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परंतु

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13 days ago

|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 9

||श्री हरिः||
6 - भगवत्प्राप्ति

'मनुष्य जीवन मिला ही भगवान को पाने के लिए है। संसार भोग तो दूसरी योनियों में भी मिल सकते हैं। मनुष्य में भोगों को भोगने की उतनी शक्ति नहीं, जितनी दूसरे प्राणियों में है।' वक्ता की वाणी में शक्ति थी। उनकी बातें शास्त्रसंगत थी, तर्कसम्मत थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि उनका व्यक्तित्व ऐसा था जो उनके प्रत्येक शब्द को सजीव बनाये दे रहा था। 'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।भगवत्प्राप्ति हो गई तो जीवन सफल हुआ और न हुई तो महान हानि हुई।'

प्रवचन समाप्त हुआ। लोगों ने हाथ जोड़े, सिर झुकाया और एक-एक करके जाने लगे। सबको अपने-अपने काम हैं और वे आवश्यक हैं। यही क्या कम है जो वे प्रतिदिन एक घंटे भगवच्चर्चा भी सुनने आ बैठते हैं। परंतु अवधेश अभी युवक था, भावुक था। उसे पता नहीं था कि कथा पल्लाझाड़ भी सुनी जाती है। वह प्रवचन में आज आया था और उसका हृदय एक ही दिन के प्रवचन ने झकझोर दिया था।

सब लोगों के चले जाने के बाद उसने वक्ता से कहा - 'मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है, उपाय बतलाइये।' वक्ता बोले - 'बस, भगवान् को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होनी चाहिए, फिर घर के सारे काम भगवान की पूजा बन जाएंगे।' उसने कहा - 'महाराज! घर में रहकर भजन नहीं हो सकता। आप मुझे स्नेहवश रोक रहे हैं, पर मैं नहीं रुकूंगा।' इतना कहकर वक्ता को कुछ भी उत्तर देने का अवसर दिए बिना ही युवक तुरंत चल दिया।

'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।' सात्विक कुल में जन्म हुआ था। पिता ने बचपन से स्त्रोतपाठादि के संस्कार दिये थे। यज्ञोपवीत होते ही त्रिकाल-संध्या प्रारंभ हो गई, भले पिता के भय से प्रारंभ हुई हो। ब्राह्मण के बालक को संस्कृत पढ़ना चाहिए, पिता के इस निर्णय के कारण कालेज की वायु लग नहीं सकी। इस प्रकार सात्विक क्षेत्र प्रस्तुत था। आज के प्रवचन ने उसमें बीज वपन कर दिया। अवधेश को आज न भोजन रुचा, न अध्ययन में मन लगा। उसे सबसे बड़ी चिंता थी - उसका विवाह होने वाला है। सब बातें निश्चित हो चुकी हैं। तिलक चढ़ चुका है। अब वह अस्वीकार करे भी तो कैसे और - भगवान को पाना है, इस बंधन में पड़े तो पता नहीं क्या होगा।

दिन बीता, रात्रि आयी। पिता ने, माता ने तथा अन्य कई ने कई बार टोका - 'अवधेश! आज तुम खिन्न कैसे हो?' परंतु वह, किससे क्या कहे। रात्रि में कहीं चिंतातुर को निद्रा आती है। अंत में जब सारा संसार घोर निद्रा में सो रहा था, अवधेश उठा। उसने माता-पिता के चरणों में दूर से प्रणाम किया। नेत्रों में अश्रु थे, किंतु घर से वह निकल गया।

'अवधेश का स्वास्थ्य कैसा है?' प्रातः जब पुत्र नित्य की भांति प्रणाम करने नहीं आया, तब पिता को चिंता हुई।

'वह रात को बाहर नहीं सोया था?' माता व्याकुल हुई। उन्होंने तो समझा था कि अधिक गर्मी के कारण वह बाहर पिता के समीप सोया होगा।

पुत्र का मोह - कहीं वह स्वस्थ, सुंदर, सुशील और गुणवान हो, मोह तो माता-पिता को कुरूप, क्षुद्र, दुर्व्यसनी पुत्र का भी होता है। विद्या-विनय सम्पन्न युवक पुत्र जिसका चला जाये, उस माता-पिता की व्यथा का वर्णन कैसे किया जाय। केवल एक पत्र मिला था - 'इस कुपुत्र को क्षमा कर दें! आशिर्वाद दें कि इसी जीवन में भगवत्प्राप्ति कर सकूँ।'
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'आपने यहां अग्नि क्यों जलायी?' वन का रक्षक रुष्ट था - 'एक चिंगारी यहां सारे वन को भस्म कर सकती है।'

'रात्रि में वन पशु न आवें इसलिए!' अवधेश - अनुभवहीन युवक, वह सीधे चित्रकूट गया और वहां से आगे वन में चला गया। उसे क्या पता था कि पहले ही प्रातः काल उसे डांट सुननी पड़ेगी। अत्यंत नम्रतापूर्वक कहा उसने - 'मैं सावधानी से अग्नि बुझा दूंगा।'

'बिना आज्ञा के यहाँ अग्नि जलाना अपराध है।' वन के रक्षक ने थोड़ी देर में ही अवधेश को बता दिया कि भारत के सब वन सरकारी वन-विभाग द्वारा रक्षित हैं। वहां अग्नि जलाने की अनुमति नहीं है। वहाँ के फल-कंद सरकारी सम्पत्ति हैं और बेचे जाते हैं। वन से बिना अनुमति कुछ लकड़ियां लेना भी चोरी है।

'हे भगवान!' बड़ा निराश हुआ अवधेश। वन में आकर उसने देखा था कि उसे केवल जंगली बेर और जंगली भिंडी मिल सकती है। वह समझ गया था कि ये भी कुछ ही दिन मिलेंगे, किंतु वैराग्य नवीन था। वह पत्ते खाकर जीवन व्यतीत करने को उद्यत था, परंतु वन में तो रहने के लिए भी अनुमति आवश्यक है। आज कहीं तपोवन नहीं है।

