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युवक

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Best Quotes चौराहे पे एक मुस्लिम युवक को पीटा जा रहा था. पीटने वाले दर्जन भर लोग खुद को गौ-रक्षक बता रहे थे और पिटने वाले पे गौ-हत्या का आरोप था. भीड़ धार्मिक कट्टरता से चमचमता हुआ राष्ट्रवाद का चश्मा पहन तमाशा देख रही थी. धर्म आधारित घृणा भीड़ के अंदर भी इस तरह घर कर गयी थी कि वहाँ तमाशा देख रहा हर व्यक्ति यही मान रहा था कि गौ-हत्यारों का यही हश्र होना चाहिए.  
मार खाने वाला युवक हाथ ते थे और पिटने वाला युवक जिसको सब गौ-हत्यारा समझ रहे थे , एक “पशु-चिकत्सक” था जिसने बहुत सी गायों का इलाज भी किया था. अन्य जानवरों के साथ साथ उसने कई बार बहुत सी गायों को भी बचाया था. 
जब भीड़ ने राष्ट्रवाद का चश्मा उतारा तो उन्हें रक्षक और भक्षक का फ़र्क भी धुँधला धुँधला दिखाई देने लगा. जाते जाते उनके चश्मों से धार्मिक कजोड़े, जान की भीख माँगता हुआ अपनी सफाई में कुछ कह भी रहा था मगर उसका बोला हर शब्द मारने वालों की गालियों, नारों और "गाय हमारी माता"  के शोर में खो सा गया.  थोड़ी देर में पुलिस आई, पूछताछ की और सबका पहचान पत्र देखा. पूछताछ करने पे मालूम हुआ  कि पीटने वालों में से पाँच “गौ-रक्षक” किसी कसाई-खाने में काम करट्टरता की चमक भी कम होती गयी. वापस जाते हुए भीड़ अपने साथ एक सबक और एक सवाल घर ले गयी . सबक यह कि हर हिंदू गौ-रक्षक नहीं होता,हर मुस्लिम गौ-हत्यारा नहीं होता. सवाल ये कि "असली गौ-रक्षक कौन??"

#RIPAkbarKhan #StopMobLynching

#MobLynching #AkbarKhan

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श्री हरिः
14 - कर्मण्येवाधिकारस्ते
'हमारा काम बहुत र्शीघ्र प्रगति करेगा।' बात यह है की कार्यारम्भ में ही आशा से अधिक सफलता मिली थी और इस सफलता ने श्री बद्रीप्रसादजी को उल्लसित कर दिया था।

'ग्राम-संगठन की ओर कोई ध्यान नहीं देता।' आज से एक सप्ताह पूर्व बद्रीप्रसादजी ने अपने एक मित्र के साथ मिलकर योजना बनायी। 'हम दोनों इस ओर लग जायें तो कार्य बहुत बड़ा नहीं है।'

'पहिले एक ग्राम का संगठन हाथ में लेना होगा।' मित्र ने सलाह दी।

'गाँव के लोग अपने खेत-खलिहान को छोड़कर दूसरी बातों में रुचि ही नहीं लेते।' बद्रीप्रसादजी ने कहा। 'अगले मंगल से प्रतिदिन अपने यहाँ के हनुमानजी पर शाम को रामायण-गान प्रारम्भ किया जाय और रामायण के अन्त में लोगों को संगठन के लिए समझाया जाय।'

'आपके गाँव से श्रीगणेश करना रहेगा तो उत्तम।' मित्र से कहा। 'यहाँ आमका प्रभाव अच्छा है और कुछ उत्साही युवक भी हैं। जो कार्यकर्ता के रूप में मिल जायेंगे। स्थान है ही आपके पास तथा प्रारम्भ में व्यय भी कुछ पड़ना नहीं है।'

'रामायण की कथा के नाम पर लोग एकत्र हो जायेंगे।' बद्रीप्रसादजी का सोचना ठीक ही था। 'कथा-कीर्तन के लिये प्रसाद की व्यवस्था भी लोग सहर्ष कर देंगे और उतने से अभी काम चल निकलेगा।'

गांव में रामायण की कथाके प्रति आदर-भाव है। कभी-कभी लोग मंगलवार को हनुमानजी के पास एकत्र होकर रामायण गाते भी हैं। बड़ा पवित्र मनोविनोद है यह ग्राम के भोले कृषकोंका।

आप जानते ही हैं कि अर्थ की प्रधानता अब गाँवों में भी अपना प्रभाव बढाती जाती है और ग्रामीणों की सरलता, श्रद्धा, ईमानदारी को वह धीरे-धीरे निगलती जा रही है। रात में कोई पशु न खोल ले जाय, खेत चरा न ले, खडी फसल चोर न काट लें - इस प्रकार खेत, खलिहान और घर पर कृषक को सदा सचेत रहना पड़ता है। उसके पसीने की कमाई पर उसी के सहचरों की आँखें रात-दिन लगी रहती हैं। मार-पीट, थाना-कचहरी बराबर चलता रहता है।

'यह सब बंद होना चाहिये।' बद्रीप्रसाद तथा उनके मित्र अभी युवक हैं। उनके रक्त में यौवन की उष्णता है। 'यह होना चाहिये । इसके आगे वे सोचना नहीं चाहते कि वैसा होने में कितनी बाधाएँ हैं। युवक का ओज बाधाओं की गणना करना पसन्द नहीं करता।

'ग्राम के लोग संगठित हो जायें,' बद्रीप्रसादजी ने मित्र से कहा, 'तो सारी घूसखोरी सारी लूट-खसोट और नयायालयों की पूरी धाँधली समाप्त हो जाय।'

'हम ग्राम-संगठन कर लें - भले वे चार गाँव ही हों।' मित्र का रोष नेताओं पर था; क्योंकि उनके सुहृद इन बद्रीप्रसादजी को चुनाव में कांग्रेस टिकट मिला नहीं था। 'तो इन नेताओं का सिर अपने आप ठिकाने आ जायगा।'

'उनकी चिन्ता कौन करता है' बद्रीप्रसादजी को भी संगठन की बात टिकट न मिलने की प्रतिक्रिया के रूप में ही सूझी थीं। वे यह समझ नहीं सके थे कि देश के उच्च नेता तो चाहते ही हैं कि लोग ग्रामों में जाकर जन-सेवा एवं जन-संगठन का कार्य करें।
इस बात को आज सात दिन हो गये। आज मंगलवार है। दोनों युवकों का श्रम सफल रहा है। हनुमानजी पर रामायण-गान में तीन चौथाई ग्रामके लोग एकत्र थे। अन्त में बद्रीप्रसादजी के समझाने पर दस युवक ग्राम कार्यकर्ता बनने को प्रस्तुत हो गये। यह अकल्पनीय सफलता थी उनके लिये।
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'एक वर्ष में यहाँ का संगठन-कार्य पूरा हो जायगा।' बद्रीप्रसादजी जी-तोड़ श्रम कर रहे थे। 'लोंगों को खेत-खलिहान की चोरी से निश्चिन्तता प्राप्त हो जायगी। वे अपनी बहुत सी आदत सुधार लेंगे। नशों के साथ पुलिस तथा न्यायालय को भी यह गाँव नमस्कार कर लेगा।'

गाँव में काम हो रहा था, यह मानना पड़ेगा। सरकार के आर्थिक सहयोग से गाँव की गलियाँ ईंटों से पाट दी गयी। चार पक्के कुएँ बन गये। बद्रीप्रसादजी, स्वयं एक रात्रि-पाठशाला चलाते हैं और एक पुस्तकालय तथा औषधालय भी उनके उद्योग से स्थापित हो गया है। अधिकांश किसानों ने खाद के व्यवस्थित गढ्ढे बना लिये हैं।

'हमारे दस कार्यकर्ता वर्ष भर में दक्ष हो जायंगें।' मित्र का स्वप्न बहुत बड़ा है। 'उन्हें अगले वर्ष पाँच गांवों में भेजा जा सकेगा और एक वर्ष में वे हमें पचास दक्ष कार्यकर्ता दे देंगे। इस प्रकार प्रतिवर्ष पाँच गुने अधिक ग्राम हम हाथ में ले सकेंगे।'

इस उत्साह में दोनों मित्रों को यह दिखायी नहीं पड़ता था कि मनुष्यों के सम्बन्ध में इस प्रकार अंक गणित का हिसाब कभी सच नहीं निकाला है।

दो महीने भी पूरे नहीं हुए थे कि ग्राम के लोगों का उत्साह शिथिल पड़ने लगा था। बद्रीप्रसादजी और उनके मित्रपर कार्य का भार बढता चला जा रहा था।

'मुझे अपनी बहिन की ससुराल जाना है।'

'मुझे ज्वर आ रहा है।'

'इस समय तो बीज बोनेकी शीघ्रता है।'

जो कार्यकर्ता ग्राम सेवा के लिये प्रस्तुत हुए थे, उनमें एक ने भी पूरा समय कभी नहीं दिया - आरम्भ के आठ-दस दिन छोड़कर। कभी बीज बोना है, कभी फसल काटना है, कभी खलिहान सम्हालना है। किसान के पास कार्य की कमी कहाँ है। फिर उसे कभी रिश्तेदारी में जाना पड़ता है और कभी घर के किसी सदस्य के रोगी होने पर सेवा भी करनी पड़ती है।

कार्यकर्ताओं ने पहले समय देना कम किया, फिर दो-चार दिन लगातार सेवा-कार्य से अवकाश लेने लगे और अन्त में एक-एक करके वे सब तटस्थ होते गये।

