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मेरे रोग वो यू लगा बैठे 
कि जैसे सावन में बूंद जमी पर आ बैठे
कुछ साथ तो रहा उनका 
फिर जमी में ही बूंद समा बैठे 
मेरे रोग वो यू लगा बैठे
हम भी बदले बदले से हो गये हैं 
ये कैसे असर है या कोई नया सफ़र है
हम उनसे जुड़े औऱ वो हमसे 
इस कदर हम औऱ करीब आ बैठे
मेरे रोग वो यू लगा बैठे #NojotoQuote

मेरे रोग

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दूसरों की खुशियों में खुश नहीं
कैसा ये रोग है।
रोग का भी क्या खूब 
हो रहा उपयोग है!
निंदा रसपान करेे कोई ,
कोई लगा रहा भोग है !
अजीब लोग हैं...

झूट , कानों से कानों तक पहुंच रहा
गजब का उद्योग है!
जिस कान तक पहुंच गया
वो सालों - साल निरोग है!
मगर पहुंचा , हर कान तक , अलग अलग
गजब का संजोग है!
अजीब लोग है...

मदद में साथ नहीं खड़ा कोई मगर
निंदा में खूब हो रहा सहयोग है!
बंटता जा रहा सभी में
क्या ये मोहनभोग है!!
इलाज इसका कुछ दिखता नहीं
क्या ये प्रेम रोग है!!!
अजीब लोग है...।

रोग

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छोटी सी उम्र में लगा के इश्क़ का 
                   रोग.......
       हमने अपनी बर्बादियों को खबर कर दी.........

pagal deewana..... #NojotoQuote

#रोग मोहॉब्त का

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 10

।।श्री हरिः।।
15 - तामस त्याग

नियतस्य तु संन्यास: कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तितः।।
(गीता 18।7)

लंबा, दुबला, तनिक साँवला शरीर, गोल मुख, कुछ भीतर गड्ढे में धँसे मटमैले छोटे नेत्र। वे खादी पहिनते हैं; किंतु वह दूध-सी उजली कभी नहीं रहती। अपने हाथ साबुन लगाने से जितनी सफेद हो जाय और साबुन भी चौथे-पाँचवे ही तो मिल पाता है। अवस्था कितनी है, मुझे पता नहीं; किंतु सिर, दाढी और मूंछों के अधिकांश केश श्वेत हो चुके हैं। विद्वान् हैं - हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी तीन भाषाएँ जानते हैं। मैंने कभी नहीं पूछा कि कोई चौथी भाषा भी जानते हैं या नहीं। केवल खादी ही नहीं पहिनते, स्वाधीनता-संग्राम में भाग लेकर कारागार की चहारदीवारी के भीतर भी रह आये हैं।

उन पर रोष आना कठिन है। उन्हें देखकर दया आती है; किंतु उनसे दूर दूर रहना ही अच्छा है। पता नहीं किस बात पर वे रुष्ट हो जायें। जहाँ जायंगे - 'यहाँ यह होना चाहिए। तुम लोग यह क्यों नहीं करते? यह असावधानी, यह बेईमानी......' पता नहीं दर्जनों दोष उन्हें एकदम एक साथ दीख कैसे जाते हैं। दोष कहाँ नहीं होते, किसमें नहीं होते? हमारी असावधानी, अपूर्णता और परिस्थिति-जन्य विवशता - किंतु वे कुछ सुनना नहीं चाहते।

'मैं यह सब क्षमा नहीं कर सकता। समाचारपत्रों में लिखूंगा। अधिकारियों को सूचित करूंगा। किसी ने न सुना तो मेरे व्याख्यान जनता को बौखला देंगे। तुम लोगों को मैं निकलवाकर छोडूंगा।' भय और चिंता की कोई बात नहीं, वे इनमें से कुछ करनेवाले नहीं। वे यह कुछ कर नहीं सकते, यह मैं नहीं कह रहा हुँ। करने की योग्यता और शक्ति उनमें है; किंतु तत्परता नहीं है। आप निश्चिन्त रह सकते हैं। किंतु बोलना उनका स्वभाव है, उसे रोका नहीं जा सकता।

जहां रहेंगे - रहने की बात तो दूर, जहाँ घंटे-दो-घंटे को पहुँच जायेंगे, सबको क्षुब्ध कर देंगे। कोई व्यक्ति हल्ला मचाकर किसी को त्रुटियों का वर्णन आस पास प्रारम्भ कर दे, एक बार वातावरण को प्रतिकूल तो बना ही देता है। आप अपनी ऐसी आलोचना पसंद करेंगे?

