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झोपड़ी तो यू बन जाते हैं जनाब
महलो को बनने में समय लग जाते है।।
हौशला तो कुछ करने का हम में भी है,
परंतु पंखों के उड़ान में समय लग जाते है।।
कुछ करने का जुनून तो सब मे है,
परंतु सपने किनार लग जाते है।।
हजार लक्षय में से एक लक्ष्य चुनते ही है,
की उम्र हजार निकल जाते है।।
झोपड़ी तो यू बन जाते है जनाब
महलो को बनने में समय लग जाते है।।
टूटे हौशले से कभी लक्ष्य पा न सके,
नाव सामने खड़ी थी  किनारे जा न सके।।
लक्ष्य चुनने के मेले में हम यू गम हुए
की अपने ही लक्ष्य को नजरअंदाज कर बैठे।।
फिर कहते है कि वो मिला ही नही
खुद से लक्षय को बेकार कर बैठे।।
फिर बेरोजगार हुए घूमते रहे सड़को पर
और अपना दोष सरकार पर लगा बैठे।।
फिर पता चला कि हजार लक्ष्य के पीछे
हार कर सपना नीलम कर बैठे।।
फिर समझा कि महल की सपने देखते देखते
हम झोपड़ी को भी नजरअंदाज कर बैठे।।

हमारा लक्ष्य

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ईश्वर कि अद्भभुत रचना
"किन्नर"

🙏🌹ईश्वर की अद्भभुत रचना "किन्नर"🌹🙏
************************************
ईश्वर ने स्त्री को रचा, कोमलता, सुघड़ता, प्रेम, कला के रंग भरे पर कुछ था जो छूट सा गया...
फ़िर ईश्वर ने पुरुष को रचा, कठोरता, जटिलता, पौरुष भरते हुए कठोर से रंग भरे पर अब नृत्य, संगीत जैसे आयाम पीछे छूट गए.बड़ा परेशान था सृजनहार,
इन विपरीतगामी रंगों को कैसे संग संग लाए...
हाथों में सृजन तूलिका लिए बैठा परेशान था, कि मां अरिष्टा और कश्यप ऋषि ने ब्रह्म के पैर के अंगूठे की छाया में कुछ नवीन रचा.जिसमें पुरुषत्व के गहरे रंग तो थे ही पर, प्रेम और कला का समागम भी था जिसमे,
कोमलता, कठोरता के कठोर आवरण में यूँ छुपी थी
ज्यूँ नारियल पानी को छुपाकर सहेजता है और
जटिलता, सुघड़ता के साथ उसी तरह प्रवाहमान थी
ज्यूँ तीखे मोड़ों पर भी नदी आराम से गुजर जाती है
अहहाआ... यही तो, यही तो ईश्वर अब चित्रपटल पर उकेर रहे थे.और ईश्वर खुशी से नाच उठे.और कहा कि जहां भी मंगल कार्य होंगें वहां यह नवाकृति नृत्य कला के रूप में मेरा आशीर्वाद पहुंचाएगी और उन्होने इस नवीन सृजन को नाम दिया "मंगलामुखी"परंतु.मां अरिष्टा और कश्यप ऋषि चुप से थे, उदास से थे कि, मंगलामुखी प्रजनन क्षमता विहीन कृति थी,अर्थात, स्वप्रतिकृति को जन्म देने की काबिलियत रहित.तो ईश्वर ने मुस्कुरा कर कहा."यह तो प्रकृति के नियमानुकूल ही है" स्त्री व पुरुष के आकर्षण की मुख्य वजह, उन दोनों की अपूर्णता है...
जो उन्हे मिल कर पूर्ण होने को आकर्षित करती है कयुकि नवसृजन, स्त्री व पुरुष दोनों के गुणधर्मों से पूर्ण है, तो यह निश्चित रूप से इस आकर्षण से ऊपर ही होगा,
और जो इस आकर्षण से ऊपर हो, उसकी नियति,
आकर्षण जनित प्रजनन से विहीन अवश्यमभावी होगी...
अतैव किं+नर अर्थात स्त्री+पुरुष के गुणोंयुक्‍त मंगलामुखी, मेरे अर्धनारीश्वर रूप का ही परिलक्षण होगा.अस्तु.परंतु तभी किन्नर बोल पड़ा, हे देव,
मानता हूँ कि मैं आकर्षण की सीमाओं से परे सृजित हुआ हूँ, परंतु इच्छाओं का दास तो मैं भी रहूंगा ही,और आपने मेरे इस सृजन रूप में, विवाह बगैर असंपूर्ण रहने की अग्नि से जलने को श्रापित कर दिया है.तदैव,
इस दुख से किन्नर को परे रखने को, स्वयं अरावन देव ने हर वर्ष एक दिन के लिए, किन्नर से विवाह करने की इजाजत मांगी.और साथ ही कहा, कि हर वर्ष वो एक दिन को सुहागन रहेगा और, विवाह के अगले दिन अरावन देव की मृत्यु के साथ ही, बाकी वर्ष मंगलामुखी के वैधव्य को निर्धारित हुआ.इस वैधव्य की वजह से ही
जो मंगलामुखी, मंगल कार्यों हेतु सृजित हुआ, उसने स्वयं के जीवन के मंगल कार्यों को भी त्याग दिया.इसीलिए आज भी सभी किन्नर,अन्य नवजात के जन्‍म पर मंगल गाकर ईश्वरीय आशीष हमें देते हैं परन्तु, कंही भी नवकिन्नर के जन्म पर रोते हैं और, किन्नर की मृत्यु पर मंगलगान करते हैं मैं जब भी इन्हे देखती हूँ, इक अजीब सी सोच में डूब जाती हूँ, कि आख़िर किस तरह से सृजनहार इन्हे संचालित करता है, कि, इन वैधव्य श्रापित उबलते तेल के दियों के कंठ से सदैव, हर आंगन में,
मंगल-गीतों के रूप में गंगाजल ही प्रवाहित होता रहता है
और, जब जब मैं ऐसे सोचती हूँ, इनके प्रति सदैव पहले से अधिक श्रद्धा से मेरा दिल ❤भर उठता हे...✍