'उसने मेरा खेत चुरा लिया है। मैं उसे देख लूंगा।'

जहाँ चार आदमी रहते हैं, कहा-सुनी हो ही जाती है। पशु यदा-कदा छूट ही जाते हैं। जो समझदारी एक बार आयी थी, धीरे-धीरे समाप्त होने लगी।

'बद्रीप्रसाद उसका पक्ष करता है। वह उससे मिला हुआ है।' जब स्वार्थ या द्वेष बलवान होता है और सहिष्णुता नहीं रह जाती, मनुष्य अपने हितैषी को भी शत्रु मानने लगता है।

संगठन स्वार्थ की इस चट्टान से टकराकर टूटता जा रहा था। बद्रीप्रसाद एवं उनके मित्र पर वे लोग आक्षेप करने लगे थे, जिनका स्वार्थ रुकता था या जो अपने मनोनुकूल निर्णय कही करा पाते थे। इक्के-दुक्के मुकदमें भी प्रारम्भ हुए और उन्होंने फुट को बढाने में सहायता भी की।

'हम दोनों कब तक इस गाडी को पेल सकेंगे?' अन्त में बद्रीप्रसाद के मित्र हताश होने लगे। उन्हें अपने भीतर स्पष्ट थकावट का अनुभव होने लगा। सच तो यह है कि उनका उत्साह एक स्वप्न को लेकर था - ग्राम, परगना, तहसील, जिले के क्रम से कुछ गिने-चुने वर्षों में एक सुदृढ़ अखिल भारतीय किसान संगठन और उसका वह सर्वोच्च नेता - इतना महान स्वप्न जिसका भग्न हो जाय, वह हिमालय के शिखर से नीचे नहीं गिरेगा? उसका उत्साह चूर-चूर होकर बिखर जाय तो क्या आश्चर्य।
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'हम दोनों ही अब यहाँ से बाहर चले जाना चाहते हैं। ' बद्रीप्रसादजी ने अपने सबसे श्रद्धय उन वृद्ध कर्मठ महापुरुष से प्रार्थना की। 'आप कुछ कर सकें तों इस गाँव के लिये भी कीजिये।'

'सेवा का कार्य वही कर सकता है, जिसकी कर्म में निष्ठा है, जो अपने उद्योग को - अपने श्रम को ही अपना सबसे सुन्दर फल और महान पुरस्कार मानता है।' उन वृद्ध ने कहा। 'मेरे बच्चों।'

'फलाशा के सुनहले स्वप्न तथा निराशा के प्रबल झोंके, ये दोनों कर्म के राजमार्ग के दो ओर हैं। एक उत्तुंग शिखर है, दूसरा गहरा खड्ड - इन दोनों से बचकर चलना है तुम्हें।'

'कार्यकर्ता सब-के-सब बहाने बनाकर पृथक हो गये।' बद्रीप्रसाद ने स्थिति का स्पष्टीकरण किया। 'जिनके लिये श्रम करते हैं, वे पक्षपाती, स्वार्थी और पता नहीं क्या-क्या कहते हैं।'

'ऐसी स्थिति में कोई कबतक लगा रहे, यही कहना चाहते हो ना।' तनिक हंसे वे वृद्ध। 'सफलता, सुयश एवं सम्मान तुम्हारा पुरस्कार नहीं है। इन्हें पुरस्कार के रूप में पानेकी कामना हो तो तुम्हारा सेवा कार्य से पृथक होना ही अच्छा, अन्यथा तुम्हारे द्वारा अनजान में ही कुसेवा होने लगेगी, तुम परार्थ के स्थान पर स्वार्थ चाहोगे। और जहाँ स्वार्थ है - छल, पार्टीबंदी, असत्य, द्वेष, द्रोह, आक्षेप, हिंसा, प्रतिहिंसा आकर रहते है।'

'आप कहना क्या चाहते हैं?' बद्रीप्रसाद गंभीर हुए। वे समझने लगे थे कि उनसे कहाँ भूल हुई है।

'स्वप्न मत देखो। कर्मिष्ठ व्यक्ति भूमि पर रहता है। वर्तमान से संतुष्ट और निराश मत हो। यह तो अन्धकूप में कूदने के समान है।' वृद्ध ने भी पूरी गम्भीरतापूर्वक समझाया। 'तुम जो श्रम, जो उद्योग कर रहे हो - यहीं तुम्हारा पुरस्कार है।'

'उस श्रम को नष्ट करने वाली शक्तियाँ बढ़ रही हैं।' बद्रीप्रसाद की यही मुख्य कठिनाई थी।

'वे तो सदा से हैं। तुम्हारा उत्साह प्रबल था तो वे दीख नही रही थीं। उत्साह शिथिल हुआ तो वे ऊपर आ गयी।' अब वे वृद्ध एक गम्भीर दार्शनिक की भाँति बोल रहे थे। 'देखो, सृष्टि में विनाश तो सदा सक्रिय है। उसके लिए कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता। एक भवन, एक पदार्थ, एक संस्था या एक अन्तःकरण - किसी एक की सुरक्षा एवं स्वच्छता का प्रयत्न शिथिल कर दो, वह मलिन होता जायगा, क्षीण होता जायगा, नष्ट होता जायगा। नवनिर्माण एवं निर्मित को बनाए रखने के लिए, स्वच्छता के लिए निरन्तर जागरूक एवं कर्मशील रहना है। यह कर्म ही हमारा पुरस्कार है।'

'जहाँ कर्म जाग्रत नहीं रहेगा - वह मर जायगा?' बद्रीप्रसाद ने पूछा।

'बच्चे। यह सृष्टि ब्रह्मा के संकल्प से चलती है। वे जब अपना संकल्प त्यागकर सो जाते हैं, यहाँ प्रलय हो जाती है।' वृद्ध ने सूत्र सूना दिया। 'लोक मंगल हो, आत्मकल्याण हो या और कुछ हो, उसमें प्रयत्न की निश्चिन्तता का कुछ अर्थ नहीं। जबतक प्रयत्न है, तभी तक सुरक्षा एवं स्वच्छता है। इसी से कहता हूँ - भागो मत। कहीं भी जाओगे, सेवा में ये सब बाधाएँ आयेंगी ही। तुम्हारा कर्म में ही अधिकार है। कर्म को ही अपना पुरस्कार मानो। उसी में तुम स्वतंत्र हो।'

आगे क्या हुआ, पता नहीं। उस दिन तो वे दोनों युवक उत्साह लेकर लौट आये थे।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: ||
13 - ज्ञानी

आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भविंत इत्थम्भूतगुणो हरि:।।

'तुम काश्मीर से स्वास्थ्य सुधार आये?' श्रीस्वामीजी ने समीप बैठे एक हृष्ट-पुष्ट संम्भ्रान्त नवयुवक से पूछा।
'जी, अभी परसों ही घर लौटा हूँ। लगभग छ: महीने लग गये वहाँ। बड़ा रमणीक प्रदेश है।' युवक संभवत: बहुत कुछ कहना चाहता था।

'सो तो है, किन्तु' स्वामीजी वहां के सौष्ठव का गुणगान सुनने को तनिक भी उत्सुक नहीं थे। उनका स्वभाव नही है इधर-उधर की बातों में लगने का। 'यह छ: महीने का श्रम, अहर्निश शरीर की सेवा, निरन्तर स्वास्थ्य का ध्यान, क्या फल है इसका? वर्षों का श्रम एक क्षण में नष्ट हो जाता है। क्या दशा हो इस काश्मीर प्रवास के छः महीने के सुपरिणाम की, यदि केवल एक दिन कसकर ज्वर आ जाये?' युवक ने मस्तक झुका लिया। वह सिहर उठा था।

'डरो मत। मैं न कोई शाप दे रहा हूँ और न कोई भविष्यवाणी कर रहा हूँ। केवल एक बात कह रहा हूँ।' युवक की भीत मुद्रा महात्मा से छिपी न रही। 'जिसपर ज्वर का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, जो कभी अस्वस्थ नहीं होता, वस्तुतः वही तुम्हारा स्वरूप है।'

'जी इस शरीर का क्या ठिकाना। आज है तो कल नहीं।' एक सेठजी ने, जो बहित समीप ही बैठे थे, बड़ी नम्रता से बात आगे चलायी। 'इसके द्वारा तो जो कुछ पुण्यकार्य हो जाय, वही थोड़ा है।'

'आप प्रसिद्ध दानी हैं। आपका सुयश बहुत व्यापक है।' स्वामीजी ने सेठजी के आत्म-प्रशंसा-प्रयत्न को लक्षित कर लिया था। 'यश धर्म के द्वारा ही प्राप्त होता है, अतः वह दूसरी कामनाओं से श्लाध्य है।'

'मैं कहाँ कुछ कर पाता हूँ।' कोई भी समझ लेता कि सेठजी की यह नम्रता स्वाभाविक नही है।

'मैं दूसरी बात कह रहा था। यश का संबंध भी स्थूल शरीर से ही है।' स्वामीजी का स्वभाव हो गया है, प्रत्येक बात को घुमा-फिराकर अध्यात्मचर्चा का रूप दे देना। 'मरने पर क्या सम्बन्ध रहेगा तुम्हारा इस सुयश से? तुम कह सकते हो कि पिछले किसी भी जन्म में तुम्हीं नेपोलियन, राणा प्रताप या दूसरे कोई विख्यात पुरूष नहीं थे? क्या सुख देती है तुम्हें वह पुर्व प्रख्याती? किसका सुयश और किसका कुयश? सभी यश-अपयश तुम्हारे ही तो हैं। जो परम प्रख्यात, एक एवं अविभाज्य है, उसको यश या अयश देगा भी कौन?'