'यहाँ यह होना चाहिये। यहाँ ऐसा प्रबन्ध होना चाहिये! यह बात एकदम नहीं होनी चाहिये। यह काम यहां न होकर वहाँ होना चाहिये। यह आदमी इस कार्य से अविलम्ब हटा दिया जाना चाहिये।' आप पूछेंगे, इसकी अपेक्षा उन्हें नहीं। अपने सुझाव देंगे ही और इतने उच्च स्वर में देंगे कि आपके साथ दस आदमी और सून लेंगे। उनके सुझावों को चरितार्थ करने की क्षमता तो कदाचित् ही किसी में निकले।

बड़े त्यागी हैं वे। कोई संग्रह नहीं उनके पास। शरीर पर पूरे वस्त्र तक नहीं। एकाध पुस्तक कदाचित कभी रख लेते हैं, कितने दिन रहेगी। पैसा है नहीं। मिल जाय तो रह नहीं पाता। अमुक वस्तु प्राप्त ही हो जाय, ऐसा भी कोई आग्रह नहीं दीखा उनमें। किसी पर लगातार कई दिन रुष्ट रहते हों सो भी नहीं। उनका क्रोध क्षणों का भले न होता हो, बद्धमूल भी नहीं होता।

निद्रा उन्हें आती नहीं। क्यों नहीं आती, कह पाना मेरे लिए कठिन है। यद्यपि मैं साधारण चिकित्सक हूँ - मैंने चेष्टा की और एकाध दिन निद्रा उन्हें आ भी गयी; किंतु वे तो इस तमोगुण को स्वीकार ही नहीं करना चाहते। निद्रा को समय का दुरुपयोग मानते हैं।

कोई साधुवेश उन्होंने स्वीकार नहीं किया है। गृहस्थ उन्हें आप कह नहीं सकते; क्योंकि गृह का त्याग कर दिया है उन्होंने। पत्नी की मृत्यु के पश्चात् घर उन्हें रहने के उपयुक्त नहीं जान पड़ा। अब दस-पांच दिन या
महीने-दो-महीने एक स्थान में, फिर दूसरे स्थानों मे - घूमते ही अवस्था व्यतीत हो रही है। अच्छा ही है यह उनके लिए। वे कहीं जमकर रहने लगे, उस स्थान के दूसरे लोगो को निश्चय बाध्य कर देंगे कि वे घर-द्वार छोड़कर भाग खड़े हों।

सुना है, पढा भी है कि त्याग से शान्ति प्राप्त होती है। राग अशान्ति का हेतु है, यह निर्विवाद तथ्य है। जब हेतु नहीं रहा, अशान्ति क्यों रहनी चाहिये? किंतु सच मानिये, इतना अशान्त मनुष्य मैंने नहीं देखा। स्वयं रात-दिन अशान्त और जहाँ रहे, दूसरे आस-पास के लोगों की शान्ति को फटकार कर दूर भगा देने वाला।

निरन्तर व्यग्र, निरन्तर दुखी व्यक्ति आपने नहीं देखा होगा। उनके मुखपर भी कभी-कभी प्रसन्नता दीखती है; किंतु बहुत कम। उनके क्रोध से भी भयंकर है उनका रुदन। वे किस बात पर क्रोध करेंगे और किस पर फूट-फूट कर रोते हुए अपने भाग्य को, अपनी असमर्थता को कोसने लगेंगे, कहना कठिन है। मुझे उन पर दया आती है; किंतु मैं उनसे दूर-दूर रहना ही पसंद करता हूँ।
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'आपने घर छोड़ा तो कोई आप पर आश्रित नहीं था?' एक दिन मैंने उनसे पूछा। प्राय: आ बैठते हैं और इनकी-उनकी इतनी त्रुटियाँ, इतने अपराध-विवरण उनके समीप सदा रहते हैं कि आप रात्रि-जागरण पसन्द कर लें तो भी उनकी सामग्री समाप्त नहीं होगी। मैं अल्पप्राण मनुष्य हूँ। बहुत थोड़ा धैर्य, बहुत कम सुनते रहने की शक्ति मुझमें है। उन्हें रोकने-टोकने का अर्थ है उनके रोष या रुदन को आमन्त्रण देना। इसलिए मैं अपनी ओर से कोई चर्चा चलाने का प्रयत्न करता हूँ और यदि इसमें असफल हो गया, नेत्र बन्द करके बिना निद्रा के सो जाने का अभिनय एकमात्र मेरा सहारा है।