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माॅफी
गलतियाँ हर किसी से होती हैं। जाने-अनजाने क्रोध में आकर हम किसी को कुछ भी बोल देते हैं परंतु फिर जब हमें अपनी गलती का अहसास होता है तब हम 'सॉरी' कहकर सामने वाले को मनाने की कोशिश करते हैं। 
हमें तब ज्यादा दु:ख होता है, जब हमारी गलतियों की पुनरावृत्ति से तंग आकर हमारा कोई अपना हमें छोड़कर चला जाता है। तब बीती बातों को याद करके दु:खी होने के अलावा हमारे पास कोई और रास्ता ही नहीं बचता है। 
कई बार हमारा माफी माँगने का तरीका इतना गलत होता है कि सामने वाले को मनाने में भी हम नाकाम रहते हैं। इस 
आपका बार-बार तर्क देना या बहाने करना सामने वाले का क्रोध और भी अधिक बढ़ाता है। माफी माँगते वक्त दूसरों को सुनना भी बेहद जरूरी होता है। 
धैर्य रखना जरूरी :- 
यदि आपने कोई गलती की है तो आपको धैर्य रखना भी सीखना होगा। आपकी वजह से यदि कोई आहत होता है तो उस वक्त उसे भी अपनी बात कहने दें। यदि आप भी क्रोध में कही गई उसकी बातों को दिल से लगाकर बैठ जाएँगे तथा उससे रिश्ता तोड़ लेंगे तो आपकी कभी सुलह नहीं होगी। यही वह वक्त है जब आपके धैर्य की परीक्षा होती है। 
आई एम सॉरी' कहने के कई तरीके हैं परंतु हमेशा ऐसा तरीका अपनाएँ, जिसमें आप माफी के रूप में अपने दिल की बात सामने वाले से कह सकें। रूठना बहुत आसान है पर रूठे को मनाना बहुत ही मुश्किल। याद रखें इस दुनिया में दोस्त बहुत खुशकिस्मत लोगों को ही मिलते हैं, अत: गलतियाँ करके अपने दोस्त को कभी न खोएँ।

 #NojotoQuote

sorry

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 9

|| श्री हरि: ||
7 - सब में भगवान

'हम कहाँ जा रहे हैं?' सभी के मन में यही प्रश्न था। सभी के मुख सूख गये थे। वे दुर्दान्त, निसर्गतः क्रूर दस्यु, जिन्होंने कभी किसी की करुण प्रार्थना एवं आर्त चीत्कार पर दया नहीं दिखायी, आज़ इस समय बार-बार पुकार रहे थे - 'या खुदा! या अल्ला!'
दस्युपोत था वह। उन्होंने रात्रि के अन्धकार मॅ सौराष्ट्र के एक छोटे ग्राम पर आक्रमण किया। बडी निराशा हुई उन्हें। पता नहीं कैसे उनके आक्रमण का अनुमान ग्रामवासियों ने कर लिया था। पूरा ग्राम जन शुन्य था। भवनों के द्वार खुले पड़े थे। न सामग्री हाथ लगी, न पशु और न मनुष्य ही। अपनी असफलता, कारण दस्यु चिढ़ उठे। बार-बार वे हाथ-पैर पटकते और दांतों से होंठ काटते थे - 'ये काफिर.......' व्यर्थ था उनका रोष।

'कोई बड़ा 'मगर' आ रहा है!' एक दस्यु, जो पोत पर निरीक्षण के लिए था, दौड़ा आया। 'मगर' यह उनका सांकेतिक शब्द था। इसका अर्थ था कि उनके पोत को नष्ट करने में समर्थ कोई युद्धपोत आ रहा है।

'मगर!' दस्युओं में भय फैला। बड़ी-बड़ी काली दाढ़ी, भयंकर नेत्र, वे यमदूत से दस्यु - किंतु जो जितना क्रूर है, उतना ही भीरु होता है। समाचार इतना ही था - 'दूर लहरों में एक बड़ी रोशनी इधर आती लगती थी।' परंतु दस्यु भाग रहे थे।

'फूंक दो ये मकान!' एक ने मशाल उठायी।

'बेवकूफी मत कर।' सरदार ने डाँटा - 'इनकी रोशनी समंदर में दूर तक हम लोगों को रोशन करती रहेगी और जानता नहीं था कि सोरठी मगर कितने खूँखार होते हैं।'

'रणछोड़राय की जय!' दस्यु जब भागे जा रहे थे, ग्राम के बाहर एक झोंपडी में से उन्हें यह ध्वनि सुनायी पड़ी। रात्रि के अन्धकार में यह झोंपड़ी उन्हें दीखी नहीं थी।

'एक केकड़ा ही सही।' दो-चार एक साथ घुस पड़े झोंपड़ी में। केवल एक अधेड़ साधु मिले उनको। साधु की झोंपड़ी में तूंबा-कौपीन छोड़कर ओर होना ही क्या था। दस्युओं ने ठोकर मारकर जल का घड़ा लुढ़का दिया। पटककर तूंबा फोड़ दिया और साधु को घसीट ले चले।