'आप मुझे क्षमा करें। मैं आज ही चला जाऊँगा।' वन-रक्षक से उसने प्रार्थना की। वैसे भी जंगली भिंडी और जंगली बेर के फल के आहार ने उसे एक ही दिन में अस्वस्थ बना दिया था। उसके पेट और मस्तक में तीव्र पीड़ा थी। लगता था कि उसे ज्वर आने वाला है।

'आप मेरे यहाँ चलें।' वन-रक्षक को इस युवक पर दया आ रही थी। यह भोला बालक तपस्या करने आया था - कहीं यह तपस्या का युग है। 'आज मेरी झोपड़ी को पवित्र करें।'

अवधेश अस्वीकार नहीं कर सका। उनका शरीर किसी की सहायता चाहता था। उनके लिए अकेले पैदल वन से चित्रकूट बस्ती तक जाना आज सम्भव नहीं रह गया था। 'यदि ज्वर रुक गया - कौन कह सकता है कि वह नहीं रुकेगा।' अवधेश तो कल्पना से ही घबरा गया। उसने सोचा ही नहीं था कि वन में जाकर वह बीमार भी पड़ सकता है।
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'आप मुझे अपनी शरण में ले लें।' बढ़े केश, फटी-सी धोती, एक कई स्थानों से पिचका लोटा - युवक गौरवर्ण है, बड़े-बड़े नेत्र हैं, किंतु अत्यंत दुर्बल है। सम्भ्रांत कुल का होने पर भी लगता है कि निराश्रित हो रहा है। उसने महात्मा के चरण पकड़ लिये और उनपर मस्तक रखकर फूट-फूटकर रोने लगा।

'मुझे और सारे विश्व को जो सदा शरण में रखता है, वही तुम्हें भी शरण में रख सकता है।' ये महात्माजी प्रज्ञाचक्षु हैं। गंगाजी में नौका पर ही रहते हैं। काशी के बड़े से बड़े विद्वान भी बड़ी श्रद्धा से नाम लेते हैं इनका। इन्होंने युवक को पहचाना या नहीं, पता नहीं किंतु आश्वासन दिया - 'तुम पहले गंगा स्नान करो और भगवत्प्रसाद लो। फिर तुम्हारी बात सुनूंगा।'

'आप मुझे अपना लें। मेरा जीवन व्यर्थ नष्ट हो रहा है।' युवक फूट-फूटकर रो रहा था - 'मुझे नहीं सूझता कि मुझे कैसे भगवत्प्राप्ति होगी।'

'तुम पहले स्नान-भोजन करो।' महात्मा ने बड़े स्नेह से युवक की पीठ पर हाथ फेरा - 'जो भगवान को पाना चाहता है, भगवान स्वयं उसे पाना चाहते हैं। वह तो भगवान को पायेगा ही।'

युवक ने स्नान किया और थोड़ा सा प्रसाद शीघ्रतापूर्वक मुख में डाल कर गंगाजल पी लिया। उसे भोजन-स्नान की नहीं पड़ी थी। वैराग्य सच्चा था और लगन में प्राण थे। वह कुछ मिनटों में ही महात्माजी के चरणों को पकड़कर उनके समीप बैठ गया।
'पहले तुम यह बताओ कि तुमने अबतक किया क्या?' महात्माजी ने तनिक स्मित के साथ पूछा।

'बडा़ लम्बा पुराण है।' अवधेश - हां, वह युवक अवधेश ही है - यह आपने समझ लिया होगा। उसने अपनी बात प्रारंभ की। उसने बताया कि वह खूब भटका है इधर चार वर्षों में। उसे एक योगी ने नेती, धोती, न्यौली, ब्रह्मदांतौन तथा अन्य अनेक योग की क्रियाएँ करायी। उन क्रियाओं के मध्य ही उसके मस्तक में भयंकर दर्द रहने लगा। बड़ी कठिनाई से एक वृद्ध संत की कृपा से वह दूर हुआ। उन वृद्ध संत ने योग की क्रियाएँ सर्वथा छोड़ देने को कह दिया।

'ये मूर्ख!' महात्माजी कुछ रुष्ट हुए - 'ये योग की कुछ क्रियाएँ सीखकर अपने अधूरे ज्ञान से युवकों का स्वास्थ्य नष्ट करते फिरते हैं। आज कहां है अष्टांग योग के ज्ञाता। यम-नियम की प्रतिष्ठा हुई नहीं जीवन में और चल पड़े आसन तथा मुद्राएँ कराने। असाध्य रोग के अतिरिक्त और क्या मिलता है इस व्यायाम के दूषित प्रयत्न में।'

'मुझे एक ने कान बंद करके शब्द सुनने का उपदेश दिया।' अवधेश ने महात्माजी के चुप हो जाने पर बताया - 'एक कुण्डलिनी योग के आचार्य भी मिले। मुझे घनगर्जन भी सुनाई पड़ा और कुण्डलिनी जागरण के जो लक्षण वे बताते थे, वे भी मुझे अपने में दीखे। नेत्र बंद करके मैं अद्भुत दृश्य देखता था, किंतु मेरा संतोष नहीं हुआ। मुझे भगवान नहीं मिले - मिला एक विचित्र झमेला।'

'अधिकारी के अधिकार को जाने बिना चाहे जिस साधन में उसे जोत दिया जाय - वह पशु तो नहीं है।' महात्माजी ने कहा - 'धारणा, ध्यान, समाधि - चाहे शब्दयोग से हो या लययोग से, किंतु जीवन में चांचल्य बना रहेगा और समाधि कुछ क्रिया मात्र से मिल जायगी, ऐसी दुराशा करनेवालों कहा क्या जाय। जो भगवद्दर्शन चाहता है उसे सिखाया जाता है योग....! भगवान की कृपा है तुम पर। उन्होंने तुम्हें कहीं अटकने नहीं दिया।'

