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Harsh Modiya

Jay

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Sujeet Kumar Jha

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सफ़रनामा यादों का

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Subhash Singh

Bhavesh Rawal

नमस्ते में भारत हूं और आज देशवासियों से चंद बाते करने आया हु।
आज १५,अगस्त है। में आज ही के दिन अंग्रेजो से आजाद हुआ था।तब से लेकर आज तक इसी दिन को आजादी का पर्व मनाया जाता है। लोग झंडे खरीदते है,उसे सलामी देते है और बाद में दूसरे दिन वही त्रिरंगा कचरे के डब्बे में पाया जाता है।चलो कुछ बात आपसे करना चाहता हु मैं भी क्या भावनाओ में बह गया।
मुझे आजाद कराने में लाखोने कुरबानी दी,लाखो लोग जेल भी गए थे।
में जब गुलामी में था तब सब लोग भारतीय थे सब गुलामी में भी गर्वित थे मुजपे।
सब मुझे बोहोत प्यार करते थे,मेरे लिए सर भी कटा लेते थे।
सब के दिलमे एक ही बात थी आजादी बस।
अंग्रेजो की गुलामी का कलंक मिटाना था पर यह इतना आसान भी नहीं था।
बच्चे से लेकर वृद्ध आदमी तक सब मेरे लिए लड़ रहे थे।
नवयुवान फांसी पे चढ़ गए ,कई तो तोप पे बांधे गए बोलो।
कइयों को तो कालापानी की सजा हुई और कइयों पे गोलीबार किए गए।
औरते अपने बच्चो को पीछे बांध के भी लडी।
इतना जोश इतना जुनून था जिसकी कोई सीमा नहीं थी।
बोहोत खून बहा मेरे बच्चो का,बोहोत जुल्म सहे,बोहोत अत्याचार हुआ,
पर वो टस से मस न हुए।उन्हें मौत पसंद था पर गुलामी का यह धब्बा जरा भी पसंद नही था।
मेरे आजाद भारत के लोगो में तुम्हे आइना दिखाने आया हु।
उतनी पीड़ा मुझे गुलामी में नही हुई जितनी आज आजादी में हो रही है।
कैसे निर्दयी लोग बन गए हो तुम? बस एक दिन की देशभक्ति के बाद पूरे साल अपना कर्तव्य भूल जाते हो।
जब सरकारी दफ्तरों में बैठकर आम जनता को धक्के खिलवाए जाते है तब मेरा रुह कांप उठता है।
जब गरीब का हक छीनकर उसपे अत्याचार किए जाते है तो मुझे वही अंग्रेज याद आते है।
जब छोटी छोटी बच्चियों पे बलात्कार होते है तो मुझे आजाद होने पे घिन आती है।
जब भ्रष्टाचार बढ़ता जाता है और ईमानदार को दबाया जाता है तो मुझे बोहोत घुटन होती है।
अपने स्वार्थ के लिए मेरी संपत्ति को तहस नहस किया जाता है तब मेरा खून खोल उठता है।
जब चंद रुपयों के लिए अपने वोट बिकवाते हो तब मुझे अपने अस्तित्व पे दया आती है।
जब न्याय के लिए धक्के खाते है लोग तो मुझे वो गोरे अंग्रेज याद आते है।
जब अपने ही देश में हिंदी भाषा का मजाक बनाया जाता है तब मुझे फिर से गुलामी का एहसास होता है।
मुझे अफसोस होता है आजादी का।अगर इसी तरह आप दिखावा करना चाहते हो तो मत मनाओ आजादी का पर्व।
मुझे माफ करदो पर जूठी देशभक्ति मत दिखाओ। अपने दिल पे हाथ रखो और बोलो क्या ये ढोंग नही है तो क्या है?
ये सच्चाई है आज की।ये सच्चाई है आजादी की।

©Bhavesh Rawal #India2021

CHANDRAVEER GARG

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Writer Purbali De

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