अपने पोत में दस्युओं ने साधु को पटक दिया था। क्रोध के आवेग में और सच कहा जाय तो युद्धपोतके आ धमकने के भय के कारण वे सोच नहीं सके थे कि इस साधु को वे क्यों लिये जा रहे हैं और उसका क्या करेंगे। वे सब-के-सब डाँड़ सम्हाल कर बैठ गये थे। उन्हें यथाशीघ्र युद्धपोत के आने से पूर्व दूर निकल जाना था।

ज़ल-दस्यु समुद्र में मार्ग नहीं भूला करते। परंतु 'आसमानी आफत' का कोई रास्ता उनके पास नहीं था। वे तट से दूर समुंद्र में पहुंचे और तूफान की भयंकर हरहराहट उनके कानों में पड़ी।

'तूफान।' दस्यु इस आफत की कल्पना भी नहीं कर सके थे। समुद्र में तूफान आता तो है; किंतु ऐसे आ पड़ेगा? क्षणों में दस्युपोत नियन्त्रण से बाहर हो गया। पल-पलपर लगता था कि वह अब डूबा, तब डूबा। घोर अंधकार में कुछ सूझता नहीं था। लहरों के थपेड़े - सबके वस्त्र भीग चुके थे। सबके दिल धड़क रहे थे। पोत पता नहीं, किधर लहरों पर उड़ा जा रहा था।

'हम कहाँ हैं?' मुख पर आकर भी यह प्रश्न बाहर नही आता था। इससे भी बडा प्रश्न - 'हम बचेंगे आज?' लेकिन इस अन्धकार में कोई एक दूसरेका मुख तक देख नहीं पाता था।
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'रणछोड़राय की जय!' अरुणोदय के झुटपुटे में दस्युओं ने देखा कि वे जिसे पकड़ लाये हैं, वह भारतीय साधु हिलते-कूदते पोत में एक तख्ते पर तली में शान्त बैठा था। वह इतना स्थिर इतना शान्त था कि पोत में वह है, यह बात ही दस्यु भूल चुके थे। अब वह हिला है और उठकर लहरों से एक चुल्लु पानी लेने की फिराक में है।

'काफिर!' एक दस्यु ने अपना भाला उठाया।

'ठहरो!' सरदार ने रोका उसे। हम उसे फिर जिबह कर सकते हैं। क्या करता है, यह देखने दो।'

'रणछोड़राय की जय!' साधु को इसकी कोई चिंता नहीं जान पड़ती थी कि वह यमदूतों के मध्य में है। पोत अब भी बुरी तरह उछल रहा है, इसकी भी उसे चिंता नहीं थी। उसके मुखपर न भय के चिह्न थे और न खेद के। उसने एक हाथ से पोत का एक किनारा पकड़ लिया था, दूसरे हाथ से उत्ताल तरंगों से एक-एक चुल्लू जल लेकर मुख धो रहा था।

'यह इतना थोडा पानी क्यों पीता है?' साधु को समुंद्र के जल से आचमन करते देख दस्युओं को कुतूहल हुआ।

'समंदर का पानी वह ढ़ेर-सा पी कैसे सकता है।' दूसरे ने समाधान कर लिया अपनी समझ के अनुसार।साधु ने संध्या की और सागर की लहरों से उठते भगवान भास्कर को अर्ध्य अर्पित किया। पोत में खड़े होना सम्भव नहीं था। बैठकर वे प्रार्थना करने लगे - 'विश्वानि देव सवितुर्दुरितानि परासुव......।'

'यह तो इबादत कर रहा है - खुदा की इबादत!' सरदार ने साथियों की ओर देखा।

'काफिर!' दूसरा दस्यु चिढ़ उठा - 'आफताब है इसका खुदा!' और भाला उठाया उसने।

'तुम मेरे सामने हथियार उठाने की जुर्रत करते हो?' सरदार चिढ़ उठा। उसके नेत्र जलने लगे। अपनी भारी तलवार उसने खींची - 'रात को कहाँ था आफताब? वह पूरी रात परस्तिश करता रहा है और कौन जानता है कि खुदा ने उसी की दुआ कुबूल करके हमें बचाया नहीं है।'

'एक काफिर के हक में शमशेर उठाना अच्छा नहीं है।' दूसरे दस्यु भी झगड़े को उद्यत हो गये। 'हम इसे गवारा नहीं कर सकते। भले हमारे सरदार की ही यह हरकत हो।'

'मैं नहीं चाहता कि वह कतल किया जाय है।' सरदार ने स्वर को नरम करके कहा - 'कुल घंटे भर में हम मौत के जजीरे के पास पहुँच रहे हैं। वहाँ इसे उतार देंगे।'

'एक ही बात, काफिर को मारना है। हम रहमदिली से मारते, ज़जीरे के जंगली पत्थरों से मारेंगे।' सरदार के साथी दस्यु खुश हो गये। 'कोई बात नहीं, इसके कबाब पर एक दिन उन्हें दावत उड़ा लेने दिया जाय।'
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महाद्वीप अफ्रीका के समीप का वह घने वनों से आच्छादित द्वीप। जलदस्युओं ने ही नहीं सभी परिचित माझियों ने उसका नाम 'मृत्यु-द्वीप' रख छोडा था। जलपोत उसके तट से दूर ही रहने का प्रयत्न करते थे। उसपर रहने वाले वन्यमानव इतने भयानक थे कि उनका दर्शन न होना ही ठीक। चुटकी बजाते वे बिल में से चीटियों के समान वन में से ढ़ेर-के-ढ़ेर निकल पड़ते हैं। अपनी वृक्ष नौकाएं वे पाँच-सात हाथों पर उठाये दौड़े आते हैं और समुद्र में एक बार उनकी नौका छूट गयी - तट के मीलभर का क्षेत्र तो उनके लिए भूमि पर दौड़ते जैसा क्षेत्र है। उनके अचूक निशाने - उनके हाथ के फेंके भाले लक्ष्य चूकना जानते ही नहीं। आरब्य सुपुष्टकाय, दैत्याकार, दस्यु भी इन कौपीनधारी, कज्जलवर्ण, मोटे होठ और रूखे घुँघराले केशोंवाले वन्यमानवों से दूर ही रहने में कुशल मानते हैं।

