIVA KANT(Shayar)
  #Apocalypse #muskaan