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रिपुदमन झा 'पिनाकी'
White ज़िन्दगी पूछती है ज़िन्दगी जियोगे कब। स्वाद इस ज़िन्दगी की मौज का चखोगे कब। ऊम्र अपनी बिता रहे हो फंँस के उलझन में - आसमाँ पर उड़ानें सपनों की भरोगे कब। आप खुद से बताओ यार अब मिलोगे कब। क़ैद कर रखा है खुद को जो तुम खुलोगे कब। पालते हो क्यूँ दिल में ग़म उदास रहते हो- रंग जीवन में अपने खुशियों की भरोगे कब। जी रहे हो घुटन में खुल के साँस लोगे कब। दुःख के दुश्मन को हौसलों से मात दोगे कब। कुछ नहीं मिलता है औरों के लिए जीने से- हो चुके सब के बहुत अपने बता होगे कब। रिपुदमन झा 'पिनाकी' धनबाद (झारखण्ड) स्वरचित एवं मौलिक ©रिपुदमन झा 'पिनाकी' #कब
Anuj Ray
Unsplash समस्त नोजोतो परिवार को विश्व हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ©Anuj Ray #विश्व हिंदी दिवस
#विश्व हिंदी दिवस
read moreHarpinder Kaur
जिस भाषा ने हाथ जोड़कर हमें है आदर से झुकना सिखाया उसी भाषा ने विदेशों तक जाकर सनातन का है सार समझाया गजब की है इसकी वर्णमाला अ से अदब,घ से घर,म से ममता,स से संस्कार और ज्ञ से ज्ञान हमें सिखाती है संस्कृत है इसकी जननी उर्दू इसकी बहना है अंग्रेजी भी है अतरंगी पड़ोसन मेरी हिन्दी को उस संग भी रहना है विश्व हिन्दी दिवस 💐 ©Harpinder Kaur # विश्व हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
# विश्व हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
read moreTARUN KUMAR VIMAL
T20 सीरीज का शेड्यूल 22 जनवरी - पहला टी20, कोलकाता 25 जनवरी - दूसरा टी20, चेन्नई 28 जनवरी - तीसरा टी20, राजकोट 31 जनवरी - चौथा टी20, पुणे 2 फरवरी - पांचवां टी20, मुंबई ©TARUN KUMAR VIMAL #T20 सीरीज का शेड्यूल 22 जनवरी - पहला टी20, कोलकाता 25 जनवरी - दूसरा टी20, #चेन्नई 28 जनवरी - तीसरा टी20, #राजकोट
theABHAYSINGH_BIPIN
दुखों का घड़ा सिर पर रख कब तक घूमोगे, जज़्बातों से भरा है दिल तेरा, कब बोलोगे। खुद की बंदिशों में दम अब घुट रहा है मेरा, पड़ी ज़ंजीरों से ख़ुद को कब तक बाँधोगे। वक़्त के साथ बेहिसाब ग़लतियाँ की हैं तुमने, सलाखों के पीछे ख़ुद को कब तक छुपाओगे? जो कभी साथ छांव सा था, वह अब छूट गया, आख़िर खुद से ये जंग कब तक लड़ोगे। लोग माफ़ी देते हैं एक-दूसरे को अक्सर, आख़िर तुम खुद को कब तक सताओगे। रिहाई जुर्म से नहीं मिलती, यह तो मालूम है, आख़िर ग़लतियों पर कब तक पछताओगे। प्रकृति में सूखी डालें भी बहार में पनपती हैं, खुद को सहलाने का वक़्त कब तक टालोगे। वक्त हर नासूर बने ज़ख्मों को भी भरता है, आख़िर ज़ख्मों को भरने से कब तक डरोगे। ©theABHAYSINGH_BIPIN दुखों का घड़ा सिर पर रख कब तक घूमोगे, जज़्बातों से भरा है दिल तेरा, कब बोलोगे। खुद की बंदिशों में दम अब घुट रहा है मेरा, पड़ी ज़ंजीरों से ख़
दुखों का घड़ा सिर पर रख कब तक घूमोगे, जज़्बातों से भरा है दिल तेरा, कब बोलोगे। खुद की बंदिशों में दम अब घुट रहा है मेरा, पड़ी ज़ंजीरों से ख़
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White वक़्त के तराजू पर कब तक तौलते, बुरे वक्त की आहट को कब तक टालते। एहसासों को रखकर हाशिये पर, प्यार से यूँ ही कब तक भागते। हर दर्द के पीछे कोई बात होती है, हर खामोशी में एक आवाज़ होती है। पलकों के साए से कब तक छिपोगे, दिल की पुकार से कब तक बचोगे। प्यार बुरा है, ये बहाना कब तक, खुद से दूरी का फसाना कब तक। वक्त की इस रेत पर नाम लिखो, एक बार प्यार से अपनी राह चुनो। ©theABHAYSINGH_BIPIN #love_shayari वक़्त के तराजू पर कब तक तौलते, बुरे वक्त की आहट को कब तक टालते। एहसासों को रखकर हाशिये पर, प्यार से यूँ ही कब तक भागते। हर
#love_shayari वक़्त के तराजू पर कब तक तौलते, बुरे वक्त की आहट को कब तक टालते। एहसासों को रखकर हाशिये पर, प्यार से यूँ ही कब तक भागते। हर
read moreParul Sharma
tea quotes अक्सर हम कप उठा लेते हैं चाय खत्म होने के बाद भी ये ज़िन्दगी उम्मीद का वो प्याला है ©Parul Sharma #जिंदगी #चाय #प्याला #कप #उम्मीद #त्रिवेणीलेखन
Parasram Arora
Unsplash मेरी बिगड़ेल चाहतो से मुझे राहत मिलेगी कब? मेरे शरारती स्वार्थी तत्व आखिर कब समझ पायगे जीवन का यथार्थ? मेरा मौन चिल्लाना चाहता है युगो से आखिर उनकी आवाज़ मै सुन पाऊंगा कब? ©Parasram Arora कब?
कब?
read moreF M POETRY
इस तरह से मेरे दिल में सुकूँन भरती है... एक कप चाय दिसंबर को जून करती है... यूसुफ़ आर खान... ©F M POETRY #एक कप चाये....
#एक कप चाये....
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