'घनन, घनन' मन्दिर की घण्टी बज उठी। बड़ा घण्टा बजाया जाने लगा। नगाड़ेपर चोप पड़ी और पुजारी ने मन्दिर का पर्दा हटा दिया भीतर से। दक्षिण हाथ में आरती का प्रदीप एवं वाम में घण्टी लिये वह खड़ा था मूर्ती के समीप। 'श्रीबाँके बिहारीलाल की जय।' सबसे पहले स्वामीजी ही उठ खड़े हुए थे दर्शनार्थ। वस्तुतः तो सभी दर्शनार्थ ही आये थे। मन्दिर के पट बंद होने के
कारण प्रांरण में ही बैठ गये थे और स्वामाजी से बातचीत प्रारम्भ हो गयी थी।

'बडे विचित्र हैं ये स्वामीजी भी।' बाहर आते ही एक ने कहा। स्वामीजी तो अभी भी दर्शनार्थियों में सबसे पीछे खड़े थे और पट बन्द होने के भी दो-चार क्षण पश्चात तक खड़े रहेंगे। उनका तो यही नित्य नियम है। 'बातें तो बडी गम्भीर करते हैं। तत्वज्ञान से नीचे बोलते ही नही और मन्दिर में बच्चों की भाँति आँसू बहाते खड़े हैं।' सम्भवत: स्वामीजी को उन्होंने प्रथम बार
देखा है।

'वे केवल रोते ही नहीं, खूब कूद-फाँदकर नाचते भी हैं।' दूसरे ने गम्भीरता से ही कहा। 'उनकी कुटिया पर कभी कीर्तन के समय आप पधारें तो देखेंगें। यह ब्रज है भाई साहब! यहाँ की वायु में बड़े-बड़े बह जाया करते हैं। आप अभी नये-ही-नये आये हैं यहां।' दोनों साथ-ही-साथ आगे निकल गये।
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(2)
दर्शक चौंक पड़े थे। छोटी-मोटी भीड़ ने उन्हें आवृत कर लिया था। सबको आशचर्य था कि नित्य सबके पीछे शान्त खड़े अश्रु बहाने वाले महात्मा आज इस प्रकार क्यों अट्टहास कर रहे हैं। क्यों इस प्रकार लोट-पोट हो रहे हैं। आज न तो वे भगवद्विग्रह को प्रणाम करते हैं और न उठकर खड़े होते हैं। पागल तो नहीं हो गये।

स्वामीजीने श्रीयमुनाजी के किनारे एक झोपड़ी डाली थी। आज तो भक्तों ने उसे भव्य भवन बना दिया है। चारों ओर पुष्पित उपवन से आवृत हो गया है उनका 'गोविन्द-निवास'। आज कई वर्ष से वृन्दावन की सीमा से बाहर नहीं गये हैं वे।

वेदान्त के वे विख्यात आचार्य हैं। उनके लिखित ग्रन्थों की पंक्तियाँ दूसरे बड़े-बड़े विद्वान कठिनता से लगा पाते हैं। न्याय तो जैसे उन्हीं के मुख से बोलता है और योग की क्रियाएँ उनसे भली प्रकार यहाँ कौन समझता सकता है? कर्म-सिद्धान्त, व्याकरण, साहित्य, कोई भी विषय ऐसा नहीं, जिसमें कोई स्वामीजी की शिष्यता का भी ठीक-ठीक गर्व कर सके। भगवती मरालवाहिनी ने इस युग में उनको ही चुना है अपने वरदहस्त का अधिकारी। ऐसा उद्भट एवं प्रख्यात विद्धान, नैष्ठिक वीतराग इस प्रकार मन्दिर में हँसते-हँसते लोट-पोट हो, पागल नहीं तो और क्या कहा जाय उसे?

'मैं हूँ, मैं हूँ, मैं ही हुँ!' आत्मचिन्तन अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया। इन्द्रिय-निग्रह का प्रश्न ही व्यर्थ था। मन केन्द्र पर एकाग्र हो गया। बुद्धि ने मन से एकात्मता प्राप्त कर ली। शरीर विस्मृत हो चुका था और तब दृश्य की चर्चा करना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती।

स्थिर आसन पर पर्याप्त समय बीत चुका था। प्राणों की गती को मन की गती स्थिरता ने ठप कर दीया था। आप उसे धारणा-ध्यान तथा समाधि का एकीकरण कह सकते हैं। जैसे एक तरंगायमान तत्व है। आकृतियाँ तरंगों का रूप मात्र हैं। तरंगें सीधी होती गयी और अन्तत: एक स्थिर, शान्तस्थिति थी। उसके पश्चात। वह भी नहीं कह सकते कि उसके पश्चात क्या हुआ। क्या स्थिति रही ।

धीरे-धिरे नेत्र खुले। सम्मुख हँसती हुई ललित-त्रिभंगी मूर्ति विराजमान थी। मध्य के दर्शकों पर दृष्टि गयी ही नहीं। जैसे आज दर्शकों की सत्ता ही नहीं थी। थी वह शरारतभरी मुसकराती मूर्ति और पूर्णता से उत्थित हुए वे। आज कुछ अधिक पहले दर्शनार्थ आ गये थे स्वामीजी। उस समय मन्दिर-प्रांगण में कोई भी नही आया था। सामने के बरामदे में ठीक मन्दिर के द्वार के सम्मुख बैठ गये आसन लगाकर। न बिछाने को आसन की आवश्यकता हुई और न कोई उपकरण। नेत्र बन्द हो गये अपने-आप।

'त्वमेवेदं सर्वम्' जैसे मूर्ती बढ़ रही थी, बढ़ती जा रही थी। सम्पूर्ण अनन्त विराट उसने अपने में अन्तर्हित लिया। 'रोम-रोम प्रति राजहिं कोटी-कोटी ब्रह्मांड।' उसमें साकार हो उठा। नहीं - यह सब कुछ नहीं। न ब्रह्मांड न ब्रह्मांड की कोई विशेषता। केवल वही-वही - एकमात्र वही। नेत्र खुले थे, किंतु सन्यासी स्तब्ध हो गये। मूक-चेष्टाहीन।

'क्या निर्वाण तो नहीं लेंगे स्वामीजी यहीं?' लोगों में हलचल मच गयी। फटे-फटे नेत्र, जडवत् शरीर। स्वामीजी की इस स्थिति ने लोगों को भयभीत कर दिया।

'नाहं न में' धीरे-धीरे पलकें हिली। शरीर में चेतेना के लक्षण प्रगट हुए। कुछ बड़बड़ा रहे थे स्वामीजी। 'मैं ही हूँ और मैं नही, केवल तू ही है। बड़ा सुन्दर है तब तो। हम दोनों मित्र हैं। अभेद ही तो मित्रत्व है।' वे ठठाकर हँस पड़े।

'सुहृद सर्वभूतानाम्' वह मन्दिर का देवता तो जाने कब का स्वीकार कर चुका है। स्वामीजी ने फिर कह-कहा लगाया 'बड़ा प्रसन्न हुआ होगा वह ऋषि, जिसने समाधि में वेदमन्त्र का अर्थ स्पष्ट किया होगा।' एक क्षण रुक गये वे। दूसरे ही क्षण उनका कण्ठ सस्वर था - 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखायौ।'
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(3)
जय कन्हैया लालकी। गिरधर गोपाल की।।

एक चमचमाते थाल में ढेरों बत्तियाँ जलायी गयी थी। मध्य में कपूर की सुगन्धित लपटें उठ रही थीं। दाहिने हाथपर ऊपर से नीचे नाच रहा था थाल। स्वामीजी का नृत्य उद्दाम हो गया था। उत्तरीय गिर चुका था कौपीन के ऊपर का अधोवस्त्र। केवल कौपीन पहिने वह कुछ स्थूलकाय, मुण्डित मस्तक, गौरवर्ण, तेजमूर्ती थिरक रहे थे। नेत्र जैसे छत की ओर किसी को देख रहे थे। उनसे आनन्दाश्रु चल रहे थे। प्रांगण की भीड़ कभी इधर, कभी-उधर हट-बढ़ रही थी। उन्हें भीड़ का सम्भवतः भान भी नहीं था।
आज जन्माष्ठमी थी। कई दिनों से प्रतिवर्ष की भाँति स्वामीजी के यहाँ महोत्सव की प्रस्तुति हो रहीं थी। केले के खम्भों पर की छित्रकला संगमरमर की भ्रांती उत्पन्न कर रही थी। मोगरे के फूलों से पुरा मन्दिर ही बना डाला गया था। पर्याप्त दर्शनार्थी आ गये थे जन्म के समय।

पूर्व दिशा में अनुराग बिखर गया। निशीथ का ठीक समय आ पहुँचा। कुमुदकान्त की प्रथम किरण क्षितिज पर थिरक उठी। साथ ही यमुना किनारे एक धड़ाका हुआ। जैसे मन्दिर की वह पीतयवनिका फट गयी हो। पर्दा हटाने में सीमा की स्फूर्ति प्रदर्शित की पुजारी ने।

