Biikrmjet Sing

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ਕਿੰਨੀ ਅਜੀਬ ਗੱਲ ਹੈ ਨਾ ਰੱਬ ਤੋਂ ਅਸੀਂ ਸਭ ਕੁਝ ਮੰਗਦੇ ਹਾਂ ਤੇ ਉਸ ਦੀ ਗੱਲ ਤੋਂ ਬੋਰ ਵੀ ਹੁੰਦੇ ਹਾਂ ਤੇ ਜਿਸ ਦੀਆ ਗੱਲਾਂ ਤੋਂ ਤੇ ਜਿਸ ਤੋਂ ਅਸੀਂ ਬੋਰ ਹਾਂ ਉਸ ਤੋਂ ਮੰਗਣ ਦੇ ਅਸੀਂ ਕਿਵੇਂ ਹਕੱਦਾਰ ਹਾਂ।।

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Happy Dussehra To All:- इक्क लख पूत सवा लाख नाती तह रावण घर दिया न बाती।। 2. राम गयो रावण गयो जा को बहो परिवार।।कहो नानक किछु थिर नहीं सुपनै जेओं संसार।। अर्थ:- जिस रावण के 1 लाख पुत्र थे और सवालाख पोते थे उसके घर मे काल ने 1 भी दीपक या बाती नहीं छोड़ा।। 2. राम जी भी काल वश हुए और रावण भी काल वश हुए जिनका कितना बड़ा परिवार था।। नानक कहे रहे हैं कि इस जगत में कुछ भी स्थिर नहीं है यानी सभी 5 तत्व काल वश हैं और यह संसार सपने की तरह ही है।। और सत्य है मन का प्रकाश व परमात्मा ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रकाश।। ©Biikrmjet Sing

#ਗਿਆਨ #Dussehra  Happy Dussehra To All:- 

इक्क लख पूत सवा लाख नाती तह रावण घर दिया न बाती।। 2. राम गयो रावण गयो जा को बहो परिवार।।कहो नानक किछु थिर नहीं सुपनै जेओं संसार।।

अर्थ:- जिस रावण के 1 लाख पुत्र थे और सवालाख पोते थे उसके घर मे काल ने 1 भी दीपक या बाती नहीं छोड़ा।। 2. राम जी भी काल वश हुए और रावण भी काल वश हुए जिनका कितना बड़ा परिवार था।। नानक कहे रहे हैं कि इस जगत में कुछ भी स्थिर नहीं है यानी सभी 5 तत्व काल वश हैं और यह संसार सपने की तरह ही है।। और सत्य है मन का प्रकाश व परमात्मा ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रकाश।।

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#Dussehra

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देवियों के नाम का आध्यात्मिक अर्थ:- असल मे देवीओ के नाम हमारे मन=जोत=प्रकाश की स्थिति पर हैं।। मन को जीव इस्त्री कहा है और परमात्मा को पति व कंत कहा है:- 1. दुर्गा=नाम=प्रकाश=दुर्गुणों यानी हउमै रूपी विकार को काट कर मन को प्रकाश में ले जाने वाली।। 2. काली:- जिसमें नाम=प्रकाश को एकदृष्ट करने का ज्ञान तो है पर क्रोध पर विजय नहीं प्राप्त हुई इसलिए क्रोध में जीहभा बाहर है मुख से।। 3. सन्तोषी- जिसमे नाम धया कर संतोख उत्पन्न हो गया हो।। 4. पार्वती- जिस जीव मन को परमेश्वर अपना माध्यम यानी सन्त बनाये जिसका मन प्रकाश कर दे ओर वह परमेश्वर ओर वह जीवमन एक हो कर एक दूसरे में समा गए हों।। 5. लक्ष्मी:- मन का लक्ष्य नाम रूपी धन=प्रकाश=परमेश्वर जिस मन ने पा लिया हो।। 6. सरस्वती:- जिसने ज्ञान का सुरमा अपने नेत्रों में गुरमुखों द्वारा डलवा लिया हो।। 7. नैना देवी- जिसके नेत्रों ने एकदृष्ट करने की कला को यानी नाम=प्रकाश=परमात्मा को ध्याना सीख लिया हो।। 8. कामख्या देवी- यानी माया रूपी गर्भ में सोया मन=जोत=प्रकाश खुद को शरीर समझता है पर गुरमुखों द्वारा ज्ञान की जाग नेत्रों में डालने पर मन का सूक्ष्म प्रकाश की दुनिया मे जन्म लेना।। 9. वैष्णो देवी- जो मन त्रै-गुण माया यानी रजो-तमो-स्तो से मुक्त हुआ और जो विष्णु जी की सर्वोच्च माया सतोगुण से भी मुक्त हुए मन जो प्रकाश में समा गया को वैष्णो देवी की संघ्या दी गयी है।। ©Biikrmjet Sing