दस्युपोत महाद्वीप के पास नहीं गया। उपद्वीप से भी दूर घुमता रहा। वह जैसे कुछ प्रतीक्षा कर रहा था। सहसा उस उपद्वीप की हरियाली में हलचल हुई। कुछ आकृतियाँ रेंगती दिखायी पड़ी और फिर तो चिचियारी का कोलाहल समुद्र की लहरों पर गूंजने लगा।

'जल्दी फैंक दो इसे। वे आ रहे हैं। पास आ गये तो समझो कयामत आ गयी।' दस्यु सरदार ने लहरों के ऊपर दूर तैरती काली-काली नौकाएं देख ली थी। जैसे बड़े-बड़े मगर मुख फाड़े बढे आ रहे हों।

'मेहरबान! अब इन लोगों का मेहमान बनना है जनाब को।' दो दस्युओं ने पकड़कर उठाया साधु को और अट्टहास करके फेंक दिया समुद्र में।

'या खुदा!' सरदार ने सिर पर हाथ दे मारा। कई नोकाएँ एक बडी लहर के पीछे से ऊपर उठ आयी एक साथ। अब उनपर खड़े चीत्कार करते वन्यमानव स्पष्ट देखे जा रहे थे। चिल्लाया सरदार - 'फुर्ती! डांढ उठाओ! मौत दौड़ी आ रही है! मौत!'

एक, दो, चार - पच्चीसों नौकाएं बढी आ रही थीं। पोत इन नौकाओं के समान शीघ्रगामी कैसे हो सकता है और समुद्र अभी शांत हुआ नहीं है। दस्यु प्राण पर खेलकर डांढ चला रहे थे।

'ओह!' सबसे आगे की नौकापर खड़े एक काले पुरुष ने हाथ उठाया। एक भाला 'खप्' करता आकर एक दस्यु के कन्धे में घुस गया। लुढ़क गया दस्यु।

'खप्, खट्, खट्, बराबर भाले दस्युओं पर या पोत पर पड़ने लगे थे। नौकाओं ने उन्हें घेर लिया था।

दस्यु सरदार ने देखा कि अब भागने की चेष्टा करना व्यर्थ है। वह पोत से कूद पड़ा सागर के जल में। इतने वन्यमानवों से युद्धकी तो बात सोचना व्यर्थ है।
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'आप यहाँ कैसे पहुँचे?' सरदार ने आँखें खोली तो देखा कि साधु उसके ऊपर झुके कुछ पूछ रहे थे। परन्तु अभी वह कुछ बोल सके, ऐसी दशा में नहीं था। मस्तक में भयंकर पीडा हो रही थी। तनिक सिर घुमाकर वह उलटी करने लगा। पेट में से समुद्र का पानी निकल जाने पर उसे कुछ शान्ति मिली।

'बहुत थोडी चोट लगी है। सिर चट्टान से टकरा गया लगता है; परन्तु रक्त अब बंद हो गया है। साधु पास बैठे दस्युपति का सिर सहला रहे थे।

'हुजूर की मेहरबानी!' दस्यु अत्यंत दीन स्वर में बोला। उसके नेत्रों से आँसू बह चले - 'मुझे हुजूर माफ कर दें। खुदा के बंदे हैं हुजूर!'

'आप घबराइये मत! मुझे भी लहरों ने आपके ही समान यहाँ किनारे फेंक दिया। अन्तर इतना है किं मुझे चोट नहीं लगी और मैनें समुद्र का पानी नहीं पिया। भगवान सबका मंगल करते हैं।' साधु स्नेहपूर्वक हाथ फेरते रहे - 'धूप तीव्र है आप खिसक सकें तो हमलोग कुछ दूर चलकर छाया में बैठें!'

'हम मौत के जजीरे पर हैं?' दस्यु सरदार उठ बैठा। उसका पुष्ट शरीर - उसकी जीवनी शक्ति इस विपत्ति मेँ इतनी क्षीण नहीं हुई थी कि वह उठ न सके; किन्तु इधर-उधर देखकर वह हतप्रभ हो उठा। 'वह दूर से आवाज आ रही है। वे लोग मेरे साथियों को बाँधकर उनके चारों ओर नाचते-कूदते, चिल्लाते होंगे। वे उन्हें पत्थरों से मारकर समाप्त कर डालेंगे ओर टुकड़े करके उनका कबाब खा जायंगे।'

'मृत्यु दो बार नहीं आती और जब आने को होती है, उससे पहले भी नही आती।' साधु का तत्वज्ञान दस्यु की समझ में आये, इसकी आशा नहीं थी, साधु ने भी इसे झट अनुभव कर लिया। वे प्रसंग बदल कर बोले - मेरे गुरुदेव ने बताया है कि जो सम्मुख आये, उसे भगवदरुप मानो और उसके अनुरूप उसकी सेवा करो। संसार की चिंता में पड़ना तुम्हारा काम नहीं है। आप क्या छाया तक चल सकेगें?'