बाहर शहनाई का मधुर स्वर गूँज रहा था। मन्दिर में घण्टा, घड़ियाल के शब्द कों दबाकर अष्टादश शंख अपने निनाद से संभवत: सृष्टि संलग्न स्त्रष्टा को उनके ब्रह्मलोक में भी सूचित करने दौड़ा जा रहा था पितामह, कन्हैया के जन्म का समय आ गया। एक क्षण को अपने व्यस्त हाथ रोकिये और आप भी ताली बजाकर गाइये तो सही 'जय कन्हैया लाल की।'

ब्राह्मणों ने वेदध्वनी प्रारम्भ की। दुग्धाभिषेक के अनन्तर सहस्त्र तुलसीदल समान्त्रिक चढाये गये। षोडशोपचार पूजन हुआ। अन्त में पुजारी ने आरती की। नीराजन का थाल लेकर दर्शकों को आरती देने मन्दिर से बाहर निकला था वह। अबतक स्वामीजी एकटक मन्दिर में पलने की ओर देख रहे थे। सहसा आगे बढ़े और पुजारी से थाल ले लिया उन्होंने।

'ओह! आपकी तो पूरी हथेली ही फफोला हो गयी है।' प्रसाद वितरण हो चुका था। रात्रि जागरण करना ही था और भजनीकों के तबले की खुट-खुट अभी घंटे भर से कम समय न लेगी। सितार के कान एँठते भी समय लगेगा ही। स्वामीजी को घेर कर कुछ लोग बैठ गये थे। 'अंगुलियों के फफोले तो फुट गये हैं। आरती के थाल के नीचे एक गमछा भी नहीं रखा गया।' दुखित स्वर था कहने वाले का। घृत लगाने लगे वे उस दाहिने हाथ में।

'पवित्र हो गया यह मांसपिण्ड।' स्वामीजी जैसे कोई कष्ट ही नहीं हुआ और न हो रहा था। 'आज जन्माष्टमी है तुम यदि देख सकते है।' उनका कंठ भर आया था। अश्रु टपकने लगे थे। नेत्र अधमुंदे हो चले थे।

'तपोलोक में सब महर्षि ही रहते हैं। बड़ी-बड़ी ज़टा और दाढ़ियों वाले महर्षि।' तनिक आश्वस्त हो कर उन्होंने कहा। 'चिरशिशु सनकादि चारों कुमार ताली बजाते, उछलते-कूदते सचमुच आज शिशु हो जाते हैं। 'जय कन्हैया लाल की।' सबकी दाढियाँ हिला आते हैं। सबकी गम्भीरता, आत्मनिष्ठा आनन्द में डूब जाती है। उन पूर्वजों के पूर्वजों को कौन रोके?' एक-एक योगिराज अपने अन्तर्नेत्रों से तपोलोक का साक्षात करते होंगे, यह किसी के लिये सन्देह का विषय नहीं था।

'सनकादि तो परम ज्ञानी हैं' मैंने ही शंका की।

'तुम क्या समझते हो कि ज्ञानी हृदयहीन होता है?' बड़ी सुन्दर फटकार पड़ी मुझपर। 'वह आनन्द कल्लोलिनी में कभी स्नान कर ही नही पाता? अरे, तुम्हे इतना भी पता नहीं कि सभी शरीरधारियों के लिये फिर वे दिव्य शरीरी हों या भौतिक शरीरधारी, एक ही प्रशस्त मार्ग है -

हिय निरगुन, नयननि सगुन, रसनाराम सुनाम ।
मनहु पुरट सम्पुट लसत, 'तुलसी' ललितललाम ।।
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(4)
'कोई भी काम निरुद्देश्य नहीं किया जा सकता। कुछ-न-कुछ कामना तो होती है उसके मूल में।' मेरा समाधान नही हो सका था जन्माष्टमीको। उस समय अवसर नही था। स्वामीजी भाव-विभोर हो रहे थे। बहुत से लोग थे वहाँ। मैंने आज दोपहरी का एकान्त अवसर अनुकूल पाया था। स्वामीजी भी स्वस्थ थे। 'ज्ञानी पूर्णकाम होता है। वह कोई भी प्रयत्न क्यों करेगा?'

'तुम चाहते हो कि ज्ञानी भोजन-पान-शयन एवं श्वास-प्रश्वास भी बंद कर दे।' स्वामीजी तनिक हंस रहे थे। 'उसके लिए जीवन अपराध है। उसे मर जाना चाहिए और वह भी मरने का बिना कोई प्रयास किये। क्यों?' खुलकर हंसना उनके लिए नवीन बात नहीं है।

'मेरा ऐसा उद्देश्य तो नहीं है।' मैं भी गम्भीर नहीं रह सका। 'प्रकृति प्रेरित कार्य तो उसके द्वारा होंगे ही, किंतु वे कार्य जो अप्रयास नहीं होते, जिन्हें प्रयत्नपूर्वक करना पड़ता है, जिनके लिए प्रकृति विवश नहीं करती, उनके लिए वे क्यों प्रयतन करेंगे? विधि-निषेध का बन्धन तो है नहीं उनके लिए और कोई कामना शेष रही नहीं है।'

'ठीक तो है। तुमको इसमें पूछना क्या रह गया है!' स्वामीजी ने मेरे तर्क को ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया। 'यदि तुम किसी व्यक्ति विशेष की चर्चा कर रहे हो तो मैंने किसी का ठेका नहीं लिया है और यदि मेरे सम्बन्ध में तुम्हें शंका हो तो तुमसे कहा किसने कि मैं ज्ञानी हूँ?'

'मैं किसी की समालोचना नहीं कर रहा हूँ।' स्वामीजी की स्पष्टवादिता ने मुझे कुण्ठित कर दिया था। 'जब प्रयत्न नहीं किया जाता तो हृदय में जो कुछ है, मन उसका चिंतन करता है और वाणी उसी को प्रकट करती है।' मैंने अपना प्रश्न अब भी स्पष्ट न करके भूमिका ही विस्तृत की।

'अच्छा इतना ओर जोड़ दो कि यदि मन में उसे चिन्तन करने और वाणी में उसे प्रकट करने की शक्ति हो।' वे खिलखिलाकर हंस पड़े। मैं जो कुछ कहनेवाला था, उसे समझ लिया था उन्होने। 'भोले बच्चे! तुम गोस्वामी तुलसीदास के वचनों पर शंका करते हो?' चेतावनी के साथ स्नेह और आत्मीयता थी स्वर में।

'मैं केवल समझना चाहता हूँ।' मैंने सच ही कहा। कुतर्क करना भी चाहूँ तो विवाद में स्वामीजी से पार पाने का स्वप्न देखना भी मेरे लिये सम्भव नहीं हो सकता।

'वाणी कोई-न-कोई नाम ही ले सकती है। किसी-न-किसी का गुण दोष ही कहेगी वह। क्यों न वह भगवन्नाम ले और भगवान का ही गुण गाये, यदि उसे मौन नहीं रहना है।' गम्भीर थी वह वाणी।स्थिर दृष्टि जैसे सीधे हृदय तक जाकर उसे पढ़ रही थी। 'नेत्र व्यक्ति को ही देखेंगे और तब मायिक को देखने के बदले वे अमायिक सगुण-साकार के दर्शनार्थ क्यों न समुत्सुक बने?' एक क्षण को रुक गये कुछ सोचते हुए।

'निर्गुण तो हृदय की ही वस्तु है। उसका तो केवल अनुभव हो सकता है।' फिर वही सुशान्त वाणी गुँजी। 'मन बिना कुछ सोचे तो रहेगा नहीं। निर्गुण को भला क्या सोचेगा वह। विश्व एवं विषयों के चिन्तन से तो यही परम श्रेष्ठ है कि वह लीलामय, सकल गुणगणार्णव की दिव्य लीलाओं, परमपावन गुणोंका चिंन्तन करे।'

'क्या श्रेष्ठ है और क्या निकृष्ट, क्या चाहिये और क्या नही चाहिये, यह एक आप्तकाम आत्माराम सोचे ही क्यों?' मैं समझ रहा था कि संभवत: जिज्ञासा हठधर्मी का रूप लेती जा रही है। फिर भी प्रश्न तो हो गया । 'ज्ञानी के नेत्र जो चाहें सो देखें। मन जो चाहे सो सोचे।'

'वही तो होता है।' स्वामीजी भावजगत में पहुँच गये। 'माया तो उससे भीत होकर भाग जाती है। प्रकृति उसे प्रेरित नहीं करती। उसे वह चीर-चोर प्रेरित करने लगता है। उसकी स्वतःचालित गति सर्वसामान्य से भिन्न हो जाती है।' मुझे स्मरण आया -

अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्याः
स्वाराज्यसिहांसनलब्धदीक्षा:।
शठेन केनापि वयं हठेन
दासीकृता गोपवधुविटेन।।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: ||
12 - अर्थार्थी

'बेशर्म कहीं का' सरदार की आखें गुस्से से लाल हो गयी। फड़कते ओठों से उन्होंने डांटा। 'पासमें तो महज एक बूढा ऊँट है ओर हिम्मत इतनी।'

'कसूर माफ हो।' अरब अपमान सह नहीं सकता। अगर उसे रोशन का खयाल न होता तो तेग बाहर चमकती होती। लेकिन वह समझ नहीं सका था कि उसने गलती क्या की है। आखीर वह काना-कुबड़ा नही है। बदशकल भी नहीं है ओर कमजोर भी नही है। अरब न तो रोजगार करता और न खेती। किसी नखलिस्तान की चढ़ाई में वह भी दुशमन से आधे दर्जन ऊँट और बडा-सा तम्बू छीन सकता है। सरदार के ऊँट और उसका तम्बू भी लूट का ही है।

