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खंडहर बरसों से यहां कोई था नहीं, या होकर भी कोई य

खंडहर

बरसों से यहां कोई था नहीं,
या होकर भी कोई यहां का हुआ नहीं,
तय वक्त के लिए कोई होगा बंधा यहां,
जिसको अगले पल जाना कहां ये पता नहीं।

भिन्न भिन्न किरदारों से रूबरू करवा रही,
हरेक कोना यहां एक नई धुन गुनगुना रही,
बेरंग, बेजान, इतर - बितर पड़ी मानवीय कृतियां, 
बरसों की दास्तानें क्षण में सुना रही।

©Ruchi Jha
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