'आपका हुक्म मानूंगा।' दस्यु को सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ी। वह भी देख रहा था कि अब समुद्र में भागने का कोई मार्ग नहीं और धूप में देर तक बैठा नहीं जा सकता। दोनों में ही दूर तक जाने की शक्ति नहीं थी। तट के सबसे समीप के वृक्ष तक वे जा सके और बैठ गये। लहरों के थपेड़ों ने उनके अंग-अंग चूर कर दिये थे।

'आइये, भगवान!' विपत्ति अकेली नहीं आती। छाया में बैठे आधा घंटे भी नहीं हुआ था कि सामने की झाड़ी में दो नेत्र चमक उठे। साधु से पहले दस्यु की दृष्टि उधर गयी। वह भय से पीला पड़ गया। उसने बिना बोले उधर संकेत किया। परन्तु साधु तो अद्भुत पुरुष है। उसने तो ऐसे बुलाया जैसे किसी सामान्य अतिथि को बुला रहा हो - 'आप संकोचपूर्वक छिप क्यों रहे हैं? पधारिये!'
सचमुच झाड़ी में से सिंह निकला और अपनी स्थिर मन्दगति से आगे बढ़ आया।

'आप विराजें! कोई आसन मेरे पास नहीं है।' साधु ने खड़े होकर दोनों हाथ जोडे 'हम कंगाल कोई भी अभ्यर्थना करने योग्य नहीं, देव!'

सिंह बैठ गया और जब उसके पास साधु बैठ गये, तब अपना मुख उसने उनके पैरों पर रख दिया। एक पालतू कुत्ते के समान अपनी पूंछ वह हिला रहा था और उसके नेत्र अधमुँदे हो चुके थे।

'हुजूर करिश्मा कर सकते है!' दस्यु को आश्चर्य हो रहा था कि एक आदमी इस तरह जंगल में खुंखार शेर का सिर थपथपा सकता है।

'भगवान ने कहा है कि वे पशुओं में सिंह हैं।' साधु का स्वर श्रद्धापूर्ण था।

'हुजूर आफताब की इबादत करते थे और अब शेर को खुदा कह रहे हैं!' दस्यु की समझ में कुछ नहीं आया था; परन्तु उसका भय दूर हो गया था।

'तो आप समझते हैं कि खुदा हर जगह और हर वस्तु में नहीं है?' साधु ने देखा दस्यु की ओर।

'वे आ गये - उनमें भी खुदा.....।' दस्यु का स्वर भय से बंद हो गया। झाड़ियों के पीछे कुछ काली आकृतियां उसने देख ली थी, जो इधर-उधर हिल रही थीं।

पता नहीं क्या हुआ - एक चिचियारी गुंजी और शान्ति फैल गयी। कुछ क्षण ऐसा लगा कि वन्यमानवों का समूह घने वन में, लताओं के पीछे चुपचाप एकत्र हो रहा है और तब तीन-चार सुपुष्ट व्यक्ति धीरे-धीरे एक ओर से बाहर आये।

'आइये भगवान!' साधु ने उनकी ओर देखा और सिंह ने भी सिर उठाकर देखा; किन्तु वे भागें, इससे पूर्व ही सिंह ने मुख साधु के पैरों पर फिर रख लिया।

कुछ पूकार कर कहा उन लोगों ने - एक साथ पूरी भीड़ वन के पीछे से निकल आयी। वन्यमानव भूमि पर लेट कर साधु को प्रणाम करते थे।

'ये कहते हैं कि आप वन के देवता हैं या उनके दूत?' दस्यु ने अधर हिलाकर बिना शब्द किये एक वृद्ध से संकेत की भाषा में बातें प्रारंभ कर दीं।

'देवताओं का आराधक!' साधु का उत्तर सुनकर वे वन्यमानव नृत्य करने लगे। सिंह की उपस्थिति वे भूल ही गये। उन्होने साधु से प्रार्थना की कि वे ग्राम को पधार कर पवित्र करें। वहीं निश्चय हो गया कि दस्युपोत वे साधु को दे देंगे भारत जाने के लिए और दस्यु को तो वे साधु का सेवक ही समझ रहे थे। सचमुच अब दस्यु साधु सेवक हो चुका था।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 9

||श्री हरिः||
6 - भगवत्प्राप्ति

'मनुष्य जीवन मिला ही भगवान को पाने के लिए है। संसार भोग तो दूसरी योनियों में भी मिल सकते हैं। मनुष्य में भोगों को भोगने की उतनी शक्ति नहीं, जितनी दूसरे प्राणियों में है।' वक्ता की वाणी में शक्ति थी। उनकी बातें शास्त्रसंगत थी, तर्कसम्मत थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि उनका व्यक्तित्व ऐसा था जो उनके प्रत्येक शब्द को सजीव बनाये दे रहा था। 'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।भगवत्प्राप्ति हो गई तो जीवन सफल हुआ और न हुई तो महान हानि हुई।'

प्रवचन समाप्त हुआ। लोगों ने हाथ जोड़े, सिर झुकाया और एक-एक करके जाने लगे। सबको अपने-अपने काम हैं और वे आवश्यक हैं। यही क्या कम है जो वे प्रतिदिन एक घंटे भगवच्चर्चा भी सुनने आ बैठते हैं। परंतु अवधेश अभी युवक था, भावुक था। उसे पता नहीं था कि कथा पल्लाझाड़ भी सुनी जाती है। वह प्रवचन में आज आया था और उसका हृदय एक ही दिन के प्रवचन ने झकझोर दिया था।

सब लोगों के चले जाने के बाद उसने वक्ता से कहा - 'मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है, उपाय बतलाइये।' वक्ता बोले - 'बस, भगवान् को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होनी चाहिए, फिर घर के सारे काम भगवान की पूजा बन जाएंगे।' उसने कहा - 'महाराज! घर में रहकर भजन नहीं हो सकता। आप मुझे स्नेहवश रोक रहे हैं, पर मैं नहीं रुकूंगा।' इतना कहकर वक्ता को कुछ भी उत्तर देने का अवसर दिए बिना ही युवक तुरंत चल दिया।