'जैसे कारूँ का खजाना इनके वालिद ने इन्हीं के लिए रख छोड़ा हो। सरदार की तेज जबान पूरे कबीले में मशहूर है। 'कल की सुबह तुम्हें मेरे कबीले में नहीं मिलना चाहिए। तुम जानते हो कि मैं अपने उसूल का पक्का हूँ और दुबारा कसूर माफ की दरख्वास्त कतई कबूल नहीं होगी। मुंह काला करो।' बूढ़ा बड़े जोर से चिल्ला रहा था। उसकी आदत से वाकिफ होने की वजह से किसी ने ख्याल नहीं किया और कोई नहीं आया।

'मैं तेरे टुकड़े नहीं खाता और न कबीला तेरे बाप की पुश्तैनी जायदाद है।' आदमी के सब्र की भी एक हद होती है। बहुत छोटी हद होती है अरब के सब्र की। 'शाम को पंचायत होगी और वही फैसला करेगी कि मैं कबीला दूँ या तू अपनी सरदारी कायम रखने के लिये मेरे साथ तेग के दो हाथ करेगा।' एक झटके से यह तब्बू के बाहर चला गया। उसने परवा नहीं की कि बूढ़ा क्या बड़बड़ा रहा है।

इस कबीले में सरदार ही सब कुछ नहीं है। वह महज मुखिया है कबीले का। उसका मुखियापन भी तभीतक है, जबतक कोई दूसरा उसे ललकार न दे या हर ललकारने वाले को वह नीचा न दिखाता रहे। कबीले का सरदार सबसे बहादुर और मजबूत आदमी रह सकता था। आज बूढे सरदार को, जो बूढ़ा होकर भी फौलाद का बना जान पड़ता था, नौजवान महमूद ने ललकार दिया।

'महमूद!' उसने देखा कि तम्बू के दरवाजे से चिपककर रोशन बाहर खड़ी है। शायद उसने अपने अब्बा की और उसकी बातें सुन ली हैं। कुर्ते का एक किनारा पकड़कर खींच लिया था उसीने। 'मेरे अब्बा का लिहाज-' उसका गला भरा था। चुपचाप रोती खड़ी रही वह।

'पगली है तू!' उसने अपने हाथों से आँसू पोंछ दिये। दोनों साथ-साथ खेले हैं और अब भी साथ-साथ बकरियां चराते हैं। रोशन से पूछकर ही महमूद उसके अब्बा से कहने गया था कि अपनी लड़की का निकाह कर दे उसके साथ। 'तू समझती है कि मैं बूढ़े को मार डालूँगा?'

'वह खुदकशी कर लेगा।' रोशन जानती है कि पंचायत ही सब छोटे-बड़े झगडों का फैसला करती है। कभी भी महमूद को कबीला छोड़ने को पंचायत नहीं कहेगी। उसकी ललकार कबीले के कायदे के मुताबिक मंजूर होगी। बूढा सरदार अगर हारा तो एक साधारण अरब की तरह रहने के बदले मरना ज्यादा पसंद होगा उसे और अगर जीता तो महमूद .....। दोनों हालतें खतरनाक थी उसके लिये।

'तेरा अब्बा कारूँ का खजाना चाहता है।' महमूद ने थोडी देर सिर झुकाकर सोचा। 'मैं वही दूंगा उसे। पंचायत न बुलाऊंगा। उसे कह देना, मैंने उसका हुक्म कबूल किया।' आंखें उठाकर रोशन की ओर देखने की भी जरूरत नही समझी उसने। एकदम मुड़ा और चला गया। रोशन पुकार भी तो नही सकी। देखती रही वह उसकी ओर। देखती रही तबतक, जबतक वह दिखायी देता रहा और फिर सिर पकड़कर बैठ गयी सिसकियाण लेते हुए।
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(2)

'कारूँ का खजाना कहाँ है?' बढ़ी हुई दाढ़ी, फटे मैले कपड़े, शरीर की एक-एक हड्डी गिनी जा सकती थी। कोई बहुत गरीब अरब मुफ्ती की कदमबोसी करके उनके कदमों के पास जमीन पर घुटनों के बल बैठा हूआ पूछ रहा था।

'तुम कहाँ से आये हो?' मुफ्ती को उसके भोलेपन पर हंसी नहीं आयी। उसकी गढ्ढे में घुस गयी आँखें किसी को भी हंसने नहीं दे सकती। दयापरवश मुफ्ती पूछ रहे थे।

'बहुत दूर - बहुत दूर मेरे मालिक। मैं यन्नान कबीले का हूँ। मुझे वहाँ से चले इतने दिन हो गये कि मैंने पूरे छ: चाँद देखे रास्ते में।' दिन को गिनने का कोई तरीका नहीं था उसके पास। महज़ पूर्णिमा के चाँद से उसने कुछ अंदाज कर लिया था।

'ओह, इतनी मेहनत काबाशरीफ के लिये।' मुफ्ती की आँखें भर गयी। उन्होंने युवक को बडे आदर से देखा। 'काबिल तारीफ है तुम्हारी मेहनत। खुदा तुम्हारा जरूर खयाल करेगा।'

'सो कुछ नहीं मेरे मालिक।' युवक ने फिर सिर झुुकाया। 'मैं हज करने नही आया। वैसे मैंने दरबारेशरीफ में बोसा दे लिया है और इस नालायक को आबे-जमजम भी नसीब हो चुका है।' मुफ्ती के लिये यह जरूरी नहीं है कि गरीब-से-गरीब भिखमंगा मुसलमान भी जब मक्काशरीफ करने निकलता है तो बोसा और आबे-जमजम की फीस तो जरूर उसके पास होती है। अपना पेट काटकर भी वह उसे मुहय्या कर लेता है।

'फिर तुमने इतनी बड़ी तकलीफ किस मसलहत से उठायी?' मुफ्ती को ताज्जूब था इस फटेहाल अरब पर। उनका खयाल था कि महज मजहबी जोश ही आदमी को इतनी बड़ी आफत सहने की ताकत दे सकता है।

'मेरा बूढा ऊँट रास्ते की आखिरी मंजिल पर दम तोड़ गया। मुझे तीन-तीन दिन तक पानी भी नसीब नहीं हुआ। बहुत थाोड़े नखलिस्तान पड़े मेरे रास्ते में।' नखलिस्तानों के अरब हज करनेवालों की खातिर करते हैं और रास्ते के लिये पानी व खजूर वगैरह साथ हैं, यह कोई बतलाने की बात नहीं थी।

'आखिर तुम चाहते क्या हो?' मुफ्ती ने अपने कुतूहल को दबाया नहीं। दूसरे अरब सरदार जो पास बैठे थे, वे भी काफी उकता चुके थे और सुन लेने की जल्दी उन्हें भी थी।

'कारूँ के खजाने के लिये। मैंने उसी को पाने के लिये इतनी मुसीबत उठायी है।' युवक ने फिर कदमबोसी की। 'मैं जानता हूँ मेरे मालिक कि आपसे दुनियां की कोई बात छिपी नहीं। आप ही मुझे बता सकते हैं कि वह कहाँ है।'

'कोई नही जानता कि वह कहाँ है?' युवक को मजहब-परस्ती की वजह जो आदर मुफ्ती के मन में उसके लिये हो गया था, एकदम दूर हो गया। अरबों ने मुख फेरकर हंसने की कोशिश की। मुफ्ती ने यह भी नहीं सोचा कि उसको सर्वज्ञ मानने की जो धारणा दूर के अनपढ़ कबीलेवालों में है, उसको वह इस जवाब से खत्म कर रहा है।

'आप जानते हैं - आप जरूर जानते हैं मेरे मालिक।' युवक फिर कदमों पर माथा रगड़ने लगा। वह फूट-फूटकर रो रहा था।

'कोह काकेशश में कहीं पर।' मुफ्ती ने कहानियों में जो सुन रखा था, बतला दिया। 'ठीक पता उसका कोई नहीं जानता। मैं भी नहीं। अगर उसका ठीक पता किसी को होता तो क्या वह अब भी कहीं जमीन में छिपा रहता? उसे निकाल न लिया गया होता है? उसे इस मुर्ख युवक के भोलेपन पर हँसी आ रही थी और लालचीपन पर गुस्सा था।

'तब वह किसे मिलेगा?' अरब ने किसी की हँसी का खयाल नहीं किया।

'जिसे खुदा दे।' मुफ्ती ऊब चुका इस गंदे अरब से।

'जरूर तब वह मुझे देगा।' अरब ने फिर कदमबोसी की और उठकर खड़ा हो गया। उसने यह भी नहीं पूछा कि कोह काकेशश है किस ओर?
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(3)

'ओह, इतना लम्बा कोह काकेशश।' आज जब वह अपनी मंजिल पर पहुंचा तो उसका दिल बैठ गया। रास्ते की मुसीबतों की परवाह नहीं की थी उसने। लगभग समुंद्र के किनारे के शहरों में होता यहाँ तक पहुँचा था और उसकी मुसीबतों का अंदाज आप भी नहीं कर सकेगें। मक्का से पैदल, बिना एक छदाम लिये काकेशश की तराई तक। आदमी को यदि सच्ची 'धुन' हो तो नामुमकिन कुछ नही।