'मैं सम्मान्य धार्मिक अग्रणियों के समीप रहा और विश्रुत आश्रमों में। कुछ प्रख्यात पुरुषों ने भी मुझपर कृपा करनी चाही।' अवधेश में व्यंग्य नहीं, केवल खिन्नता थी - 'जो अपने आश्रम-धर्म का निर्वाह नहीं कर पाते, जहाँ सोने-चाँदी का सेवन और सत्कार है, जो अनेक युक्तियां देकर शिष्यों का धन और शिष्याओं का धर्म अपहरण करने का प्रयत्न करते हैं, वहां परमार्थ और अध्यात्म भी है, यह मेरी बुद्धि ने स्वीकार नहीं किया।'

'कलियुग का प्रभाव - धर्म की आड़ में ही अधर्म पनप रहा है।' महात्माजी में भी खिन्नता आयी - 'जहाँ संग्रह है, विशाल सौध हैं, वहां साधुता कहाँ है। जहाँ सदाचार नहीं, इन्द्रियतृप्ति है, वहाँ से भगवान या आत्मज्ञान बहुत दूर है। परंतु इतनी सीधी बात लोगों की समझ में नहीं आती। सच तो यह है कि हमें कुछ न करना पड़े, कोई आशिर्वाद देकर सब कुछ कर दे, इस लोभ से जो चलेगा वह ठगा तो जायगा ही। आज धन और नारी का धर्म जिनके लिए प्रलोभन हैं, ऐसे वेशधारियों का बाहुल्य इसीलिए है। ऐसे दम्भी लोग सच्चे साधु-महात्माओं का भी नाम बदनाम करते हैं।

'मैं करने को उद्यत हूँ।' अवधेश ने चरणों पर मस्तक रखा - 'मुझे क्या करना है, यह ठीक मार्ग आप बताने की कृपा करें।'

'घर लौटो और माता-पिता को अपनी सेवा से संतुष्ट करो।' महात्माजी ने कहा - 'वे चाहते हैं तो विवाह करो। घर के सारे काम भगवान की पूजा समझकर करो - यही तो उस वक्ता ने तुमसे कहा था।

'देव!' अवधेश रो उठा।

'अच्छा, आज अभी रुको।' महात्माजी कुछ सोचने लगे।
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'ये पुष्प अंजलि में लो और विश्वनाथजी को चढ़ा आओ।' प्रातः स्नान करके जब अवधेश ने महात्माजी के चरणों में मस्तक रखा, तब महात्माजी ने पास रखी पुष्पों की डलिया खींच ली। टटोलकर वे अवधेश की अंजलि में पुष्प देने लगे। बड़े-बड़े सुंदर कमल पुष्प - थोड़े ही पुष्पों से अंजलि पूर्ण हो गई। महात्माजी ने खूब ऊपर तक भर दिये पुष्प।

असीघाट से अंजलि में पुष्प लेकर नौका से उतरना और उसी प्रकार तीन मील दूर विश्वनाथजी आना सरल नहीं है। परंतु अवधेश ने इस कठिनाई की ओर ध्यान नहीं दिया। वह पुष्पों से भरी अंजलि लिए उठा।

'कोई पुष्प गिरा तो नहीं?' महात्माजी ने भरी अंजलि से नौका में पुष्प गिरने का शब्द सुन लिया।

'एक गिर गया।' अवधेश का स्वर ऐसा था जैसे उससे कोई बड़ा अपराध हो गया हो।

'कहाँ गिरा, गंगाजी में?' फिर प्रश्न हुआ।

'नौका में' अवधेश खिन्न होकर बोला - 'मैं सम्भाल नहीं सका।'

'न विश्वनाथ को चढ़ सका, न गंगाजी को।' महात्माजी ने कहा - 'अच्छा, अपनी अंजलि के पुष्प मुझे दे दो।'

अवधेश ने महात्माजी की फैली अंजलि में अपनी अंजलि के पुष्प भर दिये। महात्माजी ने कहा - 'बाबा विश्वनाथ!' और सब पुष्प वहीं नौका में गिरा दिये।

'भैया, ये पुष्प विश्वनाथजी को चढ़ गए?' पूछा महात्माजी ने।

'चढ़ गए भगवन।' अवधेश ने मस्तक झुकाया।

'बच्चे! तू जहाँ है, भगवान तेरे पास ही हैं। वहीं तू उनके श्रीचरणों पर मस्तक रख।' महात्माजी ने अबकी कुछ ऐसी बात कही जो भली प्रकार समझ में नहीं आयी।

'वहां किनारे एक कोढ़ी बैठता है।' साधु होते ही विचित्र हैं। पता नहीं कहां से कहां की बात ले बैठे महात्माजी।
'वह बैठा तो है।' इंगित की गयी दिशा में अवधेश ने देखकर उत्तर दिया।

'देख, वह न नेती-धोती कर सकता, न कान बंद कर सकता और न माला पकड़ सकता।' महात्माजी समझाने लगे - 'वह पढ़ा-लिखा है नहीं, इसलिए ज्ञान की बात क्या जाने। परंतु वह मनुष्य है। मनुष्य जन्म मिलता है भगवत्प्राप्ति के लिए ही। भगवान ने उसे मनुष्य बनाया, इस स्थिति में रखा। इसका अर्थ है कि वह इस स्थिति में भी भगवान को तो पा ही सकता है।'
'निश्चय पा सकता है।' अवधेश ने दृढ़तापूर्वक कहा।

'तब तुम्हें यह क्यों सूझा कि भगवान घर से भागकर वन में ही जानेपर मिलते हैं।' महात्माजी ने हाथ पकड़कर अवधेश को पास बैठाया - 'क्यों समझते हो कि गृहस्थ होकर तुम भगवान से दूर हो जाओगे। जो सब कहीं है, उससे दूर कोई हो कैसे सकता है।'
'मैं आज्ञा पालन करुंगा।' अवधेश ने मस्तक रखा संत के चरणों पर। उसका स्वर कह रहा था कि कुछ और सुनना चाहता है - कोई साधन।

'भगवान साधन से नहीं मिलते।' महात्माजी बोले - 'साधन करके थक जाने पर मिलते हैं। जो जहां थककर पुकारता है - 'प्रभो! अब मैं हार गया, वहीं उसे मिल जाते हैं। या फिर उसे मिलते हैं जो अपने को सर्वथा उनका बनाकर उन्हें अपना मान लेता है।'
'अपना मान लेता है?' अवधेश ने पूछा।