'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।' सात्विक कुल में जन्म हुआ था। पिता ने बचपन से स्त्रोतपाठादि के संस्कार दिये थे। यज्ञोपवीत होते ही त्रिकाल-संध्या प्रारंभ हो गई, भले पिता के भय से प्रारंभ हुई हो। ब्राह्मण के बालक को संस्कृत पढ़ना चाहिए, पिता के इस निर्णय के कारण कालेज की वायु लग नहीं सकी। इस प्रकार सात्विक क्षेत्र प्रस्तुत था। आज के प्रवचन ने उसमें बीज वपन कर दिया। अवधेश को आज न भोजन रुचा, न अध्ययन में मन लगा। उसे सबसे बड़ी चिंता थी - उसका विवाह होने वाला है। सब बातें निश्चित हो चुकी हैं। तिलक चढ़ चुका है। अब वह अस्वीकार करे भी तो कैसे और - भगवान को पाना है, इस बंधन में पड़े तो पता नहीं क्या होगा।

दिन बीता, रात्रि आयी। पिता ने, माता ने तथा अन्य कई ने कई बार टोका - 'अवधेश! आज तुम खिन्न कैसे हो?' परंतु वह, किससे क्या कहे। रात्रि में कहीं चिंतातुर को निद्रा आती है। अंत में जब सारा संसार घोर निद्रा में सो रहा था, अवधेश उठा। उसने माता-पिता के चरणों में दूर से प्रणाम किया। नेत्रों में अश्रु थे, किंतु घर से वह निकल गया।

'अवधेश का स्वास्थ्य कैसा है?' प्रातः जब पुत्र नित्य की भांति प्रणाम करने नहीं आया, तब पिता को चिंता हुई।

'वह रात को बाहर नहीं सोया था?' माता व्याकुल हुई। उन्होंने तो समझा था कि अधिक गर्मी के कारण वह बाहर पिता के समीप सोया होगा।

पुत्र का मोह - कहीं वह स्वस्थ, सुंदर, सुशील और गुणवान हो, मोह तो माता-पिता को कुरूप, क्षुद्र, दुर्व्यसनी पुत्र का भी होता है। विद्या-विनय सम्पन्न युवक पुत्र जिसका चला जाये, उस माता-पिता की व्यथा का वर्णन कैसे किया जाय। केवल एक पत्र मिला था - 'इस कुपुत्र को क्षमा कर दें! आशिर्वाद दें कि इसी जीवन में भगवत्प्राप्ति कर सकूँ।'
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'आपने यहां अग्नि क्यों जलायी?' वन का रक्षक रुष्ट था - 'एक चिंगारी यहां सारे वन को भस्म कर सकती है।'

'रात्रि में वन पशु न आवें इसलिए!' अवधेश - अनुभवहीन युवक, वह सीधे चित्रकूट गया और वहां से आगे वन में चला गया। उसे क्या पता था कि पहले ही प्रातः काल उसे डांट सुननी पड़ेगी। अत्यंत नम्रतापूर्वक कहा उसने - 'मैं सावधानी से अग्नि बुझा दूंगा।'

'बिना आज्ञा के यहाँ अग्नि जलाना अपराध है।' वन के रक्षक ने थोड़ी देर में ही अवधेश को बता दिया कि भारत के सब वन सरकारी वन-विभाग द्वारा रक्षित हैं। वहां अग्नि जलाने की अनुमति नहीं है। वहाँ के फल-कंद सरकारी सम्पत्ति हैं और बेचे जाते हैं। वन से बिना अनुमति कुछ लकड़ियां लेना भी चोरी है।

'हे भगवान!' बड़ा निराश हुआ अवधेश। वन में आकर उसने देखा था कि उसे केवल जंगली बेर और जंगली भिंडी मिल सकती है। वह समझ गया था कि ये भी कुछ ही दिन मिलेंगे, किंतु वैराग्य नवीन था। वह पत्ते खाकर जीवन व्यतीत करने को उद्यत था, परंतु वन में तो रहने के लिए भी अनुमति आवश्यक है। आज कहीं तपोवन नहीं है।

'आप मुझे क्षमा करें। मैं आज ही चला जाऊँगा।' वन-रक्षक से उसने प्रार्थना की। वैसे भी जंगली भिंडी और जंगली बेर के फल के आहार ने उसे एक ही दिन में अस्वस्थ बना दिया था। उसके पेट और मस्तक में तीव्र पीड़ा थी। लगता था कि उसे ज्वर आने वाला है।

'आप मेरे यहाँ चलें।' वन-रक्षक को इस युवक पर दया आ रही थी। यह भोला बालक तपस्या करने आया था - कहीं यह तपस्या का युग है। 'आज मेरी झोपड़ी को पवित्र करें।'

अवधेश अस्वीकार नहीं कर सका। उनका शरीर किसी की सहायता चाहता था। उनके लिए अकेले पैदल वन से चित्रकूट बस्ती तक जाना आज सम्भव नहीं रह गया था। 'यदि ज्वर रुक गया - कौन कह सकता है कि वह नहीं रुकेगा।' अवधेश तो कल्पना से ही घबरा गया। उसने सोचा ही नहीं था कि वन में जाकर वह बीमार भी पड़ सकता है।
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'आप मुझे अपनी शरण में ले लें।' बढ़े केश, फटी-सी धोती, एक कई स्थानों से पिचका लोटा - युवक गौरवर्ण है, बड़े-बड़े नेत्र हैं, किंतु अत्यंत दुर्बल है। सम्भ्रांत कुल का होने पर भी लगता है कि निराश्रित हो रहा है। उसने महात्मा के चरण पकड़ लिये और उनपर मस्तक रखकर फूट-फूटकर रोने लगा।