'छोटे दो बच्चे थे।' उन्होंने इतनी तटस्थता से उत्तर दिया, मानो वे बच्चे उनके नहीं, किसी मनुष्य के भी नहीं, बकरी या मुर्गी के उपेक्षणीय शिशु थे।

'उनका पालन-शिक्षण .........।'

'आप इन व्यर्थ की बातों की चिन्ता क्यों करते हैं।' मुझे बीच में ही उन्होंने रोक दिया - 'सब अपना-अपना
लेकर आते हैं। अपने भाग्य का भोग उन्हें भोगना चाहिये। उनके लिए गृह में बँधे रहने को तो मनुष्य का जन्म नहीं मिला है।'

'मनुष्य का जन्म किसलिए मिला है।' यह प्रश्न करने का साहस मुझमें नहीं था। जानता था कि इसके उत्तर में वे जो प्रवचन प्रारम्भ करेंगे, वह कई घण्टे अविराम चलता रहेगा। वे ऐसे वक्ता नहीं जो बोलते-बोलते थक जाते हैं। सामान्य वक्तृत्व की बात तो दूर, किसी को कोसने में भी उन्हें बीच में पानी नहीं पीना पड़ता।

'मनुष्य-जन्म किस प्रकार सफल कर रहे हैं।' मुझे पागल कुत्ते ने नहीं काटा था कि मैं उनसे इस प्रकार पूछपर उनके क्रोध का पात्र बनता। क्रोध यदि उस समय उनको न आता - कोई सौभाग्य की बात नहीं होती। तब वे फूट-फूट कर क्रन्दन करने लगते और उनका रुदन मुझे उनके क्रोध से अधिक कष्टदायी लगता है।

'आप नियमित संध्या करते हैं?' जब भी वे मेरे पास आ बैठते हैं, उनकी अविराम वाग्धारा को अटकाने के लिए मुझे अपने मस्तिष्क पर दबाव डालना पड़ता है किंतु यह बात आपसे कह दी, उनसे मत कहिये। वे निजी प्रश्नों से कतराते हैं। जिन प्रश्नों के उत्तर में उनके पिछले जीवन का विवरण हो, उनके कर्तव्याकर्तव्य की पूछताछ हो, उन प्रश्नों का उत्तर वे दो शब्दों में देना चाहते हैं। जब देखते हैं कि आज उनसे ऐसे ही प्रश्न पूछे जायँगे, उन्हें कोई अत्यावश्यक कार्य स्मरण आ जाता है। आप समझ गये होंगे कि मैं उनसे प्रायः कैसी बातें पूछता होऊँगा।

'मैं इन कर्मकाण्डों को महत्त्व नहीं देता।' उनके स्वर में ऊबने का भाव स्पष्ट था। वे ब्राह्मण हैं, पर बड़ी सी चुटिया रखते नहीं; शिखाशुन्य भी आप उन्हें नहीं कह सकते। सिर के केश छोटे रखते हैं, अतः शिखा के स्थान पर जो दस-पाँच कुछ बड़े बाल हैं, वे उन्हें हिन्दू बताते हैं। वैसे जनेऊ खादी के सूत का खूब मोटा पहनते हैं वे।

'मैंने एक आदमी को अभी मिलने का वचन दिया है।' वे उठ खड़े हुए। मुझे तो इसकी आशा ही थी। मैं उनसे निजी प्रश्न न करूं, उनको कभी अपना किसी को दिया वचन स्मरण नहीं आ सकता।
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'तुम दूसरों के दोष देखने में जितना समय देते हो, उतना यदि भजन करने में लगाओ।' उस दिन मैं एक वीतराग महात्मा के पास गया था। देखा, वे वहाँ बैठे लोगों में सबसे आगे बैठे हैं। महात्मा उनको समझा रहे हैं - 'तुम्हें भी शान्ति मिले और दूसरों को भी तुमसे उद्वेग न हो।'