'संसार के सारे संबंध मान लेने के ही तो हैं।' महात्माजी ने कहा - 'कोई लड़की सगाई होते ही तुम्हें पति मान लेगी और तुम उसके पति हो जाओगे। भगवान तो हैं सदा से अपने। उन्हें अपना नहीं जानते, यह भ्रम है। वे तुम्हारे अपने ही तो हैं।'

'वे मेरे हैं - मेरे भगवान।' पता नहीं क्या हुआ अवधेश को। वह वहीं नौका में बैठ गया - बैठा रहा पूरे दिन। लोग कहते हैं - कहते तो महात्माजी भी हैं कि अवधेश को एक क्षण में भगवत्प्राप्ति हो गई थी।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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Rishton ki naajuk door...
काफी समय से अदिति और सौरभ के बीच मनमुटाव चल रहा था. करीब एक महीने से भी ऊपर हो गया था, ठीक से बात भी नहीं हो रही थी. आज झगड़ा खत्म करके दोनों एक दूसरे से माफी मांग चुके थे. इसलिए आदिति बहुत खुश है. परंतु यह खुशी कितनी देर की है यह नहीं कहा जा सकता.
अक्सर अदिति और सौरभ के रिश्ते में तकरार होती रहती है, जोकि हर पति-पत्नी के रिश्ते में होती ही है. लेकिन इनका रिश्ता बहुत उतार-चढ़ाव से गुजरा है और फिर लड़ाइयां तो हर दूसरे दिन का ड्रामा है. कुछ दिन सब सामान्य हो जाता है. चार दिन बाद फिर वही दोहराया जाता है.
अदिति अपने रिश्ते को ले के और अपने पति से बहुत परेशान-हताश सी हो गई थी.

अदिति बैठे-बैठे सोचने लगी,आज ऐसा लग रहा है मानो सर से कोई भारी बोझ हट गया है. आज तो सब ठीक है. दो दिन तो प्यार से रहेंगे... फिर न जाने कल क्या होगा, न जाने कौन सी बात पर यह चिढ़ जाएं और कोई नया ड्रामा शुरू कर दे... फिर तो महीने भर तक मुंह फुला ही रहेगा.

शादी को पांच साल होने को हैं.जो समय पति पत्नी के लिए बहुत ख़ास होता है.. जब वो ये समय एक-दुसरे को समझने,प्यार जताने और अपनी भवनाओ का एहसास दिलाने में बिता देते हैं. लेकिन तब हमने इस कीमती समय को बस इन्हीं लड़ाई-झगड़ों में ही खत्म कर दिया.

पता भी नहीं लगा और शादी के पांच साल गुजर गए. शादी के बाद का समय जिसके लिए हम वर्षों से अरमान सजाते है. चाहत होती है की शादीशुदा ज़िन्दगी में प्यार ही प्यार होगा.. जिसमें हम पति से बहुत ज्यादा उम्मीदें करते हैं. वो एक ऐसा समय होता है, जहां उस वक्त हमारे रिश्ते में प्यार बहुत ज्यादा मायने रखता है... पर मेरी लाइफ में ये प्यार आने से पहले ही खत्म हो गया. मेरी ज़िन्दगी से "प्यार" नाम जैसे खो सा गया है. शादी के बाद प्यार और रोमांस ऐसे शब्द जुबान पे तो दूर जिंदगी में ही नहीं आए कभी ...

क्या प्यार रोमांस वह सब कुछ फिल्मी बातें होती हैं...?
क्या जिंदगी में प्यार सिर्फ जरूरतें पूरी करने तक ही सीमित होता है..??

मैंने अपनी शादी के इन पांच सालों में कभी निष्चिंत हो अपना एक हफ्ता भी नहीं बिताया होगा. हर दूसरे दिन का लड़ाई-झगड़ा और बढ़ते बढ़ते बात गाली-गलौज और मारपीट तक पहुंच जाती है.
लड़ाई झगड़ा तक तो ठीक है वो तो हर रिश्ते में होता है और होना भी जरूरी है लेकिन गाली-गलौज और मारपीट यह में कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती.
बात फिर मेरे स्वाभिमान पे आ जाती है. जब इस तरीके के अपशब्द कोई मुझे बोले भले ही वह गुस्से में हो, परंतु मुझे यह कतई बर्दाश्त नहीं होगा. हाथ उठाना तो कहीं से कहीं तक भी जायज नहीं है. हाथ उठाने का तो किसी को भी कोई हक नहीं है,, और यह सब सहना मेरी फितरत में भी नहीं है. मैं यह सब बर्दाश्त नहीं करूंगी.

मैं उसे बाहर से तो माफ कर सकती हूं पर यह बातें मेरे दिल की गहराई में समा जाती है. मैं चाह कर भी भूल नहीं पाती. मुझे बार-बार वही सब याद आता रहता है. जब भी मैं अकेले में होती हू. मुझे अजीब सी घुटन महसूस होती है. ऐसे शख्स के साथ में अपनी जिंदगी कैसे बिता पाउंगी, जो बात बात पर चिढ़ जाए और हमेशा अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन कर अपनी सारी सीमाएं तोड़ कर दूसरे को जलील करें. वह भी इस हद तक कि वह गाली-गलौज और मारपीट तक पहुंच जाएं.
हर आदमी की एक सीमा होती है कोई समझदार और सभ्य व्यक्ति ऐसा नहीं होता है कि वो इतना उत्तेजित हो जाए कि वह गुस्से में आकर अपनी सीमाएं तोड़ दे... किसी को भी मारने पीटने लगे और यह तभी संभव है जब वो आदमी जाहिल और घटिया सोच रखता हो. किसी और की ज़िन्दगी को भी अपनी जागीर समझने लग जाए. जब मर्जी पटक दो जमीन पे, जब मर्जी झुनझुना पकड़ा के ख़ुश करवा दो..
लेकिन मैं कोई कटपुतली नही हूँ मुझे भी सब समझ आता है बस कुछ कहती नहीं... यह सब हरकतें करने के बावजूद भी सौरव को ये उम्मीद होती है कि मैं उसे माफ कर दूँ. सब कुछ भूल कर रिश्ता फिर पहले जैसा हो जाए. और तो और माफी मांगने का तरीका ये होता है की गाली-गलौज और मारपीट के लिए भी मैंने ही उसे उकसाया था.. अपनी इतनी गंदी और जाहिल गलती का जिम्मेदार भी वह मुझे ठहरा देता है और मैं भी पागल उसकी बातों में आ के भावुक हो जाती हूँ. उन सब बातों को भूल कर आगे के सपने देखने लगतीं हूँ, की अब आगे वो ऐसा नहीं करेगा..
पर वो उसका ब्यक्तित्व है वो मेरी वजह से नहीं खुद अपनी वजह से मजबूर होता है, ये उसकी आदत है जिसे वो बदल नही सकता वो मजबूर है अपनी आदतों से.. लेकिन अपनी गलती को स्वीकारने की हिम्मत उसे तब भी नहीं होती और फिर भी चाहता हैं कि सब सामान्य हो जाये...
सब कुछ पहले जैसा कैसे होगा???
अब सब कुछ सामान्य नहीं हो सकता.....