'यहाँ से कई सौ मील ऊपर जाकर यह कोहकाक से मिल जाता है।' पूछने पर एक शख्स ने उसे बतलाया था।' बहुत चौड़ा है। लगभग दो सौ मील चौड़ा। इतना ऊँचा-नीचा है कि तुम इसे सीधे पार करना चाहो तो बहुत थोड़ी खास-खास जगहों से ही कर सकते हो।' बतलानेवाले को क्या खबर कि उसका बयान सुनने वाले के दिल पर क्या गुजर रही है।

'ठीक पता उसका कोई नहीं जानता।' मुफ्ती के इन लफ्जों की असलियत आज उसके दिमाग में शक्ल बनकर खडी हो गयी थी। 'मैं पूरी उमर नही ढूंढ़ सकता। काकेशश को एक सिरे से दूसरे सिरे तक पूरा-पूरा देख डालना किसी फरिश्ते के लिये ही मुमकिन हो सकता है।' अब भी वह नही समझ सका था कि खजाना कहीं बाहर नहीं पड़ा होगा। उसके लिये काकेशश को पूरा खोदना होगा। पता नहीं कितनी गहराई तक।

बैठ गया वह वहीं एक पत्थरपर। रास्ते की सारी थकावट जैसे आज इकट्ठी आकर उसपर लद गयी। सारी मुसीबतें, जिनको उसने तिनके से भी छोटी मानकर ठुकरा दिया था, जैसे आज उससे पूरा बदला वसूल कर लेंगी। सिर चकराने लगा था। देह में कंपकपी जान पड़ती थी। बड़े जोर से खाँसने लगा था वह।

'नहीं, अब नहीं चल सकेगा वह' अब उसमें एक कदम भी चलने की ताकत नहीं है। यहीं - चट्टान पर................। अब वह इस पर से उठ भी नहीं सकेगा। बड़ा भय लग रहा था उसे।

'उसका यन्नान कबीला। हँसते, खेलते, लंबे तगड़़े साथी। उसकी बकरियाँ। छोटे-मोटे टीले। वह खूबसूरती की पुतली रोशन। बूढ़ा खूसट सरदार। सरदार का बिगड़ना। तम्बू के बाहर आँखों में आंसू भरे वह सदा की, हंसती-खेलती, शरारती लड़ती गुमसुम बनी। उसका बूढा 'अंट'।' एक-एक कर तस्वीरें सामने आती जा रहीं थीं। वह चट्टान पर लेट गया था और आँखें बंद कर ली थी। प्यास से गला सूख रहा था। चमड़े के थैले में पानी की एक बूंद नहीं थी और होती भी तो उसमें उठकर खुद पानी पीने की ताकत कहां रह गयी थी आज। वह अब बैठ भी कहाँ सकता है।

'रास्ते के नखलिस्तान। कबीलेवालों की खातिरदारी। जईफों की दुआएँ और हमजोलियों का साथ न दे सकने का अफसोस। जईफ औरतों की सलाहें। मक्काशरीफ, काबे का बोसा। मौलवी-मुल्लों की पैसों के लिये छीना-झपटी। डांट-फटकार।' बेतादाद तस्वीरें उसके सामने से गुजर रही थी।

'जिसे खुदा दे।' मुफ्ती की तस्वीर आखिर में आयी सामने। कितना आबरूदार है मुंफ्ती। लेकिन आखिरी कलाम मुफ्ती का दिमाग में आते ही वह चौंककर उठ बैठा। उसमें पता नहीं कहाँ से ताकत आ गयी। प्यास पता नहीं रफूचक्कर हो गयी। पता नही उसके बदन के किस कोने में जिंदगी का जोश छिपा था।

'मुफ्ती झुठ नहीं बोलता।' उसके पास मुसल्ला कहाँ रखा था। उसी चट्टान पर उसने अपने फटे-फटाये चद्दर को बिछा दिया। 'ज़रूर खुदा ही उस खजाने को दे सकता है।' अब भी उसे याद था वही जवाब जो चलते वक्त उसने मुफ्ती को दिया था। अपने जवाब पर उसे अब भी पूरा यकीन है। कोई वजह नहीं कि वह अपना इतमीनान खो दे। जब खुदा को ही देना है तो वह कहीं भी दे सकता है। पता भी बतला सकता है। जोश के मारे बिना वजू किये ही नमाज पढने खड़ा हो गया। पानी कहाँ था वहाँ वजू करने को?
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(4)

'तेरा जलवा बेशुमार है।' कौन गिनने बैठा था वहाँ कि वह दिन-रात में कितनी नमाजें अदा करता है। बिना रुके, बिना दूसरी बात सोचे वह बराबर एक के बाद दूसरी - नमाज पढता जा रहा था। 'तेरे दरबार में कोई कमी नहीं है और न तेरे लिए कोई मुश्किल है। तेरा यह सबसे छोटा गुनहगार गुलाम कारूँ का खजाना माँगता है। महज कारूँ का खजाना। मेरे मालिक। मेरी दुआ कबूल कर।'
उसकी आँखें इतना पानी बहा चुकी थी कि उनमें अब एक बूंद पानी नहीं बचा था। उसके चमड़े के थैले की तरह वे खुश्क हो चुकी थी। भूख-प्यास-नींद - इनकी हिम्मत नहीं थी कि खुदा की परस्तिश में लगे इस बंदे की छाया भी छू सकें। हर नमाज की आखिरी दुआ जब वह दोनों हाथों को इक्कठा करके हथेली फैलाकर मांगते हुए ऊपर मुख उठाता था, तो जान पड़ता था कि उसकी नजरों से सातों आसमान फट जाएंगे। वह सातवें आसमान का मालिक जरूर कूद पड़ेगा उसकी इन नजरों से मज़बूर होकर।

आज उसे पूरे नौ दिन हो चुके हैं। नमाज के लिए उठना-बैठना भी अब मुश्किल होता जा रहा है। आखिर बिना खाये-पिये जिस्म कहाँ तक बदस्तूर काम कर सकता है। हाँफ जाता है वह हर बार उठने में। बैठने पर उठना दूभर हो जाता है और खड़े होने पर पैर काँपने लगते हैं। सिर में चक्कर आने लगता है। बड़ी दिक्कत होती है झुककर खड़े होने में। लगता है कि वह सामने की ओर लुढ़क जाएगा।

नहीं उठ सका - आखिर जब आफताब उसकी नवें दिन की शाम की नमाज का गवाह होकर कोहकाक के पिछे जा छिपा, तब वह फिर नमाजके लिये किसी तरह उठ न सका। माथा ज़मीन में टेकते ही बेहोश हो गया। जैसे का वैसे ही पड़ा रहा। उस सुनसान जगह में कौन था जो उसकी खोज-खबर लेता। इन नौ दिनों में कोई चरवाहा भी उधर से नहीं निकला था।

'अल्लाह' पता नहीं कितनी देर पर उठाया था उसने सिर। कहीं से उसी वक्त मुर्गे ने बांग दी। शायद वह बाँग उसके कानों तक नही पहुँची। वह ठहाके पर ठहाके लगाता जा रहा था। पेट पकड़कर हंस रहा था। क्या पागल तो नही हो गया।

पता नही कहाँ से फिर बदन में ताकत आ गयी। पता नही अभी कहीं उस हड्डियों के ढांचे में यह ताकत छिपी थी या कहीं से किसी ने उसमें जान फूंक दी थी। मामूली ताकत नही थी वह। वह हँसते हुए चट्टान से नीचे खडा हो गया और एक कोना दोनों हाथों से पकड़ कर चट्टान उसने दूर फेंक दी।

बड़े खुबसूरत जीने नीचे जा रहे थे। किसी तहखाने का दरवाजा निकल पडा था। उसमें नीचे चाहे जो हो जीनोंपर किसी चमकीली चीज की काफी रोशनी थी। उस अँधेरी रात में भी जीने-चमक रहे थे। वह जीनों से नीचे उतर पडा।

'मैं भी कितना नालायक हूँ।' वह कुल आधे घंटे में ही ऊपर आ गया और चट्टान उठाकर उसने फिर जीनों-के ऊपर पहले जैसे ही रख दी। 'माना कि उसमें बहुत बड़े-बड़े, बहुत चमकीले पत्थरों ढ़ेर हैं। पत्थर ही तो हैं वे सब। मेरे मालिक! तूने अपने नापाक बन्दे की दुआ कबूल की और उसे बताया। कौन कहता है कि मैंने ख्वाब देखा था। ये पत्थर, जीने क्या ख्वाब हैं? लेकिन तूने छिपाया है, छिपा ही रहने दे इसको। तेरे बन्दे को अब तेरी दुआ के अलावा कुछ नहीं चाहिये। भाड़ में जाये कारूँ और दोजख में जाये उसका यह खजाना। खूब, शैतान ने भी मुझे खूब बेवकूफ बनाया।'

अब कहने को कुछ नहीं रह गया है। कोह-काकेशश में वह पागलों की तरह घूमा करता है। मुझे नहीं मालूम कि वह खाता क्या है। कभी-कभी चरवाहे उसे खजूर या रोटी जरूर खिला देते हैं। रोजा वह रखता कि नहीं, कौन बतावे, लेकिन नमाज तो उसे पढ़ते कभी देखा नहीं गया। कौन पुछे उससे कि कारूँ के खजाने को लेकर वह कब लौटेगा वह। पूछने पर भी क्या वह जवाब देगा? उसने तो बोलना एकदम बंद कर दिया है।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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||श्री हरिः||
6 - भगवत्प्राप्ति