#नव_देवी_आध्यात्मिक_अर्थ #ਗਿਆਨ  देवियों के नाम का आध्यात्मिक अर्थ:-

असल मे देवीओ के नाम हमारे मन=जोत=प्रकाश की स्थिति पर हैं।। मन को जीव इस्त्री कहा है और परमात्मा को पति व कंत कहा है:- 

1. दुर्गा=नाम=प्रकाश=दुर्गुणों यानी हउमै रूपी विकार को काट कर मन को प्रकाश में ले जाने वाली।।

2. काली:- जिसमें नाम=प्रकाश को एकदृष्ट करने का ज्ञान तो है पर क्रोध पर विजय नहीं प्राप्त हुई इसलिए क्रोध में जीहभा बाहर है मुख से।।

3. सन्तोषी- जिसमे नाम धया कर संतोख उत्पन्न हो गया हो।।

4. पार्वती- जिस जीव मन को परमेश्वर अपना माध्यम यानी सन्त बनाये जिसका मन प्रकाश कर दे ओर वह परमेश्वर ओर वह जीवमन एक हो कर एक दूसरे में समा गए हों।।

5. लक्ष्मी:- मन का लक्ष्य नाम रूपी धन=प्रकाश=परमेश्वर जिस मन ने पा लिया हो।।

6. सरस्वती:- जिसने ज्ञान का सुरमा अपने नेत्रों में गुरमुखों द्वारा डलवा लिया हो।।

7. नैना देवी- जिसके नेत्रों ने एकदृष्ट करने की कला को यानी नाम=प्रकाश=परमात्मा को ध्याना सीख लिया हो।।

8. कामख्या देवी- यानी माया रूपी गर्भ में सोया मन=जोत=प्रकाश खुद को शरीर समझता है पर गुरमुखों द्वारा ज्ञान की जाग नेत्रों में डालने पर मन का सूक्ष्म प्रकाश की दुनिया मे जन्म लेना।।

9. वैष्णो देवी- जो मन त्रै-गुण माया यानी रजो-तमो-स्तो से मुक्त हुआ और जो विष्णु जी की सर्वोच्च माया सतोगुण से भी मुक्त हुए मन जो प्रकाश में समा गया को वैष्णो देवी की संघ्या दी गयी है।।

