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जाने किस घड़ी में निकला था वो घर से ,कि बदनसीबी मे

 जाने किस घड़ी में निकला था वो घर से ,कि बदनसीबी मेरे घर चली आई ,
बहा ले गया उसे वक़्त का सैलाब अपने संग, दुआ माँ की भी काम न आई,

बिछड़    गया     एक     फूल     डाली   से , आँखे माली की भी भर आईं,
उड़ गया  एक   नीड़   का   पँछी , पतझड़ सी खिज़ा मेरे चमन में है छाई ,

हर  वक़्त   ढूँढती   हैं   उसे   कई  सूनी आँखे ,कभी फूलों में कभी खारो में,
मिल   जाये  कहीं   हँसता   हुआ ,उस चाँद के पास खिलखिलाते सितारों में,

वक़्त का ये  कैसा सितम है देखिए , जवान बेटे की लाश बूढ़े बाप ने उठाई,
मिल जाये कहीं ख़ुदा तो उससे पूछूँगी ,कि कैसा ख़ुदा है तू कैसी तेरी ख़ुदाई,

उस माँ  की आँखों में एक   समन्दर  है  ठहरा , जो उम्र भर बहता ही रहेगा,
माँ के आँसू देख कहता है ख़ुदा ,ये तो जीवन चक्र है सदा चलता ही रहेगा।।

-पूनम आत्रेय

©poonam atrey
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