'मनुष्य जीवन मिला ही भगवान को पाने के लिए है। संसार भोग तो दूसरी योनियों में भी मिल सकते हैं। मनुष्य में भोगों को भोगने की उतनी शक्ति नहीं, जितनी दूसरे प्राणियों में है।' वक्ता की वाणी में शक्ति थी। उनकी बातें शास्त्रसंगत थी, तर्कसम्मत थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि उनका व्यक्तित्व ऐसा था जो उनके प्रत्येक शब्द को सजीव बनाये दे रहा था। 'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।भगवत्प्राप्ति हो गई तो जीवन सफल हुआ और न हुई तो महान हानि हुई।'

प्रवचन समाप्त हुआ। लोगों ने हाथ जोड़े, सिर झुकाया और एक-एक करके जाने लगे। सबको अपने-अपने काम हैं और वे आवश्यक हैं। यही क्या कम है जो वे प्रतिदिन एक घंटे भगवच्चर्चा भी सुनने आ बैठते हैं। परंतु अवधेश अभी युवक था, भावुक था। उसे पता नहीं था कि कथा पल्लाझाड़ भी सुनी जाती है। वह प्रवचन में आज आया था और उसका हृदय एक ही दिन के प्रवचन ने झकझोर दिया था।

सब लोगों के चले जाने के बाद उसने वक्ता से कहा - 'मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है, उपाय बतलाइये।' वक्ता बोले - 'बस, भगवान् को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होनी चाहिए, फिर घर के सारे काम भगवान की पूजा बन जाएंगे।' उसने कहा - 'महाराज! घर में रहकर भजन नहीं हो सकता। आप मुझे स्नेहवश रोक रहे हैं, पर मैं नहीं रुकूंगा।' इतना कहकर वक्ता को कुछ भी उत्तर देने का अवसर दिए बिना ही युवक तुरंत चल दिया।

'भगवान को पाना है - इसी जीवन में पाना है।' सात्विक कुल में जन्म हुआ था। पिता ने बचपन से स्त्रोतपाठादि के संस्कार दिये थे। यज्ञोपवीत होते ही त्रिकाल-संध्या प्रारंभ हो गई, भले पिता के भय से प्रारंभ हुई हो। ब्राह्मण के बालक को संस्कृत पढ़ना चाहिए, पिता के इस निर्णय के कारण कालेज की वायु लग नहीं सकी। इस प्रकार सात्विक क्षेत्र प्रस्तुत था। आज के प्रवचन ने उसमें बीज वपन कर दिया। अवधेश को आज न भोजन रुचा, न अध्ययन में मन लगा। उसे सबसे बड़ी चिंता थी - उसका विवाह होने वाला है। सब बातें निश्चित हो चुकी हैं। तिलक चढ़ चुका है। अब वह अस्वीकार करे भी तो कैसे और - भगवान को पाना है, इस बंधन में पड़े तो पता नहीं क्या होगा।

दिन बीता, रात्रि आयी। पिता ने, माता ने तथा अन्य कई ने कई बार टोका - 'अवधेश! आज तुम खिन्न कैसे हो?' परंतु वह, किससे क्या कहे। रात्रि में कहीं चिंतातुर को निद्रा आती है। अंत में जब सारा संसार घोर निद्रा में सो रहा था, अवधेश उठा। उसने माता-पिता के चरणों में दूर से प्रणाम किया। नेत्रों में अश्रु थे, किंतु घर से वह निकल गया।

'अवधेश का स्वास्थ्य कैसा है?' प्रातः जब पुत्र नित्य की भांति प्रणाम करने नहीं आया, तब पिता को चिंता हुई।

'वह रात को बाहर नहीं सोया था?' माता व्याकुल हुई। उन्होंने तो समझा था कि अधिक गर्मी के कारण वह बाहर पिता के समीप सोया होगा।

पुत्र का मोह - कहीं वह स्वस्थ, सुंदर, सुशील और गुणवान हो, मोह तो माता-पिता को कुरूप, क्षुद्र, दुर्व्यसनी पुत्र का भी होता है। विद्या-विनय सम्पन्न युवक पुत्र जिसका चला जाये, उस माता-पिता की व्यथा का वर्णन कैसे किया जाय। केवल एक पत्र मिला था - 'इस कुपुत्र को क्षमा कर दें! आशिर्वाद दें कि इसी जीवन में भगवत्प्राप्ति कर सकूँ।'
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'आपने यहां अग्नि क्यों जलायी?' वन का रक्षक रुष्ट था - 'एक चिंगारी यहां सारे वन को भस्म कर सकती है।'

'रात्रि में वन पशु न आवें इसलिए!' अवधेश - अनुभवहीन युवक, वह सीधे चित्रकूट गया और वहां से आगे वन में चला गया। उसे क्या पता था कि पहले ही प्रातः काल उसे डांट सुननी पड़ेगी। अत्यंत नम्रतापूर्वक कहा उसने - 'मैं सावधानी से अग्नि बुझा दूंगा।'

'बिना आज्ञा के यहाँ अग्नि जलाना अपराध है।' वन के रक्षक ने थोड़ी देर में ही अवधेश को बता दिया कि भारत के सब वन सरकारी वन-विभाग द्वारा रक्षित हैं। वहां अग्नि जलाने की अनुमति नहीं है। वहाँ के फल-कंद सरकारी सम्पत्ति हैं और बेचे जाते हैं। वन से बिना अनुमति कुछ लकड़ियां लेना भी चोरी है।

'हे भगवान!' बड़ा निराश हुआ अवधेश। वन में आकर उसने देखा था कि उसे केवल जंगली बेर और जंगली भिंडी मिल सकती है। वह समझ गया था कि ये भी कुछ ही दिन मिलेंगे, किंतु वैराग्य नवीन था। वह पत्ते खाकर जीवन व्यतीत करने को उद्यत था, परंतु वन में तो रहने के लिए भी अनुमति आवश्यक है। आज कहीं तपोवन नहीं है।

'आप मुझे क्षमा करें। मैं आज ही चला जाऊँगा।' वन-रक्षक से उसने प्रार्थना की। वैसे भी जंगली भिंडी और जंगली बेर के फल के आहार ने उसे एक ही दिन में अस्वस्थ बना दिया था। उसके पेट और मस्तक में तीव्र पीड़ा थी। लगता था कि उसे ज्वर आने वाला है।

'आप मेरे यहाँ चलें।' वन-रक्षक को इस युवक पर दया आ रही थी। यह भोला बालक तपस्या करने आया था - कहीं यह तपस्या का युग है। 'आज मेरी झोपड़ी को पवित्र करें।'

अवधेश अस्वीकार नहीं कर सका। उनका शरीर किसी की सहायता चाहता था। उनके लिए अकेले पैदल वन से चित्रकूट बस्ती तक जाना आज सम्भव नहीं रह गया था। 'यदि ज्वर रुक गया - कौन कह सकता है कि वह नहीं रुकेगा।' अवधेश तो कल्पना से ही घबरा गया। उसने सोचा ही नहीं था कि वन में जाकर वह बीमार भी पड़ सकता है।
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'आप मुझे अपनी शरण में ले लें।' बढ़े केश, फटी-सी धोती, एक कई स्थानों से पिचका लोटा - युवक गौरवर्ण है, बड़े-बड़े नेत्र हैं, किंतु अत्यंत दुर्बल है। सम्भ्रांत कुल का होने पर भी लगता है कि निराश्रित हो रहा है। उसने महात्मा के चरण पकड़ लिये और उनपर मस्तक रखकर फूट-फूटकर रोने लगा।

'मुझे और सारे विश्व को जो सदा शरण में रखता है, वही तुम्हें भी शरण में रख सकता है।' ये महात्माजी प्रज्ञाचक्षु हैं। गंगाजी में नौका पर ही रहते हैं। काशी के बड़े से बड़े विद्वान भी बड़ी श्रद्धा से नाम लेते हैं इनका। इन्होंने युवक को पहचाना या नहीं, पता नहीं किंतु आश्वासन दिया - 'तुम पहले गंगा स्नान करो और भगवत्प्रसाद लो। फिर तुम्हारी बात सुनूंगा।'

'आप मुझे अपना लें। मेरा जीवन व्यर्थ नष्ट हो रहा है।' युवक फूट-फूटकर रो रहा था - 'मुझे नहीं सूझता कि मुझे कैसे भगवत्प्राप्ति होगी।'

'तुम पहले स्नान-भोजन करो।' महात्मा ने बड़े स्नेह से युवक की पीठ पर हाथ फेरा - 'जो भगवान को पाना चाहता है, भगवान स्वयं उसे पाना चाहते हैं। वह तो भगवान को पायेगा ही।'

युवक ने स्नान किया और थोड़ा सा प्रसाद शीघ्रतापूर्वक मुख में डाल कर गंगाजल पी लिया। उसे भोजन-स्नान की नहीं पड़ी थी। वैराग्य सच्चा था और लगन में प्राण थे। वह कुछ मिनटों में ही महात्माजी के चरणों को पकड़कर उनके समीप बैठ गया।
'पहले तुम यह बताओ कि तुमने अबतक किया क्या?' महात्माजी ने तनिक स्मित के साथ पूछा।

