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part2:- "त्याग के लिए प्यार कमजोर पड़ रहा"//tyag ke liye pyar kamjor pad raha.
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2 Love

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"त्याग":- आप सभी अपने संदर्भ के अनुसार त्याग को ले सकते हैं। वास्तव में यह त्याग दो प्रेमियों के बीच का है किंतु कोविड कर परिवेश के संदर्भ में देख सकतें है जहाँ एक ओर डॉक्टर्स और उनके परिवार का निस्वार्थ त्याग है वही दूसरी और असंख्य लोगो का जिन्होंने अपने प्यारे खोय है। उनका भी यह त्याग ही हैं।
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5 Love

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"जाने किसके लिए ये महल खड़े किए हैं... पैसों को दी तवज्जो बाकी सब रिश्ते परे किए हैं... दूर जब वो गया तो पता चला दिल के कितने करीब है ना... बात ये अजीब है ना.... दुनियां जीतने निकला आज खुद से ही हारा हूं... खुद चल रहा हूं बैसाखी पे और दूसरों का मैं सहारा हूं..... मां बाप को ठुकरा...घर को जो स्वर्ग कहलाए..... कैसा वो बदनसीब है ना... बात ये अजीब है ना... भगवान ऐसा क्यों चाहते हैं... किसी की भरी थाली...किसी को भूखा क्यों रखवाते हैं... पूछो तो सब बोलेंगे...अपना अपना नसीब है ना... बात ये अजीब है ना... ©Prince Attri"

जाने किसके लिए ये महल खड़े किए हैं...
पैसों को दी तवज्जो बाकी सब रिश्ते परे किए हैं...
दूर जब वो गया तो पता चला दिल के कितने करीब है ना...
बात ये अजीब है ना....


दुनियां जीतने निकला आज खुद से ही हारा हूं...
खुद चल रहा हूं बैसाखी पे और दूसरों का मैं सहारा हूं.....
मां  बाप को ठुकरा...घर को जो स्वर्ग कहलाए..... कैसा वो बदनसीब है ना...
बात ये अजीब है ना...

भगवान ऐसा क्यों चाहते हैं...
किसी की भरी थाली...किसी को भूखा क्यों रखवाते हैं...
पूछो तो सब बोलेंगे...अपना अपना नसीब है ना...
बात ये अजीब है ना...

©Prince Attri

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10 Love

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"महफिलों में बैठे कुछ गुनगुना रहा था, कि किसी ने पूछा, मैं क्या करता हूं? जवाब जो मिली उसे, लिखने के ऊपर, फिर उसने पूछा मैं क्या लिखता हूं? खड़े -खड़े मैंने सुनाया उन्हें - गर डूब जाऊं गहराई में, बस ख्वाब लिखता हूं। लिखने की है ललक मुझमें, कभी बंदिशें न हो गर, जज्बात लिखता हूं। मिलता जब दर्द मुझे, दर्द -ए -आवाज़ लिखता हूं। गर कोई कह दे कुछ लिखने को, फिर उस शख्स का ऐहसास लिखता हूं। अपनों के बीच में, अपनों का सौगात लिखता हूं। कभी -कभार अपने जीवन का प्यास लिखता हूं। हो गम या जुदाई, साथ -साथ लिखता हूं। पर प्यार भरे नगमें, बार - बार लिखता हूं। सुहाना हो मौसम गर, फिर मौसम-ए-बहार लिखता हूं। गज़ल न सही पर, गीत हर बार लिखता हूं। कोशिशें होती हमारी, लिख लूं जहान सारी, गर कोई मज़ाक भी उड़ाए, फिर भी हर बार लिखता हूं। लिखने की जो है ललक, इसीलिए बार-बार लिखता हूं।। हर बार लिखता हूं।। ©Kundan Kumar"

महफिलों में बैठे कुछ गुनगुना रहा था,
कि किसी ने पूछा, मैं क्या करता हूं?
जवाब जो मिली उसे, लिखने के ऊपर,
फिर उसने पूछा मैं क्या लिखता हूं?

खड़े -खड़े मैंने सुनाया उन्हें -
गर डूब जाऊं गहराई में, बस ख्वाब लिखता हूं।
लिखने की है ललक मुझमें, कभी बंदिशें न हो गर,
जज्बात लिखता हूं।
मिलता जब दर्द मुझे, दर्द -ए -आवाज़ लिखता हूं।
गर कोई कह दे कुछ लिखने को, 
फिर उस शख्स का ऐहसास लिखता हूं।
अपनों के बीच में, अपनों का सौगात लिखता हूं।
कभी -कभार अपने जीवन का प्यास लिखता हूं।
हो गम या जुदाई, साथ -साथ लिखता हूं।
पर प्यार भरे नगमें, बार - बार लिखता हूं।
सुहाना हो मौसम गर, फिर मौसम-ए-बहार लिखता हूं।
गज़ल न सही पर, गीत हर बार लिखता हूं।
कोशिशें होती हमारी, लिख लूं जहान सारी,
गर कोई मज़ाक भी उड़ाए, 
फिर भी हर बार लिखता हूं।
लिखने की जो है ललक,
इसीलिए बार-बार लिखता हूं।।
हर बार लिखता हूं।।

©Kundan Kumar

बार-बार लिखता हूं।।
हर बार लिखता हूं।।

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