जब तुम असामान्य व्यवहार करते हो तब तुम यह क्यों नहीं सोचते कि हम सामान्य तरीके से भी यह बात बोल सकते हैं. सामान्य रहते हुए भी कई मुद्दों का हल निकला जा सकता है. प्यार से कही हुई बात मारपीट से कहीं हुई बात से ज्यादा असरदार और स्वीकार्य पूर्ण होती है....

आपने भी देखा होगा जब एक बार डोर टूट जाती है तो उसे जोड़ने के लिए गांठ तो लगानी ही पड़ती है. फिर डोर पहले की जैसी नहीं रहती. बीच में गांठ आ ही जाती है.
यही सब रिश्ते के साथ भी हैं. जितना हम उसे प्यार से सहेजने की कोशिश करते हैं रिश्ता लंबे समय तक टिकता है और माजबूत रहता है.. जितनी खींचातानी करते हैं तो रिश्ते की डोर भी कमजोर पड़ने लगती है और टूट जाती है....
अब इस टूटी हुई डोर को फेंकना है या फिर उसे जोड़ के रखना है यह हमारे ही हाथ में होता है. ज्यादातर हम रिश्ते को जोड़ने की ही कोशिश में रहते हैं.
अगर बार-बार उस रिश्ते की डोर को खींचा जाए तो बार-बार टूटने पर गांठ लगाना भी मुश्किल सा हो जाता है. अंततः रिश्ता खत्म होने की कगार पर पहुंच जाता है.

इसलिए वक्त रहते ही अपने रिश्ते को संभालने में भलाई है. अगर आपने रिश्ता बनाया है तो उसकी कदर करना भी सीखना चाहिए. कैसे रिश्ते में प्यार बड़े आपकी हमेशा यही कोशिश होनी चाहिए. रिश्ते बहुत नसीबों से बनते हैं. उन्हें प्यार से निभाने की शिद्दत होनी चाहिए. समय पर अपने रिश्ते की नाजुक डोर को सहेजना सीख लो नहीं तो रिश्ते की डोर खींचेगी फिर टूट जाएगी और रिश्ता भी बिखरेगा. इससे आपकीं ही नहीं परिवार के कई अन्य लोगों की ज़िंदगिया भी बिखर जाएंगी.
आपकी खुशहाल जिंदगी और परिवार की खुशहाली की पतवार आपके हाथों में है. इस नाव को डूबने ना दे, खुश रहे और खुशहाली लाए...

इसी के साथ मैं आपसे विदा लेती हूं और मिलती हूँ एक नए ब्लाग में तब तक के लिए अलविदा...
अगर आपको ब्लॉग पसंद आया हो तो लाइक करें और कमेंट करके फीडबैक जरूर दीजिए और फॉलो कीजिए मेरे इस ब्लॉग को... धन्यवाद 🙏🙏