'बडा़ लम्बा पुराण है।' अवधेश - हां, वह युवक अवधेश ही है - यह आपने समझ लिया होगा। उसने अपनी बात प्रारंभ की। उसने बताया कि वह खूब भटका है इधर चार वर्षों में। उसे एक योगी ने नेती, धोती, न्यौली, ब्रह्मदांतौन तथा अन्य अनेक योग की क्रियाएँ करायी। उन क्रियाओं के मध्य ही उसके मस्तक में भयंकर दर्द रहने लगा। बड़ी कठिनाई से एक वृद्ध संत की कृपा से वह दूर हुआ। उन वृद्ध संत ने योग की क्रियाएँ सर्वथा छोड़ देने को कह दिया।

'ये मूर्ख!' महात्माजी कुछ रुष्ट हुए - 'ये योग की कुछ क्रियाएँ सीखकर अपने अधूरे ज्ञान से युवकों का स्वास्थ्य नष्ट करते फिरते हैं। आज कहां है अष्टांग योग के ज्ञाता। यम-नियम की प्रतिष्ठा हुई नहीं जीवन में और चल पड़े आसन तथा मुद्राएँ कराने। असाध्य रोग के अतिरिक्त और क्या मिलता है इस व्यायाम के दूषित प्रयत्न में।'

'मुझे एक ने कान बंद करके शब्द सुनने का उपदेश दिया।' अवधेश ने महात्माजी के चुप हो जाने पर बताया - 'एक कुण्डलिनी योग के आचार्य भी मिले। मुझे घनगर्जन भी सुनाई पड़ा और कुण्डलिनी जागरण के जो लक्षण वे बताते थे, वे भी मुझे अपने में दीखे। नेत्र बंद करके मैं अद्भुत दृश्य देखता था, किंतु मेरा संतोष नहीं हुआ। मुझे भगवान नहीं मिले - मिला एक विचित्र झमेला।'

'अधिकारी के अधिकार को जाने बिना चाहे जिस साधन में उसे जोत दिया जाय - वह पशु तो नहीं है।' महात्माजी ने कहा - 'धारणा, ध्यान, समाधि - चाहे शब्दयोग से हो या लययोग से, किंतु जीवन में चांचल्य बना रहेगा और समाधि कुछ क्रिया मात्र से मिल जायगी, ऐसी दुराशा करनेवालों कहा क्या जाय। जो भगवद्दर्शन चाहता है उसे सिखाया जाता है योग....! भगवान की कृपा है तुम पर। उन्होंने तुम्हें कहीं अटकने नहीं दिया।'

'मैं सम्मान्य धार्मिक अग्रणियों के समीप रहा और विश्रुत आश्रमों में। कुछ प्रख्यात पुरुषों ने भी मुझपर कृपा करनी चाही।' अवधेश में व्यंग्य नहीं, केवल खिन्नता थी - 'जो अपने आश्रम-धर्म का निर्वाह नहीं कर पाते, जहाँ सोने-चाँदी का सेवन और सत्कार है, जो अनेक युक्तियां देकर शिष्यों का धन और शिष्याओं का धर्म अपहरण करने का प्रयत्न करते हैं, वहां परमार्थ और अध्यात्म भी है, यह मेरी बुद्धि ने स्वीकार नहीं किया।'

'कलियुग का प्रभाव - धर्म की आड़ में ही अधर्म पनप रहा है।' महात्माजी में भी खिन्नता आयी - 'जहाँ संग्रह है, विशाल सौध हैं, वहां साधुता कहाँ है। जहाँ सदाचार नहीं, इन्द्रियतृप्ति है, वहाँ से भगवान या आत्मज्ञान बहुत दूर है। परंतु इतनी सीधी बात लोगों की समझ में नहीं आती। सच तो यह है कि हमें कुछ न करना पड़े, कोई आशिर्वाद देकर सब कुछ कर दे, इस लोभ से जो चलेगा वह ठगा तो जायगा ही। आज धन और नारी का धर्म जिनके लिए प्रलोभन हैं, ऐसे वेशधारियों का बाहुल्य इसीलिए है। ऐसे दम्भी लोग सच्चे साधु-महात्माओं का भी नाम बदनाम करते हैं।

'मैं करने को उद्यत हूँ।' अवधेश ने चरणों पर मस्तक रखा - 'मुझे क्या करना है, यह ठीक मार्ग आप बताने की कृपा करें।'

'घर लौटो और माता-पिता को अपनी सेवा से संतुष्ट करो।' महात्माजी ने कहा - 'वे चाहते हैं तो विवाह करो। घर के सारे काम भगवान की पूजा समझकर करो - यही तो उस वक्ता ने तुमसे कहा था।

'देव!' अवधेश रो उठा।

'अच्छा, आज अभी रुको।' महात्माजी कुछ सोचने लगे।
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'ये पुष्प अंजलि में लो और विश्वनाथजी को चढ़ा आओ।' प्रातः स्नान करके जब अवधेश ने महात्माजी के चरणों में मस्तक रखा, तब महात्माजी ने पास रखी पुष्पों की डलिया खींच ली। टटोलकर वे अवधेश की अंजलि में पुष्प देने लगे। बड़े-बड़े सुंदर कमल पुष्प - थोड़े ही पुष्पों से अंजलि पूर्ण हो गई। महात्माजी ने खूब ऊपर तक भर दिये पुष्प।

असीघाट से अंजलि में पुष्प लेकर नौका से उतरना और उसी प्रकार तीन मील दूर विश्वनाथजी आना सरल नहीं है। परंतु अवधेश ने इस कठिनाई की ओर ध्यान नहीं दिया। वह पुष्पों से भरी अंजलि लिए उठा।

'कोई पुष्प गिरा तो नहीं?' महात्माजी ने भरी अंजलि से नौका में पुष्प गिरने का शब्द सुन लिया।

'एक गिर गया।' अवधेश का स्वर ऐसा था जैसे उससे कोई बड़ा अपराध हो गया हो।

'कहाँ गिरा, गंगाजी में?' फिर प्रश्न हुआ।

'नौका में' अवधेश खिन्न होकर बोला - 'मैं सम्भाल नहीं सका।'

'न विश्वनाथ को चढ़ सका, न गंगाजी को।' महात्माजी ने कहा - 'अच्छा, अपनी अंजलि के पुष्प मुझे दे दो।'

अवधेश ने महात्माजी की फैली अंजलि में अपनी अंजलि के पुष्प भर दिये। महात्माजी ने कहा - 'बाबा विश्वनाथ!' और सब पुष्प वहीं नौका में गिरा दिये।

'भैया, ये पुष्प विश्वनाथजी को चढ़ गए?' पूछा महात्माजी ने।

'चढ़ गए भगवन।' अवधेश ने मस्तक झुकाया।

'बच्चे! तू जहाँ है, भगवान तेरे पास ही हैं। वहीं तू उनके श्रीचरणों पर मस्तक रख।' महात्माजी ने अबकी कुछ ऐसी बात कही जो भली प्रकार समझ में नहीं आयी।

'वहां किनारे एक कोढ़ी बैठता है।' साधु होते ही विचित्र हैं। पता नहीं कहां से कहां की बात ले बैठे महात्माजी।
'वह बैठा तो है।' इंगित की गयी दिशा में अवधेश ने देखकर उत्तर दिया।

'देख, वह न नेती-धोती कर सकता, न कान बंद कर सकता और न माला पकड़ सकता।' महात्माजी समझाने लगे - 'वह पढ़ा-लिखा है नहीं, इसलिए ज्ञान की बात क्या जाने। परंतु वह मनुष्य है। मनुष्य जन्म मिलता है भगवत्प्राप्ति के लिए ही। भगवान ने उसे मनुष्य बनाया, इस स्थिति में रखा। इसका अर्थ है कि वह इस स्थिति में भी भगवान को तो पा ही सकता है।'
'निश्चय पा सकता है।' अवधेश ने दृढ़तापूर्वक कहा।

'तब तुम्हें यह क्यों सूझा कि भगवान घर से भागकर वन में ही जानेपर मिलते हैं।' महात्माजी ने हाथ पकड़कर अवधेश को पास बैठाया - 'क्यों समझते हो कि गृहस्थ होकर तुम भगवान से दूर हो जाओगे। जो सब कहीं है, उससे दूर कोई हो कैसे सकता है।'
'मैं आज्ञा पालन करुंगा।' अवधेश ने मस्तक रखा संत के चरणों पर। उसका स्वर कह रहा था कि कुछ और सुनना चाहता है - कोई साधन।

'भगवान साधन से नहीं मिलते।' महात्माजी बोले - 'साधन करके थक जाने पर मिलते हैं। जो जहां थककर पुकारता है - 'प्रभो! अब मैं हार गया, वहीं उसे मिल जाते हैं। या फिर उसे मिलते हैं जो अपने को सर्वथा उनका बनाकर उन्हें अपना मान लेता है।'
'अपना मान लेता है?' अवधेश ने पूछा।

'संसार के सारे संबंध मान लेने के ही तो हैं।' महात्माजी ने कहा - 'कोई लड़की सगाई होते ही तुम्हें पति मान लेगी और तुम उसके पति हो जाओगे। भगवान तो हैं सदा से अपने। उन्हें अपना नहीं जानते, यह भ्रम है। वे तुम्हारे अपने ही तो हैं।'

'वे मेरे हैं - मेरे भगवान।' पता नहीं क्या हुआ अवधेश को। वह वहीं नौका में बैठ गया - बैठा रहा पूरे दिन। लोग कहते हैं - कहते तो महात्माजी भी हैं कि अवधेश को एक क्षण में भगवत्प्राप्ति हो गई थी।

लेखक : श्री सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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