Morris Dollar(Ayush kumar gautam)

Morris Dollar(Ayush kumar gautam) Lives in Unnao, Uttar Pradesh, India

गिर रही है कलम सम्भाल ऐ लफ्जों के जादूगर वरना तेरे जज्बातों को कौन सम्भालेगा 7398375251 is my wtsapp no.

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मेरी और पेंड़ की बातचीत

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"सफरनामा जिंदगी का कुछ ऐसा रहा कैसे समेटें फकत कुछ लकीरों में जिन तकलीफों को बंद कमरे में हमने घुट-घुट कर सहा सबसे हंसकर मुखातिब हुए हम जानलेवा दर्द हमने कभी किसी से न कहा शराफत में किसी को जवाब भी देना न आया बस सोंचकर आंसू लिये बहा जरूरत महसस हुई एक दफा चीख कर रो लें हम पर उस वक्त घर के सभी लोग मौजूद थे वहां उलझनें चेहरे से साफ झलक रहीं थी टोका जब दोस्तों ने तो खीझकर बेसाख्ता मूंह से निकला बोलो अब दर्द-ओ-गम मिटाने जायें तो जायें कहां कदम हम बढा़ते गये गमों की बारिश से खुद को नहलाते गये कभी तो पहुंचेंगे कदम हमारी मंजिल है जहां बेसाख्ता-सहसा/एकाएक बेदम शायर आयुष कुमार गौतम की कलम से"

सफरनामा जिंदगी का कुछ ऐसा रहा
कैसे समेटें फकत कुछ लकीरों में
जिन तकलीफों को बंद कमरे में हमने घुट-घुट कर सहा
 सबसे हंसकर मुखातिब हुए हम
जानलेवा दर्द हमने कभी किसी से न कहा
शराफत में किसी को जवाब भी देना न आया
बस सोंचकर आंसू लिये बहा
जरूरत महसस हुई एक दफा चीख कर रो लें हम
पर उस वक्त घर के सभी लोग मौजूद थे वहां
उलझनें चेहरे से साफ झलक रहीं थी
टोका जब दोस्तों ने तो खीझकर बेसाख्ता मूंह से निकला बोलो अब दर्द-ओ-गम मिटाने जायें तो जायें कहां
कदम हम बढा़ते गये
गमों की बारिश से खुद को नहलाते गये
कभी तो पहुंचेंगे कदम हमारी मंजिल है जहां

बेसाख्ता-सहसा/एकाएक

बेदम शायर आयुष कुमार गौतम की कलम से

सफरनामा जिंदगी का कुछ ऐसा रहा

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"सुना है इश्क के तर्जुबेकारों से सच्ची मोहब्बत करता नहीं कोई दिलों में मोहब्बत जगानी पड़ती है सिर्फ यही सोंचकर टूटा नहीं मैं सच्चे आशिकों को दर्द भरी चोंटे खानी पड़ती हैं बेदम शायर आयुष कुमार गौतम की कलम से"

सुना है इश्क के तर्जुबेकारों से सच्ची मोहब्बत करता नहीं कोई दिलों में मोहब्बत जगानी पड़ती है
सिर्फ यही सोंचकर टूटा नहीं मैं सच्चे आशिकों को दर्द भरी चोंटे खानी पड़ती हैं

बेदम शायर आयुष कुमार गौतम की कलम से

दर्द भरी चोटें खानी पड़ती हैं

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"रेड हो, व्हाइट हो या हो ब्राउन हमारे लिये तो पीना ही हराम था चढ़ता भी था उतरता भी था कोई सीढी़ नहीं वो तो जाम था उनके दीदार ए नजर ने ऐसा घायल किया हमें खंजर की जरूरत ही न पडी़ वो भी क्या खूबसूरत कत्ल-ए-आम था शायर आयुष कुमार गौतम"

रेड हो, व्हाइट हो या हो ब्राउन हमारे लिये तो पीना ही हराम था
चढ़ता भी था उतरता भी था कोई सीढी़ नहीं वो तो जाम था
उनके दीदार ए नजर ने ऐसा घायल किया हमें खंजर की जरूरत ही न पडी़
वो भी क्या खूबसूरत कत्ल-ए-आम था

शायर आयुष कुमार गौतम

खूबसूरत कतले आम

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"अपने जीवन के अनुभव अब किससे प्रकट करूं बहुत तो टूट चुका हूं मैं इससे अधिक क्या विकट करूं प्रत्येक मनुष्य यहां अपनी समस्याओं से तंग है हर कोई यहां आर्थिक रूप से अपंग है मात्र आशायें ही यहां सभी के संग हैं बरसों से चली आ रही कुछ परम्परायें आज भी प्रसंग हैं प्रस्तुत तौर तरीके समाज का प्रमुख अंग हैं चंद्र रात्रि में खिली कोमल चांदनी जीवन के लिये उज्जवल तरंग है बनावटी है सारी खिलखिलाहट,निश्छल तो उस बालक की मुस्कान है बनाये रखो तुम भी स्वयं को अबोध बालक के भांति क्यूंकि ईश्वर के लिये बस मनुष्य बालक के जैसा ही महान है कवि आयुष कुमार गौतम की कलम से"

अपने जीवन के अनुभव अब किससे प्रकट करूं
बहुत तो टूट चुका हूं मैं इससे अधिक क्या विकट करूं
प्रत्येक मनुष्य यहां अपनी समस्याओं से तंग है
हर कोई यहां आर्थिक रूप से अपंग है
मात्र आशायें ही यहां सभी के संग हैं
बरसों से चली आ रही कुछ परम्परायें आज भी प्रसंग हैं
प्रस्तुत तौर तरीके समाज का प्रमुख अंग हैं
चंद्र रात्रि में खिली कोमल चांदनी जीवन के लिये उज्जवल तरंग है
बनावटी है सारी खिलखिलाहट,निश्छल तो उस बालक की मुस्कान है
बनाये रखो तुम भी स्वयं को अबोध बालक के भांति क्यूंकि ईश्वर के लिये बस मनुष्य बालक के जैसा ही महान है

कवि आयुष कुमार गौतम की कलम से

जीवन के अनुभव किससे प्रकट करुं(कवि आयुष कुमार गौतम की कलम से)

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