'मुझे और सारे विश्व को जो सदा शरण में रखता है, वही तुम्हें भी शरण में रख सकता है।' ये महात्माजी प्रज्ञाचक्षु हैं। गंगाजी में नौका पर ही रहते हैं। काशी के बड़े से बड़े विद्वान भी बड़ी श्रद्धा से नाम लेते हैं इनका। इन्होंने युवक को पहचाना या नहीं, पता नहीं किंतु आश्वासन दिया - 'तुम पहले गंगा स्नान करो और भगवत्प्रसाद लो। फिर तुम्हारी बात सुनूंगा।'

'आप मुझे अपना लें। मेरा जीवन व्यर्थ नष्ट हो रहा है।' युवक फूट-फूटकर रो रहा था - 'मुझे नहीं सूझता कि मुझे कैसे भगवत्प्राप्ति होगी।'

'तुम पहले स्नान-भोजन करो।' महात्मा ने बड़े स्नेह से युवक की पीठ पर हाथ फेरा - 'जो भगवान को पाना चाहता है, भगवान स्वयं उसे पाना चाहते हैं। वह तो भगवान को पायेगा ही।'

युवक ने स्नान किया और थोड़ा सा प्रसाद शीघ्रतापूर्वक मुख में डाल कर गंगाजल पी लिया। उसे भोजन-स्नान की नहीं पड़ी थी। वैराग्य सच्चा था और लगन में प्राण थे। वह कुछ मिनटों में ही महात्माजी के चरणों को पकड़कर उनके समीप बैठ गया।
'पहले तुम यह बताओ कि तुमने अबतक किया क्या?' महात्माजी ने तनिक स्मित के साथ पूछा।

'बडा़ लम्बा पुराण है।' अवधेश - हां, वह युवक अवधेश ही है - यह आपने समझ लिया होगा। उसने अपनी बात प्रारंभ की। उसने बताया कि वह खूब भटका है इधर चार वर्षों में। उसे एक योगी ने नेती, धोती, न्यौली, ब्रह्मदांतौन तथा अन्य अनेक योग की क्रियाएँ करायी। उन क्रियाओं के मध्य ही उसके मस्तक में भयंकर दर्द रहने लगा। बड़ी कठिनाई से एक वृद्ध संत की कृपा से वह दूर हुआ। उन वृद्ध संत ने योग की क्रियाएँ सर्वथा छोड़ देने को कह दिया।

'ये मूर्ख!' महात्माजी कुछ रुष्ट हुए - 'ये योग की कुछ क्रियाएँ सीखकर अपने अधूरे ज्ञान से युवकों का स्वास्थ्य नष्ट करते फिरते हैं। आज कहां है अष्टांग योग के ज्ञाता। यम-नियम की प्रतिष्ठा हुई नहीं जीवन में और चल पड़े आसन तथा मुद्राएँ कराने। असाध्य रोग के अतिरिक्त और क्या मिलता है इस व्यायाम के दूषित प्रयत्न में।'

'मुझे एक ने कान बंद करके शब्द सुनने का उपदेश दिया।' अवधेश ने महात्माजी के चुप हो जाने पर बताया - 'एक कुण्डलिनी योग के आचार्य भी मिले। मुझे घनगर्जन भी सुनाई पड़ा और कुण्डलिनी जागरण के जो लक्षण वे बताते थे, वे भी मुझे अपने में दीखे। नेत्र बंद करके मैं अद्भुत दृश्य देखता था, किंतु मेरा संतोष नहीं हुआ। मुझे भगवान नहीं मिले - मिला एक विचित्र झमेला।'

'अधिकारी के अधिकार को जाने बिना चाहे जिस साधन में उसे जोत दिया जाय - वह पशु तो नहीं है।' महात्माजी ने कहा - 'धारणा, ध्यान, समाधि - चाहे शब्दयोग से हो या लययोग से, किंतु जीवन में चांचल्य बना रहेगा और समाधि कुछ क्रिया मात्र से मिल जायगी, ऐसी दुराशा करनेवालों कहा क्या जाय। जो भगवद्दर्शन चाहता है उसे सिखाया जाता है योग....! भगवान की कृपा है तुम पर। उन्होंने तुम्हें कहीं अटकने नहीं दिया।'

'मैं सम्मान्य धार्मिक अग्रणियों के समीप रहा और विश्रुत आश्रमों में। कुछ प्रख्यात पुरुषों ने भी मुझपर कृपा करनी चाही।' अवधेश में व्यंग्य नहीं, केवल खिन्नता थी - 'जो अपने आश्रम-धर्म का निर्वाह नहीं कर पाते, जहाँ सोने-चाँदी का सेवन और सत्कार है, जो अनेक युक्तियां देकर शिष्यों का धन और शिष्याओं का धर्म अपहरण करने का प्रयत्न करते हैं, वहां परमार्थ और अध्यात्म भी है, यह मेरी बुद्धि ने स्वीकार नहीं किया।'

'कलियुग का प्रभाव - धर्म की आड़ में ही अधर्म पनप रहा है।' महात्माजी में भी खिन्नता आयी - 'जहाँ संग्रह है, विशाल सौध हैं, वहां साधुता कहाँ है। जहाँ सदाचार नहीं, इन्द्रियतृप्ति है, वहाँ से भगवान या आत्मज्ञान बहुत दूर है। परंतु इतनी सीधी बात लोगों की समझ में नहीं आती। सच तो यह है कि हमें कुछ न करना पड़े, कोई आशिर्वाद देकर सब कुछ कर दे, इस लोभ से जो चलेगा वह ठगा तो जायगा ही। आज धन और नारी का धर्म जिनके लिए प्रलोभन हैं, ऐसे वेशधारियों का बाहुल्य इसीलिए है। ऐसे दम्भी लोग सच्चे साधु-महात्माओं का भी नाम बदनाम करते हैं।