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नवरात्र का चौथा दिन:- चौदह चार कुण्ट प्रभु आप।। सगल भवन पूर्ण प्रताप।। दसे दिसा रवैया प्रभु एक।। धरन आकाश सब में प्रभु पेख।। जल थल बन पर्बत पाताल।। परमेश्वर तह बसे दयाल।। सुखम अस्थूल सगल भगवान।। नानक गुरमुख ब्रम्ह पछान।। अर्थ- नवरात्र के चौथे दिन चारो दिशाओं में प्रकाश=प्रभु खुद बस रहा है।। तीनो भवनो में यानी धरती-आकाश-पाताल में उस निराकार प्रकाश का प्रताप पुर्ण रूप से छाया है।। दसों दिशाओं में वह एक प्रकाश रूपी प्रभु समाया हुआ है।। धरती यानी नीचे स्पेस में देखने पर फिर साहमने व मस्तक के साहमने देखने पर सब जगह उसी को देखना है यानी निराकार प्रकाश सर्वत्र है।। जल में भूमि पर वनों में पर्वत पर धरती के नीचे भी प्रभु=प्रकाश ही बस रहा है।। सूक्ष्म में यानी जो एकदृष्ट करके दिव्य दृष्टि से सूक्ष्म प्रकाश=प्रभु है और जो शरीरों में बसा स्थूल रूप ज्योति है वह सब भगवान ही तो है।। हे नानक! तू सच्चे गुरमुखो यानी जिन की वाणी पर बैठ कर वह आप बोलता है व जिनके मस्तक पर वह प्रगट हो गया है यानी जिस मन को उसने अपना माध्यम चुना है व खालसा बनाया है ऐसे गुरमुखो से मिल कर तू दिव्य दृष्टि ले इन्ही नेत्रों में ज्ञान का सुरमा डाल व एकदृष्ट करने की कला को सीख कर तू हे मन ! उस ब्रहम=प्रकाश=अनंत को पहचान ले।। ©Biikrmjet Sing

#चौथा_नवरात्र #ਗਿਆਨ  नवरात्र का चौथा दिन:- 

चौदह चार कुण्ट प्रभु आप।। सगल भवन पूर्ण प्रताप।। दसे दिसा रवैया प्रभु एक।। धरन आकाश सब में प्रभु पेख।। जल थल बन पर्बत पाताल।। परमेश्वर तह बसे दयाल।। सुखम अस्थूल सगल भगवान।। नानक गुरमुख ब्रम्ह पछान।।

अर्थ- नवरात्र के चौथे दिन चारो दिशाओं में प्रकाश=प्रभु खुद बस रहा है।। तीनो भवनो में यानी धरती-आकाश-पाताल में उस निराकार प्रकाश का प्रताप पुर्ण रूप से छाया है।। दसों दिशाओं में वह एक प्रकाश रूपी प्रभु समाया हुआ है।। धरती यानी नीचे स्पेस में देखने पर फिर साहमने व मस्तक के साहमने देखने पर सब जगह उसी को देखना है यानी निराकार प्रकाश सर्वत्र है।। जल में भूमि पर वनों में पर्वत पर धरती के नीचे भी प्रभु=प्रकाश ही बस रहा है।। सूक्ष्म में यानी जो एकदृष्ट करके दिव्य दृष्टि से सूक्ष्म प्रकाश=प्रभु है और जो शरीरों में बसा स्थूल रूप ज्योति है वह सब भगवान ही तो है।। हे नानक! तू सच्चे गुरमुखो यानी जिन की वाणी पर बैठ कर वह आप बोलता है व जिनके मस्तक पर वह प्रगट हो गया है यानी जिस मन को उसने अपना माध्यम चुना है व खालसा बनाया है ऐसे गुरमुखो से मिल कर तू दिव्य दृष्टि ले इन्ही नेत्रों में ज्ञान का सुरमा डाल व एकदृष्ट करने की कला को सीख कर तू हे मन ! उस ब्रहम=प्रकाश=अनंत को पहचान ले।।