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स्त्री तू श्रेष्ठ है...
शादी के बाद एक औरत की जिंदगी क्या चूल्हा चौका तक ही सीमित हो जाती है...??
क्या उसे अपने सपने साकार करने का कोई हक नहीं होता..??
क्या उसने बच्चे अकेले ही पैदा किये होते हैं, जो उनकी परवरिश के लिए सिर्फ मां को ही खड़ा रहना जरूरी होता है..??
अगर उनमे कोई गलत चीज या गलत आदत आ जाए तो उसके लिए भी माँ को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है....
आखिर बहू भी तो एक आम इंसान की तरह ही होती है. जिसका अपना भी एक अस्तित्व होता है. घर परिवार के अलावा बच्चों का ध्यान रखती है परंतु इसका मतलब यह नहीं कि सब उसे रॉबर्ट समझने लगे. हां एक औरत मल्टीटास्किंग जरूर होती है, जोकि उसे बना दिया जाता है. उसे घर, परिवार, बच्चे, बाहर सब कुछ देखना होता है. लेकिन उसे इतना बोझ देने वाला भी तो उसी का परिवार है. परिवार का हर सदस्य अगर थोड़ी कुछ अपनी अपनी जिम्मेदारी ले ले तो उसे भी थोड़ा आराम मिल जाए.
मुझे ऐसा लगता है कि परिवार के सहयोग के साथ अगर काम किया जाए तो वह आसान हो जाता है. परंतु सब यही सोचें कि... वह तो ये सब करती ही है तो अपने आप कर लेगी....!!!
वह कब तक करेगी..???
उसकी भी तो कुछ इच्छाएं हैं. वह आप लोगों के ही काम निपटाती रह जाती है और अपने सारे अरमान व ख्वाबों को अधूरा छोड़ती जाती है. अगर जहां उसने अपने लिए आवाज उठाना शुरू कर दिया तो वह सब की नज़रों में बुरी और गिरी हुई औरत बन जाती है.
यह ऐसा अन्याय क्यों.... मुझे आज समाज से इस बात का जवाब चाहिए कि औरत को एक काम वाली मशीन क्यों समझा जाता है...??
क्यों उसके सपनों को जिम्मेदारियों का बोझ डालकर कुचल दिया जाता है...??
क्यों महिला को पुरुष से कमतर ही आंका जाता है...??
जबकी यहां महिला पुरुष से कंधे से कंधा मिला कर अपना उत्कृष्ट प्रदर्शन दे रही हैं और तो और पुरुषों से आगे ही निकलती जा रही हैं...
फिर भी उसके लक्ष्य में हर जगह परस्थितियों की रुकावटें व जिम्मेदारियों की बाधाएं डाली जाती है. क्या यह परिस्थितियां और जिम्मेदारियां पुरुष के लिए नहीं होती...? या पुरुष में इतनी सामर्थ्य ही नहीं है कि इन जिम्मेदारियों को निभा सके....
इसलिए इसे महिला के सर पर डाल दिया जाता है. क्यूंकि कहीं ना कहीं सभी को पता है की महिला पुरुष से श्रेष्ट्तम तरीके से काम को अंजाम देगी, लेकिन यह कोई स्वीकारना नहीं चाहता.
उसे अपने पौरुषत्व पर इतना घमंड है ही क्यों.. जब वह महिला से बेहतर कुछ कर ही नहीं सकता. वैसे तो समाज बहुत आगे पहुंच गया है. यहां लोगों की मानसिकता काफी हद तक बदल भी चुकी है. परंतु अभी भी कुछ बहुत से अपवाद ऐसे है जिनकी मानसिकता में परिवर्तन लाना अभी भी बाकी है और अनिवार्य भी...
मेरा बस इतना ही पॉइंट है कि महिलाओं को उनका उचित सम्मान मिले, उन्हें भी उनके सपने साकार करने के लिए खुला आसमान मिले...
इसी के साथ मैं अपनी कलम को विराम देती हूं और आपसे विदा लेती हूं. मिलते हैं आपसे एक न्यू ब्लॉग में एक नए टॉपिक के साथ तब तक के लिए बाय... 🙏🙏

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Mere Daayre
शादी के बाद सिया हनीमून पर जाने की तैयारी कर रही थी. पैकिंग में पूरा दिन लग गया. अपनी सारी शादी की शॉपिंग सिया ने अपनी पसंद के अनुसार की थी. अब उन्हें गोवा जाना था. जिसके लिए वह बहुत उत्साहित थी. उसकी रात काटे नहीं कट रही थी. उसके मन में बहुत से रोचक खायाल आ रहे थे, कि गोवा जाएंगे तो वहां घूमेंगे फिरेंगे,नई नई जगह देखेंगे और आनंद उठाएंगे. साथ ही इसी बहाने उन्हें एक दूसरे को अच्छे से जानने का भी मौका मिलेगा और एक दूसरे की पसंद नापसंद का भी उन्हें बहुत अच्छे से अंदाजा आ जाएगा. सुबह होते ही उन्हें निकलना था इसलिए वह सोने की कोशिश करने लगी.
वह शादी के बाद बहुत खुश थी, मानो उसे वह सब कुछ मिल गया हो जिसकी उसे चाहत थी. उनकी अरेंज मैरिज हुई थी. सिया बहुत ही खुले दिमाग की लड़की थी. वो आज के जमाने की आत्मनिर्भर लड़की थी. वह मॉडर्न जरूर थी पर सिर्फ पहनावे से नहीं, अपनी सोच से भी. उसकी खुली सोच और विचारों से वह अपने को स्वतंत्र और संपूर्ण रूप से प्रस्तुत करने में विश्वास रखती थी. मॉडर्न होने का मतलब उसकी नजरों में समाज के अनुसार सोचना नहीं, बल्कि एक औरत को उसके हक़ पता होना था. ताकि वो अपनी सीमाएं खुद तय कर सके और किसी की गुलामी ना करनी पाड़े. जिन भी बातों पर उसका विश्वास था, वह सब आज सच भी हुआ था. उसे अपने पति पर गर्व था. इसी बात की उसे खुशी थी की भले ही वो मुझसे बड़े है, फिर भी वह एक मॉडर्न सोच रखते है. उसकी तरह सोचते है और उसकी सोच की कदर भी करते है. अंदर ही अंदर वो उनका साथ पाकर बहुत सुरक्षित और गौरवान्वित महसूस कर रही थी. उसका पति दीपक उससे थोड़ा बड़ा था, लेकिन उनकी अंडरस्टैंडिंग बहुत अच्छी हो गयी थी. उनकी शादी से पहले सारी चीजें डिसकस हो चुकी थी. सिया को उसमें कोई उम्र का फरक नहीं दिखा. बल्कि वो उसे बहुत अच्छा,समझदार व् समायोज्य इंसान लगा. इसलिए वह अपने से दस साल बड़े लड़के से शादी के लिए राजी हो गई. उसने शादी के लिए ख़ुशी ख़ुशी अपनी अच्छी खासी जॉब भी छोड़ दी थी....