'मैं करने को उद्यत हूँ।' अवधेश ने चरणों पर मस्तक रखा - 'मुझे क्या करना है, यह ठीक मार्ग आप बताने की कृपा करें।'

'घर लौटो और माता-पिता को अपनी सेवा से संतुष्ट करो।' महात्माजी ने कहा - 'वे चाहते हैं तो विवाह करो। घर के सारे काम भगवान की पूजा समझकर करो - यही तो उस वक्ता ने तुमसे कहा था।

'देव!' अवधेश रो उठा।

'अच्छा, आज अभी रुको।' महात्माजी कुछ सोचने लगे।
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'ये पुष्प अंजलि में लो और विश्वनाथजी को चढ़ा आओ।' प्रातः स्नान करके जब अवधेश ने महात्माजी के चरणों में मस्तक रखा, तब महात्माजी ने पास रखी पुष्पों की डलिया खींच ली। टटोलकर वे अवधेश की अंजलि में पुष्प देने लगे। बड़े-बड़े सुंदर कमल पुष्प - थोड़े ही पुष्पों से अंजलि पूर्ण हो गई। महात्माजी ने खूब ऊपर तक भर दिये पुष्प।

असीघाट से अंजलि में पुष्प लेकर नौका से उतरना और उसी प्रकार तीन मील दूर विश्वनाथजी आना सरल नहीं है। परंतु अवधेश ने इस कठिनाई की ओर ध्यान नहीं दिया। वह पुष्पों से भरी अंजलि लिए उठा।

'कोई पुष्प गिरा तो नहीं?' महात्माजी ने भरी अंजलि से नौका में पुष्प गिरने का शब्द सुन लिया।

'एक गिर गया।' अवधेश का स्वर ऐसा था जैसे उससे कोई बड़ा अपराध हो गया हो।

'कहाँ गिरा, गंगाजी में?' फिर प्रश्न हुआ।

'नौका में' अवधेश खिन्न होकर बोला - 'मैं सम्भाल नहीं सका।'

'न विश्वनाथ को चढ़ सका, न गंगाजी को।' महात्माजी ने कहा - 'अच्छा, अपनी अंजलि के पुष्प मुझे दे दो।'

अवधेश ने महात्माजी की फैली अंजलि में अपनी अंजलि के पुष्प भर दिये। महात्माजी ने कहा - 'बाबा विश्वनाथ!' और सब पुष्प वहीं नौका में गिरा दिये।

'भैया, ये पुष्प विश्वनाथजी को चढ़ गए?' पूछा महात्माजी ने।

'चढ़ गए भगवन।' अवधेश ने मस्तक झुकाया।

'बच्चे! तू जहाँ है, भगवान तेरे पास ही हैं। वहीं तू उनके श्रीचरणों पर मस्तक रख।' महात्माजी ने अबकी कुछ ऐसी बात कही जो भली प्रकार समझ में नहीं आयी।

'वहां किनारे एक कोढ़ी बैठता है।' साधु होते ही विचित्र हैं। पता नहीं कहां से कहां की बात ले बैठे महात्माजी।
'वह बैठा तो है।' इंगित की गयी दिशा में अवधेश ने देखकर उत्तर दिया।

'देख, वह न नेती-धोती कर सकता, न कान बंद कर सकता और न माला पकड़ सकता।' महात्माजी समझाने लगे - 'वह पढ़ा-लिखा है नहीं, इसलिए ज्ञान की बात क्या जाने। परंतु वह मनुष्य है। मनुष्य जन्म मिलता है भगवत्प्राप्ति के लिए ही। भगवान ने उसे मनुष्य बनाया, इस स्थिति में रखा। इसका अर्थ है कि वह इस स्थिति में भी भगवान को तो पा ही सकता है।'
'निश्चय पा सकता है।' अवधेश ने दृढ़तापूर्वक कहा।

'तब तुम्हें यह क्यों सूझा कि भगवान घर से भागकर वन में ही जानेपर मिलते हैं।' महात्माजी ने हाथ पकड़कर अवधेश को पास बैठाया - 'क्यों समझते हो कि गृहस्थ होकर तुम भगवान से दूर हो जाओगे। जो सब कहीं है, उससे दूर कोई हो कैसे सकता है।'
'मैं आज्ञा पालन करुंगा।' अवधेश ने मस्तक रखा संत के चरणों पर। उसका स्वर कह रहा था कि कुछ और सुनना चाहता है - कोई साधन।

'भगवान साधन से नहीं मिलते।' महात्माजी बोले - 'साधन करके थक जाने पर मिलते हैं। जो जहां थककर पुकारता है - 'प्रभो! अब मैं हार गया, वहीं उसे मिल जाते हैं। या फिर उसे मिलते हैं जो अपने को सर्वथा उनका बनाकर उन्हें अपना मान लेता है।'
'अपना मान लेता है?' अवधेश ने पूछा।

'संसार के सारे संबंध मान लेने के ही तो हैं।' महात्माजी ने कहा - 'कोई लड़की सगाई होते ही तुम्हें पति मान लेगी और तुम उसके पति हो जाओगे। भगवान तो हैं सदा से अपने। उन्हें अपना नहीं जानते, यह भ्रम है। वे तुम्हारे अपने ही तो हैं।'

'वे मेरे हैं - मेरे भगवान।' पता नहीं क्या हुआ अवधेश को। वह वहीं नौका में बैठ गया - बैठा रहा पूरे दिन। लोग कहते हैं - कहते तो महात्माजी भी हैं कि अवधेश को एक क्षण में भगवत्प्राप्ति हो गई थी।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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