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नवरात्र का तीसरा दिन:- तरौदसि तीन ताप संसार।। आवत जात नर्क अवतार।। हरि हरि भजन न मन मय आएओ।। सुख सागर प्रभु निमख न गाएओ।। हरख सोग का देह कर बाधेओ।। दीर्घ रोग माया आसाधेओ।। दिन्हे बिकार करत सर्म पाएओ।।नैनी नींद सुपन बर्राएओ।। हरि बिसरत होवत एह हाल।। सरन नानक प्रभ पुरख दएआल।। अर्थ:- नवरात्र के तीसरे दिन अपने मन रूपी संसार को तीन ताप लगे हैं यानी मन रजो-तमो-स्तो में फंसा है।। बार-2 इन तीनो गुणों व ताप में फंस कर मन ऐसे नर्क में आता जाता रहता है।। परमात्मा के नाम के व्यख्यान जिसमे हो, ऐसी परमात्मा के गुणों की कथा, मन के ख्याल में, कभी नहीं आयी।। सुखों के सागर देने वाला प्रभु की एक पल भी हरिकथा नहीं गाई।। खुशी-गमी से बंधा मन प्रकाश अपनी देह से अटैच हुआ पड़ा है।। बहुत ही क्रोनिक रोग लगा है मन को किसका माया यानी रजो-तमो-स्तो में फंसने का जिससे छूटने के कोई भी हल नहीं मिल रहा इसे।। दिन भर विकारों में फंस कर मन अपनी रोजी रोटी शरीर के लिए कमाता है।। नेत्रों में रात को भी साउंड स्लीप नहीं आती रात भर स्वप्न ले कर भी कारोबार व पैसे की चिंता में मन अर्ध नींद में भी बड़बड़ाता रहता है।। परमात्मा की पहचान को गर्भ से निकलने के बाद भूलने पर जीवमन का यह हाल होता है! जब तक सच्चे सन्त ज्ञान का सुरमा नेत्रों में नहीं डाल देते।। इसलिए हे मन! तू सच्चे सन्तों को ढूंढ, जिनके जरिए तू उस नानक के निराकार प्रभु पुरख की शरण मे, दयालु प्रभु की शरण मे जा सके।। ©Biikrmjet Sing

#तीसरा_नवरात्र #ਗਿਆਨ  नवरात्र का तीसरा दिन:- 
तरौदसि तीन ताप संसार।। आवत जात नर्क अवतार।। हरि हरि भजन न मन मय आएओ।। सुख सागर प्रभु निमख न गाएओ।। हरख सोग का देह कर बाधेओ।। दीर्घ रोग माया आसाधेओ।। दिन्हे बिकार करत सर्म पाएओ।।नैनी नींद सुपन बर्राएओ।। हरि बिसरत होवत एह हाल।। सरन नानक प्रभ पुरख दएआल।।

अर्थ:- नवरात्र के तीसरे दिन अपने मन रूपी संसार को तीन ताप लगे हैं यानी मन रजो-तमो-स्तो में फंसा है।। बार-2 इन तीनो गुणों व ताप में फंस कर मन ऐसे नर्क में आता जाता रहता है।। परमात्मा के नाम के व्यख्यान जिसमे हो, ऐसी परमात्मा के गुणों की कथा, मन के ख्याल में, कभी नहीं आयी।। सुखों के सागर देने वाला प्रभु की एक पल भी हरिकथा नहीं गाई।। खुशी-गमी से बंधा मन प्रकाश अपनी देह से अटैच हुआ पड़ा है।। बहुत ही क्रोनिक रोग लगा है मन को किसका माया यानी रजो-तमो-स्तो में फंसने का जिससे छूटने के कोई भी हल नहीं मिल रहा इसे।। दिन भर विकारों में फंस कर मन अपनी रोजी रोटी शरीर के लिए कमाता है।। नेत्रों में रात को भी साउंड स्लीप नहीं आती रात भर स्वप्न ले कर भी कारोबार व पैसे की चिंता में मन अर्ध नींद में भी बड़बड़ाता रहता है।। परमात्मा की पहचान को गर्भ से निकलने के बाद भूलने पर जीवमन का यह हाल होता है! जब तक सच्चे सन्त ज्ञान का सुरमा नेत्रों में नहीं डाल देते।। इसलिए हे मन! तू सच्चे सन्तों को ढूंढ, जिनके जरिए तू उस नानक के निराकार प्रभु पुरख की शरण मे, दयालु प्रभु की शरण मे जा सके।।