सुबह उठते ही सिया एक नई नवेली दुल्हन की तरह प्यारा सा सूट डालकर और श्रृंगार करके तैयार हो गई. उसने अपने पति को जगाया और साथ में चाय पी. थोड़ी देर बातें करने के बाद वे दोनों तैयार हो गए. घरवालों से विदा ली और गोवा के लिए रवाना हो गए.
गोवा पहुंचते ही सिया बहुत ही रोमांचक हो उठी. उसकी खुशी दुगनी हो रही थी. उसके चेहरे पे एक चमक थी, वह एक अच्छा जीवन साथी मिलने की खुशी थी. अपनी इस खुशी को वह छुपा ना सकी और भावुक हो उठी. उसने अपने पति को गले लगा लिया और अपनी जिंदगी में उसकी इंपॉर्टेंस बताई. उसने दीपक को बताया कि वह कितना खास है उसके लिए, दीपक के आने से उसकी जिंदगी में चार चांद लग गए हैं. उम्र का फरक होने के बाद भी तुम मुझे कितना अच्छे से समझते हो. यह बात उसे बहुत अच्छी लगी थी.
दोनों ने लंच किया फिर अचानक शाम को उनका डिस्क जाने का प्लान बना. सिया खुश तो थी लेकिन भ्रमित भी की अभी क्या पहने... रूम पे पहुंचते ही उसने अपने पति को सरप्राइज देने के लिए वन पीस डाल लिया. उसने एक रेड कलर की लॉन्ग ड्रेस डाली. जिसमें वह बहुत ही ब्यूटीफुल लग रही थी, मानो आसमान से कोई परी उतर आई हो. उसे लगा कि अभी तक उसके पति ने उसे दुल्हन के ही रुप में ही देखा है. क्योंकि शादी के बाद हैवी और ट्रेडिशनल कपड़े ही सिया को डालने पढ़ रहे थे. आज वह अपने असली रूप में आना चाहती थी. जिसे देख के दीपक ज्यादा खुश होंगे. वह खुद को बार-बार शीशे में निहार रही थी. उसे बस इंतजार था तो अपने पति के आने का. वह अभी किसी काम से बाहर ही था.
इतने में ही डोरबेल बजी. वह झटके से उठकर लपक के दरवाजा खोलती है और सामने दीपक होता है. वो उसे देखकर समझ नहीं पाता कि ये क्या है... और देखता रह जाता है. सिया खिल खिला उठती है और उसे हाथ पकड़कर खींचती है.

"क्या हुआ??? मैं ही हूं आपकी सिया, आपकी असली सिया...." सिया बोलती है.

दीपक थोड़ा असहज होते हुए "यह कैसे कपड़े डाले है..? हमें बाहर जाना है न..."

"इसीलिए तो यह डाले हैं डिस्क में सूट थोड़ी ना डालूंगी" सिया मुस्कुराते हुए बोली.

"नहीं यह ठीक नहीं है लग रहा है" दीपक बोलता है.

सिया बोलती है "इसमें क्या ख़राब लग रहा है.. इतनी सिंपल सी लॉन्ग ड्रेस है आपको अच्छी नहीं लगी क्या??"

"इसमें डीप नेक है और ना ही इसमें दुपट्टा मुझे ये आपत्तिजनक लग रहा है.." दीपक सिया को बताता है.

सिया बोली.. "ये तो कुछ भी नहीं इतना तो मैं अपने टॉप्स और सूट में भी डालती हूं. और तो और इसमें ऑल ओवर नेट भी लगा हुआ है. इसमें तो कुछ भी ओड नहीं लग रहा है."

दीपक थोड़ा गुस्से में आते हुए "तुम्हें इन सब की आदत होगी इसलिए ओड नहीं लग रहा है लेकिन मुझे यह सब ठीक नहीं लगता. इसे अभी चेंज करो.."

सिया ड्रेस चेंज करती है. वो दीपक को दूसरी ड्रेसेस भी डाल कर दिखाती है, पर उसे कोई भी वेस्टर्न ड्रेसेस पसंद नहीं आती. सिया के पास वही सब कपड़े थे, जो सारे उसके पति ने रिजेक्ट कर दिए होते हैं. सिया रुवासी हो जाती है और डिस्क का प्लान भी कैंसिल हो जाता है.

वह दीपक से शांत होकर सवाल करती है कि ""शादी से पहले हमारी जो भी बातें हुई थी, तब दीपक ने सिया को जैसी वह है वैसे ही रहने की बात बोली थी. उसने शादी के बाद भी अपनी मर्जी से रहने की बात बोली... तब ये झूटी दिलासा क्यों दी..? तब क्यों नहीं बताया कि शादी के बाद तुम्हें अपनी मर्जी से नहीं रहना है. जब मेरे पहनने ओढ़ने और खाने-पीने के सारे डिसीजन अपने ही लेने है, तो इसमें मेरी मर्जी कहां है..?""

दीपक ने उसे प्यार से समझाया की ""तुम्हे जैसे रहना है तुम रहो. तुम्हे मैं कभी जबरदस्ती नहीं करूंगा. तुम अपनी मर्जी से रहो परंतु मर्जी की भी सीमाएं होती हैं. तुमने मुझसे शादी की है, तो तुम्हारी सीमाएं भी मैं ही तय करूंगा ना.. क्योंकि मैं तुम्हारा पति हूं तुम्हारी जिंदगी पे मेरा भी अधिकार है. तुम्हारे क्या दायरे है, हमारी क्या हैसियत है उसके अनुसार मैं ही तो तुम्हे बताऊंगा की अपने दायरे में रहकर ही तुम अपनी मर्जी करो. अपने दायरे में रहकर ही तुम अपनी इच्छाओं की पूर्ति करो.
तुम्हें जो मन हो करो, मैं तुम्हें कुछ नहीं बोलूंगा पर उसकी एक लिमिट होती है, वह लिमिट मैं तय करूंगा....""