'मैं दूसरों के दोष देखता हूँ और आप सबके गुण-ही-गुण देखते हैं। मुझमें कोई गुण नहीं दीखता आपको।' वे बिगड़ उठे। 'लोग मनमानी करते रहें, पर किसी को बोलना नहीं चाहिये। जनता के पैसे और सार्वजनिक स्थानों का दुरुपयोग लोग कर रहे हैं, मैं उसे चलने नहीं दे सकता। जनता-जनार्दन की सेवा भगवान का भजन नहीं है, यह कहने वाला शास्त्रों का तात्पर्य तनिक भी नहीं समझता।'

वे खड़े हो गए आवेश के मारे और बोलते रहे। वहाँ बैठे लोगों में से एक समझदार सज्जन उठे। बड़ी नम्रतापूर्वक वे उन्हें साथ लेकर चले गये एक ओर। सबका समय नष्ट न हो, सबके सत्संग में बाधा न पड़े, इसलिए उन्होंने अपने सत्संग का समय उनको पृथक ले जाने में लगाया।

'त्याग से शान्ति मिलनी चाहिए।' मुझे जब अवसर मिला, मैंने महात्माजी से पूछा। ‘इनमें न संग्रह की प्रवृति है, न वस्तुओं का मोह दीखता है। किन्तु इतना अशान्त पुरुष........।'

'नारायण, त्याग सात्विक हो तो उससे निश्चय शान्ति प्राप्त होती है।' महात्मा ने मुझे बताया। 'परन्तु राजस त्याग शान्ति नहीं देता। वह तो निष्फल ही जाता है। त्याग राजस न होकर यदि तामस हो जाय तो अशान्ति का उद्भव बन जाता है।'

'त्याग से अशान्ति उत्पन्न होती है?' मैंने आश्चर्य के साथ पूछा। आपको भी यह बात सरलता से गले उतरती नहीं जान पड़ेगी।

'नारायण, यदि तुम स्नान का त्याग कर दो अथवा अपने वस्त्रों को स्वच्छ करने का प्रयत्न त्याग दो', महात्मा ने स्नेहभरे स्वर में समझाया - 'क्या होगा, जानते हो?'

'वस्त्र मैले हो जायेंगे, देह मैल से ढक जायगा।' मुझे स्वीकार करना पड़ा। 'दुर्गन्धि आयेगी और रोग आ सकता है।'

'इस त्याग ने तुमको और तुम्हारे समीपस्थों को क्या दिया - शान्ति या अशान्ति?' महात्मा का प्रश्न सीधा था। उत्तर बिना दिये ही दे दिया गया मुझे।

'नियत कर्तव्य का त्याग किसी अवस्था में उचित नहीं है। अज्ञान या कुतर्कवश कोई इसका त्याग कर ही दे' साधु कह रहे थे - 'इस तामस त्याग से उसके मन का मल बढता जायगा। कर्तव्य का पालन तो चित्त की नित्य स्वच्छता का हेतु है। वह स्वच्छता अवरुद्ध हुई, मल एकत्र होने लगा। जहाँ मल होगा, वहाँ दुर्गन्धि और रोग होगे। स्वयं तथा दूसरों को भी अशान्त तथा कष्ट के अतिरिक्त और क्या मिलेंगे, ऐसी स्थिति में।'

वे त्यागी हैं - बेचारे..........किंतु उन्हें समझाने का साहस मुझमें नहीं है। आप में से यदि कोई साहस कर सकते हों.......।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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राजनीति लकवे के रोग से जो त्रस्त हुई,
ऐसे रोग हेतु हमें उपचार चाहिए
डिग्री लिए जो नित्य घूमता है  दफ्तरों में,
देश के भविष्य हेतु रोजगार चाहिए 
वंशवाद वाली राजनीति हम देख चुके,
लोक हित परिपूर्ण सरकार चाहिए 
लुटने न पाए देश टूटने न पाए देश,
देश की सुरक्षा हेतु चौकीदार चाहिए

चौकीदार

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