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नवरात्रि के दूसरे दिन:- दुआदसि दान नाम इश्नांन।। हरि की भगत करो तज मान।। हरि अमृत पान करो साधसंग।। मन तृप्तासेय कीर्तन प्रभ रंग।। कोमल बानी सब को सन्तोख़ेय।। पंचभूआत्मा हरि नाम रस पोखै।। गुर पुरै ते एह नेहचओ पाइए।। नानक राम रमत फिर जोन न आइए।। अर्थ:- नवरात्रि के दूसरे दिन सन्तों द्वारा दिये गए एकदृष्ट रूपी नाम दान में मन का इश्नांन करो।। अभिमान छोड़ कर परमात्मा प्रकाश को निहारने की भगति करो।। सच्चे साधु के संग से अमृत=नाम=प्रकाश=प्रभु को निहारो यानी मन द्वारा ध्यान में नेत्रों द्वारा दर्शन रूपी अमृत पान करो निराकार संग।। ओर मन को सन्तुष्टि मिलेगी रब=प्रकाश के गुण गा कर व प्रकाश के दर्शन करके।। सन्तो के मुख से की कोमल हरिकथा सब के नेत्रों को संतोख देगी व एकदृष्ट कर देगी यानी दिव्य दृष्टि कर देगी।। उस आकाश तत्व से सम्बंधित सर्वत्र रहने वाली आत्मा=प्रकाश जो हम में भी है! हरिनाम=प्रकाश को निहारने में नेत्रों की दृष्टि में दिखने लगेगी यानी हमारा प्रकाश रूप व परमात्मा का प्रकाश रूप एक हो जाएगा व दोनों एक रूप में मिक्स हो जायेगे।। यह सच्चे गुर=विधि=नाम=प्रकाश=एकदृष्ट/कला करने द्वारा यह दृर्ता मिलेगी।।हे नानक इस तरह निराकार=प्रकाश=राम में ध्यान के रमने से जन्म/मरण में फिर नहीं आना पड़ेगा।। ऐसा दूसरा नवरात्रा मनाओ गुरबानी अनुसार।। ©Biikrmjet Sing

#दूसरा_नवरात्र #ਗਿਆਨ  नवरात्रि के दूसरे दिन:- 

दुआदसि दान नाम इश्नांन।। हरि की भगत करो तज मान।। हरि अमृत पान करो साधसंग।। मन तृप्तासेय कीर्तन प्रभ रंग।। कोमल बानी सब को सन्तोख़ेय।। पंचभूआत्मा हरि नाम रस पोखै।। गुर पुरै ते एह नेहचओ पाइए।। नानक राम रमत फिर जोन न आइए।।

अर्थ:- नवरात्रि के दूसरे दिन सन्तों द्वारा दिये गए एकदृष्ट रूपी नाम दान में मन का इश्नांन करो।। अभिमान छोड़ कर परमात्मा प्रकाश को निहारने की भगति करो।। सच्चे साधु के संग से अमृत=नाम=प्रकाश=प्रभु को निहारो यानी मन द्वारा ध्यान में नेत्रों द्वारा दर्शन रूपी अमृत पान करो निराकार संग।। ओर मन को सन्तुष्टि मिलेगी रब=प्रकाश के गुण गा कर व प्रकाश के दर्शन करके।। सन्तो के मुख से की कोमल हरिकथा सब के नेत्रों को संतोख देगी व एकदृष्ट कर देगी यानी दिव्य दृष्टि कर देगी।। उस आकाश तत्व से सम्बंधित सर्वत्र रहने वाली आत्मा=प्रकाश जो हम में भी है! हरिनाम=प्रकाश को निहारने में नेत्रों की दृष्टि में दिखने लगेगी यानी हमारा प्रकाश रूप व परमात्मा का प्रकाश रूप एक हो जाएगा व दोनों एक रूप में मिक्स हो जायेगे।। यह सच्चे गुर=विधि=नाम=प्रकाश=एकदृष्ट/कला करने द्वारा यह दृर्ता मिलेगी।।हे नानक इस तरह निराकार=प्रकाश=राम में ध्यान के रमने से जन्म/मरण में फिर नहीं आना पड़ेगा।। ऐसा दूसरा नवरात्रा मनाओ गुरबानी अनुसार।।

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व्रत कैसे मन ने रखना है! ©Biikrmjet Sing

#एकादषी #ਗਿਆਨ  व्रत कैसे मन ने रखना है!

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