पति की बात सुनकर सिया आवक रह गई. उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि यह वही आदमी है न जिसको मैं समझी थी, जिसको मैं शादी से पहले सारी चीजें डिस्कस कर चुकी थी... जो मुझे इतनी अच्छी तरीके से समझ रहा था. क्या वह मेरे छह महीने का सपना था या इनका रचाया हुआ ढोंग...?? या मैं ही इन्हे अच्छी तरह नहीं समझ पाई थी..??
उसके सारे सपने चकनाचूर हो गए. जो भी उसने ख्वाब देखे थे अधूरे रह गए. जिस बात का गर्व लेकर वह चल रही थी, वही बात झूठी निकली. जिसकी वजह से उसके चेहरे पर चमक थी, वह तो कोई वजह ही ना निकली. उसकी आंखों में अंधेरा सा छा गया. उसके चेहरे की चमक अचानक खोने सी लगी.
वह बैठे बैठे चुपचाप सोचने लगी हमारा समाज चाहे पहनावे से या दिखावे से कितना भी आगे निकल जाए पर सोच वहीं की वहीं रहेगी.
सिया को यहां पर वेस्टर्न ड्रेसेस न पहनने का दुख नहीं था. सिया को दीपक की बातें चुभ सी गयी. उसे उससे ऐसी कोई उम्मीद नहीं थी. सिया अपनी लिमिट्स खुद बना सकती थी. वह खुद तय कर सकती है कि उसे क्या पहनना है क्या नहीं... उसे दुख बस इस बात का था अगर वह यही बात को कुछ अलग ढंग से कहता तो शायद वह बात मान भी जाती लेकिन उसके कहने का लहजा, उसका माइंडसेट वह उसे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा.
मैंने शादी की और वो मेरा पति है, इसका मतलब यह तो नहीं कि मैं अपनी सारी पसंद ना पसंद भी दूसरे के नाम कर दूं. मेरी भी अपनी इच्छाएं हैं, मैं अपनी सारी इच्छाएं क्यों मार दूँ..?
क्या शादी के बाद औरत की अपनी कोई इच्छा नहीं होती...?
अगर उसके पति को नहीं पसंद तो उसे अपने हर वह प्रिय काम छोड़ने होंगे जिन्हे वो पसंद करती है..?
चाहे वह कितनी ही अच्छी चीज करती हो, अगर वह पति की मर्जी के बगैर वह सब करें तो वह बदचलन औरत होगी. पति उनकी सारी सीमाएं तय करेगा. पति जो चाहे वही करना पड़ेगा. पति की गुलाम बनकर रहना ही चरित्रवान औरत की निशानी है...
परंतु पति तो पत्नी की एक भी बात नहीं मानता लेकिन वो बदचलन आदमी कभी नहीं बनता.. क्योंकि समाज में सिर्फ औरतों के ही गुण और दोष देखे जाते हैं.. पुरुषों के सारे दोष छिपा दिए जाते हैं. चाहे वह कितना ही गिरा हुआ इंसान हो, औरत के साथ अन्याय भी करें तो चलेगा क्योकि वो पुरुष है... हद है ऐसी सोच पर..!!

हमारी जिंदगी के दायरे कोई दूसरा क्यों तय करेगा..? एक औरत इस काबिल है की वो अपने दायरे खुद बना सके. जब उसे पूरा घर-परिवार सभालने के लिए जिम्मेदार समझा जाता है, जब वो परिवार के सारे लोगो को सभाल सकती है तो क्या वो खुद को नही सभाल सकती.
अपनी इज्जत चिंता और अपनी परवाह दूसरो से ज्यादा हमें खुद होती है. हमें अच्छे से पता होता है कि हमें क्या करना है और क्या नहीं. अपनी सीमाएं हम खुद तय कर सकते हैं. दूसरा कोई हमें हमारी इच्छा के बगैर गुलाम नहीं बना सकता. किसी को हमारी सीमाएं तय करने का अधिकार नही है, जब तक हम ना चाहे.
यही बात सिया अपने पति को बोलना चाहती थी लेकिन वह नहीं बोल पाई क्योंकि उसे लगा उसका माइंडसेट वही है और वह कभी नहीं बदल सकता. अगर वो बोले भी तो भी नहीं... बस इससे उनका रिश्ता ही खराब होगा और कुछ नहीं. सिया को अपनी इच्छाएं मारनीं होगी और जैसा वह चाहे वैसा ही करना होगा. इसलिए वह बोलते बोलते चुप हो गई. चुपचाप अपने बेड पर जाकर लेट गई.
आज उसने अपने अंदर की सिया को मार दिआ. आज उसे पता लग गया कि शादी के बाद ऐसे ही आगे और न जाने अपनी कितनी इच्छाएं मारने के लिए तैयार होना पड़ेगा. आगे उसे और भी बहुत सारी चीजों का बलिदान करना है. यह तो सिर्फ कपड़ों का था, अभी तो आगे और क्या-क्या उसने देखना है. फिर एक दिन ऐसा भी आएगा जब उसकी अपनी कोई इच्छा ही नहीं होगी. हमेशा पति और बच्चो के लिए ही जियेगी,अन्यथा वो हमेशा के लिए चुप ही रहेगी..
सिया की तरह ऐसी कई महिलाएं हैं, जो अपनी इच्छाओं को मारकर बस अपने रिश्ते की परवाह करते हुए अपनी जिंदगी जीती हैं. रिश्ता निभाना तो ठीक है लेकिन रिश्ते में दूसरे की भावनाओ की जहां कदर ही ना हो तो रिश्ता खुशहाल नही बन सकता. एक प्रेमपूर्ण रिश्ते में दोनों की भावनाओं को देखा जाता है, दोनों की इच्छाओं को रखा जाता ही, तभी रिश्ता लम्बे समय तक चलता है और खुशहाल बना रहता है.
लेकिन यहां सिर्फ पुरुष की ही इच्छाओ को सर्वोपरि रखा जाता है और औरत की इच्छाओं को दबा दिया जाता है.
पति पत्नी दोनों मिलकर अगर कोम्प्रोमाईज़ करते हैं, तो रिश्ता बेहतर बनता है. लेकिन हर बार अगर औरत को ही दबाया जाएगा तो रिश्ता कमजोर होता जाता है. ऐसे रिश्ते में प्रेम तो धीरे धीरे खत्म ही हो जाता है,, बस रिश्ता बना है तो निभाना है इसलिए ही साथ रहना है, ये मजबूरी का रिश्ता बन जाता है.
आखिर कब तक यही सब होगा..??? औरत कब तक यह सब कुछ बर्दाश्त करें... आखिर क्यों??

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आज विवश हूं आज मैं निशब्द हूं आज जीता है या हारा है कैसा यह राजनीति का छलावा है मैंने ना सोचा यहां उनका कभी ऐसा भी यहां मेरे बच्चे लड़ते झगड़ते यहां परंतु बसना बेबस कहीं भूल गए हैं आज मुझे जो अपने मद में गुरुर होकर चल गए मेरी छाती पर और चीर दिया मेरी छाती को परंतु ना कभी मैंने उनसे बोला यह ना लगा पाए मेरा जयकारा

भारत माता की जय #NojotoQuote

 

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